View Full Version : !!मेरी प्रिय कविताएँ !!
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:28 PM
मै पिंजर का तोता
उड़ता था मै नील गगन में
अपने पंख पसारे
मधुर गीत मै गाता था
अपने प्रीतम के द्वारे
जाने कौन घडी में किसने
कैसा जाल बिछाया
पल भर में न देर लगी
खुदको पिंजर में पाया
अब ...........मै पिंजर का तोता
लोग देखकर मुझको कहते
कितना प्यारा गाता है
सोने के पिंजर में देखो
सारे सुख पाता है
पथिक मगर तुम अपने अंतर के
अंतरपट को खोलो
मेरे इन मधु गीतों को
तुम विरह बात से तोलो
क्यूंकि .......मै पिंजर का तोता .
सोने के यह दर दरवाजे
मेरे खातिर धेला है
शान-ओ-शौकत, रिश्ते नाते
मेरे खातिर मेला है
"अंजना" कब कौन मुसाफिर
मुझको ले जायेगा
न जाने कब पिंजर तोता नील गगन पायेगा
अब तो हूँ.........मै पिंजर का तोता
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:32 PM
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
चिर अतीत में ’आज’ समाया,
उस दिन का सब साज समाया,
किंतु प्रतिक्षण गूँज रहे हैं नभ में वे कुछ शब्द तुम्हारे!
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
लहरों में मचला यौवन था,
तुम थीं, मैं था, जग निर्जन था,
सागर में हम कूद पड़े थे भूल जगत के कूल किनारे!
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
साँसों में अटका जीवन है,
जीवन में एकाकीपन है,
’सागर की बस याद दिलाते नयनों में दो जल-कण खारे!’
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:35 PM
अच्छी किताब
एक अच्छी किताब अन्धेरी रात में
नदी के उस पार किसी दहलीज़ पर
टिमटिमाते दीपक की ज्योति है
दिल के उदास काग़ज़ पर
भावनाओं का झिलमिलाता मोती है
जहाँ लफ़्ज़ों में चाहत के सुर बजते है
ये वो साज़ है
इसे तनहाइयों में पढ़ो
ये खामोशी की आवाज़ है
एक बेहतर किताब हमारे जज़्बात में
उम्मीद की तरह घुलकर
कभी हँसाती, कभी रुलाती है
रिश्तों के मेलों में बरसों पहले बिछड़े
मासूम बचपन से मिलाती है
एक संजीदा किताब
हमारे सब्र को आज़माती है
किताब को ग़ौर से पढ़ो
इसके हर पन्ने पर
ज़िन्दगी मुस्कराती है
देवमणि पांडेय
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:37 PM
अजनबी
अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ न कहें
अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक
तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र न छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म न दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें
चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।
दीप्ति नवल (Actress)
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:40 PM
जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है|
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |
~dushyant kumar
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:42 PM
आँखों की ख़ुशबू
आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है
दिल को बहलावा नहीं दर्द दिया जाता है
दर्द जो है इश्क़ में वह ही ख़ुदा है सबका
दर्द के पहलू में यार को सजदा किया जाता है
आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…
तुम याद आ रहे हो और तन्हाई के सन्नाटे हैं
किन-किन दर्दों के बीच ये लम्हे काटे हैं
अब साँसें बिखरी हुई उधड़ी हुई रहती हैं
हमने साँसों के धागे रफ़्ता-रफ़्ता यादों में बाटे हैं
आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…
इस जनम में हम मिले हैं क्योंकि हमें मिलना है
तुम्हारे प्यार का फूल मेरे दिल में खिलना है
दूरियाँ तेरे-मेरे बीच कुछ ज़रूर हैं सनम
मगर यह फ़ासला भी एक रोज़ ज़रूर मिटना है
आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…
विनय प्रजापति 'नज़र'
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:45 PM
अधर मधु किसने किया सृजन?
अधर मधु किसने किया सृजन?
तरल गरल!
रची क्यों नारी चिर निरुपम?
रूप अनल!
अगर इनसे रहना वंचित
यही विधान,
दिए विधि ने तप संयम हित
न क्यों दृढ़ प्राण ?
सुमित्रानंदन पंत
Sikandar_Khan
08-12-2010, 12:47 PM
अधूरा मकान
उस रास्ते से गुज़रते हुए
अक्सर दिखाई दे जाता था
वर्षों से अधूरा बना पड़ा वह मकान
वह अधूरा था
और बिरादरी से अलग कर दिए आदमी
की तरह दिखता था
उस पर छत नहीं डाली गई थी
कई बरसातों के ज़ख़्म उस पर दिखते थे
वह हारे हुए जुआड़ी की तरह खड़ा था
उसमें एक टूटे हुए आदमी की परछाईं थी
हर अधूरे बने मकान में एक अधूरी कथा की
गूँज होती है
कोई घर यूँ ही नहीं छूट जाता अधूरा
कोई ज़मीन यूँ ही नहीं रह जाती बांझ
उस अधूरे बने पड़े मकान में
एक सपने के पूरा होते -होते
उसके धूल में मिल जाने की आह थी
अभाव का रुदन था
उसके खालीपन में एक चूके हुए आदमी की पीड़ा का
मर्सिया था
एक ऐसी ज़मीन जिसे आंगन बनना था
जिसमें धूप आनी थी
जिसकी चारदीवारी के भीतर नम हो आये
कपड़ों को सूखना था
सूर्य को अर्ध्य देती स्त्री की उपस्थिति से
गौरवान्वित होना था
अधूरे मकान का एहसास मुझे सपने में भी
डरा देता है
उसे अनदेखा करने की कोशिश में भर कर
उस रास्ते से गुज़रती हूँ
पर जानती हूँ
अधूरा मकान सिर्फ़ अधूरा ही नहीं होता
अधूरे मकान में कई मनुष्यों के सपनों
और छोटी-छोटी ख्वाहिशों के बिखरने का
इतिहास दफ़्न होता है ।
संध्या गुप्ता
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।
मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,
मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,
आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।
रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जा*ए छला क्या,
जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
मृत-सजीवन था तुम्हारा तो परस ही,
पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,
मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
हरिवंशराय बच्चन
आज फिर से
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
है कंहा वह आग जो मुझको जलाए,
है कंहा वह ज्वाल पास मेरे आए,
रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,
नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,
आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
मैं तपोमय ज्योती की, पर, प्यास मुझको,
है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,
स्नेह की दो बूंदे भी तो तुम गिराओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूंगा,
कल प्रलय की आंधियों से मैं लडूंगा,
किन्तु आज मुझको आंचल से बचाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
हरिवंशराय बच्चन
आज मुझसे बोल, बादल!
तम भरा तू, तम भरा मैं,
ग़म भरा तू, ग़म भरा मैं,
आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल
आज मुझसे बोल, बादल!
आग तुझमें, आग मुझमें,
राग तुझमें, राग मुझमें,
आ मिलें हम आज अपने द्वार उर के खोल, बादल
आज मुझसे बोल, बादल!
भेद यह मत देख दो पल-
क्षार जल मैं, तू मधुर जल,
व्यर्थ मेरे अश्रु, तेरी बूंद है अनमोल, बादल
आज मुझसे बोल, बादल!
हरिवंशराय बच्चन
आज़ादी का गीत
चांदी, सोने, हीरे मोती से सजती गुड़िया
इनसे आतंकित करने की घडियां बीत गई
इनसे सज धज कर बैठा करते हैं जो कठपुतले
हमने तोड़ अभी फेंकी हैं हथकडियां
परम्परागत पुरखो की जागृति की फिर से
उठा शीश पर रक्खा हमने हिम-किरीट उजव्व्ल
हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल
चांदी, सोने, हीरे, मोती से सजवा छाते
जो अपने सिर धरवाते थे अब शरमाते
फूल कली बरसाने वाली टूट गई दुनिया
वज्रों के वाहन अम्बर में निर्भय गहराते
इन्द्रायुध भी एक बार जो हिम्मत से ओटे
छत्र हमारा निर्मित करते साठ-कोटी करतल
हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादल
हरिवंशराय बच्चन
आत्मदीप / हरिवंशराय बच्चन
मुझे न अपने से कुछ प्यार,
मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक,
ज्योति चाहती, दुनिया जब तक,
मेरी, जल-जल कर मैं उसको देने को तैयार|
पर यदि मेरी लौ के द्वार,
दुनिया की आँखों को निद्रित,
चकाचौध करते हों छिद्रित
मुझे बुझा दे बुझ जाने से मुझे नहीं इंकार|
केवल इतना ले वह जान
मिट्टी के दीपों के अंतर
मुझमें दिया प्रकृति ने है कर
मैं सजीव दीपक हूँ मुझ में भरा हुआ है मान|
पहले कर ले खूब विचार
तब वह मुझ पर हाथ बढ़ाए
कहीं न पीछे से पछताए
बुझा मुझे फिर जला सकेगी नहीं दूसरी बार|
आत्मपरिचय / हरिवंशराय बच्चन
मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!
मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!
मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!
मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;
जग भ्व-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!
मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!
कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर,
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!
मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!
मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!
आदर्श प्रेम / हरिवंशराय बच्चन
प्यार किसी को करना लेकिन
कह कर उसे बताना क्या
अपने को अर्पण करना पर
और को अपनाना क्या
गुण का ग्राहक बनना लेकिन
गा कर उसे सुनाना क्या
मन के कल्पित भावों से
औरों को भ्रम में लाना क्या
ले लेना सुगंध सुमनों की
तोड उन्हे मुरझाना क्या
प्रेम हार पहनाना लेकिन
प्रेम पाश फैलाना क्या
त्याग अंक में पले प्रेम शिशु
उनमें स्वार्थ बताना क्या
दे कर हृदय हृदय पाने की
आशा व्यर्थ लगाना क्या
आ रही रवि की सवारी / हरिवंशराय बच्चन
आ रही रवि की सवारी।
नव-किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों-से अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी।
आ रही रवि की सवारी।
विहग, बंदी और चारण,
गा रही है कीर्ति-गायन,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।
आ रही रवि की सवारी।
चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह-
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।
आ रही रवि की सवारी।
इतने मत उन्मत्त बनो / हरिवंशराय बच्चन
इतने मत उन्मत्त बनो!
जीवन मधुशाला से मधु पी
बनकर तन-मन-मतवाला,
गीत सुनाने लगा झुमकर
चुम-चुमकर मैं प्याला-
शीश हिलाकर दुनिया बोली,
पृथ्वी पर हो चुका बहुत यह,
इतने मत उन्मत्त बनो।
इतने मत संतप्त बनो।
जीवन मरघट पर अपने सब
आमानों की कर होली,
चला राह में रोदन करता
चिता-राख से भर झोली-
शीश हिलाकर दुनिया बोली,
पृथ्वी पर हो चुका बहुत यह,
इतने मत संतप्त बनो।
इतने मत उत्तप्त बनो।
मेरे प्रति अन्याय हुआ है
ज्ञात हुआ मुझको जिस क्षण,
करने लगा अग्नि-आनन हो
गुरू-गर्जन, गुरूतर गर्जन-
शीश हिलाकर दुनिया बोली,
पृथ्वी पर हो चुका बहुत यह,
इतने मत उत्तप्त बनो।
इस पार उस पार / हरिवंशराय बच्चन
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है!
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, ये साधन भी छिन जा*एँगे,
तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
प्याला है पर पी पाएँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
कुछ भी न किया था जब उसका, उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर, जो रोरोकर हमने ढोए,
महलों के सपनों के भीतर जर्जर खँडहर का सत्य भरा!
उर में एसी हलचल भर दी, दो रात न हम सुख से सोए!
अब तो हम अपने जीवन भर उस क्रूरकठिन को कोस चुके,
उस पार नियति का मानव से व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
संसृति के जीवन में, सुभगे! ऐसी भी घड़ियाँ आऐंगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव रजनी तम की चादर से ढक देगी,
तब रविशशिपोषित यह पृथिवी कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबेचौड़े जग का अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब तेरा मेरा नन्हासा संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
ऐसा चिर पतझड़ आएगा, कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदुनव पल्लव के स्वर 'भरभर' न सुने जाएँगे,
अलिअवली कलिदल पर गुंजन करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का अवसान, प्रिय हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
सुन काल प्रबल का गुरु गर्जन निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज 'टलमल', सरिता अपना 'कलकल' गायन,
वह गायकनायक सिन्धु कहीं, चुप हो छिप जाना चाहेगा!
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण!
संगीत सजीव हुआ जिनमें, जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का, जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
उतरे इन आखों के आगे जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा देखो माली, सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी ऊषा की साड़ी सिन्दूरी
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा पाएगा कितने दिन रहने!
जब मूर्तिमती सत्ताओं की शोभाशुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई हम सब को खींच बुलाता है!
मैं आज चला तुम आओगी, कल, परसों, सब संगीसाथी,
दुनिया रोतीधोती रहती, जिसको जाना है, जाता है।
मेरा तो होता मन डगडग मग, तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा, मँझधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
एक और जंज़ीर तड़कती है, भारत माँ की जय बोलो / हरिवंशराय बच्चन
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,
कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए,
इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े,
और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए!
किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
जय बोलो उस धीर व्रती की जिसने सोता देश जगाया,
जिसने मिट्टी के पुतलों को वीरों का बाना पहनाया,
जिसने आज़ादी लेने की एक निराली राह निकाली,
और स्वयं उसपर चलने में जिसने अपना शीश चढ़ाया,
घृणा मिटाने को दुनियाँ से लिखा लहू से जिसने अपने,
“जो कि तुम्हारे हित विष घोले, तुम उसके हित अमृत घोलो।”
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
कठिन नहीं होता है बाहर की बाधा को दूर भगाना,
कठिन नहीं होता है बाहर के बंधन को काट हटाना,
ग़ैरों से कहना क्या मुश्किल अपने घर की राह सिधारें,
किंतु नहीं पहचाना जाता अपनों में बैठा बेगाना,
बाहर जब बेड़ी पड़ती है भीतर भी गाँठें लग जातीं,
बाहर के सब बंधन टूटे, भीतर के अब बंधन खोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
कटीं बेड़ियाँ औ’ हथकड़ियाँ, हर्ष मनाओ, मंगल गाओ,
किंतु यहाँ पर लक्ष्य नहीं है, आगे पथ पर पाँव बढ़ाओ,
आज़ादी वह मूर्ति नहीं है जो बैठी रहती मंदिर में,
उसकी पूजा करनी है तो नक्षत्रों से होड़ लगाओ।
हल्का फूल नहीं आज़ादी, वह है भारी ज़िम्मेदारी,
उसे उठाने को कंधों के, भुजदंडों के, बल को तोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
एक नया अनुभव / हरिवंशराय बच्चन
मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक
कविता लिखना चाहता हूँ।
चिड़िया नें मुझ से पूछा, 'तुम्हारे शब्दों में
मेरे परों की रंगीनी है?'
मैंने कहा, 'नहीं'।
'तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?'
'नहीं।'
'तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?'
'नहीं।'
'जान है?'
'नहीं।'
'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?'
मैनें कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है'
चिड़िया बोली, 'प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?'
एक अनुभव हुआ नया।
मैं मौन हो गया!
एकांत-संगीत (कविता) / हरिवंशराय बच्चन
तट पर है तरुवर एकाकी,
नौका है, सागर में,
अंतरिक्ष में खग एकाकी,
तारा है, अंबर में,
भू पर वन, वारिधि पर बेड़े,
नभ में उडु खग मेला,
नर नारी से भरे जगत में
कवि का हृदय अकेला!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ / हरिवंशराय बच्चन
सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
कवि की वासना / हरिवंशराय बच्चन
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
१
सृष्टि के प्रारंभ में
मैने उषा के गाल चूमे,
बाल रवि के भाग्य वाले
दीप्त भाल विशाल चूमे,
प्रथम संध्या के अरुण दृग
चूम कर मैने सुला*ए,
तारिका-कलि से सुसज्जित
नव निशा के बाल चूमे,
वायु के रसमय अधर
पहले सके छू होठ मेरे
मृत्तिका की पुतलियो से
आज क्या अभिसार मेरा?
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
२
विगत-बाल्य वसुंधरा के
उच्च तुंग-उरोज उभरे,
तरु उगे हरिताभ पट धर
काम के धव्ज मत्त फहरे,
चपल उच्छृंखल करों ने
जो किया उत्पात उस दिन,
है हथेली पर लिखा वह,
पढ़ भले ही विश्व हहरे;
प्यास वारिधि से बुझाकर
भी रहा अतृप्त हूँ मैं,
कामिनी के कंच-कलश से
आज कैसा प्यार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
३
इन्द्रधनु पर शीश धरकर
बादलों की सेज सुखकर
सो चुका हूँ नींद भर मैं
चंचला को बाहों में भर,
दीप रवि-शशि-तारकों ने
बाहरी कुछ केलि देखी,
देख, पर, पाया न को*ई
स्वप्न वे सुकुमार सुंदर
जो पलक पर कर निछावर
थी ग*ई मधु यामिनी वह;
यह समाधि बनी हु*ई है
यह न शयनागार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
४
आज मिट्टी से घिरा हूँ
पर उमंगें हैं पुरानी,
सोमरस जो पी चुका है
आज उसके हाथ पानी,
होठ प्यालों पर टिके तो
थे विवश इसके लिये वे,
प्यास का व्रत धार बैठा;
आज है मन, किन्तु मानी;
मैं नहीं हूँ देह-धर्मों से
बिधा, जग, जान ले तू,
तन विकृत हो जाये लेकिन
मन सदा अविकार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
५
निष्परिश्रम छोड़ जिनको
मोह लेता विशॿन भर को,
मानवों को, सुर-असुर को,
वृद्ध ब्रह्मा, विष्णु, हर को,
भंग कर देता तपस्या
सिदॿध, ऋषि, मुनि सत्तमों की
वे सुमन के बाण मैंने,
ही दिये थे पंचशर को;
शक्ति रख कुछ पास अपने
ही दिया यह दान मैंने,
जीत पा*एगा इन्हीं से
आज क्या मन मार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
६
प्राण प्राणों से सकें मिल
किस तरह, दीवार है तन,
काल है घड़ियां न गिनता,
बेड़ियों का शब्द झन-झन
वेद-लोकाचार प्रहरी
ताकते हर चाल मेरी,
बद्ध इस वातावरण में
क्या करे अभिलाष यौवन!
अल्पतम इच्छा यहां
मेरी बनी बंदी पड़ी है,
विश्व क्रीडास्थल नहीं रे
विश्व कारागार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
७
थी तृषा जब शीत जल की
खा लिये अंगार मैंने,
चीथड़ों से उस दिवस था
कर लिया श्रृंगार मैंने
राजसी पट पहनने को
जब हु*ई इच्छा प्रबल थी,
चाह-संचय में लुटाया
था भरा भंडार मैंने;
वासना जब तीव्रतम थी
बन गया था संयमी मैं,
है रही मेरी क्षुधा ही
सर्वदा आहार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
८
कल छिड़ी, होगी ख़तम कल
प्रेम की मेरी कहानी,
कौन हूं मैं, जो रहेगी
विश्व में मेरी निशानी?
क्या किया मैंने नही जो
कर चुका संसार अबतक?
वृद्ध जग को क्यों अखरती
है क्षणिक मेरी जवानी?
मैं छिपाना जानता तो
जग मुझे साधू समझता,
शत्रु मेरा बन गया है
छल-रहित व्यवहार मेरा!
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!
कहते हैं तारे गाते हैं / हरिवंशराय बच्चन
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमनें कान लगाया,
फ़िर भी अगणित कंठो का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं
स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आंसू आते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं
उपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा उपर को उठता, आंसू नीचे झर जाते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं
क़दम बढाने वाले: कलम चलाने वाले / हरिवंशराय बच्चन
अगर तुम्हारा मुकाबला
दीवार से है,
पहाड़ से है,
खाई-खंदक से,
झाड़-झंकाड़ से है
तो दो ही रास्ते हैं-
दीवार को गिराओ,
पहाड़ को काटो,
खाई-खंदक को पाटो,
झाड़-झंकाड़ को छांटो, दूर हटाओ
और एसा नहीं कर सकते-
सीमाएँ सब की हैं-
तो उनकी तरफ पीठ करो, वापस आओ।
प्रगति एक ही राह से नहीं चलती है,
लौटने वालों के साथ भी रहती है।
तुम कदम बढाने वालों में हो
कलम चलाने वालो में नहीं
कि वहीं बैठ रहो
और गर्यवरोध पर लेख-पर-लेख
लिखते जाओ।
किस कर में यह वीणा धर दूँ / हरिवंशराय बच्चन
देवों ने था जिसे बनाया,
देवों ने था जिसे बजाया,
मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ?
किस कर में यह वीणा धर दूँ?
इसने स्वर्ग रिझाना सीखा,
स्वर्गिक तान सुनाना सीखा,
जगती को खुश करनेवाले स्वर से कैसे इसको भर दूँ?
किस कर में यह वीणा धर दूँ?
क्यों बाकी अभिलाषा मन में,
विकृत हो यह फिर जीवन में?
क्यों न हृदय निर्मम हो कहता अंगारे अब धर इस पर दूँ?
किस कर में यह वीणा धर दूँ?
Sikandar_Khan
08-12-2010, 01:57 PM
-------------------------------------------------------
Pushp ki Abhilasha
-------------------------------------------------------
Chaah nahin main surbala ke
gehano mein gootha jaun
Chaah nahin premi maala mein bindh
pyaari ko lalchaun
Chaah nahin samraaton ke shav par
he hari daala jaun
Chaah nahin devon ke sir par chadhun
bhaagya par ithlaun
Mujhe thod lena ban-mali,
us path par dena tum phenk
Matra-bhoomi par sheesh chadhane,
jis path jayen veer anek.
Written By: Makhanlal Chaturvedi
कोई पार नदी के गाता / हरिवंशराय बच्चन
कोई पार नदी के गाता!
भंग निशा की नीरवता कर,
इस देहाती गाने का स्वर,
ककड़ी के खेतों से उठकर, आता जमुना पर लहराता!
कोई पार नदी के गाता!
होंगे भाई-बंधु निकट ही,
कभी सोचते होंगे यह भी,
इस तट पर भी बैठा कोई, उसकी तानों से सुख पाता!
कोई पार नदी के गाता!
आज न जाने क्यों होता मन,
सुन कर यह एकाकी गायन,
सदा इसे मैं सुनता रहता, सदा इसे यह गाता जाता!
कोई पार नदी के गाता!
कोशिश करने वालों की / हरिवंशराय बच्चन
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
कोई गाता मैं सो जाता / हरिवंशराय बच्चन
संस्रिति के विस्तृत सागर में
सपनो की नौका के अंदर
दुख सुख कि लहरों मे उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता ।
आँखों में भरकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता, मैं सो जाता ।
मेरे जीवन का खाराजल
मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर में मधुमय कर
बरसाता मैं सो जाता ।
कोई गाता मैं सो जाता
मैं सो जाता
मैं सो जाता
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:03 PM
- कैफी आजमी (Kaifi Azmi)
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।
ये जमीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटी शाखों से उतारे हम ने ।
इन मकानों को खबर है ना मकीनों को खबर
उन दिनों की जो गुफाओ मे गुजारे हम ने ।
हाथ ढलते गये सांचे में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नये नक्श निखारे हम ने ।
कि ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद,
बाम-ओ-दर और जरा, और सँवारा हम ने ।
आँधियाँ तोड़ लिया करती थी शामों की लौं
जड़ दिये इस लिये बिजली के सितारे हम ने ।
बन गया कसर तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे खाक पे हम शोरिश-ऐ-तामिर लिये ।
अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ऐ-पेयाम की थकान
बंद आंखों में इसी कसर की तसवीर लिये ।
दिन पिघलाता है इसी तरह सारों पर अब तक
रात आंखों में खटकतीं है स्याह तीर लिये ।
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:11 PM
छ्न्द प्रसंग नहीं हैं
हम जीवन के महाकाव्य हैं
केवल छ्न्द प्रसंग नहीं हैं।
कंकड़-पत्थर की धरती है
अपने तो पाँवों के नीचे
हम कब कहते बन्धु! बिछाओ
स्वागत में मखमली गलीचे
रेती पर जो चित्र बनाती
ऐसी रंग-तरंग नहीं है।
तुमको रास नहीं आ पायी
क्यों अजातशत्रुता हमारी
छिप-छिपकर जो करते रहते
शीतयुद्ध की तुम तैयारी
हम भाड़े के सैनिक लेकर
लड़ते कोई जंग नहीं हैं।
कहते-कहते हमें मसीहा
तुम लटका देते सलीब पर
हंसें तुम्हारी कूटनीति पर
कुढ़ें या कि अपने नसीब पर
भीतर-भीतर से जो पोले
हम वे ढोल-मृदंग नहीं है।
तुम सामुहिक बहिष्कार की
मित्र! भले योजना बनाओ
जहाँ-जहाँ पर लिखा हुआ है
नाम हमारा, उसे मिटाओ
जिसकी डोर हाथ तुम्हारे
हम वह कटी पतंग नहीं है।
- देवेन्द्र शर्मा इन्द्र
--------------------------------------------------------------------------------
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:25 PM
मधुशाला
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।
प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।
प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।
भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।
मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।
चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।
मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।
सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।
जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।
मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।
हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।
लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।
जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।
बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।
धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।
लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।
बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।
बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:27 PM
बड़े बड़े पिरवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।
सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
झगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।
भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।
बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।
हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।
एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।
नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।
बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।
सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।
सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।
तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मज्ञल्तऌा समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।
अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।
पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।
प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।
मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।
साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।
उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।
अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।
साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:39 PM
वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।
चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।
घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मज्ञल्तऌा होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।
हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।
धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।
दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।
पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।
सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।
बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।
मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।
कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।
और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।
आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्िदर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।
यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।
सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।
वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।
कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।
श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हिर मंिदरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।
एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।
बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:43 PM
कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।
आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।
आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।
सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमंे माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।
दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ -अदाई मधुशाला।।६५।
छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।
क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निरंिचत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।
मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
सिंधँु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।
क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।
लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।
कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।
ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।
क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।
प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।
अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।
यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।
यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।
याद न आए दूखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।
गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।
यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंितम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:50 PM
ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।
मेरे अधरों पर हो अंितम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।
मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।
और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालांे को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।
नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।
ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंिडत अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।
यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।
पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।
शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।
जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।
देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।
कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँखिमचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।
'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।
हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-िमलते मधुशाला।।९४।
प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।
मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।
मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।
किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।
उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।
साकी के पास है तिनक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:54 PM
साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।
साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।
जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिहवा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाय जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।
नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तिनक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।
मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।
देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।
एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।
बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँित भाँित का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।
एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।
जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।
कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।
बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।
छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।
यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।
कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।
कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।
दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हँू, घूम रही है मधुशाला।।११८।
मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंिबत करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।
किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।
वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंिबत-प्रतिबंिबत प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।
मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।
मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।
कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहँा गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।
अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उज्ञल्तऌार पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।
'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंिडत जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।
कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।
जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।
जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छूू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।
हर जिहवा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।
मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुिच थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।
यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं किव का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।
कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।
विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।
बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
किलत कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:58 PM
पिरिशष्ट से
स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।
मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहज्ञल्तऌार प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।
बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।
पित्र पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
- बच्चन
Sikandar_Khan
08-12-2010, 02:59 PM
Mother, I shall weave a chain of pearls for thy neck
with my tears of sorrow.
The stars have wrought their anklets of light to deck thy feet,
but mine will hang upon thy breast.
Wealth and fame come from thee
and it is for thee to give or to withhold them.
But this my sorrow is absolutely mine own,
and when I bring it to thee as my offering
thou rewardest me with thy grace.
Shree Rabindranath Tagore Ji
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:02 PM
Yeh koi famous writter ki likhi huyi rachna nahi hai ...... per kafi prabhavit karne wali rachna hia isliye main yahaan aapse shar kar raha hun Yeh Bhagwat Geeta ke UpdeshoN per nirdharit rachna hai........
Kabhi Rulaayein, Kabhi Hasaayein
Prabhu Ki Leela Prabhu Hi Jaane,
Kabhi Bhayanak Yudh Ladein
Kabhi Bhakton Ke Dukh Dur Karein
Gita Gyan Dilaaya Aur Mahabharat Hua Samaapt
Laute Tab Balram Ke Sang Dwarika Dwarikanaath
Pehle Pehle Kya Karte Hai Prabhu Dwarika Aake,
Jagad-Pita Khud Maat-Pita Ki Ashish Lene Jaate
Bade Pyar Se Woh Vasudev Ke Charnon Sis Jhukaaye
Aur Vasudev Shri Vaasudev Ko Liye Gale Se Lagaaye
Maat Devaki Krishna Ko Dekhe Hriday Liye Lagaai
Makhan Mishri Mahaprabhu Ko Haath Se Apne Khilaai
Ajab Nirala Dhrishya Ye Bhakton, Dekho Jagad Ke Data
Geeta Gyan Dilaake Phir, Maiya Ka Dil Behlaata
Bada Hua Hai Beta Aapka Boli Rukmini Rani
Haskar Chede Prabhu Ko Par Maa Ki Mamta Pehchaani
Bachpan Bhar Nahi Dekha Maa Ne Toh Ab Prem Lutaaye
Nirmal Prem Maiya Ka Paakar Prabhu Ko Anand Aaye
Bade Bhai Balram Hai Kehte Baat Meri Sun Maai
Saara Pyaar Kanhaiya Ko Deti Mere Liye Kya Bachaai
Haath Mein Haath Liye Beton Ka Nainan Neer Bhare
Pyar Mein Tab Vasudev Pita Balram Se Kehne Lage
Hum Dono Chahe Jitna Bhi Mamta Prem Lutaayen
Woh Vastu Toh Aisi Hai Kabhi Kam Na Hone Paayen
Devaki Boli Sach Hai Beta Baat Jo Kehte Baba
Waise Bhi Hirday Mein Hamare Prem Pada Hai Zyaada
Tum Dono Ke Aane Se Pehle Bichhad Gaye Tere Bhai
Unke Bhagya Ki Mamta Bhi Tum Dono Par Barsaai
Devaki Aur Vasudev Ki Ankhiyan Ashru Se Bhar Aaye
Guzara Kal Itna Dukhdaai Ab Tak Yaad Rulaaye
Kanha Ke Avtaar Samay Woh Base The Karagaar
Ankhiyan Aage Aankh Ke Taare Kans Ne Daale Maar
Bal Samay Shri Krishna Kanhaai Bhi Rehte The Dur
Putra Viyog Ke Dukh Mein Bichaare Maat Pita Majboor
Bhakton Ke Aasoon Kabhi Sahe Nahi Sakte Hai Bhagwan
Karuna Mein Rachte Hai Kaisi Leela Karuna Nidhaan
Ab Mat Rona Maiya Baba, Pal Mein Vaapas Aata Hoon
Jaise Guru Ke Khaatir Kinha, Baalak Aapke Laata Hoon
Tat Kshan Hi Paatal Chale Balram Aur Krishna Kanhaai
Raja Bali Se Bhet Huyi Aur Saari Katha Sunaai
Vaastav Mein Yeh Chhe Hai Devta Muni Ke Shraap Ke Maare
Unko Mukti Dilaani Thi Maa Devaki Ke Sahaare
Janam Samay Jo Doodh Piya Toh Hua Woh Mahaprashad
Us Hi Ke Dwaara Milegi Mukti Mere Bhaiyon Ko Aaj
Bali Raaj Phir Un Sabko Hai Baalak Roop Mein Laate
Maat Pita Se Aathon Bhai Saath Mein Milne Jaate
Madhur Milan Ye Bhaya Bada, Sabki Aankhon Mein Paani,
Dheere Se Phir Bhagavan Se Yeh Pooche Rukmini Rani
Yeh Toh Hai Tere Pyaare Prabhu Phir Dinhe Dukhde Kaahe
Sabse Pyaare Bhakt Mere Hai Tabhi Toh Dukh Seh Paaye
Maine Har Dukh Mein Saath Diya Aur Di Sehne Ki Shakti
Inko Dekh Ke Seekhega Jag Kya Hoti Hai Bhakti
Sachhe Bhakt Mere Hai Aise
Devaki Aur Vasudev Ke Jaise
Dukh Sehkar Vishwaas Na Haare
Tabhi Toh Pragate Unke Dwaare
Devaki Aur Vasudev Sam, Bhakti Ke Adarsh
Bhagvat Mahapuran Mein Hi Dete Hai Darsh
Sukh Mein Dukh Mein Karte Rahe, Tera Hi Gungaan
Humko Bhi Prabhu Dedo Aisi Bhakti Ka Vardaan
Maat Pita Phir Gad Gad Hokar Prabhu Ke Charan Gire
Rokar Unka Dhanyavaad Woh Dono Karne Lage
Jagadpita Khud Beta Bankar Paas Hamare Aaye
Yehi Nahi, Jeevan Ke Sab Dukh Sukh Mein Badal Kar Laaye
Aisi Bhent Wohi De Sakta Jo Hai Jeevan Data
Tum Ho Laal Hamare Kanha Yaan Ho Hamre Maat Pita
Prem Kare Jinse Govinda Gopala Madhusudhan
Unke Bhaagya Mein Hi Hoti Aisi Meethi Uljhan
Kanha Ne Tab Unhe Uthaaya Kiya Bada Sanmaan
Charan Nahin, Hirday Mein Mere Aap Dono Ka Sthaan
Chaahe Mujhe Tum Beta Kaho Chaahe Kehdo Bhagwaan
Main Tera Aur Tum Ho Mere Param Satya Yehi Jaan
Shri Krishna Ki Aisi Hai Leela
Bhakton Ka Jeevan Banaate Rangeela
Kaatke Moh Maya Ke Bandhan
Khud Se Unko Jodte Mohan
Unke Naam Se Naam Milaakar
Kehlaate Hai Devakinandan
Jai Ho Teri Devakinandan
Jai Ho Teri Devakinandan
--------------------------------------------------------------------------------
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:04 PM
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
~Harivansh Rai Bachchan.
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:06 PM
क्या गाऊँ जो मैं तेरे मन को भा जाऊँ।
प्राची के वातायन पर चढ़
प्रात किरन ने गाया,
लहर-लहर ने ली अँगड़ाई
बंद कमल खिल आया,
मेरी मुस्कानों से मेरा
मुख न हुआ उजियाला,
आशा के मैं क्या तुमको राग सुनाऊँ।
क्या गाऊँ जो मैं तेरे मन को भा जाऊँ।
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:08 PM
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
जड़ जग के उपहार सभी हैं,
धार आँसुओं की बिन वाणी,
शब्द नहीं कह पाते तुमसे
मेरे मन की मर्म कहानी,
उर की आग, राग ही केवल
कंठस्थल में लेकर चलता,
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
जान-समझ मैं तुमको लूँगा--
यह मेरा अभिमान कभी था,
अब अनुभव यह बतलाता है--
मैं कितना नादान कभी था;
योग्य कभी स्वर मेरा होगा,
विवश उसे तुम दुहराओगे?
बहुत यही है अगर तुम्हारे अधरों से परिचित हो जाऊँ।
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:11 PM
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी,
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं,
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में,
मैं लगा दूँ आग इस संसार में है
प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर,
जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी,
खूबियों के साथ परदे को उठाता,
एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था,
और मैंने था उतारा एक चेहरा,
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर
ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
और उतने फ़ासले पर आज तक सौ
यत्न करके भी न आये फिर कभी हम,
फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौका
उस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम,
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ,
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं--
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:14 PM
उस पार न जाने क्या होगा
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ
कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ
हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
जग में रस की नदियाँ बहती,
रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी
नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती,
मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं
यह वायु उड़ा ले जाती है;
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,
ये साधन भी छिन जाएँगे;
तब मानव की चेतनता का
आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
प्याला है पर पी पाएँगे,
है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है,
असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है,
हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता
है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही
कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का
अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
कुछ भी न किया था जब उसका,
उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर,
जो रो-रोकर हमने ढोए;
महलों के सपनों के भीतर
जर्जर खँडहर का सत्य भरा,
उर में ऐसी हलचल भर दी,
दो रात न हम सुख से सोए;
अब तो हम अपने जीवन भर
उस क्रूर कठिन को कोस चुके;
उस पार नियति का मानव से
व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
संसृति के जीवन में, सुभगे
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे
तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव, रजनी
तम की चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी
कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबे-चौड़े जग का
अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब हम दोनो का नन्हा-सा
संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
ऐसा चिर पतझड़ आएगा
कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा
जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर
‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन
करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का
अवसान, प्रिये, हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का
उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,
सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,
वह गायक-नायक सिन्धु कहीं,
चुप हो छिप जाना चाहेगा,
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;
संगीत सजीव हुआ जिनमें,
जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का
जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
उतरे इन आखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने;
जब मूर्तिमती सत्ताओं की
शोभा-सुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का
श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है;
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगीसाथी,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है;
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:16 PM
बच्चा
औरत के सिर पर गठरी है
कमर पर बच्चा
मर्द हाथ में बक्सा
लटकाये है
बच्चा रो रहा है लगातार
हाथ-पाँव पटक रहा
बार-बार
औरत के समझाने
मर्द के झुँझलाने के बावजूद
वह पैर-पैर चलना
चाहता है
और
गठरी अपने सिर पर
उठाना चाहता है।
इन्दु जैन
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:18 PM
सिसकते आब में किस की सदा है
सिसकते आब में किस की सदा है
कोई दरिया की तह में रो रहा है
सवेरे मेरी इन आँखों ने देखा
ख़ुदा चरो तरफ़ बिखरा हुआ है
समेटो और सीने में छुपा लो
ये सन्नाटा बहुत फैला हुआ है
पके गेंहू की ख़ुश्बू चीखती है
बदन अपना सुनेहरा हो चला है
हक़ीक़त सुर्ख़ मछली जानती है
समन्दर कैसा बूढ़ा देवता है
हमारी शाख़ का नौ-ख़ेज़ पत्ता
हवा के होंठ अक्सर चूमता है
मुझे उन नीली आँखों ने बताया
तुम्हारा नाम पानी पर लिखा है
बशीर बद्र
--------------------------------------------------------------------------------
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:25 PM
सिसकते आब में किस की सदा हैसिसकते आब में किस की सदा है
कोई दरिया की तह में रो रहा है
सवेरे मेरी इन आँखों ने देखा
ख़ुदा चरो तरफ़ बिखरा हुआ है
समेटो और सीने में छुपा लो
ये सन्नाटा बहुत फैला हुआ है
पके गेंहू की ख़ुश्बू चीखती है
बदन अपना सुनेहरा हो चला है
हक़ीक़त सुर्ख़ मछली जानती है
समन्दर कैसा बूढ़ा देवता है
हमारी शाख़ का नौ-ख़ेज़ पत्ता
हवा के होंठ अक्सर चूमता है
मुझे उन नीली आँखों ने बताया
तुम्हारा नाम पानी पर लिखा है
बशीर बद्र
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:29 PM
रात के साथ रात लेटी थी
रात के साथ रात लेटी थी
सुबह एक पालने में रोती थी
याद की बर्फपोश टहनी पर
एक गिलहरी उदास बैठी थी
मैं ये समझा के लौट आए तुम
धूप कल इतनी उजली उजली थी
कितने शादाब, कितने दिलकश थे
जब नदी रोज हमसे मिलती थी
एक कुर्ते के बाएँ कोने पर
प्यार की सुर्ख तितली बैठी थी
कितनी हल्की कमीज़ पहने हुए
सुबह अंगड़ाई लेके बैठी थी
बशीर बद्र
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:31 PM
आईना चेहरा
मुझे छूकर ज़रा देखो-
तुम्हारा आईना हूँ मैं।
मुझे भी चोट लगती है
कि शीशे का बना हूँ मैं।
तुम्हारी निस्ब्तों के साथ
मेरा दिल बहलता है
कभी सन्दल महकता है
कभी लावा पिघलता है
चुनौती हूँ, कोई मुठभेड़ हूँ
या सामना हूँ मैं।
तुम्हारे रंग के छींटे
मेरा मौसम बदलते हैं
लचीली डालियों पर
मोगरे के फूल खिलते हैं
पहाडी़ मन्दिरों का जादुई संगीत हूँ
आराधना हूँ मैं।
कभी जो जख़्म से
मजलूम का चेहरा उभरता है
हमारी सोच का ख़ुशरंग
शीराज़ा बिखरता है
कटाए हाथ बायाँ
औ’ अँगूठा दाहिना हूँ मैं
उमाशंकर तिवारी
--------------------------------------------------------------------------------
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:33 PM
नयनों ने मन के द्वारे पर स्वप्न सजाए हैं
नयनों ने मन के द्वारे पर
स्वप्न सजाए हैं
सागर चिंतित हुआ देखकर
सूखी हुई नदी
किंकर्तव्यविमूढ़ बन रही
फिर भी आज सदी
अम्मा ने उलझे प्रश्नों के
हल बतलाए हैं
कोरे काग़ज़ का सदियों से
यह इतिहास रहा
मौन साधकर सदा लेखनी
का ही दास रहा
मुनिया ने कुछ रंग-बिरंगे
चित्र बनाए हैं
निराकार मन की होती ज्यों
कोई थाह नहीं
अन्तहीन नभ में वैसे ही
निश्चित राह नहीं
नन्हीं चिड़िया ने उड़ने को
पर फैलाए हैं
योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’
--------------------------------------------------------------------------------
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:34 PM
अंदाजों का गणित
रसोईघरों में तीन सौ साठ अंशों की व्यस्तता के फलक में
हर लम्हा-हर एक छोटे से कोण में मौजूद दिखतीं स्त्रियाँ
नमक-मिर्च, शक्कर, हल्दी-धनिया और
मसालों की खुशबुओं का अनुपात चुटकियों में
अपने अंदाज से साधती
वह भी गुनगुनाते हुए बदस्तूर
चाहे बच्चों की भूख-प्यास का समय हो या
मर्दों की तलब या बुज़ुर्गों के खाँसने में छुपे हुए इशारे
इन सबके अर्थ समाहित थे उनके अंदाजों की दिव्य-दृष्टि में
सारी स्त्रियों के अंदर
अंदाज की मशीन हमेशा ठीक-ठाक काम करती रही
और तो और उसमें लगातार संसाधित होते रहे
चूल्हे की आँच के तापमान से लेकर
मौसमों के पूर्वानुमान तक के आँकड़े
इस तरह तय समय पर आते रहे
एक के बाद एक वसंत इस धरती पर
और धीरे-धीरे भरता गया आकाश स्त्रियों के अंदाज से बने रंगों के इंद्रधनुष से
कई-कई बार तो हैरानी होती
कैसे कभी थर्मामीटर और माइक्रोवेव-ओवन जैसे कई उपकरण भी हुए फेल
परदे के पीछे रहकर महसूस करके अंदाज लगा लेने के उस नायाब हुनर के आगे
जो गुँजाता था व्योम में सधे हुए हाथ के करिश्मे का गान
कहना मुश्किल कहाँ से प्रवेश करती थी सटीक अंदाजों की अजस्र धारा अपने-आप
सास-माँ से लेकर तो बहू-बेटी तक की देहों के भीतर अनंत काल से
दुनिया के बारे में
कोई कहती नज़र से पहचानती हैं हम सबको
कोई कहती आवाज़ के लहज़े से
कोई कहती चाल-ढाल से
कोई कहती पता नहीं कैसे मगर हाँ
अपने-आप हो जाता है अंदाजा
यही आख़िरी बात
जो समीकरण है
अपने-आप लग जाने वाले अंदाजों के गणित का
इसी में दुनिया के ख़ूबसूरत बने होने का राज़ छुपा हुआ है ।
राग तेलंग
--------------------------------------------------------------------------------
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:37 PM
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूँगा!
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,
बन्ध्या मिट्टी नें न एक भी पैसा उगला!-
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये!
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक
बाल-कल्पना के अपलर पाँवडडे बिछाकर
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था!
अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तबसे!
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने,
ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई;
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन!
औ\' जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये
गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर,
मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की
गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे-
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हो!
मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को,
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन!
किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में
टहल रहा था,- तब सहसा, मैने देखा
उसे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से!
देखा-आँगन के कोने में कई नवागत
छोटे-छोटे छाता ताने खड़े हुए हैं!
छांता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की,
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं प्यारी-
जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उड़ने को उत्सुक लगते थे-
डिम्ब तोड़कर निकले चिडियों के बच्चों से!
निर्निमेष, क्षण भर, मैं उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया,-कुछ दिन पहिले
बीज सेम के मैने रोपे थे आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधो की यह पलटन
मेरी आँखों के सम्मुख अब खड़ी गर्व से,
नन्हें नाटे पैर पटक, बढती जाती है!
तब से उनको रहा देखता धीरे-धीरे
अनगिनती पत्तों से लद, भर गयी झाड़ियाँ,
हरे-भरे टंग गये कई मखमली चँदोवे!
बेलें फैल गयी बल खा, आँगन में लहरा,
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को,-
मैं अवाक् रह गया-वंश कैसे बढ़ता है!
छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छीटे
झागों-से लिपटे लहरों श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से,
चोटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से!
ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ फूटी!
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ,-
पतली चौड़ी फलियाँ! उफ उनकी क्या गिनती!
लम्बी-लम्बी अँगुलियों - सी नन्हीं-नन्हीं
तलवारों-सी पन्ने के प्यारे हारों-सी,
झूठ न समझे चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़ती,
सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल
झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी!
आः इतनी फलियाँ टूटी, जाड़ो भर खाई,
सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के
जाने-अनजाने सब लोगों में बँटबाई
बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत, मँगतों ने
जी भर-भर दिन-रात महुल्ले भर ने खाई !-
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ!
यह धरती कितना देती है! धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को!
नही समझ पाया था मैं उसके महत्व को,-
बचपन में छिः स्वार्थ लोभ वश पैसे बोकर!
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ।
इसमें सच्ची समता के दाने बोने है;
इसमें जन की क्षमता का दाने बोने है,
इसमें मानव-ममता के दाने बोने है,-
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें
मानवता की, - जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ-
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
--------------------------------------------------------------------------------
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:39 PM
स्मृति
उस नैनरस के स्मरण भर से ,
मेरे भाव बादल बन गए,
अश्रु झिलमिला उठे और,
स्वप्न काजल बन गए।
पाथेय पर आशाएं बिखरी,
लगा सूर्य क्षितिज से झाँकने,
देख पथ के जुगनू,नभ के तारे,
कुछ सोचकर, कुछ आंकने।
अपने आलिंगन में कर लिया,
जब वायु ने सुगंध को,
आश्रय मिला तेरे ह्रदय का,
मेरे मन स्वछन्द को।
अब भी है अंकित ,इस दृष्टि में,
वो कोमल छवि,वो नैनरस,
समय के पाथेय से,
चुरा रखा है मैंने हर दिवस...
- चेतना पंत
Sikandar_Khan
08-12-2010, 03:41 PM
मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ
अपने प्रकाश की रेखा
तम के तट पर अंकित है
निःसीम नियति का लेखा
देने वाले को अब तक
मैं देख नहीं पाया हूँ,
पर पल भर सुख भी देखा
फिर पल भर दुख भी देखा।
किस का आलोक गगन से
रवि शशि उडुगन बिखराते?
किस अंधकार को लेकर
काले बादल घिर आते?
उस चित्रकार को अब तक
मैं देख नहीं पाया हूँ,
पर देखा है चित्रों को
बन-बनकर मिट-मिट जाते।
फिर उठना, फिर गिर पड़ना
आशा है, वहीं निराशा
क्या आदि-अन्त संसृति का
अभिलाषा ही अभिलाषा?
अज्ञात देश से आना,
अज्ञात देश को जाना,
अज्ञात अरे क्या इतनी
है हम सब की परिभाषा?
पल-भर परिचित वन-उपवन,
परिचित है जग का प्रति कन,
फिर पल में वहीं अपरिचित
हम-तुम, सुख-सुषमा, जीवन।
है क्या रहस्य बनने में?
है कौन सत्य मिटने में?
मेरे प्रकाश दिखला दो
मेरा भूला अपनापन।
भगवतीचरण वर्मा
Sikandar_Khan
08-12-2010, 07:15 PM
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
~Harivansh Rai Bachchan.
khalid
08-12-2010, 10:04 PM
क्या कहुँ ?
इस सुत्र के विषय मेँ अति उत्तम
ABHAY
08-12-2010, 10:49 PM
क्या कमल की रचना है सिकंदर भाई लगे रहो :party:
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:21 PM
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल
हम स्वच्छन्द विचार
हमारी गति चंचल
युगातीत हम रहे
नही भाया बंधन
हम शाश्वत क्रम बहे
न स्वीकारा थंभन
हम निर्झर का प्यार
हमारे स्वर कलकल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।।
अभिनय बिखेरा है हमने
विष पीकर के
खुश रहने को कहा
आंख आंसू भर के
हम शिव के अवतार
हमारे कंठ गरल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।।
अब तक मांगा नही
किसी के निर्देशन
अपने पथ का आप
किया है अन्वेषन
हम रचना आधार
हमारी कृति सम्भल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।
हम उन्मुख हो चले
सृजन के पथ पर भी
और क्रांति के बने
कभी उदघोषक भी
हम है विविध प्रकार
हमारे रूप सकल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।________________________
साभार: हम नदिया की धार द्वारा : संतोष सौनकिया
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:25 PM
मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ
अपने प्रकाश की रेखा
तम के तट पर अंकित है
निःसीम नियति का लेखा
देने वाले को अब तक
मैं देख नहीं पाया हूँ,
पर पल भर सुख भी देखा
फिर पल भर दुख भी देखा।
किस का आलोक गगन से
रवि शशि उडुगन बिखराते?
किस अंधकार को लेकर
काले बादल घिर आते?
उस चित्रकार को अब तक
मैं देख नहीं पाया हूँ,
पर देखा है चित्रों को
बन-बनकर मिट-मिट जाते।
फिर उठना, फिर गिर पड़ना
आशा है, वहीं निराशा
क्या आदि-अन्त संसृति का
अभिलाषा ही अभिलाषा?
अज्ञात देश से आना,
अज्ञात देश को जाना,
अज्ञात अरे क्या इतनी
है हम सब की परिभाषा?
पल-भर परिचित वन-उपवन,
परिचित है जग का प्रति कन,
फिर पल में वहीं अपरिचित
हम-तुम, सुख-सुषमा, जीवन।
है क्या रहस्य बनने में?
है कौन सत्य मिटने में?
मेरे प्रकाश दिखला दो
मेरा भूला अपनापन।
भगवतीचरण वर्मा
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:26 PM
अनंत यात्रा
अपनी कहानियों में मैंने
उतारा तुम्हारे चरित्र को
उभार नहीं पाई
उसमें तुम्हारा व्यक्तित्व।
बांधना चाहा कविताओं में
रूप तुम्हारा
पर शब्दों के दायरे में
न आ सका तुम्हारा मन
इस बार रंगों और तूलिका से
उकेर दी मैंने तुम्हारी देह
असफलता ही मेरी नियति है
तभी सूनी है वह तुम्हारी आत्मा के बिन
आकांक्षा पारे
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:28 PM
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी,
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं,
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में,
मैं लगा दूँ आग इस संसार में है
प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर,
जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी,
खूबियों के साथ परदे को उठाता,
एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था,
और मैंने था उतारा एक चेहरा,
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर
ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
और उतने फ़ासले पर आज तक सौ
यत्न करके भी न आये फिर कभी हम,
फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौका
उस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम,
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ,
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं--
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:29 PM
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
जड़ जग के उपहार सभी हैं,
धार आँसुओं की बिन वाणी,
शब्द नहीं कह पाते तुमसे
मेरे मन की मर्म कहानी,
उर की आग, राग ही केवल
कंठस्थल में लेकर चलता,
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
जान-समझ मैं तुमको लूँगा--
यह मेरा अभिमान कभी था,
अब अनुभव यह बतलाता है--
मैं कितना नादान कभी था;
योग्य कभी स्वर मेरा होगा,
विवश उसे तुम दुहराओगे?
बहुत यही है अगर तुम्हारे अधरों से परिचित हो जाऊँ।
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:31 PM
क्या गाऊँ जो मैं तेरे मन को भा जाऊँ।
प्राची के वातायन पर चढ़
प्रात किरन ने गाया,
लहर-लहर ने ली अँगड़ाई
बंद कमल खिल आया,
मेरी मुस्कानों से मेरा
मुख न हुआ उजियाला,
आशा के मैं क्या तुमको राग सुनाऊँ।
क्या गाऊँ जो मैं तेरे मन को भा जाऊँ।
हरिवंशराय बच्चन
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:43 PM
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।
तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।
बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।
तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।सुभद्रा कुमारी चौहान
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:45 PM
मेरे प्यारे दोस्तो:
नमस्कार और आदाब!
मेरे पिता जी ने घर के बाहर बाजू वाले हिस्से में चिड़िया के लिए कुछ घोंसले बनाए हुए है
रोज़ाना की तरह आज भी माँ ने बनाए हुए चावल के दाने लेकर उनको उनका भोजन देने गया
और जब वहाँ पहुँच के देखा तो मन को प्रफुल्लित कर देने वाला मनोहर द्रष्य घटित हुआ.. उस वक़्त मैने जो महसूस किया वो मैं आप सब के साथ बाँट रहा हू
*****************************हाथो में चावल के दाने लिए
जब पहुँचा घोंसले के पास
आहा! क्या द्रश्य था वो!!
कुछ दीनो. से जिसकी आवाज़ मैं
रोज़ सुना करता था
आज वो चिडिया का बच्चा
घोंसले में से झाँक के बाहर
मानो अपना मासूम सा चेहरा मुझे दिखा रहा हो
उसकी मासूम सी आँखों से
मुझ को टुकूर-टुकूर वो देख रहा था
और जैसे मेरे हाथों में चावल के दाने देख
मुझसे मानो कुछ कह रहा हो
अर्रे! आप आ गये ? रोज़ की तरह
मेरा भोजन लेकर!!
मैने भी फिर मन ही मन कहा
हाँ मासूम ! चल आ और जल्दी से अपना भोजन कर ले
क्यूंकी अब तुम बड़े हो गये हो
देखो तुम्हारी माँ बाहर बैठी है
आज वो तुम्हे भोजन देने घोंसले मे नहीं आएँगी
आज खुद बाहर आके ही भोजन तुम्हे लेना होगा
इन प्यारी सी बातों को सोचते हुए अचानक ही
उसकी माँ ने उसे पुकारा सामने से
वो अपनी माँ की आवाज़ सुन के
जैसे चौकन्ना हो गया!
मेरी पल्के जैसे ही झपकी तो उस मासूम ने
अपने पंख फैलाए
उसकी माँ ने भी उसका हॉंसला बढ़ाया
पर वो नाकाम रहा!
डरा हुआ , सहमा हुआ ! बेचारा
मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गये
के माँ ने मुझे भी ऐसे चलना सिखाया होगा
पर उसने हार ना मानी माँ ने फिर आवाज़ लगाई
ईस बार कोशिश कामयाब रही
पँखो को हवाओं मे फैला कर
ऐसी उड़ान भरी !
जैसे वो मासूम कह रहा हो
की माँ देखो मैने कर दिखाया
मैने पूरा जग जीत लिया!
माँ के पास जल्दी से जाके बैठ गया
नन्हा मासूम सा
और आज देखा की उस मासूम ने
सच मे ऐसी उड़ान भरी के
मेरी खाहिश भी पूरी कर दी
उस मासूम ने आज घोंसले मे बैठे बैठे ऩहीँ
बाहर आ के अपनी माँ के साथ भोजन किया
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:47 PM
उस नैनरस के स्मरण भर से ,
मेरे भाव बादल बन गए,
अश्रु झिलमिला उठे और,
स्वप्न काजल बन गए।
पाथेय पर आशाएं बिखरी,
लगा सूर्य क्षितिज से झाँकने,
देख पथ के जुगनू,नभ के तारे,
कुछ सोचकर, कुछ आंकने।
अपने आलिंगन में कर लिया,
जब वायु ने सुगंध को,
आश्रय मिला तेरे ह्रदय का,
मेरे मन स्वछन्द को।
अब भी है अंकित ,इस दृष्टि में,
वो कोमल छवि,वो नैनरस,
समय के पाथेय से,
चुरा रखा है मैंने हर दिवस.
Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:54 PM
धीरे धीरे शाम चली आई
भीनी भीनी खुशबू छाई
इन्द्रधनुषी रँग मेरे मन का
मैं उसकी परछाई, छाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
बूँद पडे बारिश की, सौंधी
महक मिट्टी की भाई, भाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
भीगी मेरे तन की चादर
प्यास न पर बुझ पाई, पाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
कल जो बीज थे मैने बोए
हरियाली अब छाई, छाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
आँगन में कुछ फूल खिले हैं
रँगत मन को भाई, भाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
सुर से सुर मिल राग बना यह
मालकौंस रस बरसाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
सातरँगों की सरगम, कारी
कोयल ने है गाई, गाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
महकाए मन मेरा देवी
भोर न ऐसी आई, आई
धीरे धीरे शाम चली आई॥
khalid
09-12-2010, 06:04 PM
अच्छा सुत्र हैँ सिकन्दर भाई गजल का महासागर बनाना इस सुत्र को
मैँ भी कोशिश करुगाँ पोस्ट करने का
abhisays
09-12-2010, 06:07 PM
बहुत ही बढ़िया सूत्र बनाया है सिकंदर जी आपने. मज़ा आ गया कवितायेँ पड़ कर.
:bravo::bravo::bravo::bravo:
ndhebar
09-12-2010, 06:10 PM
आश्चर्य है अभी तक नहीं देखा था
सूत्र कविताओं का है तो अच्छा तो होगा ही
कवितायेँ अभी पढ़ी नहीं है क्यों की सिर्फ पढना बिना भाव को समझे हुए मुझे रास नहीं आता
पहली फुरसत में सूत्र की सारी कवितायेँ पढ़ डालूँगा
man1234
09-12-2010, 06:14 PM
अगर इस दुनिया मै कुछ काम कठिन हे तो वो हे एक "कवि" का दिल मिलना......
बहुत बहुत बढ़िया सिकन्दर भाई ........
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:18 PM
रात की दस्तक दरवाज़े पर है
आज का दिन भी बीत गया है
कितना था उजाला फिर भी फिर से
अन्धियारा ही जीत गया है
एकान्त की चादर ओढ़ कर फिर से
मैं खुद में खोया जाता हूँ
आँखों के सामने यादों के रथ पर
मेरा ही अतीत गया है
सन्नाटों के गुन्जन में दबकर
अपनी ही आवाज़ नहीं आती मुझको
आँखों की सरहद पर लड़ता
आँसू भी अब जीत गया है
टूटे दर्पण के सामने बैठकर
मैं स्वयं को खोज रहा हूँ
यूँ ही बैठे बैठे जाने
कितना अरसा बीत गया है ... ॥
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:19 PM
नीली चादर ओढ़े,
तुम अंतरिक्ष की सीमा हो,
तुम अनंत, अरूपा हो,
तुम आसमान हो।
भोर के वक्त
तुम्हारी सुंदरता
निखर उठती है,
चारों ओर तुम्हारे चेहरे पर,
लालिमा छा जाती है।
पंछी तुम्हारी गोद में,
चहचहाने लगते है,
सूर्य की किरणें
तुम पर पूरी तरह,
हावी हो जाती है और
धरती खिल उठती है।
साँझ के वक्त
तुम्हारी सुंदरता,
दुगुनी हो उठती है,
सूरज डूब जाता है,
चाँद खिल आता है,
चारों ओर अँधेरा
का अधिकार हो जाता है
तुम्हारे आँचल में
सितारों की चमक रहती है,
रात को तुम्हारे आँगन में,
ग्रहों की रौनक रहती है।
तुम शायरों, कवियों का
प्रेरणास्रोत हो,
तुम देवी देवताओं का
निवास स्थान हो,
जी चाहता है, तुम्हें छू लूँ।
पर तुम तक कैसे पहुचू बन्धु बोलो तो ?
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:23 PM
मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ तुम शहज़ादी रूप नगर की
हो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहाँ पर होगा ?
मीलों जहाँ न पता खुशी का
मैं उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ नित
होंठ करें गीतों का न्योता,
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...
मेरा कुर्ता सिला दुखों ने बदनामी ने काज निकाले
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
नभ ने सब तारे जड़ डाले
मैं केवल पानी ही पानी तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो मन का हवन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...
मैं जन्मा इसलिए कि थोड़ी
उम्र आँसुओं की बढ़ जाए
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी
रोज़ नए कंगन जड़वाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल तुम सुखान्तकी, मैं दुखान्तकी
जुड़ भी गए अंक अपने तो रस-अवतरण कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...
इतना दानी नहीं समय जो
हर गमले में फूल खिला दे,
इतनी भावुक नहीं ज़िन्दगी
हर ख़त का उत्तर भिजवा दे,
मिलना अपना सरल नहीं है फिर भी यह सोचा करता हूँ
जब न आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहाँ पर होगा ?
मैं पीड़ा का...
gopaldas neeraj
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:25 PM
तुम्हारे बिना आरती का दीया यह
न बुझ पा रहा है न जल पा रहा है।
भटकती निशा कह रही है कि तम में
दिए से किरन फूटना ही उचित है,
शलभ चीखता पर बिना प्यार के तो
विधुर सांस का टूटना ही उचित है,
इसी द्वंद्व में रात का यह मुसाफिर
न रुक पा रहा है, न चल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
मिलन ने कहा था कभी मुस्करा कर
हँसो फूल बन विश्व-भर को हँसाओ,
मगर कह रहा है विरह अब सिसक कर
झरा रात-दिन अश्रु के शव उठाओ,
इसी से नयन का विकल जल-कुसुम यह
न झर पा रहा है, न खिल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
कहाँ दीप है जो किसी उर्वशी की
किरन-उंगलियों को छुए बिना जला हो?
बिना प्यार पाए किसी मोहिनी का
कहाँ है पथिक जो निशा में चला हो!
अचंभा अरे कौन फिर जो तिमिर यह
न गल पा रहा है, न ढल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
किसे है पता धूल के इस नगर में
कहाँ मृत्यु वरमाल लेकर खड़ी है?
किसे ज्ञात है प्राण की लौ छिपाए
चिता में छुपी कौन-सी फुलझड़ी है?
इसी से यहाँ राज हर जिंदगी का
न छुप पा रहा है, न खुल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:28 PM
विप्र सुदामा बसत हैं, सदा आपने धाम।
भीख माँगि भोजन करैं, हिये जपत हरि-नाम॥
ताकी घरनी पतिव्रता, गहै वेद की रीति।
सलज सुशील सुबुद्धि अति, पति सेवा सौं प्रीति॥
कह्यौ सुदामा एक दिन, कृस्न हमारे मित्र।
करत रहति उपदेस गुरु, ऐसो परम विचित्र॥
(सुदामा की पत्नी)
लोचन-कमल, दुख मोचन, तिलक भाल,
स्रवननि कुंडल, मुकुट धरे माथ हैं।
ओढ़े पीत बसन, गरे में बैजयंती माल,
संख-चक्र-गदा और पद्म लिये हाथ हैं।
विद्व नरोत्तम संदीपनि गुरु के पास,
तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं।
द्वारिका के गये हरि दारिद हरैंगे पिय,
द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं॥
(सुदामा)
सिच्छक हौं, सिगरे जग को तिय, ताको कहाँ अब देति है सिच्छा।
जे तप कै परलोक सुधारत, संपति की तिनके नहि इच्छा॥
मेरे हिये हरि के पद-पंकज, बार हजार लै देखि परिच्छा।
औरन को धन चाहिये बावरि, ब्राह्मन को धन केवल भिच्छा॥
(सुदामा की पत्नी)
कोदों, सवाँ जुरितो भरि पेट, तौ चाहति ना दधि दूध मठौती।
सीत बितीतत जौ सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती॥
जो जनती न हितू हरि सों तुम्हें, काहे को द्वारिका पेलि पठौती।
या घर ते न गयौ कबहूँ पिय, टूटो तवा अरु फूटी कठौती॥
(सुदामा)
छाँड़ि सबै जक तोहि लगी बक, आठहु जाम यहै झक ठानी।
जातहि दैहैं, लदाय लढ़ा भरि, लैहैं लदाय यहै जिय जानी॥
पाँउ कहाँ ते अटारि अटा, जिनको विधि दीन्हि है टूटि सी छानी।
जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तौ, काहु पै मेटि न जात अयानी॥
(सुदामा की पत्नी)
विप्र के भगत हरि जगत विदित बंधु,
लेत सब ही की सुधि ऐसे महादानि हैं।
पढ़े एक चटसार कही तुम कैयो बार,
लोचन अपार वै तुम्हैं न पहिचानि हैं।
एक दीनबंधु कृपासिंधु फेरि गुरुबंधु,
तुम सम कौन दीन जाकौ जिय जानि हैं।
नाम लेते चौगुनी, गये तें द्वार सौगुनी सो,
देखत सहस्त्र गुनी प्रीति प्रभु मानि हैं॥
(सुदामा)
द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै झक तेरे।
जौ न कहौ करिये तो बड़ौ दुख, जैये कहाँ अपनी गति हेरे॥
द्वार खरे प्रभु के छरिया तहँ, भूपति जान न पावत नेरे।
पाँच सुपारि तै देखु बिचार कै, भेंट को चारि न चाउर मेरे॥
यह सुनि कै तब ब्राह्मनी, गई परोसी पास।
पाव सेर चाउर लिये, आई सहित हुलास॥
सिद्धि करी गनपति सुमिरि, बाँधि दुपटिया खूँट।
माँगत खात चले तहाँ, मारग वाली बूट॥
दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई,
एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं।
पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करे बात,
देवता से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं।
देखत सुदामा धाय पौरजन गहे पाँय,
कृपा करि कहौ विप्र कहाँ कीन्हौ गौन हैं।
धीरज अधीर के हरन पर पीर के,
बताओ बलवीर के महल यहाँ कौन हैं?
(श्रीकृष्ण का द्वारपाल)
सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोति फटी-सी लटी दुपटी अरु, पाँय उपानह की नहिं सामा॥
द्वार खड्यो द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकिसौं वसुधा अभिरामा।
पूछत दीन दयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा॥
बोल्यौ द्वारपाल सुदामा नाम पाँड़े सुनि,
छाँड़े राज-काज ऐसे जी की गति जानै को?
द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय,
भेंटत लपटाय करि ऐसे दुख सानै को?
नैन दोऊ जल भरि पूछत कुसल हरि,
बिप्र बोल्यौं विपदा में मोहि पहिचाने को?
जैसी तुम करौ तैसी करै को कृपा के सिंधु,
ऐसी प्रीति दीनबंधु! दीनन सौ माने को?
ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न किते दिन खोये॥
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये॥
(श्री कृष्ण)
कछु भाभी हमको दियौ, सो तुम काहे न देत।
चाँपि पोटरी काँख में, रहे कहौ केहि हेत॥
आगे चना गुरु-मातु दिये त, लिये तुम चाबि हमें नहिं दीने।
श्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सों, चोरि कि बानि में हौ जू प्रवीने॥
पोटरि काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस भीने।
पाछिलि बानि अजौं न तजी तुम, तैसइ भाभी के तंदुल कीने॥
देनो हुतौ सो दै चुके, बिप्र न जानी गाथ।
चलती बेर गोपाल जू, कछू न दीन्हौं हाथ॥
वह पुलकनि वह उठ मिलनि, वह आदर की भाँति।
यह पठवनि गोपाल की, कछू ना जानी जाति॥
घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज।
कहा भयौ जो अब भयौ, हरि को राज-समाज॥
हौं कब इत आवत हुतौ, वाही पठ्यौ ठेलि।
कहिहौं धनि सौं जाइकै, अब धन धरौ सकेलि॥
वैसेइ राज-समाज बने, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ।
वैसेइ कंचन के सब धाम हैं, द्वारिके के महिलों फिरि आयौ।
भौन बिलोकिबे को मन लोचत सोचत ही सब गाँव मँझायौ।
पूछत पाँड़े फिरैं सबसों पर झोपरी को कहूँ खोज न पायौ॥
कनक-दंड कर में लिये, द्वारपाल हैं द्वार।
जाय दिखायौ सबनि लैं, या है महल तुम्हार॥
टूटी सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर,
तामैं परो दुख काटौं कहाँ हेम-धाम री।
जेवर-जराऊ तुम साजे प्रति अंग-अंग,
सखी सोहै संग वह छूछी हुती छाम री।
तुम तो पटंबर री ओढ़े किनारीदार,
सारी जरतारी वह ओढ़े कारी कामरी।
मेरी वा पंडाइन तिहारी अनुहार ही पै,
विपदा सताई वह पाई कहाँ पामरी?
कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ, कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग में पनही न हती कहँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै कहाँ, कोमल सेज पै नींद न आवत।
कैं जुरतो नहिं कोदो सवाँ प्रभु, के परताप तै दाख न भावत॥
नरोत्तमदास
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:31 PM
अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है
जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है
होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है
शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है
देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है
हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है
दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता हैसर्वेश्वरदयाल सक्सेना
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:35 PM
उनकी याद हमें आती है
मधुपुर के घनश्याम अगर कुछ पूछें हाल दुखी गोकुल का
उनसे कहना पथिक कि अब तक उनकी याद हमें आती है।
बालापन की प्रीति भुलाकर
वे तो हुए महल के वासी,
जपते उनका नाम यहाँ हम
यौवन में बनकर संन्यासी
सावन बिना मल्हार बीतता, फागुन बिना फाग कट जाता,
जो भी रितु आती है बृज में वह बस आँसू ही लाती है।
मधुपुर के घनश्याम...
बिना दिये की दीवट जैसा
सूना लगे डगर का मेला,
सुलगे जैसे गीली लकड़ी
सुलगे प्राण साँझ की बेला,
धूप न भाए छाँह न भाए, हँसी-खुशी कुछ नहीं सुहाए,
अर्थी जैसे गुज़रे पथ से ऐसे आयु कटी जाती है।
मधुपुर के घनश्याम...
पछुआ बन लौटी पुरवाई,
टिहू-टिहू कर उठी टिटहरी,
पर न सिराई तनिक हमारे,
जीवन की जलती दोपहरी,
घर बैठूँ तो चैन न आए, बाहर जाऊँ भीड़ सताए,
इतना रोग बढ़ा है ऊधो ! कोई दवा न लग पाती है।
मधुपुर के घनश्याम...
लुट जाए बारात कि जैसे...
लुटी-लुटी है हर अभिलाषा,
थका-थका तन, बुझा-बुझा मन,
मरुथल बीच पथिक ज्यों प्यासा,
दिन कटता दुर्गम पहाड़-सा जनम कैद-सी रात गुज़रती,
जीवन वहाँ रुका है आते जहाँ ख़ुशी हर शरमाती है।
मधुपुर के घनश्याम...
क़लम तोड़ते बचपन बीता,
पाती लिखते गई जवानी,
लेकिन पूरी हुई न अब तक,
दो आखर की प्रेम-कहानी,
और न बिसराओ-तरसाओ, जो भी हो उत्तर भिजवाओ,
स्याही की हर बूँद कि अब शोणित की बूँद बनी जाती है।
मधुपुर के घनश्याम...
गोपालदास "नीरज
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:36 PM
इन सपनों के पंख न काटो
इन सपनों की गति मत बाँधो!
सौरभ उड़ जाता है नभ में
फिर वह लौट कहाँ आता है?
बीज धूलि में गिर जाता जो
वह नभ में कब उड़ पाता है?
अग्नि सदा धरती पर जलती
धूम गगन में मँडराता है।
सपनों में दोनों ही गति है
उडकर आँखों में ही आता है।
इसका आरोहण मत रोको
इसका अवरोहण मत बाँधो!
मुक्त गगन में विचरण कर यह
तारों में फिर मिल जायेगा,
मेघों से रंग औ’ किरणों से
दीप्ति लिए भू पर आयेगा।
स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प
भूमि को सिखलायेगा।
नभ तक जाने से मत रोको
धरती से इसको मत बाँधो!
इन सपनों के पंख न काटो
इन सपनों की गति मत बाँधो
महादेवी वर्मा
Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:38 PM
एक सपना लेकर वो शहरों मे आता है,
वो रोज कमाता और रोज खाता है,
उस आदमी को सबकी फ़िक्र है,
सो वो सर झुकाए ही नज़र आता है,
लोग कहते हैं उसका खून पानी हो गया है,
उसका ज़मीर कहीं जाकर सो गया है,
खून उसका भी खौलता है मगर
वो उसकी खातिर, किसी का खून नहीं बहाता है,
वो डरता नहीं यूं तो किसी से
पर उसको डराना भी नहीं आता,
वो शीशे के मकानों मे रहता है
और पत्थरों से घबराता है,
हर एक आमादा है बस
हर कीमत आगे निकल जाने मे,
बेशक दबे कोई या कुचल जाए,
उनके उठने और गुजर जाने मे,
वो अक्सर अखबारों की सुर्ख़ियों को
देख कर डर जाता है,
जिस 'चाँद ' की खातिर वो आया
देखें वो उसे हासिल कर भी पाता है !
pooja 1990
09-12-2010, 07:07 PM
Nice sutra. amazing yar
Video Master
09-12-2010, 07:31 PM
सिकंदर भाई बहुत अच्छा प्रयास है
मैं भी अपनी कुछ कविताये आप सभी के समक्ष पेश करना चाहुगा
फूलों सी नाजुक चीज है दोस्ती,
सुर्ख गुलाब की महक है दोस्ती,
सदा हँसने हँसाने वाला पल है दोस्ती,
दुखों के सागर में एक कश्ती है दोस्ती,
काँटों के दामन में महकता फूल है दोस्ती,
जिंदगी भर साथ निभाने वाला रिश्ता है दोस्ती,
रिश्तों की नाजुकता समझाती है दोस्ती,
रिश्तों में विश्वास दिलाती है दोस्ती,
तन्हाई में सहारा है दोस्ती,
मझधार में किनारा है दोस्ती,
जिंदगी भर जीवन में महकती है दोस्ती,
किसी-किसी के नसीब में आती है दोस्ती,
हर खुशी हर गम का सहारा है दोस्ती,
हर आँख में बसने वाला नजारा है दोस्ती,
कमी है इस जमीं पर पूजने वालों की
वरना इस ज़मीं पर "भगवान" है दोस्ती!
Video Master
09-12-2010, 07:36 PM
हर तरफ
सबसे आगे आने की
दौड़ चल रही थी!
मैं उसमे सबसे
पीछे चल रहा था!
हर बात में ले लिया
करता था
खुदा का इज़ाज़त!
आज खुदा भी
हमसे दूर हो गया था!
प्यार से बुलाया था
जिसे मैंने
आज वो भी मेरा
कोई न रहा!
आज मैं सबसे अलग
रहना चाहता हूँ
तो बुलावा आया आपका!
ABHAY
09-12-2010, 08:21 PM
क्या बात है भाई मजा आ गया अभी तो नहीं कल से मेरा परीछा है उसके बाद पोस्ट करूँगा
munneraja
10-12-2010, 10:19 AM
बेशक
बहुत अच्छी कविताएं हैं
प्रविष्टिकर्ता निस्संदेह बधाई के पात्र हैं
laddi
10-12-2010, 01:47 PM
अच्छी कवितायेँ हैं
पड़ कर कुछ सुकून मिला सब तो नहीं पड़ी बस कुछ ही पड़ी हैं
Sikandar_Khan
10-12-2010, 07:32 PM
अंतिम घडी
फिर याद
है आयी
पूर्ण समर्पण
करके आई
नए संसार
में खोया था वो
अपनों में भी
तनहा था वो
परियो की याद
दिल में बसाए
मज़बूरी को रोया
था वो
बीती रातें
छिपी ह्रदय में
चेहरे पे एक
नकाब लिए था
अपने नन्हे
फूल को भी
दिल से
याद करने का भी
मन न था उसका
जा रहा नए
सपने सजाने
अपनी दुल्हन को
संग ले आने
हर पल
जुड़ा था
अपने अतीत से
एक और
नया घर उसका
दूजे
उसका अनचाहा रिश्ता …
बढे जा रहे
हर कदम थे
रस्मो को
अपमानित करने
उस पावन
सिन्दूर के
पक्के रंग को
निर्लज करने
हाथ न काँपे
चड़ा दिया उस
रंग को
उसने
मन में अभिलाषा
मुस्काई
आज घडी फिर
सुहागरात की आई
आज घडी फिर
सुहागरात की आई
एक और हसीं
मेरे संग
आई
दूजी और
अतीत था उसका
अविचल ,अस्थिर
अनजाना सच से
आँचल में छिपाए
अपने प्रिय के
पावन प्रेम को …
देनी है आज
उसको
दिल खोल विदाई
कमजोर न करना
ईश्वर मुझको
कर जाना है
त्याग ये मुझको
माँ के गर्भ में
सोया था वो
देख रहा पल
पल तनहाई
बरातियो की
भीड़ में जिस पल
शान से आये
दुल्हे राजा
माँ ने मिलवाया
था उसको
देख ले इसको
ये ईश्वर
तेरा
प्राण पिता है
ये पल
अनमोल
इस एक ही
पल में
खुशिया ढेरो तू
बटोर ले
था तकाजा कुछ
वक़्त का ऐसा
पल ये
बस अब कुछ
ही क्षण का था
दर्द से थी उसकी
माँ कहराई
कहने लगी
चलो अब
हुयी विदाई
याद शब्द
फिर उनके आये
हँसते हुए हर
एक पल जाना
साथ में फिर तुम
खुशियाँ लाना
पर अश्रुधारा
फिर रुक न पायी
अंतिम विदा
पूर्ण कर आई
मैं नारी
फिर भी
बेवफा कहलाई
क्यूंकि
मैं
अंतिम विदा
पूर्ण कर आई
अंतिम विदा
पूर्ण कर आई
....................
Sikandar_Khan
10-12-2010, 07:35 PM
अच्छी कवितायेँ हैं
पड़ कर कुछ सुकून मिला सब तो नहीं पड़ी बस कुछ ही पड़ी हैं
बेशक
बहुत अच्छी कविताएं हैं
प्रविष्टिकर्ता निस्संदेह बधाई के पात्र हैं
क्या बात है भाई मजा आ गया अभी तो नहीं कल से मेरा परीछा है उसके बाद पोस्ट करूँगा
nice sutra. Amazing yar
आप सभी का हार्दिक आभार
Kumar Anil
10-12-2010, 09:09 PM
मै पिंजर का तोता
उड़ता था मै नील गगन में
अपने पंख पसारे
मधुर गीत मै गाता था
अपने प्रीतम के द्वारे
जाने कौन घडी में किसने
कैसा जाल बिछाया
पल भर में न देर लगी
खुदको पिंजर में पाया
अब ...........मै पिंजर का तोता
लोग देखकर मुझको कहते
कितना प्यारा गाता है
सोने के पिंजर में देखो
सारे सुख पाता है
पथिक मगर तुम अपने अंतर के
अंतरपट को खोलो
मेरे इन मधु गीतों को
तुम विरह बात से तोलो
क्यूंकि .......मै पिंजर का तोता .
सोने के यह दर दरवाजे
मेरे खातिर धेला है
शान -ओ -शौकत , रिश्ते नाते
मेरे खातिर मेला है
"अंजना " कब कौन मुसाफिर
मुझको ले जायेगा
न जाने कब पिंजर तोता
नील गगन पायेगा
अब तो हूँ .........मै पिंजर का तोता
हर पिँजर के तोते को उड़ने के लिए आकाश चाहिए । उमंगोँ को उड़ने के लिए अगर पंख न मिलेँ तो उनकी छटपटाहट का अनुमान मात्र करने से ही सिहरन होने लगती है । दासता मेँ भोगा ऐश्वर्य भला किस काम का । जहाँ न अपनी माटी है न अपनोँ का दुलार और न खुद को ढ़ूढ़ँती वो अपनो की मीठी नजर । जिन्दगी तो अपनोँ के साथ ही जी जाती है ।
भाई जी , सुन्दर पोस्ट का लिँक देने के लिए धन्यवाद ।
Sikandar_Khan
11-12-2010, 07:59 PM
जीवन का फल, जीवन का फल!
यह चिर यौवन-श्री से मांसल!
इसके रस में आनन्द भरा,
इसका सौन्दर्य सदैव हरा;
पा दुख-सुख का छाया-प्रकाश
परिपक्व हुआ इसका विकास;
इसकी मिठास है मधुर प्रेम,
औ’ अमर बीज चिर विश्व-क्षेम!
जीवन का फल, जीवन का फल!
इसका रस लो,--हो जन्म सफल।
तीखे, चमकीले दाँत चुभा
चाबो इसको, क्यों रहे लुभा?
निर्भीक बनो, साहसी, शक्त,
जीवन-प्रेमी,--मत हो विरक्त।
सुन्दर इच्छा की धरो आग,
प्रिय जगती पर दयितानुराग!
रचनाकार: सुमित्रानंदन पंत
Sikandar_Khan
13-12-2010, 06:55 PM
आराम करो
एक मित्र मिले,
बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।
यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।
मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।
अदवायन खिंची खाट
में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।
मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा करो। लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम
- गोपालप्रसाद व्यास
Sikandar_Khan
13-12-2010, 07:08 PM
छिप-छिप आंसू बहाने वालों
छिप-छिप आंसू
बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है
माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है
लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन न आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।
- गोपालदास "नीरज"
Kumar Anil
13-12-2010, 08:19 PM
छिप-छिप आंसू बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।
- गोपालदास "नीरज"
शुक्रिया सिकन्दर भाई ! सच्चा जीवन दर्शन तो महाकवि की इस आशावादी रचना से ही झाँक रहा है । जीवन के प्रति ऐसा ही सकारात्मक दृष्टिकोण हमेँ सही मायने देगा । मित्र यदि सम्भव हो तो ( किताबेँ करती हैँ बातेँ ) पोस्ट करने की कृपा कीजियेगा । सम्भवतः सफदर हाशमी की रचना है ।
YUVRAJ
10-01-2011, 08:19 PM
:clap:...:clap:...:clap:...:bravo:
ABHAY
10-01-2011, 09:56 PM
दूध में दरार पड़ गई
ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
खेतों में बारूदी गंध,
टुट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्याथित सी बितस्ता है।
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
ABHAY
10-01-2011, 09:57 PM
आ: धरती कितना देती है
मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,
और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !
पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।
सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।
मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।
मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,
ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।
अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।
ABHAY
10-01-2011, 09:59 PM
औ’ जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की
गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।
भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।
मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।
किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे
टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।
देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी -
जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।
ABHAY
10-01-2011, 10:00 PM
निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,
बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे
और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,
नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।
तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे
अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ
हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे
बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को
मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है
यह धरती कितना देती है । धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को
नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को
बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर
रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।
इसमे सच्ची समता के दाने बोने है
इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है
इसमे मानव ममता के दाने बोने है
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले
मानवता की – जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।
ABHAY
10-01-2011, 10:03 PM
गरीब का सलाम ले
कर्णधार तू बना तो हाथ में लगाम ले
क्रांति को सफल बना नसीब का न नाम ले
भेद सर उठा रहा मनुष्य को मिटा रहा
गिर रहा समाज आज बाजुओं में थाम ले
त्याग का न दाम ले
दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले
यह स्वतन्त्रता नहीं कि एक तो अमीर हो
दूसरा मनुष्य तो रहे मगर फकीर हो
न्याय हो तो आरपार एक ही लकीर हो
वर्ग की तनातनी न मानती है चांदनी
चांदनी लिये चला तो घूम हर मुकाम ले
त्याग का न दाम ले
दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले
ABHAY
10-01-2011, 10:05 PM
आग की भीख
धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?
दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।
ABHAY
10-01-2011, 10:06 PM
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।
मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं,
अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं।
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
ABHAY
10-01-2011, 10:07 PM
आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे;
फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे।
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।
ABHAY
10-01-2011, 10:09 PM
अंतरद्वंद्व
क्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर?
शव का अर्चन,
शिव का वर्जन,
कहूँ विसंगति या रूपांतर?
वैभव दूना,
अंतर सूना,
कहूँ प्रगति या प्रस्थलांतर?
ABHAY
10-01-2011, 10:10 PM
अपने ही मन से कुछ बोलें
क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!
पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!
जन्म-मरण अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!
ABHAY
10-01-2011, 10:10 PM
एक बरस बीत गया
एक बरस बीत गया
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया
ABHAY
10-01-2011, 10:11 PM
कौरव कौन, कौन पांडव
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|
ABHAY
10-01-2011, 10:15 PM
क्षमा याचना
क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।
जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।
ABHAY
10-01-2011, 10:18 PM
जीवन की ढलने लगी साँझ
जीवन की ढलने लगी सांझ
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ।
बदले हैं अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।
सपनों में मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।
ABHAY
10-01-2011, 10:19 PM
झुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
ABHAY
10-01-2011, 10:20 PM
पुनः चमकेगा दिनकर
आज़ादी का दिन मना,
नई ग़ुलामी बीच;
सूखी धरती, सूना अंबर,
मन-आंगन में कीच;
मन-आंगम में कीच,
कमल सारे मुरझाए;
एक-एक कर बुझे दीप,
अंधियारे छाए;
कह क़ैदी कबिराय
न अपना छोटा जी कर;
चीर निशा का वक्ष
पुनः चमकेगा दिनकर।
Sikandar_Khan
14-01-2011, 06:00 PM
किताब
हैरत है।
अक्षर नहीं हैं आज किताब पर
कहाँ चले गए अक्षर
एक साथ अचानक?
सबेरे सबेरे
काले बादल उठ रहे हैं चारों ओर से
मैली बोरियां ओढ़कर सड़क की पेटियों पर
गंदगी के पास सो रहे हैं बच्चे
हस्पताल के बाहर सड़क में
भयानक रोग से मर रही है एक युवती
पैबन्द लगे मैले कपड़ों में
हिमाल में ठंड से बचने की प्रयास में कुली
एक और प्रहर के भोजन के बदले
खुदको बेच रहे हैं लोग ।
मैं एक एक करके सोच रहा हूँ सब दृश्य
चेतना को जमकर कोड़े मारते हुए,
खट्टा होते हुए, पकते हुए
खो रहा हूँ खुद को अनुभूति के जंगल में ।
कितना पढूँ ? बारबार सिर्फ किताब
समय को टुकडों में फाड़कर
मैं आज दुःख और लोगों के जीवन को पढूंगा ।
अक्षर नहीं हैं किताब पर आज।
- भीष्म उप्रती
- अनुवाद - कुमुद अधिकारी
बहुत ही अच्छी कविता पेश की है अनुज सिकंदर ! धन्यवाद.
Kumar Anil
15-01-2011, 05:49 AM
कितना पढूँ ?
बारबार सिर्फ किताब
समय को टुकडों में फाड़कर
मैं आज दुःख और लोगों के जीवन को पढूंगा ।
अक्षर नहीं हैं किताब पर आज।
क्या खूब सिकन्दर भाई !
सुन्दर आलंकारिक भाषा मेँ त्रासदी का चित्रण किया गया है आपकी इस प्रस्तुति मेँ । कवि के साथ प्रस्तोता को भी सलाम ।
Sikandar_Khan
22-01-2011, 07:10 PM
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8411&stc=1&d=1295707184
Sikandar_Khan
22-01-2011, 07:13 PM
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8412&stc=1&d=1295707364
pankaj bedrdi
23-01-2011, 05:05 PM
बचपन मै पढा था ये सारे कविताए बचपन के दिन याद हो गया
Sikandar_Khan
25-01-2011, 05:22 PM
बेचैनी
इन दिनों कुछ बेचैन नज़र आता हूँ मैं
भिखारियों,नंगे बच्चों और तंग,टूटी झोपड़ियों
की कतारों से तो रोज़ ही गुजरता था
आज उनके लिए आँखों में कुछ नमी सी पाता हूँ मैं
लगता था बचपन बहुत पीछे छोड़ चुका हूँ
अब औरों की तरह नौकरी और गृहथि में रम चुका हूँ
जिन प्रश्नों को दबा चुका था दिल की गहराइयों में
उन्ही मासूम जिज्ञासाओं को फिर जगी सी पाता हूँ मैं
सफलताओं की सीढ़ी तेज़ी से चढ़ रहा था
मुसीबतों का सामना निडरता से कर रहा था
आँखों में कल की चमक, दिल में उमंगों का जोश लिए
सिपाही सी सधी थी मेरी चाल
आज कुछ थकी सी पाता हूँ मैं
सब कुछ है मेरे पास
हंसी,ख़ुशी और सुविधा के सब सामान
प्यार,शुभकामनायें और ढेरों आशीर्वाद
फिर भी एक अनजानी कमी सी पाता हूँ मैं
इन दिनों कुछ बेचैन नज़र आता हूँ मैं
विशद
Sikandar_Khan
25-01-2011, 05:24 PM
अनजाना-अनजानी
साथ जीनें मरनें की खायी कसमें
चाँद तारे तोड़ने के किये वादे
फूलों और उपहारों के हुए आदान प्रदान
फिर भी हैं क्यूँ
तेरी पसंद से मैं,मेरी पसंद से तुम
अनजाना-अनजानी
महफ़िलें कई सजीं,हंसी ठहाके खूब लगे
साथ-साथ आँखों में चमके दिवाली के कई दिए
फिर भी हैं क्यूँ
तेरी ख़ुशी से मैं मेरी ख़ुशी से तुम
अनजाना-अनजानी
साथ देखे जीवन के सब मौसम
कई सफ़र,उतार-चढ़ाव और हर मोड़
पर साथ थे हम
फिर भी हैं क्यूँ
तेरे दुःख से मैं ,मेरे दुःख से तुम
अनजाना-अनजानी
मिलकर बुने थे सपने कल के
साथ चलने थे रास्ते मंजिलों के
फिर भी हैं क्यूँ
तेरी डगर से मैं,मेरी डगर से तुम
अनजाना-अनजानी
Sikandar_Khan
25-01-2011, 05:26 PM
जीवन से रिश्ता
कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते
कुछ पल बसे रहते हैं आँखों में
बरसों जीवन के बदलते मौसमों की
मार सहकर भी अनजान नहीं होते
कुछ यादें बन जाती हैं सहारा ज़िन्दगी का
ले जाती हैं अपने साथ एक दूसरी दुनियां में
छुपा लेती हैं अपने गर्म आलिंगन में
ठहर जाते हैं,कुछ और पल, हम तमाम नहीं होते
बिखरे रिश्ते जुड़ भी सकते हैं
विमुख रास्ते मुड़ भी सकते हैं
आशायें जीवन का पर्याय हैं
हमें समझना है
हर दिन एक से आसमान नहीं होते.
जीवन से रिश्ता जोड़ना है
थक कर बैठ, फिर उठना है
दूसरे के रास्तों पर तो कोई भी चल सकता है
अपने बनाये पथ आसान नहीं होते.
विशद
Sikandar_Khan
25-01-2011, 05:28 PM
प्यार की परिभाषा
क्या है प्यार,क्या कभी सुनी है इसकी परिभाषा?
क्या लेना और देना ही प्यार है?
क्या जिस्मों की नजदीकी ही प्यार है?
क्या हंसी और ख़ुशी ही प्यार है?
क्या रंग और रूप ही प्यार है?
क्या यौवन और श्रृंगार ही प्यार है?
क्या सावन और झूले ही प्यार है?
क्या चंदा और तारे ही प्यार है?
कल देखा था एक वृद्ध दंपत्ति को किराने की दुकान से राशन खरीदते, और जगी
थी प्यार की परिभाषा बनने की उम्मीद
दो नो के बीच की गहरी ख़ामोशी पर ताल मेल ऐसा जैसे दोनों एक ही हों
शायद उम्र के साथ प्यार की भी कई सरहदें पर कर चुके थे वो
शायद उनकी परिभाषा ही सही हो
शायद.......विशद
Kumar Anil
26-01-2011, 05:26 PM
@sikandar
दूसरे के रास्तों पर तो कोई भी चल सकता है
अपने बनाये पथ आसान नहीं होते.
सुंदर अति सुंदर । क्या गजब का टेस्ट है और क्या संकलन है । मजा आ जाता है यहाँ आकर ।
Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:34 PM
वो कबूतरों की बात करता है
वो कबूतरों की बात करता है
उसके कई कबूतरखाने हैं
वो अमन की बात करता है
उसकी छत पे भी कबूतर उड़ते है
वो लगातार अमन की बात
कर रहा है
और चाहता है कि
हर चीज़ अमन कि तरह सफ़ेद हो जाए
हमारा खून भी
घटना-स्थल पर फैला हुआ
सफ़ेद खून
पुलिस कि मार से मुँह से निकला
सफ़ेद खून
उसने खून को
दूध भी कह दिया है
वो लगातार अमन कि बात कर रहा है
हाँ,
उसका खून अमन कि तरह
सफ़ेद है
क्यूँकी वो सफ़ेद कबूतर खता है
हमारा खून क्रांति कि तरह
लाल
क्यूँकी हम लाल गेंहू खाते हैं
उसका अमन का सफ़ेद कबूतर अन्दर से
लाल निकलता है
हमारा क्रांति का लाल गेंहू
अन्दर से सफ़ेद
वो कबूतरों की बात करता है
उसके कई कबूतरखाने हैं
Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:39 PM
जयती-जयती
के नारो से
धर्म पताकाएं
लहराई ...
भूख-लूट
क्या लाती
उनको
मुद्दो की सड़को पर भला,
जो
धर्म पे लगी
आंच ले आई ....
वाह ! महान संस्था
वाह ! महान बंधनो की
रक्त मे लिपटी कथा ....
हे महान शोध की
प्रयोगशाला
के जनो ,
हे निचुड़ जाने
को तत्पर
देवीरूपी
स्तनो .....
तेरे देवालय के भीतर ,
हुआ है जो भी
आज तलक वो ,
घटा है बाहर
तो पाबंदी ?
खुले आम अब
सींग दिखाकर ,
नाच रहे है
नंगे नंदी ...
प्रेम था तेरे
सदा सनातन ,
अनंतगामी ,
धर्म का खंभा ,
प्रेम मे ठहराव
आता है !
अब ठहर गया वो
उसके भीतर
तो काहे का
तुम्हे अचंभा ....
सोच रहा हूं
मै बस इतना
पावन था वो
पल भी कितना ..
मां ने आंचल मे
जब अपने
लेकर के
दम घोटा होगा ...
मालूम हुआ होगा
उसको ये ,
कि परिवारो
के बरगद का
तना
खोखला
सड़ा था कितना ...
उसके गर्भ मे
रखा था जो कुछ
सबके दिल से
बड़ा था कितना...
Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:40 PM
हाथ फेर दें और सभी कुछ
मिट जाए साधो
अपना दिल है रेत का टीला
थोडे़ है साधो
इस पगडंडी पे निकले है
मुड़ कैसे जाएँ
हमने कितने सारे रस्ते
छोडे़ है साधो
पहले अल्हड़ और मिजाजी
हाथी जैसे थे
अब राजाजी की परेड के
घोडे़ है साधो
सोच रहे है कैसे वापस
चिपका के आएं
उसके लिए जो इतने तारे
तोडे़ है साधो
(nm)
Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:47 PM
फागुन के पागल महीने में
हम चाह ही रहे थे गाना बसन्ती गीतकी आ गया
नए सांस्कृतिक रथ पर सवार वैलेंटाइन डे
अकेले नही आया है
प्रेम का ये त्यौहार
इसके ऑफर पैक में मिले हैं
रोज डे ,फ्रेंडशिप डे और जाने क्या क्या ??
अब तो लगता है
की जैसे इसके आने से पहले
बिना प्रेम के रह लिए हम हजारों साल
वसंतोत्सव ?
जैसे वैलेंटाइन डे का कोई उपनिवेश
पीले वस्त्रों में लिपटा सौंदर्य
मानुस प्रेम
सरसों के खेत
जैसे बीते युग की कोई बात
इन्हे तो भुलाना ही था हमें
क्यूंकि वसंतोत्सव को
सेलिब्रेट नही कर सकते
कोक और पिज्जा के साथ
ठीक नही लगता ना
सुना तुमने
वैलेंटाइन डे आ रहा है
टीवी चॅनल पढेंगे
उसकी शान में कसीदे
और कहेंगे
देश के लोगों खरीदो
मंहगे उपहार
क्यूंकि वही होंगे तुम्हारे प्रेम के यकीन
भावनाएं तो शुरुआत भर होती हैं
ओछी और सारहीन
१४ फरवरी को अचानक याद आयेगा प्रेम
और हम नोच डालेंगे बगिया के सारे फूल
घूमेंगे सडकों, बाजारों, परिसरों में
जहाँ भी दिखें प्रेमिकाएँ
जो थीं १३ तारिख तक महज लडकियां
मुर्दा संगठनों में नयी जान फून्केगा
वैलेंटाइन डे
निकल पड़ेंगे सडकों पर उनके लोग
लाठी डंडों और राखियों से लैस
जब उन्हें दिखाई देंगे
अपने ही भाई -बहन
दूसरों की गाड़ियों पर चिपके हुए
तो वे निपोरेंगे खीस
और दिल ही दिल में स्वीकारेंगे
परिवर्तन की बात
सोचता हूँ की अगर ये है प्रेम का प्रतीक
तो क्यों लाता है आँगन में बाजार
जीना सिखाता है सामानों के साथ
डरता हूँ
इस अंधी दौड़ में बसंतोत्सव
की तरह
हम मांग ना लायें होली और दीवाली के भी विकल्प
इस कठिन समय में जब प्रेम
आत्महंता तेजी से उतर रहा है
भावना से शरीर पर
आइये करें थोडी सी प्रार्थना
ताकि प्रेम बचा रहे
हमारे भीतर की गहराइयों में
ताकि हमें रखना न पड़े
प्रेम के लिए दो मिनट का मौन
(nm)
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8801&stc=1&d=1297633316
Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:56 PM
जानलेवा खेल
ये जिन्दगी है
लव आज कल नहीं
वह कहती है
मैं कहना चाहता हूँ की जिन्दगी
राजश्री बैनर का सिनेमा भी तो नहीं
प्यार चाहे मुख़्तसर सा हो या लम्बा
उससे अपरिचित हो पाना बस का नहीं
चाहे वो शाहिद करीना हों या मैं और वो
तुम शादी कर लो
उसने प्रक्टिकल सलाह दी थी
उंहू...
पहले तुम मैंने कहा था
हमारा क्या होगा
ये सवाल हमारे प्यार करने की ताकत छीन रहा था
हमने अपनी आंखों में आशंकाओं के कांटे उगा लिए थे
आकाश में उड़ती चील की तरह कोई हम पर निगाहें गडाए था
मेरे लिए अब उसे प्यार करने से ज्यादा जरूरी
उस चील के पंख नोच देना हो गया था
लेकिन मैं कुछ भी साबित नहीं करना चाहता था
न अपने लिए न उसके लिए
मुझे अब इंतज़ार था
शायद किसी दिन वो वह सब कह देगी
मैं शीशे के सामने खड़ा होकर अभिनय करता
की कैसे चौकना होगा उस क्षण
ताकि उसे ये न लगे की
अप्रत्याशित नहीं ये सब मेरे लिए
हर रोज जब वो मुझसे मिलती
मेरी आँखों में एक उम्मीद होती
लेकिन वह चुप रही
जैसे की उसे पता चल गया था सारा खेल
ये जानलेवा खेल
बर्दाश्त के बाहर हो रहा है
उम्मीद भी अँधा कर सकती है
ये जान लेने के बाद मेरी घबराहट बढ़ गयी है...
Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:58 PM
मुझे पता था तुम्हारा जवाब
उन दिनों
जब मैं तुम्हें टूटकर प्यार करना चाहता था
लिखता रहा प्रेम कविताएं
ऐसे में चूंकि मुझे पता था तुम्हारा जवाब,
मुझे कवितायेँ तुमसे संवाद का बेहतर जरिया लगीं
मैं बेहद खुश होता तुम्हारे जवाबों से
वह मेरी आजाद दुनिया थी
जहां किसी का दखल नहीं था
किसी का भी नहीं
मेरा दिल एक कमरा था
उस कमरे में एक ही खिड़की थी
खिड़की के बाहर तुम थीं
यूं तो कमरे में हमेशा दो लोगों के लिए पर्याप्त जगह मौजूद थी
लेकिन तुमने खिड़की पर खड़े होकर
उस पार से बतियाना ही ठीक समझा
किसी का होकर भी उसका न हो पाना
ये दर्द कोई मुझसे पूछे
ठीक अभी अभी इस उदास रात में
आसमान में कोई तारा चमका है
शायद तुम खिड़की के बाहर खिलखिलाकर हंसी हो
(nm)
Sikandar_Khan
13-02-2011, 01:24 PM
हम लड़ेंगे साथी,
उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी,
गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, ज़िंदगी के टुकड़े।
हथौड़ा अब भी चलता है,
उदास निहाई पर
हल अब भी चलता है,
चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता,
प्रश्न नाचता है।
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी।
कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नज़रों की कसम खाकर
हाथ पर पड़े गड्ढों की कसम खाकर।
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे साथी तब तक
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूंघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति
जब तक युद्ध से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मजबूर हैं
कि दफ्तर के बाबू जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरूरत है।
जब तक बंदूक न हुई,
तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगेकि अब तक लड़ क्यों नहीं
हम लड़ेंगेअपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी।
पाश
Sikandar_Khan
13-02-2011, 01:32 PM
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्*़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होनासब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्*बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्*याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्*मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्*म के पूरब में चुभ जाए
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।
पाश
Sikandar_Khan
13-02-2011, 01:35 PM
मैंने उम्र भर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है
अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है
तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें
मैं खूब जानता हूं नीले सागरों तक फैले हुए
इस खेतों, खानों,भट्ठों के भारत को
वह ठीक इसी का साधारण-सा एक कोना था
जहां पहली बार
जब दिहाड़ी मजदूर पर उठा थप्पड़ मरोड़ा गया
किसी के खुरदरे बेनाम हाथों में
ठीक वही वक्त था
जब इस कत्ल की साजिश रची गयी
कोई भी पुलिस नहीं खोज पायेगी इस साजिश की जगह
क्योंकि ट्यूबें सिर्फ राजधानी में जगमगाती हैं
और खेतों, खानों व भट्ठों का भारत बहुत अंधेरा है
और ठीक इसी सर्द अंधेरे में होश संभालने पर
जीने के साथ-साथ
पहली बार जब इस जीवन के बारे में सोचना शुरू किया
मैंने खुद को इस कत्ल की साजिश में शामिल पाया
जब भी वीभत्स शोर का खुरा खोज-मिटा कर
मैंने टर्राते हुए टिड्डे को ढूंढ़ना चाहा
अपनी पुरी दुनिया को शामिल देखा है
मैंने हमेशा ही उसे कत्ल किया है
हर परिचित की छाती में ढूंढ़ कर
अगर उसके कातिलों को इस तरह सड़कों पर देखा जाना है
तो मुझे भी मिले बनती सजा
मैं नही चाहता कि सिर्फ इस आधार पर बचता रहूं
कि भजनलाल बिशनोई को मेरा पता मालूम नहीं
इसका जो भी नाम है-गुंडों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं
मैं उस पायलट की
चालाक आंखों में चुभता भारत हूं
हां मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो।
पाश
Sikandar_Khan
13-02-2011, 01:49 PM
दीप आज भी लड़ता है संग्राम
जिस देहरी पर दीप रखने के लिए
तरसते रहते थे महीनों
वह छूटी जा रही है धीरे-धीरे
जिस दीये की बाती बनाने के लिए
लड़ते थे सारे भाई-बहन
उसने भी बदल ली है अपनी शक्ल
जिन नए कपड़ों के लिए
नाराज हो जाते थे पिता से
उन्हें बेटे को दिलाने में अब फूल जाता है दम
जिन सपनों को देखकर
आखें रोज़ मनाती थीं दिवाली
आज वे हो रहे हैं अमावस से भी काले
पहले हम दिवाली मनाते थे
अब दिवाली हमें मनाती है
पहले हम ज़िंदगी जीते थे
अब ज़िंदगी हमें जीती है।
लेकिन दीप कल भी लड़ता था अंधेरे से संग्राम
आज भी लड़ता है
कल भी लड़ेगा।
ओम द्विवेदी
Sikandar_Khan
15-02-2011, 10:19 AM
छिप-छिप आंसू बहाने वालों
छिप-छिप आंसू बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है
माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है
लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन न आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।
- गोपालदास "नीरज"
Sikandar_Khan
15-02-2011, 10:31 AM
वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो
चट्टानों की छाती से दूध निकालो
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो
चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे
जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है
सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है
अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे
जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है
उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
तलवार प्रेम से और तेज होती है
छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
मरता है जो एक ही बार मरता है
तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे
स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है
वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे
जब कभी अहम पर नियति चोट देती है
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है
चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे
उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है
सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!
रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)
Sikandar_Khan
15-02-2011, 10:45 AM
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।
मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।
(nm)
Sikandar_Khan
15-02-2011, 12:29 PM
वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है
पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?
अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में
समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा
समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं
कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे
समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर
समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है
समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल
तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध
रामधारी सिंह "दिनकर"
Sikandar_Khan
21-02-2011, 01:59 AM
कैदी और कोकिला'
क्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो !
क्या लाती हो?
सन्देशा किसका है?
कोकिल बोलो तो !
ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट भर खाना,
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना !
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश कर चला रात भी काली,
इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली ?
क्यों हूक पड़ी?
वेदना-बोझ वाली-सी;
कोकिल बोलो तो !
बन्दी सोते हैं, है घर-घर श्वासों का
दिन के दुख का रोना है निश्वासों का,
अथवा स्वर है लोहे के दरवाजों का,
बूटों का, या सन्त्री की आवाजों का,
या गिनने वाले करते हाहाकार ।
सारी रातें है-एक, दो, तीन, चार-!
मेरे आँसू की भरीं उभय जब प्याली,
बेसुर! मधुर क्यों गाने आई आली?
क्या हुई बावली?
अर्द्ध रात्रि को चीखी,
कोकिल बोलो तो !
किस दावानल की
ज्वालाएँ हैं दीखीं?
कोकिल बोलो तो !
निज मधुराई को कारागृह पर छाने,
जी के घावों पर तरलामृत बरसाने,
या वायु-विटप-वल्लरी चीर, हठ ठाने
दीवार चीरकर अपना स्वर अजमाने,
या लेने आई इन आँखों का पानी?
नभ के ये दीप बुझाने की है ठानी !
खा अन्धकार करते वे जग रखवाली
क्या उनकी शोभा तुझे न भाई आली?
तुम रवि-किरणों से खेल,
जगत् को रोज जगाने वाली,
कोकिल बोलो तो !
क्यों अर्द्ध रात्रि में विश्व
जगाने आई हो? मतवाली
कोकिल बोलो तो !
दूबों के आँसू धोती रवि-किरनों पर,
मोती बिखराती विन्ध्या के झरनों पर,
ऊँचे उठने के व्रतधारी इस वन पर,
ब्रह्माण्ड कँपाती उस उद्दण्ड पवन पर,
तेरे मीठे गीतों का पूरा लेखा
मैंने प्रकाश में लिखा सजीला देखा।
तब सर्वनाश करती क्यों हो,
तुम, जाने या बेजाने?
कोकिल बोलो तो !
क्यों तमोपत्र पत्र विवश हुई
लिखने चमकीली तानें?
कोकिल बोलो तो !
क्या?-देख न सकती जंजीरों का गहना?
हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश-राज का गहना,
कोल्हू का चर्रक चूँ? -जीवन की तान,
मिट्टी पर अँगुलियों ने लिक्खे गान?
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूआ।
दिन में कस्र्णा क्यों जगे, स्र्लानेवाली,
इसलिए रात में गजब ढा रही आली?
इस शान्त समय में,
अन्धकार को बेध, रो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो !
चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज
इस भाँति बो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो !
काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली
काली लहर कल्पना काली,
मेरी काल कोठरी काली,
टोपी काली कमली काली,
मेरी लोह-श्रृंखला काली,
पहरे की हुंकृति की व्याली,
तिस पर है गाली, ऐ आली !
इस काले संकट-सागर पर
मरने की, मदमाती !
कोकिल बोलो तो !
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती !
कोकिल बोलो तो !
तेरे `माँगे हुए' न बैना,
री, तू नहीं बन्दिनी मैना,
न तू स्वर्ण-पिंजड़े की पाली,
तुझे न दाख खिलाये आली !
तोता नहीं; नहीं तू तूती,
तू स्वतन्त्र, बलि की गति कूती
तब तू रण का ही प्रसाद है,
तेरा स्वर बस शंखनाद है।
दीवारों के उस पार !
या कि इस पार दे रही गूँजें?
हृदय टटोलो तो !
त्याग शुक्लता,
तुझ काली को, आर्य-भारती पूजे,
कोकिल बोलो तो !
तुझे मिली हरियाली डाली,
मुझे नसीब कोठरी काली!
तेरा नभ भर में संचार
मेरा दस फुट का संसार!
तेरे गीत कहावें वाह,
रोना भी है मुझे गुनाह !
देख विषमता तेरी मेरी,
बजा रही तिस पर रण-भेरी !
इस हुंकृति पर,
अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?
कोकिल बोलो तो!
मोहन के व्रत पर,
प्राणों का आसव किसमें भर दूँ!
कोकिल बोलो तो !
फिर कुहू !---अरे क्या बन्द न होगा गाना?
इस अंधकार में मधुराई दफनाना?
नभ सीख चुका है कमजोरों को खाना,
क्यों बना रही अपने को उसका दाना?
फिर भी कस्र्णा-गाहक बन्दी सोते हैं,
स्वप्नों में स्मृतियों की श्वासें धोते हैं!
इन लोह-सीखचों की कठोर पाशों में
क्या भर देगी? बोलो निद्रित लाशों में?
क्या? घुस जायेगा स्र्दन
तुम्हारा नि:श्वासों के द्वारा,
कोकिल बोलो तो!
और सवेरे हो जायेगा
उलट-पुलट जग सारा,
कोकिल बोलो तो !
माखनलाल चतुर्वेदी
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8959&stc=1&d=1298285758
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:03 AM
पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूथा जाऊँ
चाह नहीं प्रेमी माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं सम्राटों के
शव पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इतराऊँ
मुझे तोड़ लेना बनमाली
उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक
माखनलाल चतुर्वेदी
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8959&stc=1&d=1298285758
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:11 AM
नहुष का पतन
मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में
व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में
पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की
अरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की
दिखता है मुझे तो कठिन मार्ग कटना
अगर ये बढ़ना है तो कहूँ मैं किसे हटना?
बस क्या यही है बस बैठ विधियाँ गढ़ो?
अश्व से अडो ना अरे, कुछ तो बढ़ो, कुछ तो बढ़ो
बार बार कन्धे फेरने को ऋषि अटके
आतुर हो राजा ने सरौष पैर पटके
क्षिप्त पद हाय! एक ऋषि को जा लगा
सातों ऋषियों में महा क्षोभानल आ जगा
भार बहे, बातें सुने, लातें भी सहे क्या हम
तु ही कह क्रूर, मौन अब भी रहें क्या हम
पैर था या सांप यह, डस गया संग ही
पमर पतित हो तु होकर भुंजग ही
राजा हतेज हुआ शाप सुनते ही काँप
मानो डस गया हो उसे जैसे पिना साँप
श्वास टुटने-सी मुख-मुद्रा हुई विकला
"हा ! ये हुआ क्या?" यही व्यग्र वाक्य निकला
जड़-सा सचिन्त वह नीचा सर करके
पालकी का नाल डूबते का तृण धरके
शून्य-पट-चित्र धुलता हुआ सा दृष्टि से
देखा फिर उसने समक्ष शून्य दृष्टि से
दीख पड़ा उसको न जाने क्या समीप सा
चौंका एक साथ वह बुझता प्रदीप-सा -
“संकट तो संकट, परन्तु यह भय क्या ?
दूसरा सृजन नहीं मेरा एक लय क्या ?”
सँभला अद्मय मानी वह खींचकर ढीले अंग -
“कुछ नहीं स्वप्न था सो हो गया भला ही भंग.
कठिन कठोर सत्य तो भी शिरोधार्य है
शांत हो महर्षि मुझे, सांप अंगीकार्य है"
दुख में भी राजा मुसकराया पूर्व दर्प से
मानते हो तुम अपने को डसा सर्प से
होते ही परन्तु पद स्पर्श भुल चुक से
मैं भी क्या डसा नहीं गया हुँ दन्डशूक से
मानता हुँ भुल हुई, खेद मुझे इसका
सौंपे वही कार्य, उसे धार्य हो जो जिसका
स्वर्ग से पतन, किन्तु गोत्रीणी की गोद में
और जिस जोन में जो, सो उसी में मोद में
काल गतिशील मुझे लेके नहीं बेठैगा
किन्तु उस जीवन में विष घुस पैठेगा
फिर भी खोजने का कुछ रास्ता तो उठायेगें
विष में भी अमर्त छुपा वे कृति पायेगें
मानता हुँ भुल गया नारद का कहना
दैत्यों से बचाये भोग धाम रहना
आप घुसा असुर हाय मेरे ही ह्रदय में
मानता हुँ आप लज्जा पाप अविनय में
मानता हुँ आड ही ली मेने स्वाधिकार की
मुल में तो प्रेरणा थी काम के विकार की
माँगता हुँ आज में शची से भी खुली क्षमा
विधि से बहिर्गता में भी साधवी वह ज्यों रमा
मानता हुँ और सब हार नहीं मानता
अपनी अगाति आज भी मैं जानता
आज मेरा भुकत्योजित हो गया है स्वर्ग भी
लेके दिखा दूँगा कल मैं ही अपवर्ग भी
तन जिसका हो मन और आत्मा मेरा है
चिन्ता नहीं बाहर उजेला या अँधेरा है
चलना मुझे है बस अंत तक चलना
गिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है सँभलना
गिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभी
मैं ही तो उठा था आप गिरता हुँ जो अभी
फिर भी ऊठूँगा और बढ़के रहुँगा मैं
नर हूँ, पुरुष हूँ, चढ़ के रहुँगा मैं
चाहे जहाँ मेरे उठने के लिये ठौर है
किन्तु लिया भार आज मेने कुछ और है
उठना मुझे ही नहीं बस एक मात्र रीते हाथ
मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ
मैथिलीशरण गुप्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8960&stc=1&d=1298237963
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:13 AM
'आर्य'
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े
वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा
संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में
वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे
मैथिलीशरण गुप्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8960&stc=1&d=1298237963
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:16 AM
दोनों ओर प्रेम पलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है
सखि पतंग भी जलता है दीपक भी जलता है
सीस हिलाकर दीपक कहता
बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता
पर पतंग पडकर ही रहता कितनी विह्वलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है
बचकर हाय पतंग मरे क्या
प्रणय छोडकर प्राण धरे क्या
जले नही तो मरा करें क्या क्या यह असफलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है
कहता है पतंग मन मारे
तुम महान मैं लघु पर प्यारे
क्या न मरण भी हाथ हमारे शरण किसे छलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है
दीपक के जलनें में आली
फिर भी है जीवन की लाली
किन्तु पतंग भाग्य लिपि काली किसका वश चलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है
जगती वणिग्वृत्ति है रखती
उसे चाहती जिससे चखती
काम नही परिणाम निरखती मुझको ही खलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है
मैथिलीशरण गुप्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8960&stc=1&d=1298237963
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:24 AM
नर हो, न निराश करो मन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को
संभलों कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को
निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्*तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को
प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्*त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को
किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को
करके विधि वाद न खेद करो
निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्*यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
मैथिलीशरण गुप्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8960&stc=1&d=1298237963
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:26 AM
सांध्य वंदना
जीवन का श्रम ताप हरो हे!
सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे!
सूने जग गृह द्वार भरो हे!
लौटे गृह सब श्रान्त चराचर
नीरव, तरु अधरों पर मर्मर,
करुणानत निज कर पल्लव से
विश्व नीड प्रच्छाय करो हे!
उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल,
स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल
तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि!
सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:29 AM
वे आँखें
अंधकार की गुहा सरीखी
उन आँखों से डरता है मन,
भरा दूर तक उनमें दारुण
दैन्*य दुख का नीरव रोदन!
अह, अथाह नैराश्य, विवशता का
उनमें भीषण सूनापन,
मानव के पाशव पीड़न का
देतीं वे निर्मम विज्ञापन!
फूट रहा उनसे गहरा आतंक,
क्षोभ, शोषण, संशय, भ्रम,
डूब कालिमा में उनकी
कँपता मन, उनमें मरघट का तम!
ग्रस लेती दर्शक को वह
दुर्ज्ञेय, दया की भूखी चितवन,
झूल रहा उस छाया-पट में
युग युग का जर्जर जन जीवन!
वह स्*वाधीन किसान रहा,
अभिमान भरा आँखों में इसका,
छोड़ उसे मँझधार आज
संसार कगार सदृश बह खिसका!
लहराते वे खेत दृगों में
हुया बेदख़ल वह अब जिनसे,
हँसती थी उनके जीवन की
हरियाली जिनके तृन तृन से!
आँखों ही में घूमा करता
वह उसकी आँखों का तारा,
कारकुनों की लाठी से जो
गया जवानी ही में मारा!
बिका दिया घर द्वार,
महाजन ने न ब्*याज की कौड़ी छोड़ी,
रह रह आँखों में चुभती वह
कुर्क हुई बरधों की जोड़ी!
उजरी उसके सिवा किसे कब
पास दुहाने आने देती?
अह, आँखों में नाचा करती
उजड़ गई जो सुख की खेती!
बिना दवा दर्पन के घरनी
स्*वरग चली,--आँखें आतीं भर,
देख रेख के बिना दुधमुँही
बिटिया दो दिन बाद गई मर!
घर में विधवा रही पतोहू,
लछमी थी, यद्यपि पति घातिन,
पकड़ मँगाया कोतवाल नें,
डूब कुँए में मरी एक दिन!
ख़ैर, पैर की जूती, जोरू
न सही एक, दूसरी आती,
पर जवान लड़के की सुध कर
साँप लोटते, फटती छाती!
पिछले सुख की स्*मृति आँखों में
क्षण भर एक चमक है लाती,
तुरत शून्*य में गड़ वह चितवन
तीखी नोक सदृश बन जाती।
मानव की चेतना न ममता
रहती तब आँखों में उस क्षण!
हर्ष, शोक, अपमान, ग्लानि,
दुख दैन्य न जीवन का आकर्षण!
उस अवचेतन क्षण में मानो
वे सुदूर करतीं अवलोकन
ज्योति तमस के परदों पर
युग जीवन के पट का परिवर्तन!
अंधकार की अतल गुहा सी
अह, उन आँखों से डरता मन,
वर्ग सभ्यता के मंदिर के
निचले तल की वे वातायन!
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:31 AM
बाँध दिए क्यों प्राण प्राणों से
बाँध दिए क्यों प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से
गोपन रह न सकेगी
अब यह मर्म कथा
प्राणों की न रुकेगी
बढ़ती विरह व्यथा
विवश फूटते गान प्राणों से
यह विदेह प्राणों का बंधन
अंतर्ज्वाला में तपता तन
मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को
दग्ध कामना करता अर्पण
नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:33 AM
बापू
चरमोन्नत जग में जब कि आज विज्ञान ज्ञान,
बहु भौतिक साधन, यंत्र यान, वैभव महान,
सेवक हैं विद्युत वाष्प शक्ति: धन बल नितांत,
फिर क्यों जग में उत्पीड़न? जीवन यों अशांत?
मानव नें पाई देश काल पर जय निश्चय,
मानव के पास नहीं मानव का आज हृदय!
चर्वित उसका विज्ञान ज्ञान: वह नहीं पचित;
भौतिक मद से मानव आत्मा हो गई विजित!
है श्लाघ्य मनुज का भौतिक संचय का प्रयास,
मानवी भावना का क्या पर उसमें विकास?
चाहिये विश्व को आज भाव का नवोन्मेष,
मानव उर में फिर मानवता का हो प्रवेश!
बापू! तुम पर हैं आज लगे जग के लोचन,
तुम खोल नहीं जाओगे मानव के बंधन?
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:42 AM
गृहकाज
आज रहने हो यह गृहकाज
प्राण! रहने हो यह गृहकाज!
आज जाने कैसी वातास
छोड़ती सौरभ-श्लभ उच्छ्वास,
प्रिये, लालस-सालस वातास,
जगा रोओं में सौ अभिलाष!
आज उर के स्तर-स्तर में, प्राण!
सहज सौ-सौ स्मृतियाँ सुकुमार,
दृगों में मधुर स्वप्न संसार,
मर्म में मदिर स्पृहा का भार!
शिथिल, स्वप्निल पंखड़ियाँ खोल,
आज अपलक कलिकाएँ बाल,
गूँजता भूला भौरा डोल,
सुमुखि, उर के सुख से वाचाल!
आज चंचल-चंचल मन प्राण,
आज रे, शिथिल-शिथिल तन-भार,
आज दो प्राणों का दिन-मान
आज संसार नही संसार!
आज क्या प्रिये सुहाती लाज!
आज रहने दो सब गृहकाज!
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:47 AM
जीना अपने ही में
जीना अपने ही में
एक महान कर्म है
जीने का हो सदुपयोग
यह मनुज धर्म है
अपने ही में रहना
एक प्रबुद्ध कला है
जग के हित रहने में
सबका सहज भला है
जग का प्यार मिले
जन्मों के पुण्य चाहिए
जग जीवन को
प्रेम सिन्धु में डूब थाहिए
ज्ञानी बनकर
मत नीरस उपदेश दीजिए
लोक कर्म भव सत्य
प्रथम सत्कर्म कीजिए
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:52 AM
चींटी
चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।
गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।
चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।
वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
21-02-2011, 02:56 AM
'प्रार्थना'
जग के उर्वर आँगन में
बरसो ज्योतिर्मय जीवन!
बरसो लघु लघु तृण तरु पर
हे चिर अव्यय, चिर नूतन!
बरसो कुसुमों के मधु बन,
प्राणो में अमर प्रणय धन;
स्मिति स्वप्न अधर पलकों में
उर अंगो में सुख यौवन!
छू छू जग के मृत रज कण
कर दो तृण तरु में चेतन,
मृन्मरण बांध दो जग का
दे प्राणो का आलिंगन!
बरसो सुख बन, सुखमा बन,
बरसो जग जीवन के घन!
दिशि दिशि में औ' पल पल में
बरसो संसृति के सावन!
सुमित्रानंदन पन्त
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=8961&stc=1&d=1298238908
Sikandar_Khan
22-02-2011, 03:15 PM
एक कहानी
चलो सुनाउ इक कहानी , इस मे है न राजा न रानी
चुलबुली सी थी इक चिडिया , नाम था जिसका "मुन्नी रानी"
छोटी सी चिडिया थी लेकिन, बातों मे थी बड़ी सयानि
रोज रोज वोह बुनती थी खाव्ब , नील गगन को छू लेने के
हवाओं संग गाती थी गाना, चुन चुन कर लाती वो दाना
बस थी उस मे इक खराबी, कभी न सुनती वोह बात किसीकी
मम्मी उसकी हमेशा कहती मुन्नी न करना कुछ भी नादानी
इक दिन किसी परबत पर जाने की, बात उसने मन मे ठानी
मम्मी - डेडी को बिन पूछे, निकल पड़ी करने मन मानी
उड़ती चली परबत की और न लिया संग दाना-पानी
भूख-प्यास के मारे हो रही थी वोह पानी -पानी
किस से मांगू अब में दाना, सोच रही थी मुन्नी रानी
उड़ते उड़ते जा वोह पहोंची जहा थी इक बगिया सुहानी
बच्चे खेल रहे थे जहाँ पे इक दुसरे को दे के ताली
थकी हारी मुन्नी रानी ढूंढ़ रही थी दाना पानी
नन्हे से बच्चे राजू की, नज़रों मई मुन्नी तब आई
छोटी सी चिडिया को देखने, उसने अपनी मम्मी बुलाई
राजू की इक पुकार पर मम्मी वहां दौडती आई
मुन्नी को ऐसे हाल मे देखकर आँख उसकी पानी से भर आई
मुन्नी को लेकर हाथों में , थोड़ा सा छिड़का पानी
पानी की चंद बूंदों से, मुन्नी में थोडी जान आई
राजू ने मुन्नी को घर लेजाने की मम्मी को बात बताई
मम्मी ने राजू को समजाया, " मुन्नी को वापस घर भी है जाना "
मम्मी की वोह बात सुनकर, राजू ने न की आना-कानी
राजू की ऐसी देख समजदारी, मुन्नी मन में बहोत पछताई
काश में भी सुनती मम्मी का कहा, आज यह नौबत ना थी आनी
अब न करूंगी कुछ नादानी, मुन्नी ने ली मन में ठानी
अपनी मम्मी के पास जाने, घर की और चल पड़ी मुन्नी,
घर पहोंच कर मुन्नी ने, मम्मी को सारी बात सुनाई
“मम्मी अब न करूंगी नादानी, न कोई करुँगी कोई मन-मानी”
गले लगाकर मम्मी बोली : “मुन्नी अब तू हो गई सच में सयानि “
मुन्नी बन गई सच में सायानी, और खत्म हूवी कहानी,
चलो सुनाउ इक कहानी , इस में है न राजा न रानी
(nm)
Sikandar_Khan
23-02-2011, 12:18 AM
हम नदिया की धार
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल
हम स्वच्छन्द विचार
हमारी गति चंचल
युगातीत हम रहे
नही भाया बंधन
हम शाश्वत क्रम बहे
न स्वीकारा थंभन
हम निर्झर का प्यार
हमारे स्वर कलकल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।।
अभिनय बिखेरा है हमने
विष पीकर के
खुश रहने को कहा
आंख आंसू भर के
हम शिव के अवतार
हमारे कंठ गरल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।।
अब तक मांगा नही
किसी के निर्देशन
अपने पथ का आप
किया है अन्वेषन
हम रचना आधार
हमारी कृति सम्भल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।
हम उन्मुख हो चले
सृजन के पथ पर भी
और क्रांति के बने
कभी उदघोषक भी
हम है विविध प्रकार
हमारे रूप सकल ।
हम नदिया की धार
हमारी मति निर्मल ।
संतोष सौनकिया
Sikandar_Khan
24-02-2011, 02:01 PM
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
न रजा रहा न रानी रही
न बुढ़ापा रहा न जवानी रही
हर वास्तु यहाँ आनी जनि रही
कहने सुनाने को बस यह कहानी रही
चार दिन के लिए यह झमेला जुडा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
राज रजा धरे कई धरे रह गए
कोठी बंगले खड़े के खड़े रह गए
सब नगीने जड़े के जड़े रह गए
हीरे मोती पड़े के पड़े रह गए
अंत मे लखपती कोई न ढेला जुडा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
तेरा तन नहीं है ये कुछ काम का
सारा संसार है प्यारे सुभ काम का
सोच ले प्यारे तू अपने अंजाम का
नाम रट ले मधुर मेरे घनश्याम का
राम का नाम दुनिया मे है सबसे बड़ा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
कवि मधु
sagar -
24-02-2011, 02:08 PM
सभी कविताए अच्छी हे सिकन्दर भाई
Sikandar_Khan
24-02-2011, 02:12 PM
सभी कविताए अच्छी हे सिकन्दर भाई
sagar bhai
हौसला अफजाई के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया
bhoomi ji
24-02-2011, 06:20 PM
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
न रजा रहा न रानी रही
न बुढ़ापा रहा न जवानी रही
हर वास्तु यहाँ आनी जनि रही
कहने सुनाने को बस यह कहानी रही
चार दिन के लिए यह झमेला जुडा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
राज रजा धरे कई धरे रह गए
कोठी बंगले खड़े के खड़े रह गए
सब नगीने जड़े के जड़े रह गए
हीरे मोती पड़े के पड़े रह गए
अंत मे लखपती कोई न ढेला जुडा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
तेरा तन नहीं है ये कुछ काम का
सारा संसार है प्यारे सुभ काम का
सोच ले प्यारे तू अपने अंजाम का
नाम रट ले मधुर मेरे घनश्याम का
राम का नाम दुनिया मे है सबसे बड़ा
हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा
कवि मधु
क्या बात है
"हंस जब भी उड़ा अकेला उड़ा"
सिकंदर जी
बहुत ही अच्छी और प्रेरणादायक कवितायेँ :bravo::bravo:
Sikandar_Khan
27-02-2011, 12:01 AM
http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=9005&stc=1&d=1298748575
Sikandar_Khan
27-02-2011, 01:17 AM
तराना-ए-हिन्द
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं उसकी ये गुलसिताँ हमारा
ग़ुरबत में हों अगर हम रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा
पर्बत वो सब से ऊँचा हमसाया आसमाँ का
वो सन्तरी हमारा वो पासबाँ हमारा
गोदी में खेलती हैं जिसकी हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिस के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमारा
ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा, वो दिन है याद तुझ को
उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गये जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
'इक़बाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
इक़बाल
Sikandar_Khan
27-02-2011, 01:21 AM
मेरा नया बचपन
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥
चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥
किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥
मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥
दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥
लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥
दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥
मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥
सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥
माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥
आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥
वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?
मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥
मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥
पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥
मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥
जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥
सुभद्राकुमारी चौहान
Sikandar_Khan
27-02-2011, 01:23 AM
जलियाँवाला बाग में बसंत
यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।
सुभद्रा कुमारी चौहान
Sikandar_Khan
27-02-2011, 01:49 AM
अगर प्*यार में और कुछ नहीं
अगर प्*यार में और कुछ नहीं
केवल दर्द है फिर क्*यों है यह प्*यार ?
कैसी मूर्खता है यह
कि चूंकि हमने उसे अपना दिल दे दिया
इसलिए उसके दिल पर
दावा बनता है,हमारा भी
रक्*त में जलती ईच्*छाओं और आंखों में
चमकते पागलपन के साथ
मरूथलों का यह बारंबार चक्*कर क्*योंकर ?
दुनिया में और कोई आकर्षण नहीं उसके लिए
उसकी तरह मन का मालिक कौन है;
वसंत की मीठी हवाएं उसके लिए हैं;
फूल, पंक्षियों का कलरव सबकुछ
उसके लिए है
पर प्*यार आता है
अपनी सर्वगासी छायाओं के साथ
पूरी दुनिया का सर्वनाश करता
जीवन और यौवन पर ग्रहण लगाता
फिर भी न जाने क्*यों हमें
अस्तित्*व को निगलते इस कोहरे की
तलाश रहती है ?
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
Sikandar_Khan
28-02-2011, 09:30 PM
आभार
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।
जीवन अस्थिर अनजाने ही
हो जाता पथ पर मेल कहीं
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल
तय कर लेना कुछ खेल नहीं
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते
सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।
साँसों पर अवलम्बित काया
जब चलते-चलते चूर हुई
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली
नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई
पथ के पहचाने छूट गए
पर साथ-साथ चल रही याद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।
जो साथ न मेरा दे पाए
उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या
राही मर लेकिन राह अमर
इस पथ पर वे ही चलते हैं
जो चलने का पा गए स्वाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।
कैसे चल पाता यदि न मिला
होता मुझको आकुल-अन्तर
कैसे चल पाता यदि मिलते
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर
आभारी हूँ मैं उन सबका
दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।
- शिवमंगल सिंह सुमन
Sikandar_Khan
28-02-2011, 09:59 PM
कभी हम खो गये कभी तुम खो गये।
दासतां कहते सुनते ही हम सो गये।
नील नभ को सजाया तुम्हारे लिये,
इंद्रधनु माँग लाया तुम्हारे लिये,
भूल जाओ तिमिर में न तुम राह को
नेह दीपक जलाया तुम्हारे लिये,
रोशनी में मगर तुम तो गुम हो गये। कभी..............
मैंने देखा है सूरज निकलते हुये
शाम कि वक्त चुपचाप ढलते हुये
रूप का गर्व है आपको किसलिये
क्या न देखा कभी हिम पिघलते हुये
फूल की चाह थी शूल क्यों बो गये। कभी..........................
मैंने देखे हैं पत्थर पिघलते हुये
शीत जल में से शोले निकलते हुये
तुम न बदलोगी ये कैसे विश्वास हो
क्या न देखा कभी हिम पिघलते हुये
सिसकियाँ तुमने लीं और हम रो गये। कभी...................................
dr vishnu saxena
Sikandar_Khan
09-03-2011, 08:32 PM
औरत का तो ये गुण है सदा से मशहूर
गाती हुई हाथों में सिंगर की मशीन
कतरों से पसीने के शराबोर जबीन
मसरूफ किसी काम में देखूं जो तुझे
तू और भी मुझको नजर आती है हसीन
पानी कभी दे रही है फुलवारी में
कपड़े कभी रख रही है अलमारी में
तू कितनी घरेलू-सी नजर आती है
लिपटी हुई, हाथ की धुली साड़ी में
अब इसको किफायत कहो या इसका शऊर
औरत का तो ये गुण है सदा से मशहूर
हर तरह की तंगी भी उठा लेगी, मगर
चुपचाप से कुछ बचा के रखेगी जरूर
चुप रह के हर एक घर की परेशानी को
किस तरह न जाने तू उठा लेती है
फिर आए-गए से, मुस्कुरा कर मिलना
तू कैसे हर एक दर्द छुपा लेती है
(nm)
Sikandar_Khan
09-03-2011, 09:34 PM
बीती विभावरी जाग री
बीती विभावरी जाग री!
अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट ऊषा नागरी।
खग कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर ला*ई
मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये
तू अब तक सो*ई है आली
आँखों में भरे विहाग री।
जयशंकर प्रसाद
Sikandar_Khan
09-03-2011, 09:39 PM
ठंडा लोहा ! ठंडा लोहा ! ठंडा लोहा !
मेरी दुखती रगों पर ठंडा लोहा !
मेरी स्वप्न भरी पलकों पर
मेरे गीत भरे होंठों पर
मेरी दर्द भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब
एक पर्त ठन्डे लोहे की
मै जमकर लोहा बन जाऊं -----
हार मान लूँ -----
यह शर्त ठन्डे लोहे की
ओ मेरी आत्मा की संगिनी
तुम्हे समर्पित मेरी साँस -साँस थी लेकिन
मेरी सांसों में यम के तीखे नेजे
सा कौन अडा है ?
ठंडा लोहा !
मेरे और तुम्हारे निश्छल विश्वासों को
आज कुचलने को कौन खड़ा है ?
ठंडा लोहा !
फूलों से ,सपनों से ,आंसू और प्यार से
कौन बड़ा है ?
ठंडा लोहा !
ओ मेरी आत्मा की संगिनी !
अगर जिन्दगी की करा गे ,
कभी छटपटा कर मुझको आवाज लगाओ
और न कोई उत्तर पाओ
यही समझना कोई इसको धीरे -धीरे निगल चुका है ,
इस बस्ती में कोई दीप जलाने वाला नहीं बचा है ,
सूरज और सितारे ठन्डे
रहें सूनी
विवश हवाएं
शीश झुकाए खड़ी मौन हैं ,
बचा कौन है ?
ठंडा लोहा ! ठंडा लोहा ! ठंडा लोहा !
धरमवीर भारती
bhoomi ji
09-03-2011, 09:48 PM
बहुत सुन्दर और दिल को छू लेने वाली कवितायें हैं
pankaj bedrdi
09-03-2011, 10:18 PM
धन्यवाद जो आपने इतने अच्छा अच्छा कविता ....
Sikandar_Khan
09-03-2011, 10:31 PM
आज सड़कों पर
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख
एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख
अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख
वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख
ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख
राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख
दुष्यंत कुमार
Sikandar_Khan
10-03-2011, 08:51 AM
ग्राम श्री
फैली खेतों में दूर तलक
मख़मल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिस से रवि की किरणें
चाँदी की-सी उजली जाली !
रोमाँचित-सी लगती वसुधा
आयी जौ-गेहूँ में बाली
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली
उड़ती भीनी तैलाक्त गन्ध
फूली सरसों पीली-पीली,
लो, हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि, तीसी नीली,
रँग-रँग के फूलों में रिलमिल
हँस रही संखिया मटर खड़ी,
मख़मली पेटियों-सी लटकी
छीमियाँ, छिपाये बीज लड़ी !
अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से
लद गयी आम्र-तरु की डाली,
झर रहे ढाँक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली !
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली,
फूले आड़ू, नीबू, दाड़िम,
आलू, गोभी, बैगन, मूली !
पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल-लाल चित्तियाँ पड़ीं
पक गये सुनहले मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ीं !
लहलह पालक,महमह धनिया,
लौकी औ' सेम फली,फैलीं !
मख़मली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली !
गंजी को मार गया पाला,
अरहर के फूलों को झुलसा,
हाँका करती दिन-भर बन्दर
अब मालिन की लड़की तुलसा !
बालाएँ गजरा काट-काट,
कुछ कह गुपचुप हँसतीं किन-किन
चाँदी की-सी घण्टियाँ तरल
बजती रहती रह-रह खिन-खिन!
बगिया के छोटे पेड़ों पर
सुन्दर लगते छोटे छाजन,
सुन्दर गेहूँ, की बालों पर
मोती के दानों से हिमकन !
प्रात: ओझल हो जाता जग,
भू पर आता ज्यों उतर गगन,
सुन्दर लगते फिर कुहरे से
उठते-से खेत, बाग़, गॄह वन !
लटके तरुओं पर विहग नीड़
वनचर लड़कों को हुए ज्ञात,
रेखा-छवि विरल टहनियों की
ठूँठे तरुओं के नग्न गात !
आँगन में दौड़ रहे पत्ते,
धूमती भँवर-सी शिशिर-वात,
बदली छँटने पर लगती प्रिय
ऋतुमती धरित्री सद्य-स्नात !
हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोये,
भीगी अँधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से-खोये,-
मरकत डिब्बे-सा खुला ग्राम-
जिस पर नीलम नभ-आच्छादन-
निरुपम हिमान्त में स्निग्ध-शान्त
निज शोभा से हरता न-मनज !
सुमित्रानंदन पंत
Sikandar_Khan
10-03-2011, 08:54 AM
तुम और मैं
तुम तुंग - हिमालय - श्रृंग
और मैं चंचल-गति सुर-सरिता।
तुम विमल हृदय उच्छवास
और मैं कांत-कामिनी-कविता।
तुम प्रेम और मैं शान्ति,
तुम सुरा - पान - घन अन्धकार,
मैं हूँ मतवाली भ्रान्ति।
तुम दिनकर के खर किरण-जाल,
मैं सरसिज की मुस्कान,
तुम वर्षों के बीते वियोग,
मैं हूँ पिछली पहचान।
तुम योग और मैं सिद्धि,
तुम हो रागानुग के निश्छल तप,
मैं शुचिता सरल समृद्धि।
तुम मृदु मानस के भाव
और मैं मनोरंजिनी भाषा,
तुम नन्दन - वन - घन विटप
और मैं सुख -शीतल-तल शाखा।
तुम प्राण और मैं काया,
तुम शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म
मैं मनोमोहिनी माया।
तुम प्रेममयी के कण्ठहार,
मैं वेणी काल-नागिनी,
तुम कर-पल्लव-झंकृत सितार,
मैं व्याकुल विरह - रागिनी।
तुम पथ हो, मैं हूँ रेणु,
तुम हो राधा के मनमोहन,
मैं उन अधरों की वेणु।
तुम पथिक दूर के श्रान्त
और मैं बाट - जोहती आशा,
तुम भवसागर दुस्तर
पार जाने की मैं अभिलाषा।
तुम नभ हो, मैं नीलिमा,
तुम शरत - काल के बाल-इन्दु
मैं हूँ निशीथ - मधुरिमा।
तुम गन्ध-कुसुम-कोमल पराग,
मैं मृदुगति मलय-समीर,
तुम स्वेच्छाचारी मुक्त पुरुष,
मैं प्रकृति, प्रेम - जंजीर।
तुम शिव हो, मैं हूँ शक्ति,
तुम रघुकुल - गौरव रामचन्द्र,
मैं सीता अचला भक्ति।
तुम आशा के मधुमास,
और मैं पिक-कल-कूजन तान,
तुम मदन - पंच - शर - हस्त
और मैं हूँ मुग्धा अनजान !
तुम अम्बर, मैं दिग्वसना,
तुम चित्रकार, घन-पटल-श्याम,
मैं तड़ित् तूलिका रचना।
तुम रण-ताण्डव-उन्माद नृत्य
मैं मुखर मधुर नूपुर-ध्वनि,
तुम नाद - वेद ओंकार - सार,
मैं कवि - श्रृंगार शिरोमणि।
तुम यश हो, मैं हूँ प्राप्ति,
तुम कुन्द - इन्दु - अरविन्द-शुभ्र
तो मैं हूँ निर्मल व्याप्ति।
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
Bhuwan
10-03-2011, 01:56 PM
सिकंदर भाई एक बार फिर से बहुत अछि कविताएँ लेकर आएं हैं.
आपका धन्यवाद.:banalema:
Sikandar_Khan
12-03-2011, 12:18 AM
कम महत्व वाला आदमी
हर घर हर जगह
होता है एक कम महत्त्व वाला आदमी
वो बोलता नहीं सिर्फ है
सिर्फ पूंछने पर देता है जवाब
झिझक शंका रोज पूंछते हैं उससे
तुम कहां बैठोगे ?
तुम्हारा कमरा आज क्या होगा ?
तुम्हारी चादर , तुम्हारा बिस्तर
कब बदला जायेगा ?
आज तुम्हारे खाने - सोने में समय कितना खिसकेगा ?
इस बार तुम्हारी छुट्टी किसकी छुट्टी से कटेगी ?
अपने सारे सवालों के जवाब में
वो एक कबाड़ी की तरह
कचरे में हाथ डाल - डाल कर
बाकी सबके बचे - छोडे
कम महत्व के टुकड़ों को
अनचाहे मन से थोड़े कम से
बोरी में भर लेता है
आधी दिहाड़ी के लिए |
और एक दिन जब नहीं रहता
ये कम महत्व वाला आदमी
तो उसके तमाम सवाल
उसकी झिझक उसकी शंका
उसकी पिछली पंक्ति ,उसका कोना
उसकी ओढ़न, उतरन , बिछावन ,
उसकी पौनी करवट
उसकी कटी छुट्टी
उसका टूटा खिसका समय
उससे भी कम महत्व वाले आदमी को
तजेन्द्र लूथरा
Kumar Anil
12-03-2011, 02:30 PM
साहित्य के अनुरागी सिकन्दर भाई को अपनी मनपसंद एक कविता समर्पित करूँगा , जो आदरणीय सफ़दर हाशमी की कृति है । हाशमी साहब ओजस्वी रंगकर्मी होने के साथ साथ मूल्योँ के लिये भी समर्पण भाव रखते थे । निरंकुश और भ्रष्ट व्यवस्था से निरन्तर संघर्षरत रहे और अन्ततोगत्वा इसी संघर्ष के दौरान अल्पायु मेँ ही एक दिन निर्मम हत्या के शिकार हो गये .....
किताबेँ
करती हैँ बातेँ
बीते ज़मानोँ की
दुनिया की , इंसानोँ की
आज की , कल की
एक एक पल की
ख़ुशियोँ की , ग़मोँ की
फूलोँ की , बमोँ की
जीत की , हार की
प्यार की , मार की
क्या तुम नहीँ सुनोगे
इन किताबोँ की बातेँ ?
किताबेँ
कुछ कहना चाहती हैँ
तुम्हारे पास
रहना चाहती हैँ
किताबोँ मेँ
चिड़ियाँ चहचहाती हैँ
किताबोँ मेँ
खेतियाँ लहलहाती हैँ
किताबोँ मेँ
झरने गुनगुनाते हैँ
परियोँ के क़िस्से
सुनाते हैँ
किताबोँ मेँ
रॉकेट का राज़ है
किताबोँ मेँ
साइंस की आवाज़ है
किताबोँ मेँ
कितना बड़ा संसार है
किताबोँ मेँ
ज्ञान की भरमार है
क्या तुम इस संसार मेँ
नहीँ जाना चाहोगे ?
किताबेँ
कुछ कहना चाहतीँ हैँ
तुम्हारे पास रहना चाहतीँ हैँ ।
ndhebar
12-03-2011, 06:12 PM
हर घर हर जगह
होता है एक कम महत्त्व वाला आदमी
सोचने वाली बात ये है की वो आदमी कम महत्व वाला क्यों होता है ?
पर होता जरूर है इस बात से मैं भी सहमत हूँ.
Sikandar_Khan
14-03-2011, 11:20 AM
जीना अपने ही में
जीना अपने ही में
एक महान कर्म है
जीने का हो सदुपयोग
यह मनुज धर्म है
अपने ही में रहना
एक प्रबुद्ध कला है
जग के हित रहने में
सबका सहज भला है
जग का प्यार मिले
जन्मों के पुण्य चाहिए
जग जीवन को
प्रेम सिन्धु में डूब थाहिए
ज्ञानी बनकर
मत नीरस उपदेश दीजिए
लोक कर्म भव सत्य
प्रथम सत्कर्म कीजिए
- सुमित्रानंदन पंत
amit_tiwari
18-03-2011, 05:28 AM
कम महत्व वाला आदमी
हर घर हर जगह
होता है एक कम महत्त्व वाला आदमी
वो बोलता नहीं सिर्फ है
सिर्फ पूंछने पर देता है जवाब
झिझक शंका रोज पूंछते हैं उससे
तुम कहां बैठोगे ?
तुम्हारा कमरा आज क्या होगा ?
तुम्हारी चादर , तुम्हारा बिस्तर
कब बदला जायेगा ?
आज तुम्हारे खाने - सोने में समय कितना खिसकेगा ?
इस बार तुम्हारी छुट्टी किसकी छुट्टी से कटेगी ?
अपने सारे सवालों के जवाब में
वो एक कबाड़ी की तरह
कचरे में हाथ डाल - डाल कर
बाकी सबके बचे - छोडे
कम महत्व के टुकड़ों को
अनचाहे मन से थोड़े कम से
बोरी में भर लेता है
आधी दिहाड़ी के लिए |
और एक दिन जब नहीं रहता
ये कम महत्व वाला आदमी
तो उसके तमाम सवाल
उसकी झिझक उसकी शंका
उसकी पिछली पंक्ति ,उसका कोना
उसकी ओढ़न, उतरन , बिछावन ,
उसकी पौनी करवट
उसकी कटी छुट्टी
उसका टूटा खिसका समय
उससे भी कम महत्व वाले आदमी को
तजेन्द्र लूथरा
:fyi: काफी अच्छी कविता और भाव उससे भी अच्छे !!!
शायद ये कम महत्त्व वाला आदमी ही सबसे इमानदार और सुखी होता है | ना बैंक अकाउंट में जीरो बढाने की फिकर और ना उन जीरो को बढ़ चढ़ कर बताने का झंझट !!!
धन्यवाद सिकंदर भाई इसे पढ़ाने के लिए |
Sikandar_Khan
18-03-2011, 11:38 PM
कारवां गुज़र गया
स्वप्न झरे फूल से,
मीत-चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे !
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पांव जब तलक उठे कि ज़िंदगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिये धुआं पहन-पहन गए
और हम झुके-झुके
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे !
क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आईना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहां,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे
वक़्त से पिटे-पिटे
सांस की शराब का ख़ुमार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे !
हाथ थे मिले कि जुल्फ चांद की संवार दूं,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं,
दर्द था कि दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं,
और सांस यूं कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि ढह गए क़िले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे !
मांग भर चली कि एक जब नई-नई किरन,
झोलकें धुनक उठीं, ठुमक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गांव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी
गाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर, तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान-से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहें !
कारवा गुज़र गया, गुबार देखते रहे !
नीरज
Sikandar_Khan
18-03-2011, 11:51 PM
कड़वा सत्य
एक लंबी मेज
दूसरी लंबी मेज
तीसरी लंबी मेज
दजीवारों से सटी पारदर्शी शीशेवाली अलमारियाँ
मेजों के दोनों ओर बैठे हैं व्यक्ति
पुरुष-स्त्रियाँ
युवक-युवतियाँ
बूढ़े-बूढ़ियाँ
सब प्रसन्न हैं
कम-से-कम अभिनय उनका इंगित करता है यही
पर मैं चिंतित हूँ
देखकर उस वृद्धा को
जो कभी प्रतिमा भी लावण्य की
जो कभी तड़प थी पूर्व राग की
क्या ये सब युवतियाँ
जो जीवन उँड़ेल रही हैं
युवक हृदयों में
क्या ये सब भी
बूढ़ी हो जाएँगी
देखता हूँ पारदर्शी शीशे में
इस इंद्रजाल को
सोचता हूँ—
सत्य सचमुच कड़वा होता है।
विष्णु प्रभाकर
Sikandar_Khan
19-03-2011, 04:01 AM
सत्याग्रह का अलख
भभक रहे भ्रष्टाचारी शोलों को
ठंडा करने
क्या अब इस धरती पर
"मंगल पाण्डे" जन्म नहीं लेंगे
बेलगाम प्रशासन पर
बम फ़ेंकने
क्या अब इस धरती पर
"भगत सिंह" जन्म नहीं लेंगे
दुष्ट-पापियों से लडने को
एक नई सेना बनाने
क्या अब इस धरती पर
"सुभाष चन्द्र" जन्म नहीं लेंगे
एक नई आजादी के खातिर
सत्याग्रह का अलख जगाने
क्या अब इस धरती पर
"महात्मा गांधी" जन्म नहीं लेंगे !!!
WRITER : Shyam kori 'uday''
Sikandar_Khan
20-03-2011, 02:31 PM
ले चल वहाँ भुलावा देकर
ले चल वहाँ भुलावा देकर,
मेरे नाविक! धीरे धीरे।
जिस निर्जन मे सागर लहरी।
अम्बर के कानों में गहरी
निश्*चल प्रेम-कथा कहती हो,
तज कोलाहल की अवनी रे।
जहाँ साँझ-सी जीवन छाया,
ढोले अपनी कोमल काया,
नील नयन से ढुलकाती हो
ताराओं की पाँत घनी रे ।
जिस गम्भीर मधुर छाया में
विश्*व चित्र-पट चल माया में
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई,
दुख सुख वाली सत्य बनी रे।
श्रम विश्राम क्षितिज वेला से
जहाँ सृजन करते मेला से
अमर जागरण उषा नयन से
बिखराती हो ज्योति घनी से!
जयशंकर प्रसाद
Sikandar_Khan
20-03-2011, 04:37 PM
आह ! वेदना मिली विदाई
आह ! वेदना मिली विदाई
मैंने भ्रमवश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई
छलछल थे संध्या के श्रमकण
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण
मेरी यात्रा पर लेती थी
नीरवता अनंत अँगड़ाई
श्रमित स्वप्न की मधुमाया में
गहन-विपिन की तरु छाया में
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
यह विहाग की तान उठाई
लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी
रही बचाए फिरती कब की
मेरी आशा आह ! बावली
तूने खो दी सकल कमाई
चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर
उससे हारी-होड़ लगाई
लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व ! न सँभलेगी यह मुझसे
इसने मन की लाज गँवाई
जयशंकर प्रसाद
Sikandar_Khan
21-03-2011, 05:21 PM
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
और एक बार मुझे मेरे बचपन में बुलाती है
उसका तुतलाना , चलते चलते गिर जाना
गिर कर उठाना फिर दौड़ जाना
मुझे गिर कर संभलना सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
उनकी गृहस्थी का अलग संसार है
उसकी गुडिया उसका गुड्डा जिससे उसे प्यार है
रोज वह उनका ब्याह का खेल रचती है
मुझे बेटी गृहस्थी के नियम सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
अपनी दुनिया से जब थक जाती है
मेरे सीने से लग सो जाती है
वह सिखाती है की दुनिया एक झमेला है
यह बस गुड्डा गुडिया का मेला है
जिद करती है रट लगाती है
अपनी हर बात को मनवाती है
जरा सी भी औकात नहीं है हमारी
फिर भी वह दुनिया से जीत जाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
(nm)
Bond007
21-03-2011, 06:34 PM
अएहाये सिकंदर मियां! दिल के भाव निकल कर आ रहे हैं|
क्या कहूं, मन खुश हो गया| :party:
saajid
21-03-2011, 06:38 PM
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
और एक बार मुझे मेरे बचपन में बुलाती है
उसका तुतलाना , चलते चलते गिर जाना
गिर कर उठाना फिर दौड़ जाना
मुझे गिर कर संभलना सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
उनकी गृहस्थी का अलग संसार है
उसकी गुडिया उसका गुड्डा जिससे उसे प्यार है
रोज वह उनका ब्याह का खेल रचती है
मुझे बेटी गृहस्थी के नियम सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
अपनी दुनिया से जब थक जाती है
मेरे सीने से लग सो जाती है
वह सिखाती है की दुनिया एक झमेला है
यह बस गुड्डा गुडिया का मेला है
जिद करती है रट लगाती है
अपनी हर बात को मनवाती है
जरा सी भी औकात नहीं है हमारी
फिर भी वह दुनिया से जीत जाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
(nm)
भाईजान अप इतनी मार्मिक कवितायेँ कहाँ से लाते हैं मैं तो रो परा :cryingbaby:
Sikandar_Khan
21-03-2011, 06:40 PM
अएहाये सिकंदर मियां! दिल के भाव निकल कर आ रहे हैं|
क्या कहूं, मन खुश हो गया| :party:
हार्दिक आभार बंधू
Sikandar_Khan
21-03-2011, 06:42 PM
भाईजान अप इतनी मार्मिक कवितायेँ कहाँ से लाते हैं मैं तो रो परा :cryingbaby:
फैज भाई
रो मत इसी मे हमारे जीवन का सत्य छुपा है
Sikandar_Khan
21-03-2011, 10:15 PM
सूरज की गर्मी
मैने देखा है.. मैने जाना है
इस सच्चाई को मैने माना है
के सूरज की गर्मी से भी बड़ी होती है पेट की गर्मी
देखे है मैने तेज़ धूप में
वो थके लड़खड़ाते हुए कदम
कंधों पर अपने सामान को उठाये
छाँव की खुदा से करते वो रहम
देखी है मैने एक बच्चे की आंखें
जो कड़ी धूप में बूट पालिश करता है
आइस क्रीम खाते हुए उन बच्चों को
अपनी लाचार ऩज़रों से वो देखता है
देखा है मैने कुछ लोगों को ट्राफ़िक सिग्नल पर
रुकती हुई गाड़ियों को साफ़ करते हुए
आग की लपटों जैसी सूरज की इस गर्मी में
मेहनत में अपना पसीना बहाते हुए
इन मुश्किलों से भी गुज़र कर लोग
तेज़ धूप में भी मुस्कुराते हैं
सूरज की गर्मी से भी बड़ी होती हे पेट की गर्मी
यह इक रोटी की क़ीमत हमे समझाते हैं
हां !! इक रोटी की क़ीमत हमे समझाते हैं..!!
(nm)
Sikandar_Khan
22-03-2011, 01:39 AM
डा. कुमार विश्वास - रंग बिरंगी दुनिया
इतनी रंग बिरंगी दुनिया, दो आँखों में कैसे आये,
हमसे पूछो इतने अनुभव, एक कंठ से कैसे गाये.
ऐसे उजले लोग मिले जो, अंदर से बेहद काले थे,
ऐसे चतुर मिले जो मन से सहज सरल भोले-भाले थे.
ऐसे धनी मिले जो, कंगलो से भी ज्यादा रीते थे,
ऐसे मिले फकीर, जो, सोने के घट में पानी पीते थे.
मिले परायेपन से अपने, अपनेपन से मिले पराये,
हमसे पूछो इतने अनुभव, एक कंठ से कैसे गाये.
इतनी रंग बिरंगी दुनिया, दो आँखों में कैसे आये.
जिनको जगत-विजेता समझा, मन के द्वारे हारे निकले,
जो हारे-हारे लगते थे, अंदर से ध्रुब- तारे निकले.
जिनको पतवारे सौपी थी, वे भवरो के सूदखोर थे,
जिनको भवर समझ डरता था, आखिर वोही किनारे निकले.
वो मंजिल तक क्या पहुचे, जिनको रास्ता खुद भटकाए
हमसे पूछो इतने अनुभव, एक कंठ से कैसे गाये,
इतनी रंग बिरंगी दुनिया, दो आँखों में कैसे आये.
Sikandar_Khan
22-03-2011, 01:42 AM
फिर बसंत आना है - डा. कुमार विश्वास
तूफानी लहरें हों
अम्बर के पहरे हों,
पुरुवा के दामन पर दाग बहुत गहरे हों,
सागर के मांझी, मत मन को तू हारना,
जीवन के क्रम मैं जो खोया है पाना है.
पतझर का मतलब है
फिर बसंत आना है.
राजवंश रूठे तो
राज मुकुट टूटे तो
सीतापति राघव से राजमहल छूटे तो
आशा मत हार,
पर सागर के एक बार,
पत्थर मैं प्राण फूंक सेतु फिर बनाना है
अंधियारे के आगे, दीप फिर जलाना है
पतझर का मतलब है
फिर बसंत आना है.
घर-भर चाहे छोडे,
सूरज भी मुंह मोड़े
विदुर रहे मौन, छीने राज्य, स्वर्ण रथ, घोड़े
माँ का बस प्यार, सार गीता का साथ रहे,
पंचतत्व सौ पर हैं भारी बतलाना है
जीवन का राजसूय यज्ञ फिर कराना है
पतझर का मतलब है
फिर बसंत आना है
Sikandar_Khan
22-03-2011, 01:56 AM
चाँद ने कहा है - डा. कुमार विश्वास
चाँद ने कहा है, एक बार फिर चकोर से,
इस जनम में भी जलेगे तुम ही मेरी और से
हर जनम का अपना चाँद है, चकोर है अलग,
यूँ जनम जनम का एक ही मछेरा है मगर,
हर जनम की मछलियाँ अलग हैं डोर है अलग,
डोर ने कहा है मछलियों की पोर-पोर से
इस जनम में भी बिंधोगी तुम ही मेरी ओर से
इस जनम में भी जलोगी तुम ही मेरी ओर से
यूँ अनंत सर्ग और ये कथा अनंत है
पंक से जनम लिया है पर कमल पवित्र है
यूँ जनम जनम का एक ही वो चित्रकार है
हर जनम की तूलिका अलग, अलग ही चित्र है
ये कहा है तूलिका ने, चित्र के चरित्र से
इस जनम में भी सजोगे तुम ही मेरी कोर से
चाँद ने कहा है एक बार फिर चकोर से
इस जनम में भी जलोगी तुम ही मेरी ओर से
हर जनम के फूल हैं अलग, हैं तितलियाँ अलग
हर जनम की शोखियाँ अलग, हैं सुर्खियाँ अलग
ध्वँस और सृजन का एक राग है अमर, मगर
हर जनम का आशियाँ अलग, है बिजलियाँ अलग
नीड़ से कहा है बिजलियों ने जोर शोर से
इस जनम में भी जलोगी तुम ही मेरी ओर से
इस जनम में भी मिटोगे तुम ही मेरी ओर से
चाँद ने कहा है एक बार फिर चकोर से
Sikandar_Khan
22-03-2011, 01:58 AM
मधुयामिनी - डा. कुमार विश्वास
क्या अजब रात थी, क्या गज़ब रात थी
दंश सहते रहे, मुस्कुराते रहे
देह की उर्मियाँ बन गयी भागवत
हम समर्पण भरे अर्थ पाते रहे
मन मे अपराध की, एक शंका लिए
कुछ क्रियाये हमें जब हवन सी लगीं
एक दूजे की साँसों मैं घुलती हुई
बोलियाँ भी हमें, जब भजन सी लगीं
कोई भी बात हमने न की रात-भर
प्यार की धुन कोई गुनगुनाते रहे
देह की उर्मियाँ बन गयी भागवत
हम समर्पण भरे अर्थ पाते रहे
पूर्णिमा की अनघ चांदनी सा बदन
मेरे आगोश मे यूं पिघलता रहा
चूड़ियों से भरे हाथ लिपटे रहे
सुर्ख होठों से झरना सा झरता रहा
इस नशा सा अजब छा गया था की हम
खुद को खोते रहे तुमको पाते रहे
देह की उर्मियाँ बन गयी भागवत
हम समर्पण भरे अर्थ पाते रहे
आहटों से बहुत दूर पीपल तले
वेग के व्याकरण पायलों ने गढ़े
साम-गीतों की आरोह - अवरोह में
मौन के चुम्बनी- सूक्त हमने पढ़े
सौंपकर उन अंधेरों को सब प्रश्न हम
इक अनोखी दीवाली नामाते रहे
देह की उर्मियाँ बन गयी भागवत
हम समर्पण भरे अर्थ पाते रहे
Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:04 AM
मोरे अंगना, आये सांझ सकारे - डा कुमार विश्वास
तन मन महका जीवन महका
महक उठे घर-द्वारे
जब- जब सजना
मोरे अंगना, आये सांझ सकारे
खिली रूप की धुप
चटक गयीं कलियाँ, धरती डोली
मस्त पवन से लिपट के पुरवा, हौले-हौले बोली
छीनके मेरी लाज की चुनरी, टाँके नए सितारे
जब- जब सजना
मोरे अंगना, आये सांझ सकारे
सजना के अंगना तक पहुंचे
बातें जब कंगना की
धरती तरसे, बादल बरसे, मिटे प्यास मधुबन की
होठों की चोटों से जागे, तन के सुप्त नगारे
जब- जब सजना
मोरे अंगना, आये सांझ सकारे
नदिया का सागर से मिलने
धीरे-धीरे बढ़ना
पर्वत के आखरघाटी, वाली आँखों से पढ़ना
सागर सी बाहों मे आकर, टूटे सभी किनारे
जब- जब सजना
मोरे अंगना, आये सांझ सकारे
Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:06 AM
तुमने जाने क्या पिला दिया. - डा.कुमार विश्वास
कैसे भूलूं वह एक रात, तन हरर्सिंगार मन-पारिजात,
छुअनें,सिहरन,पुलकन,कम्पन,
अधरो से अंतर हिला दिया,
तुमने जाने क्या पिला दिया.
तन की सारी खिडकिया खोलकर मन आया अगवानी मै,
चेतना और सन्यम भटके,मन की भोली नादानी मै,
थी तेज धार,लहरे अपार,भवरे थी कठिन, मगर फिर भी,
डरते-डरते मैं उतर गया,नदिया के गहरे पानी मै
नदिया ने भी जोबन-जीवन,
जाकर सागर मैं मिला दिया,
तुमने जाने क्या पिला दिया
जिन जख्मो की हो दवा सुलभ,उनके रिसते रहने से क्या,
जो बोझ बने जीवन-दर्श,न,उसमे पिसते रहने सेक्या.
हो सिंह्दवार परअंधकार,तो जगमग महल किसे दीखे
तन पर काई जम जाये तो,मन को रिसते रहने से क्या.
मेरी भटकन पी गये स्वयम,
मुझसे मुझको क्यो मिला दिया,
तुमने जाने क्या पिला दिया.
Bhuwan
22-03-2011, 03:00 PM
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
और एक बार मुझे मेरे बचपन में बुलाती है
उसका तुतलाना , चलते चलते गिर जाना
गिर कर उठाना फिर दौड़ जाना
मुझे गिर कर संभलना सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
उनकी गृहस्थी का अलग संसार है
उसकी गुडिया उसका गुड्डा जिससे उसे प्यार है
रोज वह उनका ब्याह का खेल रचती है
मुझे बेटी गृहस्थी के नियम सिखाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
अपनी दुनिया से जब थक जाती है
मेरे सीने से लग सो जाती है
वह सिखाती है की दुनिया एक झमेला है
यह बस गुड्डा गुडिया का मेला है
जिद करती है रट लगाती है
अपनी हर बात को मनवाती है
जरा सी भी औकात नहीं है हमारी
फिर भी वह दुनिया से जीत जाती है
मेरी बेटी मुझे बहुत कुछ सिखाती है
(nm)
वाह सिकंदर भाई एक बार फिर से आपकी कविता पढ़कर मजा आ गया.
Sikandar_Khan
24-03-2011, 09:27 AM
होता मोती अनमोल
सागर में सीपी
सीपी में मोती ,
वह गहरे जल में जा बैठी
आचमन किया सागर जल से
स्नान किया खारे जल से
फिर भी कभी नहीं हिचकी
गहरे जल में रहने में
क्योंकि वह जान गई थी
एक मोती पल रहा था
तिल-तिल कर बढ़ रहा था
उसके तन में
पानी क्यूँ ना हो मोती में
कई परतों में छिपा हुआ था
जतन से सहेजा गया था
यही आभा उसकी
बना देती अनमोल उसे
बिना पानी वह कुछ भी नहीं
उसका कोई मूल्य नहीं
सारा श्रेय जाता सीपी को
जिसने कठिन स्थिति में
हिम्मत ज़रा भी नहीं हारी
हर वार सहा जलनिधि का
और आसपास के जीवों का
क्योंकि मोती पल रहा था
अपना विकास कर रहा था
उसके ही तन में
था बहुत अनमोल
सब के लिये |
आशा
Sikandar_Khan
24-03-2011, 09:31 AM
रंग बिरंगे फूल चुने
रंग बिरंगे फूल चुने ,
चुन-चुन कर माला बना ,
रोली चावल और नैवेद्य से ,
थाली खूब सजाई है ,
यह नहीं केवल आकर्षण ,
प्रबल भावना है मेरी ,
माला में गूँथे गये फूल ,
कई बागों से चुन-चुन ,
नाज़ुक हाथों से ,
सुई से धागे में पिरो कर ,
माला के रूप में लाई हूँ ,
भावनाओं का समर्पण ,
ध्यानमग्न रह ,
तुझ में ही खोये रहना ,
सुकून मन को देता है ,
शांति प्रदान करता है ,
जब भी विचलित होता मन ,
सानिध्य पा तेरा ,
स्थिर होने लगता है ,
नयी ऊर्जा आती है ,
नित्य प्रेरणा मिलती है ,
दुनिया के छल छिद्रों से ,
बहुत दूर रह ,
शांत मना रहती हूँ ,
भय मुक्त रहती हूँ ,
होता है संचार साहस का ,
है यही संचित पूँजी ,
इस पर होता गर्व मुझे ,
हे सृष्टि के रचने वाले ,
पूरे मन से सदा ,
तेरा स्मरण करती हूँ ,
तुझ पर ही ,
पूरी निष्ठा रखती हूँ !
आशा
Sikandar_Khan
24-03-2011, 10:56 AM
अनाथ
माँ मैं तेरी बगिया की ,
एक नन्हीं कली ,
क्यूँ स्वीकार नहीं किया तूने ,
कैसे भूल गई मुझे ,
छोड़ गई मझधार में
तू तो लौट गई
अपनी दुनिया में
मुझे झूला घर में छोड़ गई ,
क्या तुझे पता है ,
जब-जब आँख लगी मेरी ,
तेरी सूरत ही याद आई ,
तेरा स्पर्श कभी न भूल पाई ,
बस मेरा इतना ही तो कसूर था ,
तेरी लड़के की आस पूरी न हुई ,
और मैं तेरी गोद में आई ,
तू कितनी पाषाण हृदय हो गई ,
सारी नफरत, सारा गुस्सा ,
मुझ पर ही उतार डाला ,
मुझे रोता छोड़ गई ,
और फिर कभी न लौटी,
अब मैं बड़ी हो गई हूँ ,
अच्छी तरह समझती हूँ
मेरा भविष्य क्या होगा
मुझे कौन अपनाएगा ,
मैं अकेली
इतना बड़ा जहान ,
कब क्या होगा
इस तक का मुझे पता नहीं है ,
फिर भी माँ तेरा धन्यवाद
कि तूने मुझे जन्म दिया ,
मनुष्य जीवन समझने का
एक अवसर तो मुझे दिया !
आशा
Sikandar_Khan
24-03-2011, 11:36 PM
हैरान हूँ
हैरान हूँ
सदियों से
मुठ्ठी में बंद
यादों के स्निग्ध,और
सुन्दर, सुनहरे मोती
अनायास ही अंगार की तरह
दहक कर
मेरी हथेलियों को
जला क्यों रहे हैं !
अंतरतम की
गहराइयों में दबे
मेरे सुषुप्त ज्वालामुखी में
घनीभूत पीड़ा का लावा
सहसा ही व्याकुल होकर
करवटें क्यों
बदलने लगा है !
वर्षों से संचित
आँसुओं की झील
की दीवारें सहसा
कमज़ोर होकर दरक
कैसे गयी हैं कि
ये आँसू प्रबल वेग के साथ
पलकों की राह
बाहर निकलने को
आतुर हो उठे हैं !
मेरे सारे जतन ,
सारे इंतजाम ,
सारी चेष्टाएं
व्यर्थ हुई जाती हैं
और मैं भावनाओं के
इस ज्वार में
उमड़ते घुमड़ते
लावे के साथ
क्षुद्र तिनके की तरह
नितांत असहाय
और एकाकी
बही जा रही हूँ !
क्या पता था
इस ज्वालामुखी को
इतने अंतराल के बाद
इस तरह से
फटना था और
मेरे संयम,
मेरी साधना,
मेरी तपस्या को
यूँ विफल करना था !
साधना वैद
Sikandar_Khan
24-03-2011, 11:53 PM
"स्वरचना "
कविता को नहीं,
स्वयं को रचती हूँ,
एक नए रंग में,
एक नए कोण से,
एक नए भाव में,
और...
इसी कोशिश में,
मन के किसी हिस्से को,
छूकर लौट आती हूँ,
जहाँ से चली थी,
वहीँ पर...
तो कभी ले आती हूँ,
स्मृति को,
एक रचनात्मक रूप देकर,
और बिखेर देती हूँ,
इन कोरे पन्नो पर...
यूँ ही...
एक चक्र सा,
चलता रहता है,
स्वरचना का,
अनवरत, निरंतर,
सोचती हूँ...
कहीं ये रचना,
अधूरी न लगे खुद को,
इसलिए गढती रहती हूँ,
स्वयं को स्वयं के भीतर...
"संध्या शर्मा"
Sikandar_Khan
25-03-2011, 12:07 AM
एक तितली उड़ी
मधु मास में
नीलाम्बर में ,
किसी की तलाश में
था जो सब से प्रिय उसको ,
और बिछड़ गया था
भीड़ भरे संसार में |
वह भटकी जंगल-जंगल
घास के मैदान में
बाग बगीचों में
और न जाने कहाँ-कहाँ |
जब वह नहीं मिल पाया
हुई बहुत उदास
खोजते-खोजते थकने लगी |
तभी संग पवन के
मंद-मंद सुरभि फैली
यही गंघ थी उसकी
जिसे वह खोज रही थी |
खोज हो गई समाप्त
जब मिली उससे वहाँ
सजे सजाए पुष्प गुच्छ में
पास गई गले लगाया
अपना सारा दुःख दर्द सुनाया
तब का जब थी नितांत अकेली
खोज रही थी अपने प्रिय को |
जब दोनों को मिलते देखा
जलन हुई अन्य पुष्पों को
पर एक ने समझाया
जब हैं दोनों ही प्रसन्न
तब जलन हो क्यूँ हम को
आओ ईश्वर से प्रार्थना करें
उन्हें आशीष देने के लिये
जो मिल गए हैं पुनः
इस भीड़ भरे संसार में |
आशा
Sikandar_Khan
26-03-2011, 05:34 PM
यह दिया बुझे नहीं
यह दिया बुझे नहीं
घोर अंधकार हो
चल रही बयार हो
आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।
शक्ति का दिया हुआ
शक्ति को दिया हुआ
भक्ति से दिया हुआ
यह स्वतंत्रता–दिया
रूक रही न नाव हो
जोर का बहाव हो
आज गंग–धार पर यह दिया बुझे नहीं
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।
यह अतीत कल्पना
यह विनीत प्रार्थना
यह पुनीत भावना
यह अनंत साधना
शांति हो, अशांति हो
युद्ध, संधि, क्रांति हो
तीर पर¸ कछार पर¸ यह दिया बुझे नहीं
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है।
तीन–चार फूल है
आस–पास धूल है
बांस है –बबूल है
घास के दुकूल है
वायु भी हिलोर दे
फूंक दे, चकोर दे
कब्र पर मजार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह किसी शहीद का पुण्य–प्राण दान है।
झूम–झूम बदलियाँ
चूम–चूम बिजलियाँ
आंधिया उठा रहीं
हलचलें मचा रहीं
लड़ रहा स्वदेश हो
यातना विशेष हो
क्षुद्र जीत–हार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।
- गोपाल सिंह नेपाली
Sikandar_Khan
27-03-2011, 12:32 PM
आज मैं अपनी डायरी से दो दिनों को मिटाऊंगा
बीता हुआ कल और आने वाला कल...
बीता हुआ कल सीखने के लिए था,
आने वाला कल नतीजा होगा उसका,
जो मैं आज कर सकता हूं...
आज मैं ज़िंदगी का सामना करूंगा,
ये मानकर कि ये दिन फिर कभी,
दोबारा नहीं लौटने वाला...
आज आखिरी मौका है,
मैं शिद्दत के साथ जी लूं,
कोई नहीं मुझे आश्वस्त कर सकता कि,
मैं कल का सूरज देखूंगा या नहीं...
आज मैं इतनी हिम्मत दिखाऊंगा,
किसी मौके को हाथ से जाने नहीं दूंगा,
एक ही विकल्प है मेरे पास,
सिर्फ और सिर्फ कामयाबी...
आज मैं निवेश करूंगा,
अपने सबसे मूल्यवान संसाधन,
यानि अपने वक्त का,
सबसे श्रेष्ठ काम में,
यानि अपनी ज़िंदगी में...
आज मैं अपने हर मिनट को,
इस तरह बिताऊंगा,
कि मेरी ज़िंदगी का आज,
सबसे अलग और खास दिन बन जाए...
आज मेरे रास्ते में जो बाधा आएगी,
उससे पार पाऊंगा,
इस विश्वास के साथ कि,
जीत मेरी ही होगी...
आज मैं निराशा छोड़ कर उठूंगा,
दुनिया को जीतूंगा मुस्कान के साथ,
अपनी सारी सकारात्मक ऊर्जा के साथ,
बस इसी उम्मीद से कि,
सब कुछ अच्छा होगा...
आज मैं हर सादे काम को भी
खास अंदाज़ से ख़ास बनाऊंगा
आज मैं ज़मीन पर ही रखूंगा,
अपने कदमों को,
हक़ीक़त समझते हुए...
और सितारे टकटकी लगाकर देखेंगे,
मेरा भविष्य किस तरह गढ़ा जाता है...
Sikandar_Khan
27-03-2011, 02:37 PM
तुम और मैं
तुम तुंग - हिमालय - श्रृंग
और मैं चंचल-गति सुर-सरिता।
तुम विमल हृदय उच्छवास
और मैं कांत-कामिनी-कविता।
तुम प्रेम और मैं शान्ति,
तुम सुरा - पान - घन अन्धकार,
मैं हूँ मतवाली भ्रान्ति।
तुम दिनकर के खर किरण-जाल,
मैं सरसिज की मुस्कान,
तुम वर्षों के बीते वियोग,
मैं हूँ पिछली पहचान।
तुम योग और मैं सिद्धि,
तुम हो रागानुग के निश्छल तप,
मैं शुचिता सरल समृद्धि।
तुम मृदु मानस के भाव
और मैं मनोरंजिनी भाषा,
तुम नन्दन - वन - घन विटप
और मैं सुख -शीतल-तल शाखा।
तुम प्राण और मैं काया,
तुम शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म
मैं मनोमोहिनी माया।
तुम प्रेममयी के कण्ठहार,
मैं वेणी काल-नागिनी,
तुम कर-पल्लव-झंकृत सितार,
मैं व्याकुल विरह - रागिनी।
तुम पथ हो, मैं हूँ रेणु,
तुम हो राधा के मनमोहन,
मैं उन अधरों की वेणु।
तुम पथिक दूर के श्रान्त
और मैं बाट - जोहती आशा,
तुम भवसागर दुस्तर
पार जाने की मैं अभिलाषा।
तुम नभ हो, मैं नीलिमा,
तुम शरत - काल के बाल-इन्दु
मैं हूँ निशीथ - मधुरिमा।
तुम गन्ध-कुसुम-कोमल पराग,
मैं मृदुगति मलय-समीर,
तुम स्वेच्छाचारी मुक्त पुरुष,
मैं प्रकृति, प्रेम - जंजीर।
तुम शिव हो, मैं हूँ शक्ति,
तुम रघुकुल - गौरव रामचन्द्र,
मैं सीता अचला भक्ति।
तुम आशा के मधुमास,
और मैं पिक-कल-कूजन तान,
तुम मदन - पंच - शर - हस्त
और मैं हूँ मुग्धा अनजान !
तुम अम्बर, मैं दिग्वसना,
तुम चित्रकार, घन-पटल-श्याम,
मैं तड़ित् तूलिका रचना।
तुम रण-ताण्डव-उन्माद नृत्य
मैं मुखर मधुर नूपुर-ध्वनि,
तुम नाद - वेद ओंकार - सार,
मैं कवि - श्रृंगार शिरोमणि।
तुम यश हो, मैं हूँ प्राप्ति,
तुम कुन्द - इन्दु - अरविन्द-शुभ्र
तो मैं हूँ निर्मल व्याप्ति।
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
Sikandar_Khan
27-03-2011, 05:34 PM
दीन
सह जाते हो
उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न,
हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न,
अन्तिम आशा के कानों में
स्पन्दित हम - सबके प्राणों में
अपने उर की तप्त व्यथाएँ,
क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँ
कह जाते हो
और जगत की ओर ताककर
दुःख हृदय का क्षोभ त्यागकर,
सह जाते हो।
कह जातेहो-
"यहाँकभी मत आना,
उत्पीड़न का राज्य दुःख ही दुःख
यहाँ है सदा उठाना,
क्रूर यहाँ पर कहलाता है शूर,
और हृदय का शूर सदा ही दुर्बल क्रूर;
स्वार्थ सदा ही रहता परार्थ से दूर,
यहाँ परार्थ वही, जो रहे
स्वार्थ से हो भरपूर,
जगतकी निद्रा, है जागरण,
और जागरण जगत का - इस संसृति का
अन्त - विराम - मरण
अविराम घात - आघात
आह ! उत्पात!
यही जग - जीवन के दिन-रात।
यही मेरा, इनका, उनका, सबका स्पन्दन,
हास्य से मिला हुआ क्रन्दन।
यही मेरा, इनका, उनका, सबका जीवन,
दिवस का किरणोज्ज्वल उत्थान,
रात्रि की सुप्ति, पतन;
दिवस की कर्म - कुटिल तम - भ्रान्ति
रात्रि का मोह, स्वप्न भी भ्रान्ति,
सदा अशान्ति!
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
Sikandar_Khan
27-03-2011, 06:00 PM
अंतिम बूँद
अंतिम बूँद बची मधु को अब जर्जर प्यासे घट जीवन में।
मधु की लाली से रहता था जहाँविहँसता सदा सबेरा,
मरघट है वह मदिरालय अब घिरा मौत का सघन अंधेरा,
दूर गए वे पीने वाले जो मिट्टी के जड़ प्याले में-
डुबो दिया करते थे हँसकर भाव हृदय का 'मेरा-तेरा',
रूठा वह साकी भी जिसने लहराया मधु-सिन्धु नयन में।
अंतिम बूँद बची मधु को अब जर्जर प्यासे घट जीवन में।।
अब न गूंजती है कानों में पायल की मादक ध्वनि छम छम,
अब न चला करता है सम्मुख जन्म-मरण सा प्यालों का क्रम,
अब न ढुलकती है अधरों से अधरों पर मदिरा की धारा,
जिसकी गति में बह जाता था, भूत भविष्यत का सब भय, भ्रम,
टूटे वे भुजबंधन भी अब मुक्ति स्वयं बंधती थी जिन में।
जीवन की अंतिम आशा सी एक बूँद जो बाकी केवल,
संभव है वह भी न रहे जब ढुलके घट में काल-हलाहल,
यह भी संभव है कि यही मदिरा की अंतिम बूँद सुनहली-
ज्वाला बन कर खाक बना दे जीवन के विष की कटु हलचल,
क्योंकि आखिरी बूँद छिपाकर अंगारे रखती दामन में
अंतिम बूँद बची मधु की अब जर्जर प्यासे घट जीवन में।
जब तक बाकी एक बूँद है तब तक घट में भी मादकता,
मधु से धुलकर ही तो निखरा करती प्याले की सुन्दरता,
जब तक जीवित आस एक भी तभी तलक साँसों में भी गति,
आकर्षण से हीन कभी क्या जी पाई जग में मानवता?
नींद खुला करती जीवन की आकर्षण की छाँह शरण में।
अंतिम बूँद बची मधु की अब जर्जर प्यासे घट जीवन में।।
आज हृदय में जाग उठी है वह व्याकुल तृष्णा यौवन की,
इच्छा होती है पी डालूं बूँद आखिरी भी जीवन की,
अधरों तक ले जाकर प्याला किन्तु सोच यह रुक जाता हूँ,
इसके बाद चलेगी कैसे गति प्राणों के श्वास-पवन को,
और कौन होगा साथी जो बहलाए मन दिन दुर्दिन में।
अंतिम बूँद बची मधु की अब जर्जर प्यासे घट जीवन में॥
मानव! यह वह बूँद कि जिस पर जीवन का सर्वस्व निछावर,
इसकी मादकता के सम्मुख लज्जित मुग्धा का मधु-केशर,
यह वह सुख की साँस आखिरी जिसके सम्मुख हेय अमरता-
यह वह जीवन ज्योति-किरण जो चीर दिया करती तम का घर,
अस्तु इसे पी जा मुस्कुराकर मुस्काए चिर तृषा मरण में।
अंतिम बूँद बची मधु की अब जर्जर प्यासे घट जीवन में॥
किन्तु जरा रुक ऐसे ही यह बूँद मधुरतम मत पी जाना;
इसमें वह मादकता है जो पीकर जगबनता दीवाना,
इससे इसमें वह जीवन विष की एक बूँद तू और मिला ले,
सीख सके जिससे हँस हँसकर मधु के संग विष भी अपनाना,
मधु विष दोनों ही झरते हैं जीवन के विस्तृत आँगन में।
अंतिम बूँद बची मधु की अब जर्जर प्यासे घट जीवन में॥
गोपालदास "नीरज"
Sikandar_Khan
27-03-2011, 06:05 PM
अंदर का आदमी
अंदर का आदमी
पहली बार
अंदर का आदमी
दिखाई दे रहा था,
एकदम उसके बाहर
साफ-साफ
उजला और चमकदार
उसकी व्यस्त चर्या में
शौच, स्नान, नाश्ता-भोजन की
कोई ख़ास अहमियत नहीं थी,
वह थोड़ी-सी ऊर्जा इकट्ठी कर
रोज़ काम पर निकल जाता था--
अंदर के आदमी को
बाहर के मज़बूत आदमी से
जकड़े हुए
वह अंदर के आदमी से
बदशक्ल था
और ठण्ड में
अपनी दादी की कथरी ओढ़े हुए था
अंदर का आदमी
बेहद दुबला-पतला था,
वह तमीज़दार था
उसके बालों पर
कंघी हुई थी
कपड़े पुराने थे
पर, धुलाए-इस्तरी कराए हुए थे
वह गंभीर था,
बाहर के आदमी की तरह
मुंह चियारे हुए
अपनी बदनसीबी
बयां नहीं कर रहा था
मैंने पहली बार
अंदर के आदमी को
बाहर के आदमी के बाहर
क़दम-दर-क़दम
चलते हुए देख रहा था
अंदर के आदमी की पीठ पर
एक भारी-भरकम गठरी थी
गठरी में आसमान था--
सपनों का
जो रहा होगा कभी
टूटा-फूटा,
आज वह बुरादा होकर
कूड़े में तब्दील हो गया था,
उसके सपनों के कूड़े से
सडांध आ रही थी
पर, मोह उसे छोड़ नहीं रहा था
सपनों के बुरादे में क्या था--
एक गाँव था
गाँव में एक नन्हा-सा मटियाला घर
घर के बाहर एक गाय
और हू-ब-हू
अंदर के बूढ़े आदमी की शक्ल का
एक जवान ग्वाला
जो उसे दूह रहा था,
उसके बच्चे
वहां खड़े-खड़े
गिलास-भर दूध की बाट जोह रहे थे
वे दूध पी-पी, पल-बढ़ रहे थे
और ग्वाला बूढा हो रहा था
मैंने पहली बार देखा कि
अंदर का आदमी
इतना दस्तावेजी था!
उसके हर हिज्जे पर
कुछ लिखा हुआ था--
हथेलियों पर
मेहनत की इबारत लिखी हुई थी
बेटों के पालन-पोषण
बेटियों का ब्याह
और पत्नी की अंत्येष्टि के लिए
महाजन का उधार लिखा हुआ था
मेरी आँखें उसका अंतरंग देख रही थी,
पहली बार मैंने
अंदर के आदमी को
पारदर्शी होते देखा था,
पेट में पचती हुई बासी रोटियां थीं
रोटियों पर वह था
रिक्शा चलाकर
मोहल्ले के बच्चों को
स्कूल पहुंचाते हुए,
पहली बार मैंने देखा कि
एक मेहनतकश के पेट में
शराब, सिगरेट और बीड़ी
नदारद थीं
उसके दिमाग में
योजनाओं और विचारों का
बवंडर चल रहा था,
घरेलू खर्चों के फटे नुस्खे
उड़ रहे थे
जिन्हें वह जोड़-जोड़
सामानों के नाम पढ़ रहा था
और जीवनोपयोगी चीजों को
रेखांकित कर रहा था
मैंने उसके पारदर्शी जिस्म में
बाजार देखा
जहां वह बनियों के आगे
हाथ जोड़े
आटा, दाल, चावल
हल्दी-नमक और तेल-मसाला
उधार माँग रहा था
पहली बार
और सिर्फ पहली बार
मैंने देखा कि
अंदर का आदमी
किस कदर बाहर आने
और बाहर के आदमी के
हाथ में हाथ डालकर
चलने के लिए
जूझ रहा था
मैं उस अंदर के आदमी से
मिलना चाहता हूँ
और कहना चाहता हूँ
कि अगर वह
उस आदमी से ऊब गया है तो
मेरे साथ चले,
मैं कभी उसे
अपने भीतर जाने के लिए
ज़द्दोज़हद नहीं करूंगा.
मनोज श्रीवास्तव
Sikandar_Khan
27-03-2011, 06:17 PM
अंतिम प्रणाम लो हे अनंत पथ के यात्री!
हम चरणों पर शब्दों की भेंट चढ़ाते हैं
आती है ज्यों ही याद तुम्हारी निर्मल छवि
अक्षर-अक्षर बनकर गुलाब खिल जाते हैं
हे चिर-अजातरिपु! सेवालीन कर्मयोगी!
सबको प्रिय, सबके लिए सदैव शुभाकांक्षी
चन्दन की कलम शहद में डुबो-डुबोकर भी
हम नाम तुम्हारा लिखने में सकुचाते हैं
Sikandar_Khan
27-03-2011, 06:26 PM
अंधड़ था, अंधा नहीं, उसे था दीख रहा,
वह तोड़-फोड़ मनमाना हँस-हँस सीख रहा,
पीपल की डाल हिली, फटी, चिंघाड़ उठी,
आँधी के स्वर में वह अपना मुँह फाड़ उठी।
उड़ गये परिन्दे कहीं,
साँप कोटर तज भागा,
लो, दलक उठा संसार,
नाश का दानव जागा।
कोयल बोल रही भय से जल्दी-जल्दी,
पत्तों की खड़-खड़ से शान्ति वनों से चल दी,
युगों युगों बूढ़े, इस अन्धड़ में देखो तो,
कितनी दौड, लगन कितनी, कितना साहस है,
इसे रोक ले, कहो कि किस साहस का वश है?
तिसपर भी मानव जीवित है,
हँसता है मनचाहा,
भाषा ने धिक्कारा हो,
पर गति ने उसे सराहा!
बन्दर-सा करने में रत है, वह लो हाई जम्प!
यह निर्माता हँसा और वह निकल गया भूकम्प।
माखनलाल चतुर्वेदी
Sikandar_Khan
27-03-2011, 06:33 PM