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View Full Version : !! कुछ मशहूर गजलें !!


Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:19 PM
किसी मुज्जमे की सीढियों पे एक बुज़ुर्ग को तन्हा बैठे देखा (मुज्जमे- शोपिंग काम्प्लेक्स)खामोश लब थरथाराते हाथ माथे से पसीना टपकते देखा

सोच रहे होगे कैसे गुज़रे सरे आज़-इखलास ज़िन्दगी के (आज़-desire )
हर भूली बिसरी याद को उस एक बसर मे स्मिटते देखा

बचपना फिर जवानी फिर बुढ़ापा कोह्नाह-मशक हालत ( कोह्नाह-मशक-- experienced )हर असबाब को एक गहरी साँस मे टटुलते देखा

एक अबरो एक हया एक अदगी एक दुआ
बे परवाह गुज़रते नोजवानो से अपनी सादगी छुपाते देखा

सोचा जाके पूछों की क्योँ बैठे है यूँ तन्हा एकेले
पर हर रहगुज़र के बरीके से नाश-ओ-नसीर समझते देखा

क्या अच्छा किया क्या बुरा किया कोन से रिश्ते निभाए पूरे
हर एक अधूरे पूरे फ़र्ज़ इम्तिहान उम्मीद का इसबात जुटाते देखा (इसबात-proof )

कभी लगा आसूदाह सा कभी लगा आशुफ्तः सा (आसूदाह-satisfied आशुफ्तः-confused)
मुब्तादा इबारत के इबर्के-उबाल को बेकाम-ओ-कास्ते देखा (मुब्तादा--principle, इबारत-[experience,इबर्के- perception बेकाम-ओ-कास्ते--expresing)

किसी मुज्जमे की सीढियों पे एक बुज़ुर्ग को तन्हा बैठे देखा


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Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:21 PM
गुज़र रहा है वक़्त गुज़र रही है ज़िन्दगी
क्यूँ न इन राहों पर एक असर छोड़ चले

पिघल रहे है लम्हात बदल रहे है हालत
क्यूँ न इस ज़माने को बदल दे एक ऐसी खबर छोड़ चले

कोई शक्स कंही रुका सा कोई शक्स कंही थमा सा
क्यूँ न एन बेजान बुतों में एक पैकर छोड़ चले

हर तरफ अँधेरा , ख़ामोशी , तन्हाई , बेरुखी , रुसवाई
क्यूँ न नूरे मुजस्सिम का एक सितायिश्गर छोड़ चले

इन बेईज्ज़त बे परवाह ताजरी-तोश ज़माने में
क्यूँ न कह दे रेत से ये अन्ल्बहर छोड़ चले

हर तरफ धोखा, झूट, फरेब, नाइंसाफी , बेमानी
क्यूँ न बुझती अतिशे-सचाई पर एक शरर छोड़ चले

कैसे लाये वोह अबरू हया दिलके-हर दोशे में
क्यूँ न हर किसी की मोजे शरोदगी पर एक नज़र छोड़ चले

मची है नोच खसोट एक होड़ हर तरफ पाने की
क्यूँ न पाकर अपनी मंजिल को यह लम्बा सफ़र छोड़ चले

करके अपने ख्वाबों को पूरा
क्यूँ न अपनी ताबीर को मु'यासर' छोड़ चले

क्यूँ न इन राहों पर एक असर छोड़ चले

Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:23 PM
कभी कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती हे
चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती है
आसूं तो बहते नहीं आँखों से मगर रूह अन्दर ही रोती जाती है
हर पल कुछ कर दिखने की चाह सताती है
सख्त हालातों की हवाँ ताब-औ-तन्वा हिला जाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
रहती है दवाम जिबस उस मंजिल को पाने मे
फिर भी 'यासिर' की तरह एक बाज़ी हार जाती है
रह जाती है एक जुस्तुजू सी और एक नया इम्तेहान दे जाती है
जुड़ जाती है सारी कामयाबियां एक ऐसी नाकामयाबी पाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
होता नहीं जिस पर यकीं किसीको एक ऐसा मुज़मर खोल जाती है
फिर भी ह़र बात के नाश-औ-नुमा को नहीं जान पाती है
मुश्किल हो जाता है फैसला करना एक ऐसा असबाब बनाती है
नहीं पा सकते है साहिल एक ऐसे मझधार मे फस जाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
कोई रास्ता नज़र नहीं आता ह़र मंजिल सियाह हो जाती है
ह़र तालाब-झील मिराज हो जाते है और ज़िंदगी प्यासी रह जाती है
ह़र चोखट पर शोर तो होता है मगर ज़िन्दगी खामोश रह जाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
मुन्तज़िर सी एक कशमोकश रहती है हर तस्वीर एक धुंदली परछाई बन जाती है
होसला तो देते है सब मगर ज़िन्दगी मायूस रह जाती है
हर मुमकिन कोशिश करती है अफ्ज़लिना बन्ने के लिए मगर ज़िन्दगी बेबस रह जाती है


कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
धड़कने रुक जाती है साँस रुक जाती है मगर एक सुनी सी रात कटती नहीं
मज्लिसो मे नाम तो होता है बहुत मगर ज़िन्दगी 'यासिर' की तरह तनहा रह जाती है
बेबस लाचार सी लगने लगती है, ज़िन्दगी हार के कंही रुक जाती है
फिर उट्ठ के चलने की कोशिश तो करती है मगर कुछ सोच के थम जाती है
एक नए खुबसूरत लम्हे के इंतज़ार मे पूरी ज़िन्दगी गुज़र जाती है
कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है

Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:28 PM
गधे ज़ाफ़रान में कूद रहे है

चारगाह में घोडों के लिये घास नहीं,
लेकिन गधे ज़ाफ़रान में कूद रहे है
कैसे कैसे दोस्त हैं कैसे कैसे धोखे
चबा रहे हैं अंगूर बता अमरूद रहे हैं

ना जाने खो गया है किस अज़ब अन्धेरे में
आंख बन्द करके तलाश अपना वज़ूद रहे हैं

उधार लिये थे चंद लम्हे पिछ्ले जनम में
अभी तक चुका उनका सूद रहे हैं

मकान बेच कर खरीदी थी तोप कोमल ने
ज़मीन बेच के खरीद उसका बारूद रहे हैं

Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:29 PM
हर पूरी होती ख्वाहिश के हाशिये बदलते रहते है ताजरी-तोश ज़िन्दगी के मायने बदलते रहते है
जो रहते है सादगी से उनके लब्ज़ों से आतिशे-ताब भी पिघलते रहते है
कुछ कर गुज़रते है वोह शक्स जो गिर के सही वक़्त पर सम्भलते रहते है
गड़ा के ज़मीन पे पाऊँ फलक पे चलने वाले बड़े बड़ो का गुरुर कुचलते रहते है
सब्र की चख-दमानी को फैय्लाये कितना यंहा हर क्वाहिश पर दिल मचलते रहते है
ताकता रहता हूँ क्यूँ इन खुले रास्तों को तंग गलियों से भी रहनुमा निकलते रहते है
नहीं रही राजा तेरी अदाए-ज़ात से हमरे दिल तो इस टूटी फूटी शयरी से ही बहलते रहते है
थोड़ी सियासी पहुच तो हो ऐ 'यासिर' यंहा तो कत्ले-आम के बाद फंसी के फैसले टलते रहते है
हर पूरी होती ख्वाहिश के हाशिये बदलते रहते है ताजरी-तोश ज़िन्दगी के मायने बदलते रहते है

Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:34 PM
हर बयानी खलिशे-खार की तरह बयां होती
खल्वत मे सफे-मिज़गा के मोअजे -शरोदगी है खोलती

हनोज़ न मिल सका जवाब उन आँखों को
मेरी रुकाशी मे न जाने कैसे -कैसे मुज़मर के साथ है डोलती

मुश्ताक है सारी बातों को जानने के लिए
हर नाश-औ-नुमा बात के शर-हे को जिबस हे तोलती

महवे रहती हे दवाम मोअजे-ज़ार की कुल्फत मे
ऐ-'यासिर' खामोश होकर भी ये तेरी ऑंखें हे बोलती



इसमे कुछ फारसी शब्द भी हैं जिनको मै लिख देता हूँ

खार -- कांटे
खल्वत-- तन्हाई
मिज़गा -- जूनून
शर-हे -- मतलब
जिबस -- बहुत ज्यादा
दवाम -- लीन

Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:36 PM
कैलैंडर की तरह मह्बूब बदलते क्युं हैं
झूठे वादों से ये दिल बहलते क्युं हैं ?

अपनी मरज़ी से हार जाते हैं जुए में सल्तनत,
फ़िर दुर्योध्नो के आगे हाथ मलते क्युं हैं ?

औरों के तोड डालते हैं अरमान भरे दिल,
तो फ़िर खुद के अरमान मचलते क्युं हैं ?

दम भरते हैं हवाओं का रुख मोड देने का ,
फ़क़्त पत्तों के लरज़ने से ही दहलते क्युं हैं ?

खोल लेते हैं बटन कुर्ते के, फ़िर पूछ्ते हैं,
न जाने आस्तीनों मे सांप पलते क्युं हैं ?

नन्हा था इस लिए मां से ही पूछा ,
अम्मा ! ये सूरज शाम को ढलते क्युं हैं ?

वो कहते हैं नाखूनो ने ज़खम "दीया",
नाखूनों से ही ज़खम सहलते क्युं हैं ?

Sikandar_Khan
09-12-2010, 05:40 PM
कभी कभी आईना भी झूठ कहता है
अकल से शक्ल जब मुकाबिल हो
पलडा अकल का ही भारी रहता है

अपनी खूबसूरती पे ना इतरा मेरे मह्बूब
कभी कभी आईना भी झूठ कहता है

जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है
मुर्दा है जो खामोश हो के जुल्म सहता है

काट देता है टुकडों मे संग-ए-मर्मर को
पानी भी जब रफ़्तार से बहता है.

ईशक़ में चोट खा के दीवाने हो जाते हैं जो
नशा उनपे ता उमर मोहब्बत का तारी रहता है

अकल से शक्ल जब मुकाबिल हो
पलडा अकल का ही भारी रहता है

Sikandar_Khan
09-12-2010, 06:17 PM
सुनाते क्या हो वक़्त बदलने वाला है
देखते आये हैं सूरज निकलने वाला है ...

जो नहीं है अपना उस पर ध्यान क्यों है
जो है पास में वो कब तक रहने वाला है ...

बाज़ार में शौहरत का खिलौना लेकर घूमने वाले
यह नहीं जानते कब वह टूटके बिखरने वाला है ...

शहर के घरों की दीवारें बाहर से अच्छी लगती है
इसमे रहने वाले जानते है कांच बिखरने वाला है ...

मैनेँ बदलते दौर में यह रंग भी देखा है
मुसीबत में हर ख़ास रिश्ता चाल बदलने वाला है ...

bijipande
10-12-2010, 11:16 AM
सिकंदर भाई आप शायर भी हो पता ना था

Sikandar_Khan
10-12-2010, 08:15 PM
चला इक दिन जो घर से पान खा कर
तो थूका रेल की खिड़की से आकर

मगर जोशे हवा से चाँद छींटे
परे रुखसार पे इक नाजनीन के

रुखसार ..... गाल
हुई आपे से वो फ़ौरन ही बाहर
लगी कहने अबे ओ खुश्क बन्दर

ज़बान को रख तू मुंह के दाएरे में
हमेशा ही रहे गा फायदे में

बहाने पान के मत छेड़ ऐसे
यही अच्छा है मुझ से दूर रह ले

तेरी सूरत तो है शोराफा के जैसी
तबियत है मगर मक्कार वहशी

shorafaa .... shareefon ,,,,, wahshi ... darindah


कहा मैं ने कहानी कुछ भी बुन लें
मगर मोहतरमा मेरी बात सुन लें

खुदा के वास्ते कुछ खोफ खाएं
ज़रा सी बात इतनी न बढ़ाएं

नहीं अच्छा है इतना पछताना
मुझे बस एक मौका देदो जाना

ज़बान को अपनी खुद से काट लूँ गा
जहां थूका है उस को चाट लूंगा

Kumar Anil
11-12-2010, 05:09 PM
किसी मुज्जमे की सीढियों पे एक बुज़ुर्ग को तन्हा बैठे देखा (मुज्जमे- शोपिंग काम्प्लेक्स)खामोश लब थरथाराते हाथ माथे से पसीना टपकते देखा

सोच रहे होगे कैसे गुज़रे सरे आज़-इखलास ज़िन्दगी के (आज़-desire )
हर भूली बिसरी याद को उस एक बसर मे स्मिटते देखा

बचपना फिर जवानी फिर बुढ़ापा कोह्नाह-मशक हालत ( कोह्नाह-मशक-- experienced )हर असबाब को एक गहरी साँस मे टटुलते देखा

एक अबरो एक हया एक अदगी एक दुआ
बे परवाह गुज़रते नोजवानो से अपनी सादगी छुपाते देखा

सोचा जाके पूछों की क्योँ बैठे है यूँ तन्हा एकेले
पर हर रहगुज़र के बरीके से नाश-ओ-नसीर समझते देखा

क्या अच्छा किया क्या बुरा किया कोन से रिश्ते निभाए पूरे
हर एक अधूरे पूरे फ़र्ज़ इम्तिहान उम्मीद का इसबात जुटाते देखा (इसबात-proof )

कभी लगा आसूदाह सा कभी लगा आशुफ्तः सा (आसूदाह-satisfied आशुफ्तः-confused)
मुब्तादा इबारत के इबर्के-उबाल को बेकाम-ओ-कास्ते देखा (मुब्तादा--principle, इबारत-experience,इबर्के- perception बेकाम-ओ-कास्ते--expresing)

किसी मुज्जमे की सीढियों पे एक बुज़ुर्ग को तन्हा बैठे देखा


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सुभानअल्लाह ! जिँदगी के नफे - नुकसान का वास्तविक चिंतन मुज्जमेँ की सीढ़ियोँ से भला और कहाँ बेहतर हो सकता है । जिँदगी कभी आसूदाह सी कभी आशुफ्तः सी ही तो है तभी तो हमेँ मुकम्मल जहाँ नहीँ मिलता ।

Video Master
13-12-2010, 12:11 AM
इश्क के गुलशन को गुल गुज़ार न कर!
ऐ नादान इंसान कभी किसी से प्यार न कर!
बहुत धोखा देते हैं मोहब्बत में हुस्न वाले,
इन हसीनो पर भूल कर भी ऐतबार न कर!

दिल से आपका ख्याल जाता नहीं!
आपके सिवा कोई और याद आता नहीं!
हसरत है रोज़ आपको देखूं,
वरना आप बिन जिंदा रह पाता नहीं!

वे चले तो उन्हें घुमाने चल दिए!
उनसे मिलने-जुलने के बहाने चल दिए!
चाँद तारों ने छेड़ा तन्हाई में ऐसी राग,
वे रूठे नहीं की उन्हें मानाने चल दिए!

वो मिलते हैं पर दिल से नहीं!
वो बात करते हैं पर मन से नहीं!
कौन कहता है वो प्यार नहीं करते,
वो प्यार तो करते हैं पर हमसे नहीं!

नाबिक निराश हो तो साहिल ज़रूरी है!
ज़न्नत की तलाश में हो तो इशारा ज़रूरी है!
मरने को तो कोई कहीं मर सकता है,
लेकिन ज़ीने के लिए सहारा ज़रूरी है!

Video Master
13-12-2010, 12:15 AM
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की जगह रखना!


जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तनहाइयाँ बचा रखना!


मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए
अपने दिल में कहीं खुदा रखना!


मिलना-जुलना जहाँ जरुरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना!


उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस पता रखना!

Video Master
13-12-2010, 12:21 AM
एक लफ्जे-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है!
सिमटे तो दिले-आशिक, फैले तो ज़माना है!

हम इश्क के मारों का इतना ही फ़साना है!
रोने को नहीं कोई हंसने को ज़माना है!

वो और वफ़ा-दुश्मन, मानेंगे न माना है!
सब दिल की शरारत है, आँखों का बहाना है!

क्या हुस्न ने समझा है, क्या इश्क ने जाना है!
हम ख़ाक-नशीनो की ठोकर में ज़माना है!

ऐ इश्के-जुनूं-पेशा! हाँ इश्के-जुनूं पेशा,
आज एक सितमगर को हंस-हंस के रुलाना है!

ये इश्क नहीं आशां,बस इतना समझ लीजे
एक आग का दरिया है, और डूब के जाना है!

आंसूं तो बहुत से हैं आँखों में 'जिगर' लेकिन
बिंध जाए सो मोती है, रह जाए सो दाना है!

Sikandar_Khan
13-12-2010, 07:51 PM
किस तरफ का रास्ता लूंगा मैं
रुका नहीं तो मंजिल पा लूंगा मैं ...

तजुर्बे की हरारत को नहीं समझा तो
कहीं बे -वज़ह ज़मीर जला लूंगा मैं ...

कभी खींच कर लकीर काग़ज़ पर
बिना रक़म का मकान बना लूंगा मैं ...

कितने मासूम होते है मौसम के फूल
गर छू लिया तोह मुस्कुरा लूंगा मैं ...

अगर वहशत की आंधी और चली
देखना नफ़रत का पत्थर उठा लूंगा मैं ...

Sikandar_Khan
13-12-2010, 08:21 PM
अपने हाथों की लकीरों में बसाले मुझको
मैं हूं तेरा नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी
ये तेरी सदादिली मार न डाले मुझको

मैं समंदर भी हूं मोती भी हूं गोतज़ान भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुलाले मुझको

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गवां ले मुझको

कल की बात और है मैं अब सा रहूं या न रहूं
जितना जी चाहे तेरा आज सताले मुझको

Sikandar_Khan
13-12-2010, 08:22 PM
ख़ुद को मैं बांट न डालूं कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

मैं जो कांटा हूं तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूं अगर फूल तो जूड़े में सजाले मुझको

मैं खुले दर के किसी घर का हूं सामां प्यार
तू दबे पांव कभी आके चुराले मुझको

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम
तू कभी याद तो कर भूलाने वालो मुझको

बादा फिर बादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको

Hamsafar+
13-12-2010, 08:26 PM
सिकंदर भाई बहुत ही सुन्दर गजलों का संग्रह !!

Kumar Anil
13-12-2010, 09:51 PM
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की जगह रखना!


जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तनहाइयाँ बचा रखना!


मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए
अपने दिल में कहीं खुदा रखना!


मिलना-जुलना जहाँ जरुरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना!


उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस पता रखना!



सुंदर , अति सुंदर ! दिल को छूने वाली रचना को हमारे लिए प्रस्तुत करने पर निःसन्देह बधाई के पात्र हैँ ।

Sikandar_Khan
22-01-2011, 07:12 PM
गुज़र रहा है वक़्त गुज़र रही है ज़िन्दगी
क्यूँ न इन राहों पर एक असर छोड़ चले

पिघल रहे है लम्हात बदल रहे है हालत
क्यूँ न इस ज़माने को बदल दे एक ऐसी खबर छोड़ चले

कोई शक्स कंही रुका सा कोई शक्स कंही थमा सा
क्यूँ न एन बेजान बुतों में एक पैकर छोड़ चले

हर तरफ अँधेरा , ख़ामोशी , तन्हाई , बेरुखी , रुसवाई
क्यूँ न नूरे मुजस्सिम का एक सितायिश्गर छोड़ चले

इन बेईज्ज़त बे परवाह ताजरी-तोश ज़माने में
क्यूँ न कह दे रेत से ये अन्ल्बहर छोड़ चले

हर तरफ धोखा, झूट, फरेब, नाइंसाफी , बेमानी
क्यूँ न बुझती अतिशे-सचाई पर एक शरर छोड़ चले

कैसे लाये वोह अबरू हया दिलके-हर दोशे में
क्यूँ न हर किसी की मोजे शरोदगी पर एक नज़र छोड़ चले

मची है नोच खसोट एक होड़ हर तरफ पाने की
क्यूँ न पाकर अपनी मंजिल को यह लम्बा सफ़र छोड़ चले

करके अपने ख्वाबों को पूरा
क्यूँ न अपनी ताबीर को मु'यासर' छोड़ चले

क्यूँ न इन राहों पर एक असर छोड़ चले

Sikandar_Khan
22-01-2011, 07:14 PM
हर पूरी होती ख्वाहिश के हाशिये बदलते रहते है ताजरी-तोश ज़िन्दगी के मायने बदलते रहते है
जो रहते है सादगी से उनके लब्ज़ों से आतिशे-ताब भी पिघलते रहते है
कुछ कर गुज़रते है वोह शक्स जो गिर के सही वक़्त पर सम्भलते रहते है
गड़ा के ज़मीन पे पाऊँ फलक पे चलने वाले बड़े बड़ो का गुरुर कुचलते रहते है
सब्र की चख-दमानी को फैय्लाये कितना यंहा हर क्वाहिश पर दिल मचलते रहते है
ताकता रहता हूँ क्यूँ इन खुले रास्तों को तंग गलियों से भी रहनुमा निकलते रहते है
नहीं रही राजा तेरी अदाए-ज़ात से हमरे दिल तो इस टूटी फूटी शयरी से ही बहलते रहते है
थोड़ी सियासी पहुच तो हो ऐ 'यासिर' यंहा तो कत्ले-आम के बाद फंसी के फैसले टलते रहते है
हर पूरी होती ख्वाहिश के हाशिये बदलते रहते है ताजरी-तोश ज़िन्दगी के मायने बदलते रहते है

Sikandar_Khan
22-01-2011, 07:30 PM
कभी कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती हे
चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती है
आसूं तो बहते नहीं आँखों से मगर रूह अन्दर ही रोती जाती है
हर पल कुछ कर दिखने की चाह सताती है
सख्त हालातों की हवाँ ताब-औ-तन्वा हिला जाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
रहती है दवाम जिबस उस मंजिल को पाने मे
फिर भी यासिर की तरह एक बाज़ी हार जाती है
रह जाती है एक जुस्तुजू सी और एक नया इम्तेहान दे जाती है
जुड़ जाती है सारी कामयाबियां एक ऐसी नाकामयाबी पाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
होता नहीं जिस पर यकीं किसीको एक ऐसा मुज़मर खोल जाती है
फिर भी ह़र बात के नाश-औ-नुमा को नहीं जान पाती है
मुश्किल हो जाता है फैसला करना एक ऐसा असबाब बनाती है
नहीं पा सकते है साहिल एक ऐसे मझधार मे फस जाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
कोई रास्ता नज़र नहीं आता ह़र मंजिल सियाह हो जाती है
ह़र तालाब-झील मिराज हो जाते है और ज़िंदगी प्यासी रह जाती है
ह़र चोखट पर शोर तो होता है मगर ज़िन्दगी खामोश रह जाती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
मुन्तज़िर सी एक कशमोकश रहती है हर तस्वीर एक धुंदली परछाई बन जाती है
होसला तो देते है सब मगर ज़िन्दगी मायूस रह जाती है
हर मुमकिन कोशिश करती है अफ्ज़लिना बन्ने के लिए मगर ज़िन्दगी बेबस रह जाती है


कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है
धड़कने रुक जाती है साँस रुक जाती है मगर एक सुनी सी रात कटती नहीं
मज्लिसो मे नाम तो होता है बहुत मगर ज़िन्दगी यासिर की तरह तनहा रह जाती है
बेबस लाचार सी लगने लगती है, ज़िन्दगी हार के कंही रुक जाती है
फिर उट्ठ के चलने की कोशिश तो करती है मगर कुछ सोच के थम जाती है
एक नए खुबसूरत लम्हे के इंतज़ार मे पूरी ज़िन्दगी गुज़र जाती है
कभी-कभी ये ज़िन्दगी ऐसे हालातों मे फंस जाती है

Sikandar_Khan
01-02-2011, 07:58 PM
मेरी नब्ज़ छू के सुकून दे, वही एक मेरा हबीब है
है उसीके पास मेरी शफ़ा वही बेमिसाल तबीब है


हुआ संगदिल है ये आदमी कि रगों में ख़ून ही जम गया
चला राहे-हक़ पे जो आदमी, तो उसीके सर पे सलीब है


ये समय का दरिया है दोस्तो, नहीं पीछे मुड़के जो देखता
सदा मौज बनके चला करे, यही आदमी का नसीब है


यूँ तो आदमी है दबा हुआ यहाँ एक दूजे के कर्ज़ में
कोई उनसे माँगे भी क्या भला, यहाँ हर कोई ही ग़रीब है


न तमीज़ अच्छे-बुरे की है, न तो फ़र्क ऐबो-हुनर में ही
बड़ी मुश्किलों का है सामना कि ज़माना देवी अजीब है.





देवी नागरानी

Sikandar_Khan
01-02-2011, 08:07 PM
प्यार की उम्र फकत हादसों से गुजरी है।
ओस है, जलते हुए पत्थरों से गुजरी है।।
दिन तो काटे हैं, तुझे भूलने की कोशिश में
शब मगर मेरी, तेरे ही खतों से गुजरी है।।
जिंदगी और खुदा का, हमने ही रक्खा है भरम
बात तो बारहा, वरना हदों से गुजरी है।।
कोई भी ढांक सका न, वफा का नंगा बदन
ये भिखारन तो हजारों घरों से गुजरी है।।
हादसों से जहां लम्हों के, जिस्म छिल जाएं
जिंदगी इतने तंग रास्तों से गुजरी है।।
ये सियासत है, भले घर की बहू-बेटी नहीं
ये तवायफ तो, कई बिस्तरों से गुजरी है।।
जब से सूरज की धूप, दोपहर बनी मुझपे
मेरी परछाई, मुझसे फासलों से गुजरी है

Sikandar_Khan
01-02-2011, 08:16 PM
ख्वाहिशें, टूटे गिलासों सी निशानी हो गई।
जिदंगी जैसे कि, बेवा की जवानी हो गई।।
कुछ नया देता तुझे ए मौत, मैं पर क्या करूं
जिंदगी की शक्ल भी, बरसों पुरानी हो गई।।
मैं अभी कर्ज-ए-खिलौनों से उबर पाया नहीं
लोग कहते हैं, तेरी गुड़िया सयानी हो गई।।
आओ हम मिलकर, इसे खाली करें और फिर भरें
सोच जेहनो में नए मटके का पानी हो गई।।
दुश्मनी हर दिल में जैसे कि किसी बच्चे की जिद
दोस्ती दादा के चश्मे की कमानी हो गई।।
मई के सूरज की तरह, हर रास्तों की फितरतें
मंजिलें बचपन की परियों की कहानी हो गई।।

Sikandar_Khan
01-02-2011, 08:20 PM
उसे इश्क क्या है पता नहीं
कभी शम्अ पर जो जला नहीं.


वो जो हार कर भी है जीतता
उसे कहते हैं वो जुआ नहीं.


है अधूरी-सी मेरी जिंदगी
मेरा कुछ तो पूरा हुआ नहीं.


न बुझा सकेंगी ये आंधियां
ये चराग़े दिल है दिया नहीं.


मेरे हाथ आई बुराइयां
मेरी नेकियों को गिला नहीं.


मै जो अक्स दिल में उतार लूं
मुझे आइना वो मिला नहीं.


जो मिटा दे देवी उदासियां
कभी साज़े-दिल यूं बजा नहीं.

Sikandar_Khan
01-02-2011, 09:00 PM
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।

मुहब्बत में नही है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले ।

ख़ुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा ज़ालिम,
कहीं ऐसा ना हो यां भी वही काफिर सनम निकले ।

क़हाँ मैखाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़,
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले।

मिर्ज़ा गालिब

Sikandar_Khan
06-02-2011, 09:48 AM
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं

तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं

मिर्ज़ा गालिब

Sikandar_Khan
06-02-2011, 09:50 AM
की वफ़ा हम से तो ग़ैर उस को जफ़ा कह्*ते हैं
होती आई है कि अच्*छों को बुरा कह्*ते हैं

आज हम अप्*नी परेशानी-ए ख़ातिर उन से
कह्*ने जाते तो हैं पर देखिये क्*या कह्*ते हैं

अग्*ले वक़्*तों के हैं यह लोग उंहें कुछ न कहो
जो मै-ओ-नग़्*मह को अन्*दोह-रुबा कह्*ते हैं

दिल में आ जाए है होती है जो फ़ुर्*सत ग़श से
और फिर कौन-से नाले को रसा कह्*ते हैं

है परे सर्*हद-ए इद्*राक से अप्*ना मस्*जूद
क़िब्*ले को अह्*ल-ए नज़र क़िब्*लह-नुमा कह्*ते हैं

पा-ए अफ़्*गार पह जब से तुझे रह्*म आया है
ख़ार-ए रह को तिरे हम मिह्*र-गिया कह्*ते हैं

इक शरर दिल में है उस से कोई घब्*राएगा क्*या
आग मत्*लूब है हम को जो हवा कह्*ते हैं

देखिये लाती है उस शोख़ की नख़्*वत क्*या रन्*ग
उस की हर बात पह हम नाम-ए ख़ुदा कह्*ते हैं

वह्*शत-ओ-शेफ़्*तह अब मर्*सियह कह्*वें शायद
मर गया ग़ालिब-ए आशुफ़्*तह-नवा कह्*ते हैं
मिर्ज़ा ग़ालिब

Sikandar_Khan
07-02-2011, 10:18 AM
आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है

देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले
नश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है

गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाये! कि रोने पे इख़्तियार नहीं है

हम से अबस है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुब्बार नहीं है

दिल से उठा लुत्फे-जल्वाहा-ए-म'आनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है

क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे
वाये! अगर अहद उस्तवार नहीं है

तू ने क़सम मैकशी की खाई है "ग़ालिब"
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है

मिर्ज़ा ग़ालिब

Sikandar_Khan
07-02-2011, 09:57 PM
यही तोहफ़ा है यही नज़राना
मैं जो आवारा नज़र लाया हूँ
रंग में तेरे मिलाने के लिये
क़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर लाया हूँ
ऐ गुलाबों के वतन

पहले कब आया हूँ कुछ याद नहीं
लेकिन आया था क़सम खाता हूँ
फूल तो फूल हैं काँटों पे तेरे
अपने होंटों के निशाँ पाता हूँ
मेरे ख़्वाबों के वतन

चूम लेने दे मुझे हाथ अपने
जिन से तोड़ी हैं कई ज़ंजीरे
तूने बदला है मशियत का मिज़ाज
तूने लिखी हैं नई तक़दीरें
इंक़लाबों के वतन

फूल के बाद नये फूल खिलें
कभी ख़ाली न हो दामन तेरा
रोशनी रोशनी तेरी राहें
चाँदनी चाँदनी आंगन तेरा
माहताबों के वतन
kaifi azmi

Sikandar_Khan
07-02-2011, 10:08 PM
दिल-ए नादां तुझे हुआ क्या है
अख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वह बेज़ार
या इलाही यह माज्रा क्या है

मैं भी मुंह में ज़बान रख्ता हूं
काश पूछो कि मुद्द`आ क्या है

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर यह हन्गामह अय ख़ुदा क्या है

यह परी-चह्रह लोग कैसे हैं
ग़म्ज़ह-ओ-`इश्वह-ओ-अदा क्या है

शिकन-ए ज़ुल्फ़-ए अन्बरीं क्यूं है
निगह-ए चश्म-ए सुर्मह-सा क्या है

सब्ज़ह-ओ-गुल कहां से आए हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जान्ते वफ़ा क्या है

हां भला कर तिरा भला होगा
और दर्वेश की सदा क्या है

जान तुम पर निसार कर्ता हूं
मैं नहीं जान्ता दु`आ क्या है

मैं ने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

ग़ालिब

Sikandar_Khan
07-02-2011, 11:10 PM
सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।

है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है।

हाथ जिन में हो जुनून कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है।

हम तो घर से निकले ही थे बांध कर सर पे क़फ़न
जान हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये क़दम
ज़िंदगी तो अपनी मेहमाँ मौत की महफ़िल में है।

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इंक़िलाब
होश दुशमन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाए जो हम से दम कहां मंज़िल में है।

यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।
रामप्रसाद बिस्मिल

Sikandar_Khan
07-02-2011, 11:16 PM
की वफ़ा हम से तो ग़ैर उस को जफ़ा कह्*ते हैं
होती आई है कि अच्*छों को बुरा कह्*ते हैं

आज हम अप्*नी परेशानी-ए ख़ातिर उन से
कह्*ने जाते तो हैं पर देखिये क्*या कह्*ते हैं

अग्*ले वक़्*तों के हैं यह लोग उंहें कुछ न कहो
जो मै-ओ-नग़्*मह को अन्*दोह-रुबा कह्*ते हैं

दिल में आ जाए है होती है जो फ़ुर्*सत ग़श से
और फिर कौन-से नाले को रसा कह्*ते हैं

है परे सर्*हद-ए इद्*राक से अप्*ना मस्*जूद
क़िब्*ले को अह्*ल-ए नज़र क़िब्*लह-नुमा कह्*ते हैं

पा-ए अफ़्*गार पह जब से तुझे रह्*म आया है
ख़ार-ए रह को तिरे हम मिह्*र-गिया कह्*ते हैं

इक शरर दिल में है उस से कोई घब्*राएगा क्*या
आग मत्*लूब है हम को जो हवा कह्*ते हैं

देखिये लाती है उस शोख़ की नख़्*वत क्*या रन्*ग
उस की हर बात पह हम नाम-ए ख़ुदा कह्*ते हैं

वह्*शत-ओ-शेफ़्*तह अब मर्*सियह कह्*वें शायद
मर गया ग़ालिब-ए आशुफ़्*तह-नवा कह्*ते हैं
मिर्ज़ा ग़ालिब

Sikandar_Khan
08-02-2011, 09:25 PM
हम घूम चुके बस्ती-वन में
इक आस का फाँस लिए मन में

कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो

जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों

जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो

या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है

हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में

कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का

सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए

तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

इब्ने इंशा

Sikandar_Khan
08-02-2011, 09:29 PM
न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही
इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही

ख़ार-ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है
शौक़ गुलचीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही

मय परस्ताँ ख़ूम-ए-मय मूंह से लगाये ही बने
एक दिन गर न हुआ बज़्म में साक़ी न सही

नफ़ज़-ए-क़ैस के है चश्म-ओ-चराग़-ए-सहरा
गर नहीं शम-ए-सियहख़ाना-ए-लैला न सही

एक हंगामे पे मौकूफ़ है घर की रौनक
नोह-ए-ग़म ही सही, नग़्मा-ए-शादी न सही

न सिताइश की तमन्ना न सिले की परवाह्
गर नहीं है मेरे अशार में माने न सही

इशरत-ए-सोहबत-ए-ख़ुबाँ ही ग़नीमत समझो
न हुई "ग़ालिब" अगर उम्र-ए-तबीई न सही
Mirza galib

Sikandar_Khan
08-02-2011, 09:33 PM
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

अनगिनत सदियों के तारीक बहिमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुये कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुये ख़ून में नहलाये हुये
जिस्म निकले हुये अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुये नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ABHAY
12-02-2011, 08:58 AM
देखा है मैंने इश्क में ज़िन्दगी को संवरते हुए
चाँद की आरजू में चांदनी को निखरते हुए
इक लम्हे में सिमट सी गई है ज़िन्दगी मेरी
महसूस किया है मैंने वक्त को ठहरते हुए
डर लगने लगा है अब तो, सपनो को सजाने में भी
जब से देखा है हंसी ख्वाबों को बिखरते हुए
अब तो सामना भी हो जाये तो वो मुह फिर लेते हैं अपना
पहले तो बिछा देते थे नजरो को अपनी, जब हम निकलते थे
उनके रविस से गुजरते हुए...

ABHAY
12-02-2011, 08:59 AM
तू परछाई है मेरी, तो कभी मुझे भी दिखाई दिया कर
ऐ जिंदगी ! कभी तो इक जाम फुर्सत में मेरे संग पिया कर

मै भी इन्सान हूँ, मेरे भी दिल में बसता है खुदा
मेरी नहीं तो न सही, कम से कम उसकी तो क़द्र किया कर

इनायत समझ कर तुझको अबतलक जीता रहा हूँ मै
मिटा कर क़ज़ा के फासले, मै तुझमे जियूं तू मुझमे जिया कर

मेरा क्या है ? मै तो दीवाना हूँ इश्क-ऐ-वतन में फनाह हो जाऊंगा
वतन पे मिटने वालों की न जोर आजमाइश लिया कर...........

ABHAY
12-02-2011, 08:59 AM
बेबस है जिन्दगी और मदहोश है ज़मानाइक ओर बहते आंसू इक ओर है तराना
लौ थरथरा रही है बस तेल की कमी सेउसपर हवा के झोंके है दीप को बचाना
मन्दिर को जोड़ते जो मस्जिद वही बनातेमालिक है एक फिर भी जारी लहू बहाना
मजहब का नाम लेकर चलती यहाँ सियासतरोटी बड़ी या मजहब हमको ज़रा बताना
मरने से पहले मरते सौ बार हम जहाँ मेंचाहत बिना भी सच का पड़ता गला दबाना
अबतक नहीं सुने तो आगे भी न सुनोगेमेरी कब्र पर पढ़ोगे वही मरसिया पुराना
होते हैं रंग कितने उपवन के हर सुमन केहै काम बागवां का हर पल उसे सजाना

ABHAY
12-02-2011, 09:01 AM
बचपन से ही सपन दिखाया, उन सपनों को रोज सजाया।
पूरे जब न होते सपने, बार-बार मिलकर समझाया।
सपनों के बदले अब दिन में, तारे देख रहा हूँ।
सपना हुआ न अपना फिर भी, सपना देख रहा हूँ।।

पढ़-लिखकर जब उम्र हुई तो, अवसर हाथ नहीं आया।
अपनों से दुत्कार मिली और, उनका साथ नहीं पाया।
सपन दिखाया जो बचपन में, आँखें दिखा रहा है।
प्रतिभा को प्रभुता के आगे, झुकना सिखा रहा है।
अवसर छिन जाने पर चेहरा, अपना देख रहा हूँ।
सपना हुआ न अपना फिर भी, सपना देख रहा हूँ।।

ग्रह-गोचर का चक्कर है यह, पंडितजी ने बतलाया।
दान-पुण्य और यज्ञ-हवन का, मर्म सभी को समझाया।
शांत नहीं होना था ग्रह को, हैं अशांत घर वाले अब।
नए फकीरों की तलाश में, सच से विमुख हुए हैं सब।
बेबस होकर घर में मंत्र का, जपना देख रहा हूँ।
सपना हुआ न अपना फिर भी, सपना देख रहा हूँ।।

रोटी जिसको नहीं मयस्सर, क्यों सिखलाते योगासन?
सुंदर चहरे, बड़े बाल का, क्यों दिखलाते विज्ञापन?
नियम तोड़ते, वही सुमन को, क्यों सिखलाते अनुशासन?
सच में झूठ, झूठ में सच का, क्यों करते हैं प्रतिपादन?
जनहित से विपरीत ख़बर का, छपना देख रहा हूँ।
सपना हुआ न अपना फिर भी, सपना देख रहा हूँ।।

ABHAY
12-02-2011, 09:02 AM
भर गए बाज़ार नक़ली माल से
लीचियों के खोल में हैं फ़ालसे

लफ़्ज़ तो इंसानियत मा'लूम है
है मगर परहेज़ इस्तेमाल से

ना ग़ुलामी दिल से फ़िर भी जा सकी
हो गए आज़ाद बेशक़ जाल से

भूल कर सिद्धांत समझौता किया
अब हरिश्चंदर ने नटवरलाल से

खोखली चिपकी है चेहरों पर हंसी
हैं मगर अंदर बहुत बेहाल से

ज़िंदगी में ना दुआएं पा सके
अहले-दौलत भी हैं वो कंगाल से

सोचता थाज़िंदगी क्या चीज़ है
उड़ गया फुर से परिंदा डाल से

इंक़लाब अंज़ाम दे आवाम क्या
ज़िंदगी उलझी है रोटी-दाल से

शाइरी करते अदब से दूर हैं
चल रहे राजेन्द्र टेढ़ी चाल से

ABHAY
12-02-2011, 09:02 AM
लोग मुझको कहें ख़राब तो क्या
और मैं अच्छा हुआ जनाब तो क्या

है ही क्या मुश्तेख़ाक से बढ़ कर
आदमी का है ये रुआब तो क्या

उम्र बीती उन आँखों को पढ़ते
इक पहेली सी है किताब तो क्या

मैं जो जुगनु हूँ गर तो क्या कम हूँ
कोई है गर जो आफ़ताब तो क्या

ज़िंदगी ही लुटा दी जिस के लिये
माँगता है वही हिसाब तो क्या

मिलते ही मैं गले नहीं लगता
फिर किसी को लगा खराब तो क्या

आ गया जो सलीका-ए-इश्क अब
दोस्त मरकर मिला सवाब तो क्या

ABHAY
12-02-2011, 09:03 AM
होगी तलाशे इत्र ये मछली बज़ार में
निकले तलाशने जो वफ़ा आप प्*यार में

चल तो रहा है फिर भी मुझे ये गुमाँ हुआ
थम सा गया है वक्त तेरे इन्तजार में

जब भी तुम्हारी याद ने हौले से आ छुआ
कुछ राग छिड़ गये मेरे मन के सितार में

किस्मत कभी तो पलटेंगे नेता गरीब की
कितनों की उम्र कट गयी इस एतबार में

दुश्वारियां हयात की सब भूल भाल कर
मुमकिन नहीं है डूबना तेरे खुमार में

ये तितलियों के रक्स ये महकी हुई हवा
लगता है तुम भी साथ हो अबके बहार में

वो जानते हैं खेल में होता है लुत्फ़ क्या
जिनको न कोई फर्क हुआ जीत हार में

अपनी तरफ से भी सदा पड़ताल कीजिये
यूँ ही यकीं करें न किसी इश्तिहार में

'नीरज' किसी के वास्ते खुद को निसार कर
खोया हुआ है किसलिये तू इफ्तिखार में

इफ्तिखार= मान, कीर्ति, विशिष्ठता, ख्य

ABHAY
12-02-2011, 09:05 AM
जो रचनाएँ थी प्रायोजित उसे मैं लिख नहीं पाया
स्वतः अन्तर से जो फूटा उसे बस प्रेम से गाया
थी शब्दों की कभी किल्लत न भावों से वहाँ संगम,
दिशाओं और फिजाओं से कई शब्दों को चुन लाया

किया कोशिश कि सीखूँ मैं कला खुद को समझने की
कठिन है यक्ष-प्रश्नों सा है बारी अब उलझने की
घटा अज्ञान की मानस पटल पर छा गयी है यूँ,
बँधी आशा भुवन पर ज्ञान की बारिश बरसने की

बहुत मशहूर होने पर हुआ मगरूर मैं यारो
नहीं पूरे हुए सपने हुआ मजबूर मैं यारो
वो अपने बन गए जिनसे कभी रिश्ता नहीं लेकिन,
यही चक्कर था अपनों से हुआ हूँ दूर मैं यारो

अकेले रह नहीं सकते पड़ोसी की जरूरत है
अगर अच्छे मिलें तो मान लें गौहर की मूरत है
पड़ोसी के किसी भी हादसे को जानते हैं लोग,
सुबह अखबार में पढ़ते बनी अब ऐसी सूरत है

बिजलियाँ गिर रहीं घर पे न बिजली घर तलक आयी
बनाते घर हजारों जो उसी ने छत नहीं पायी
है कैसा दौर मँहगीं मुर्गियाँ हैं आदमी से अब,
करे मेहनत उसी ने पेट भर रोटी नहीं खायी

हकीकत से दुखी प्रायः यही जीवन-कहानी है
नहीं मुस्कान चेहरों पे उसी की ये निशानी है
चमन में है कभी पतझड़ कभी ऋतुराज आयेगा,
सुमन की दोस्ती काँटों से तो सदियों पुरानी है

ABHAY
12-02-2011, 09:07 AM
दोस्त बन कर मुकर गया कोई
अपने दिल ही से डर गया कोई

आँख में अब तलक है परछाईं
दिल में ऐसे उतर गया कोई

सबकी ख़्वाहिश को रख के ज़िंदा फिर
ख़ामुशी से लो मर गया कोई

जो भी लौटा तबाह ही लौटा
फिर से लेकिन उधर गया कोई

"दोस्त" कैसे बदल गया देखो
मोजज़ा ये भी कर गया कोई

ABHAY
12-02-2011, 09:08 AM
सितम जब ज़माने ने जी भर के ढाये
भरी सांस गहरी बहुत खिलखिलाये

कसीदे पढ़े जब तलक खुश रहे वो
खरी बात की तो बहुत तिलमिलाये

न समझे किसी को मुकाबिल जो अपने
वही देख शीशा बड़े सकपकाये

भलाई किये जा इबादत समझ कर
भले पीठ कोई नहीं थपथपाये

खिली चाँदनी या बरसती घटा में
तुझे सोच कर ये बदन थरथराये

बनेगा सफल देश का वो ही नेता
सुनें गालियाँ पर सदा मुसकुराये

बहाने बहाने बहाने बहाने
न आना था फिर भी हजारों बनाये

गया साल 'नीरज' तो था हादसों का
न जाने नया साल क्या गुल खिलाये

ABHAY
12-02-2011, 09:09 AM
नज़र बे-जुबाँ और जुबाँ बे-नज़र है
इशारे समझने का अपना हुनर है

सितारों के आगे अलग भी है दुनिया
नज़र तो उठाओ उसी की कसर है

मुहब्बत की राहों में गिरते, सम्भलते
ये जाना कि प्रेमी पे कैसा कहर है

जो मंज़िल पे पहुँचे दिखी और मंज़िल।
ये जीवन तो लगता सिफर का सफ़र है।।

रहम की वो बातें सुनाते हमेशा
दिखे आचरण में ज़हर ही ज़हर है

कई रंग फूलों के संग थे चमन में
ये कैसे बना हादसों का शहर है

है शब्दों की माला पिरोने की कोशिश
सुमन ये क्या जाने कि कैसा असर है

ABHAY
12-02-2011, 09:10 AM
माफ़ कर दो आज देर हो गई आने में
वक़्त लग जाता है अपनों को समझाने में।


किरण के संग संग ज़माना उठ जाता है
.देखना पड़ता है मौका छुप के आने में ।


रूठ के ख़ुद को नहीं ,मुझको सजा देते हो
क्या मज़ा आता है यूं मुझको तड़पाने में ।


एक लम्हे में कोई भी बात बिगड़ जाती है
उम्र कट जाती है उलझन कोई सुलझाने में ।


तेरी ख़ुशबू से मेरे जिस्म "ओ"जान नशे में हैं
"दीपक" जाए भला फिर क्यों किसी मयखाने में ।

ABHAY
12-02-2011, 09:11 AM
हम खुद से अनजान क्यूँ है
ज़िन्दगी मौत की मेहमान क्यूँ है

जिस जगह लगते थे खुशियों के मेले

आज वहां दहशतें वीरान क्यूँ है

जल उठता था जिनका लहू हमें देख कर

न जाने आज वो हम पर मेहेरबान क्यूँ है

जहाँ सूखा करती थी कभी फसले

वहां लाशों के खलिहान क्यूँ है

कभी गूंजा करती थी घरों में बच्चों की किलकारियां

अब न जाने खुशियों से खाली मकान क्यूँ है

आखिर कौन कर सकता है किसीकी तन्हाई को दूर

सूरज,चाँद और हजारों तारें है मगर

तन्हा-तन्हा आसमान क्यों है....

ABHAY
12-02-2011, 09:12 AM
दुनिया के दिल में हजारों की भीड़ देखी,
हसते हुए को दुआ और देते आशीष देखी.
मतलबी इस दुनिया में रोते को हँसना गुनाह है
उन पर बहाए कोई आंसू न रहम दिल देखी
न चाहे फिर भी अँधेरे को पनाह घर में मिलता है
किसी मजार पर जलता चिराग न सारी रात देखी
संग जीने मरने के वादे दुनियां में बहुतों ने किये
निकलते जनाजा न अब तक दोनों को साथ देखी
गुमराह कर गए वो खुदा मेरे आशियाने को
वे जिस्म में जान डाल दे ऐसा न हकीम देखी
छोड़ जाती है रूह जिस्म बेजान हो जाती है
हम सफर की याद में बरसती आँखें दिन रात देखी
टूटी है कसती जीवन का सफर है आंधी अभी
तिनके का हो सहारा कसती को न दरिया पार देखी ..

ABHAY
12-02-2011, 09:12 AM
दोस्त बन कर मुकर गया कोई
अपने दिल ही से डर गया कोई

आँख में अब तलक है परछाईं
दिल में ऐसे उतर गया कोई

सबकी ख़्वाहिश को रख के ज़िंदा फिर
ख़ामुशी से लो मर गया कोई

जो भी लौटा तबाह ही लौटा
फिर से लेकिन उधर गया कोई

"दोस्त" कैसे बदल गया देखो
मोजज़ा ये भी कर गया कोई

ABHAY
12-02-2011, 09:13 AM
आग लग जाये जहाँ में फिर से फट जाये ज़मीं।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।

आँधी आये या तूफ़ान बर्फ गिरे या फिर चट्टान।
उत्तरकाशी भुज लातूर सुनामी और पाकिस्तान।।
मौत का ताण्डव रौद्र रूप में फँसी ज़िंदगी अंधकूप में।
लाख झमेले आने पर भी बढ़ी ज़िंदगी छाँव धूप में।।

दहशतों के बीच चलकर खिल उठी है ज़िंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।

कुदरत के इस कहर को देखो और प्रलय की लहर को देखो।
हम विकास के नाम पे पीते धीमा धीमा ज़हर तो देखो।।
प्रकृति को हमने क्यों छेड़ा इस कारण ही मिला थपेड़ा।
नियति नियम को भंग करेंगे रोज़ बढ़ेगा और बखेड़ा।।

लक्ष्य नियति के साथ चलना और सजाना ज़िंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।

युद्धों की एक अलग कहानी बच्चे बूढ़े मरी जवानी।
कुरुक्षेत्र से अब इराक़ तक रक्तपात की शेष निशानी।।
स्वार्थ घना जब जब होता है जीवन मूल्य तभी खोता है।
करुणभाव से मुक्त हृदय भी विपदा में संग संग रोता है।।

साथ मिलकर जब बढ़ेंगे दूर होगी गंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।

जीवन है चलने का नाम रुकने से नहीं बनता काम।
एक की मौत कहीं आ जाये दूजा झंडा लेते थाम।।
हाहाकार से लड़ना होगा किलकारी से भरना होगा।
सुमन चाहिए अगर आपको काँटों बीच गुज़रना होगा।।

प्यार करे मानव मानव को यही करें मिल बंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।

ABHAY
12-02-2011, 09:14 AM
लो राज़ की बात आज एक बताते हैं
हम हँस-हँसकर अपने ग़म छुपाते हैं,

तन्हा होते हैं तो रो लेते जी भर कर
सर-ए-महफ़िल आदतन मुस्कुराते हैं.

कोई और होंगे रुतबे के आगे झुकने वाले
हम सिर बस खुदा के दर पर झुकाते हैं

माँ आज फिर तेरे आँचल मे मुझे सोना है
आजा बड़ी हसरत से देख तुझे बुलाते हैं .

इसे ज़िद समझो या हमारा शौक़ औ हुनर
चिराग हम तेज़ हवायों मे ही जलाते है

तुमने महलऔमीनार,दौलत कमाई हो बेशक़
पर गैर भी प्यार से मुझको गले लगाते हैं

शराफत हमेशा नज़र झुका कर चलती हैं
हम निगाह मिलाते हैं,नज़रे नहीं मिलाते हैं

ये मुझ पे ऊपर वाले की इनायत हैं दीपक
वो खुद मिट जाते जो मुझ पर नज़र उठाते हैं

ABHAY
12-02-2011, 09:15 AM
तनिक बतायें नेताजी, राष्ट्रवादियों के गुण खासा।
उत्तर सुनकर दंग हुआ और छायी घोर निराशा।।

नारा देकर गाँधीवाद का, सत्य-अहिंसा क झुठलाना।
एक है ईश्वर ऐसा कहकर, यथासाध्य दंगा करवाना।
जाति प्रांत भाषा की खातिर, नये नये झगड़े लगवाना।
बात बनाकर अमन-चैन की, शांति-दूत का रूप बनाना।
खबरों में छाये रहने की, हो उत्कट अभिलाषा।
राष्ट्रवादियों के गुण खासा।।

किसी तरह धन संचित करना, लक्ष्य हृदय में हरदम इतना।
धन-पद की तो लूट मची है, लूट सको तुम लूटो उतना।
सुर नर मुनि सबकी यही रीति, स्वारथ लाई करहिं सब प्रीति।
तुलसी भी ऐसा ही कह गए और तर्क सिखाऊँ कितना।।
पहले "मैं" हूँ राष्ट्र "बाद" में ऐसी रहे पिपासा।
राष्ट्रवादियों के गुण खासा।।

आरक्षण के अन्दर आरक्षण, आपस में भेद बढ़ाना है।
फूट डालकर राज करो, यह नुस्खा बहुत पुराना है।
गिरगिट जैसे रंग बदलना, निज-भाषण का अर्थ बदलना।
घड़ियाली आंसू दिखलाकर, सबको मूर्ख बनाना है।
हार जाओ पर सुमन हार की कभी न छूटे आशा।
राष्ट्रवादियों के गुण खासा।।

"सूत्र" एक है "वाद" हजारों, टिका हुआ है भारत में।
राष्ट्रवाद तो बुरी तरह से, फँस गया निजी सियासत में।।

ABHAY
12-02-2011, 09:15 AM
खौफ का जो कर रहा व्यापार है
आदमी वो मानिये बीमार है

चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता
तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है

जिस्म से चल कर रुके, जो जिस्म पर
उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है

लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है

ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए
ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार है

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है।

ABHAY
12-02-2011, 09:16 AM
मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँ

मैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमें गाऊं

अपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकर

सुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।
लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पे
निगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता है
हर तरफ हकीकत में क्या तसव्वुर में
फकत रोटी का है सवाल उभर कर आता है ।
ख़्याल आता है जेहन में उन दरवाजों का
शर्म से जिनमें छिपे हैं जवान बदन कितने
जिनके तन को ढके हैं हाथ भर की कतरन
जिनके सीने में दफन हैं , अरमान कितने
जिनकी डोली नहीं उठी इस खातिर क्योंकि
उनके माँ-बाप ने शराफत की कमाई है
चूल्हा एक बार ही जला हो घर में लेकिन
मेहनत की खायी है , मेहनत की खिलाई है ।
नज़र में घुमती है शक्ल उन मासूमों की
ज़िन्दगी जिनकी अँधेरा , निगाह समंदर है ,
वीरान साँसे , पीप से भरी -धंसी आँखे
फाकों का पेट में चलता हुआ खंज़र है ।
माँ की छाती से चिपकने की उम्र है जिनकी
हाथ फैलाये वाही राहों पे नज़र आते हैं ।
शोभित जिन हाथों में होनी थी कलमें
हाथ वही बोझ उठाते नज़र आते हैं ॥
राह में घूमते बेरोजगार नोजवानों को
देखता हूँ तो कलेजा मुह चीख उठता है
जिन्द्के दम से कल रोशन जहाँ होना था
उन्हीं के सामने काला धुआं सा उठता है ।
फ़िर कहो किस तरह हुस्न के नगमें गाऊं
फ़िर कहो किस तरह इश्क ग़ज़लें लिखूं
फ़िर कहो किस तरह अपने सुखन में
मरमरी लफ्जों के वास्ते जगह रखूं ॥
आज संसार में गम एक नहीं हजारों हैं
आदमी हर दुःख पे तो आंसू नहीं बहा सकता ।
लेकिन सच है की भूखे होंठ हँसेंगे सिर्फ़ रोटी से
मीठे अल्फाजों से कोई मन बहला नही सकता ।
*********************************************

ABHAY
12-02-2011, 09:19 AM
रो कर मैंने हँसना सीखा, गिरकर उठना सीख लिया।
आते-जाते हर मुश्किल से, डटकर लड़ना सीख लिया।।

महल बनाने वाले बेघर, सभी खेतिहर भूखे हैं।
सपनों का संसार लिए फिर, जी कर मरना सीख लिया।।

दहशतगर्दी का दामन क्यों, थाम लिया इन्सानों ने।
धन को ही परमेश्वर माना, अवसर चुनना सीख लिया।।

रिश्ते भी बाज़ार से बनते, मोल नहीं अपनापन का।
हर उसूल अब है बेमानी, हँटकर सटना सीख लिया।।

फुर्सत नहीं किसी को देखें, सुमन असल या कागज का।
जब से भेद समझ में आया, जमकर लिखना सीख लिया।।

ABHAY
12-02-2011, 09:20 AM
आज ये खामोशियाँ सिमटती क्यों नहीं
हाल-ऐ-दिल आपके लब सुनते क्यों नहीं..

कभी तो फैला दो अपनी बाहों का फलक
मेरी आँखों की दुआ तुम तक जाती क्यों नहीं..

दर्द-ऐ-दिल बार-बार पलकों को भिगो जाता है ...
आपका खामोश रहना मुझे भीतर तक तोड़ जाता है..

मुहोब्बत मेरी जिंदगी की मुझसे रूठने लगी है ..
अंधेरे मेरी जिंदगी की तरफ़ बढ़ने लगे है..

बे-इंतिहा मुहोब्बत का असर आज होता क्यों नहीं..
मेरी आत्मा में बसे हो तुम, ये तुम जानते क्यों नहीं..

दिन-रात मेरी दुआओ में तुम हो ये तुम मानते क्यों नहीं ..
कोई वजूद नही मेरा तुम बिन, ये तुम जानते क्यों नहीं॥

खामोश लब तुम्हारे आज बोलते क्यों नहीं
भेद जिया के मुझ संग खोलते क्यों नहीं..!!

ABHAY
12-02-2011, 09:23 AM
तुझे दिल याद करता है तो नग्*़मे गुनगुनाता हूँ
जुदाई के पलों की मुश्किलों को यूं घटाता हूं

जिसे सब ढूंढ़ते फिरते हैं मंदिर और मस्जिद में
हवाओं में उसे हरदम मैं अपने साथ पाता हूं

फसादों से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसले
हटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल बिछाता हूं

नहीं तहजीब ये सीखी कि कह दूं झूठ को भी सच
गलत जो बात लगती है गलत ही मैं बताता हूं

मुझे मालूम है मैं फूल हूं झर जाऊंगा इक दिन
मगर ये हौसला मेरा है हरदम मुस्*कुराता हूं

नहीं जब छांव मिलती है कहीं भी राह में मुझको
सफर में अहमियत मैं तब शजर की जान जाता हूं

घटायें, धूप, बारिश, फूल, तितली, चांदनी 'नीरज'
तुम्*हारा अक्*स इनमें ही मैं अक्*सर देख पाता हूँ

ABHAY
12-02-2011, 09:24 AM
हाल पूछा आपने तो पूछना अच्छा लगा
बह रही उल्टी हवा से जूझना अच्छा लगा

दुख ही दुख जीवन का सच है लोग कहते हैं यही
दुख में भी सुख की झलक को ढ़ूँढ़ना अच्छा लगा

हैं अधिक तन चूर थककर खुशबू से तर कुछ बदन
इत्र से बेहतर पसीना सूँघना अच्छा लगा

रिश्ते टूटेंगे बनेंगे जिन्दगी की राह में
साथ अपनों का मिला तो घूमना अच्छा लगा

कब हमारे चाँदनी के बीच बदली आ गयी
कुछ पलों तक चाँद का भी रूठना अच्छा लगा

घर की रौनक जो थी अबतक घर बसाने को चली
जाते जाते उसके सर को चूमना अच्छा लगा

दे गया संकेत पतझड़ आगमन ऋतुराज का
तब भ्रमर के संग सुमन को झूमना अच्छा लगा

ABHAY
12-02-2011, 09:27 AM
बात घर की मिटाने की करते हैं
तो हजारों ख़यालात जेहन में आते हैं

बेहिसाब तरकीबें रह - रहकर आती हैं
अनगिनत तरीके बार - बार सिर उठाते हैं ।


घर जिस चिराग से जलना हो तो
लौ उसकी हवाओं मैं भी लपलपाती है

ना तो तेल ही दीपक का कम होता है
ना ही तेज़ी से छोटी होती बाती है ।


अगर बात जब एक घर बसाने की हो तो
बमुश्किल एक - आध ख्याल उभर के आता है

तमाम रात सोचकर बहुत मशक्कत के बाद
एक कच्चा सा तरीका कोई निकल के आता है ।


वो चिराग जिससे रोशन घरोंदा होना है
शुष्क हवाओं में भी लगे की लौ अब बुझा

बाती भी तेज़ बले , तेल भी खूब पिए दीया
रौशनी भी मद्धम -मद्धम और कम रौनक शुआ ।


आज फ़िर से वही सवाल सदियों पुराना है
हालत क्यों बदल जाते है मकसद बदलते ही

फितरतें क्यों बदल जाती है चिरागों की अक्सर
घर की देहरी पर और घर के भीतर जलते ही ।

ABHAY
12-02-2011, 09:32 AM
मेरे जेहन में कई बार ये ख्याल आया
की ख्वाब के रंग से तेरी सूरत संवारूँ

इश्क में पुरा डुबो दूँ तेरा हसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारू और ज्यादा निखारूँ ।

जुल्फ उलझाऊँ कभी तेरी जुल्फ सुलझाऊँ
कब्भी सिर रखकर दामन में तेरे सो जाऊँ

कभी तेरे गले लगकर बहा दूँ गम अपने
कभी सीने से लिपटकर कहीं खो जाऊँ

कभी तेरी नज़र में उतारूँ मैं ख़ुद को
कभी अपनी नज़र में तेरा चेहरा उतारूँ।

इश्क में पूरा डुबो दूँ तेरा हसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारू और ज्यादा निखारूँ ॥

अपने हाथों में तेरा हाथ लिए चलता रहूँ
सुनसान राहों पर, बेमंजिल और बेखबर

भूलकर गम सभी, दर्द तमाम, रंज सभी
डूबा तसव्वुर में बेपरवाह और बेफिक्र

बस तेरा साथ रहे और सफर चलता रहे
सूरज उगता रहे और चाँद निकलता रहे

तेरी साँसों में सिमटकर मेरी सुबह निकले
तेरे साए से लिपटकर मैं रात गुजारूँ

इश्क में पुरा डुबो दूँ हँसीन पैकर
हुस्न तेरा निखारूँ और ज्यादा निखारूँ ॥

मगर ये इक तसव्वुर है मेरी जान - जिगर
महज़ एक ख्वाब और ज्यादा कुछ भी नहीं

हहिकत इतनी तल्ख है की क्या बयाँ करूँ
मेरे पास कहने तलक को अल्फाज़ नहीं ।

कहीं पर दुनिया दिलों को नहीं मिलने देती
कहीं पर दरम्यान आती है कौम की बात

कहीं पर अंगुलियाँ उठाते हैं जग के सरमाये
कहीं पर गैर तो कहीं अपने माँ- बाप ॥

कहीं दुनिया अपने ही रंग दिखाती है
कहीं पर सिक्के बढ़ाते हैं और ज्यादा दूरी

कहीं मिलने नहीं देता है और ज़ोर रुतबे का
कहीं दम तोड़ देती है बेबस मजबूरी ॥

अगर इस ख़्वाब का दुनिया को पता चल जाए
ख़्वाब में भी तुझे ये दिल से न मिलने देगी

कदम से कदम मिलकर चलना तो क़यामत
तुझे क़दमों के निशान पे भी न चलने देगी ।

चलो महबूब चलो , उस दुनिया की जानिब चलें
जहाँ न दिन निकलता हो न रात ढलती हो

जहाँ पर ख्वाब हकीकत में बदलते हों
जहाँ पर सोच इंसान की न जहर उगलती हो ।।

ABHAY
12-02-2011, 09:34 AM
मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँ

मैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमें गाऊं

अपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकर
सुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।

लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पे
निगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता है

हर तरफ हकीकत में क्या तसव्वुर में
फकत रोटी का है सवाल उभर कर आता है ।

ख़्याल आता है जेहन में उन दरवाजों का
शर्म से जिनमें छिपे हैं जवान बदन कितने

जिनके तन को ढके हैं हाथ भर की कतरन
जिनके सीने में दफन हैं , अरमान कितने

जिनकी डोली नहीं उठी इस खातिर क्योंकि
उनके माँ-बाप ने शराफत की कमाई है

चूल्हा एक बार ही जला हो घर में लेकिन
मेहनत की खायी है , मेहनत की खिलाई है ।

नज़र में घुमती है शक्ल उन मासूमों की
ज़िन्दगी जिनकी अँधेरा , निगाह समंदर है ,

वीरान साँसे , पीप से भरी -धंसी आँखे
फाकों का पेट में चलता हुआ खंज़र है ।

माँ की छाती से चिपकने की उम्र है जिनकी
हाथ फैलाये वाही राहों पे नज़र आते हैं ।

शोभित जिन हाथों में होनी थी कलमें
हाथ वही बोझ उठाते नज़र आते हैं ॥

राह में घूमते बेरोजगार नोजवानों को
देखता हूँ तो कलेजा मुह चीख उठता है

जिन्द्के दम से कल रोशन जहाँ होना था
उन्हीं के सामने काला धुआं सा उठता है ।

फ़िर कहो किस तरह हुस्न के नगमें गाऊं
फ़िर कहो किस तरह इश्क ग़ज़लें लिखूं

फ़िर कहो किस तरह अपने सुखन में
मरमरी लफ्जों के वास्ते जगह रखूं ॥

आज संसार में गम एक नहीं हजारों हैं
आदमी हर दुःख पे तो आंसू नहीं बहा सकता ।

लेकिन सच है की भूखे होंठ हँसेंगे सिर्फ़ रोटी से
मीठे अल्फाजों से कोई मन बहला नही सकता ।

ABHAY
12-02-2011, 09:35 AM
मोहब्बत के सफर पर चलने वाले राही सुनो,
मोहब्बत तो हमेशा जज्बातों से की जाती है,
महज़ शादी ही, मोहब्बत का साहिल नहीं,
मंजिल तो इससे भी दूर, बहुत दूर जाती है ।

जिन निगाहों में मुकाम- इश्क शादी है
उन निगाहों में फ़कत हवस बदन की है,
ऐसे ही लोग मोहब्बत को दाग़ करते हैं
क्योंकि इनको तलाश एक गुदाज़ तन की है ।

जिस मोहब्बत से हजारों आँखें झुक जायें ,
उस मोहब्बत के सादिक होने में शक है
जिस मोहब्बत से कोई परिवार उजड़े
तो प्यार नहीं दोस्त लपलपाती वर्क है ।

मेरे लफ्जों में, मोहब्बत वो चिराग है
जिसकी किरणों से ज़माना रोशन होता है
जिसकी लौ दुनिया को राहत देती है
न की जिससे दुखी घर, नशेमन होता है ।

मेरे दोस्त ! जिस मोहब्बत से परेशां होना पड़े
मैं उसे हरगिज़ मोहब्बत कह नहीं सकता
नज़र जिसकी वजह से मिल न सके ज़माने से
मैं ऐसी मोहब्बत को सादिक कह नहीं सकता ।

मैं भी मोहब्बत के खिलाफ नहीं हूँ
मैं भी मोहब्बत को खुदा मानता हूँ
फर्क इतना है की मैं इसे मर्ज़ नहीं
ज़िन्दगी सँवारने की दवा मानता हूँ ।

साफ हरफों में मोहब्बत उस आईने का नाम है
जो हकीकत जीवन की हँस कर कबूल करवाता है
आदमी जिसका तस्सव्वुर कर भी नहीं सकता
मोहब्बत के फेर में वो कर गुज़र जाता है ।

ABHAY
12-02-2011, 09:37 AM
गमों की धूप से तू उम्र भर रहे महफ़ूज़,
खुशी की छांव हमेश तुझे नसीब रहे.

रहे जहां भी तू ऐ दोस्त ये दुआ है मेरी,
मसर्रतों का खज़ाना तेरे करीब रहे.

तू कामयाब हो हर इम्तिहां में जीवन के,
तेरे कमाल का कायल तेरा रकीब रहे.

तू राहे-हक पे हो ता-उम्र इब्ने-मरियम सा,
बला से तेरी कोई मुन्तज़िर सलीब रहे.

नहीं हो एक भी दुश्मन तेरा ज़माने में,
मिले जो तुझसे वो बनके तेरा हबीब रहे.

न होगा गम मुझे मरने का फिर कोई शमसी,
जो मेरे सामने तुझसा कोई तबीब रहे.

ABHAY
12-02-2011, 09:39 AM
डर
,संशय ,बेचैनी क्या है

हर
दिल में पुश्तैनी क्या है

खूनों
के सौदागर पूछें

साखी,
शबद ,रमैनी क्या है

नदियां
सबकी आंखों में हैं

गंग,
जमुन ,तिरवेनी क्या है

दिल
को दिल से मिल जाने दो

आरी
,चाकू ,छैनी क्या है

सब
तो उसके ही बंदे हैं

हिन्दू
,मुस्लिम, जैनी क्या है

ABHAY
12-02-2011, 09:41 AM
अरे चला भी जा तू,मुझे ना तबाह कर !!

मुझे देख इस कदर,तू यूँ ना हंसा कर !!

कोई टिक ना सका,मेरे रस्ते में आकर !!

वफ़ा यहाँ फालतू है,जफा कर जफा कर !!

तू प्यार चाहता है ??,मेरे पास बैठा कर !!

तुझे सुकून मिलेगा,इधर को आया कर !!

दुनिया बदल रही है,गाफिल तू भी बदल !!

(२)

प्यार की इन्तेहाँ उरियां हो

जैसे इक नदिया दरिया हो !!

इक पल में फुर्र हो जाती है

उम्र गोया उड़ती चिडिया हो !!

तुझसे क्या-क्या मांगता हूँ

तेरे आगे अल्ला गिरिया हो !!

मैं तो चाहता ही हूँ कि मुझसे

हर इक ही इंसान बढ़िया हो !!

सुख-दुःख गोया ऐसे भईया

गले में हीरों की लड़ियाँ हों !!

तुमसे कहना चाहता हूँ ये मैं

तुम बढ़िया हो बस बढ़िया हो !!

इतना बढ़िया जी जाऊं"गाफिल"

अल्ला भी कहे कि बढ़िया हो !!

ABHAY
12-02-2011, 09:41 AM
राहों के रंग न जी सके कोई ज़िंदगी नहीं|
यूहीं चलते जाना दोस्त कोई ज़िंदगी नहीं |

कुछ पल तो रुक के देख ले,क्या क्या है राह में ,
यूही राह चलते जाना, कोई ज़िंदगी नहीं।

चलने का कुछ तो अर्थ हो कोई मुकाम हो,
चलने के लिए चलना कोई ज़िंदगी नहीं।

कुछ ख़ूबसूरत से पड़ाव, यदि राह में न हों ,
उस राह चलते जाना, कोई ज़िंदगी नहीं ।

ज़िंदा दिली से ज़िंदगी को जीना चाहिए,
तय रोते सफ़र करना कोई ज़िंदगी नहीं।

इस दौरे भागम भाग में सिज़दे में इश्क के,
कुछ पल झुके तो इससे बढ़कर बंदगी नहीं।

कुछ पल ठहर हर मोड़ पर खुशियाँ तू ढूढ़ ले,
उन पल से बढ़कर 'श्याम कोइ ज़िंदगी नहीं ॥

ABHAY
12-02-2011, 09:43 AM
मुश्किलें आती रही, हादिसे बढ़ते गये ।
मंज़ि़लों की राह में, क़ाफ़िले बढ़ते गये ।

दरमियाँ थी दूरियाँ, दिल मगर नज़दीक़ थे
पास ज्यूँ-ज्यूँ आये हम, फ़ासले बढ़ते गये ।

राहरवों का होंसला, टूटता देखा नहीं
ग़रचे दौराने-सफ़र, हादिसे बढ़ते गये ।

साथ रह कर भी बहम हो न पाई ग़ुफ़्तग़ू
ख़ामशी के दम ब दम, सिलसिले बढ़ते गये ।

हम थे मंज़िल के क़रीब, और सफ़र आसान था
यक-ब-यक तूफ़ां उठा, वस्वसे बढ़ते गये ।

किस्सा-ए-ग़म से मेरे कुछ न आँच आई कभी
मेरे दुख और उनके 'पुरु' क़हक़हे बढ़ते गये ।

ABHAY
12-02-2011, 09:43 AM
गजल
अनमोल रहा हूँ......
है
दिल की बात तुझसे मगर खोल रहा हूँ
मैं
चुप्पियों में आज बहुत बोल रहा हूँ
सांसों
में मुझे तुझसे जो एक रोज मिली थी
वो
खुश्बूयें हवाओं में अब घोल रहा हूँ
अब
तेरी हिचकियों ने भी ये बात कही है
मैं
तेरी याद साथ लिये डोल रहा हूँ
सोने
की और न चांदी की मैं बात करुंगा
मैं
दिल की ही तराजू पे दिल तोल रहा हूँ
चाहो
तो मुहब्बत से मुझे मुफ्त ही ले लो
वैसे
तो शुरु से ही मैं अनमोल रहा हूँ

ABHAY
12-02-2011, 09:44 AM
वो झुकी झुकी सी आँखें उसकी और लबों पे मुस्कान का खिल आना,
बस मेरी एक छुअन से उसका ख़ुद में सिमट जाना,
फिर हौले से खोलना झील सी आँखें और मेरा उनमें डूब जाना,
शरारत भरी निगाहों से फिर मेरे दिल में उसका उतर जाना,
रखना फिर मेरे कांधे पे सर अपना और उसका वो ग़ज़ल गुनगुनाना,
मुहब्बत है क्या बस ऐसे ही एक पल में मैंने है जाना.......

वो पायल की झंकार और उसकी चूड़ियों का खनखनाना,
चाल में मस्ती और उसका आँचल को लहराना,
सुनकर मेरी बातों को उसका हौले से मुस्कुराना,
मेरी हंसी मैं ढूँढना खुशी और मेरी उदासी मैं उदास हो जाना,
जो लगे चोट मुझे तो रो-रो के उसका बेहाल हो जाना,
मुहब्बत है क्या बस ऐसे ही एक पल में मैंने है जाना.......

वो करना शाम ढले तक बातें और थाम के हाथ मेरा सपने सजाना,
बहुत मासूमियत से उसका मुझे ज़िन्दगी का फलसफा समझाना,
जब हो लम्हा उदासी भरा तो उसका मुझे गले लगाना,
छाये जब अँधेरा गम का तो खुशी की किरन बन जाना,
मुहब्बत है क्या बस ऐसे ही एक पल में मैंने है जाना,
मुहब्बत है क्या बस ऐसे ही एक पल में मैंने है जाना.......

ABHAY
12-02-2011, 09:48 AM
जब भी निदाघ में उठी है हवा, तुम याद आई हो
श्वास में जब भरी कोई सुगंधि, तुम याद आई हो


यूँ तो मंदिरों मंदिरों न कभी घूमा किया अभागा
जब भी ये सर कहीं झुका, तुम याद आई हो


फूल दैवी उपवनों के भू पर खिले हैं घर-घर में
जब भी दिखा निश्छल कोई शिशु, तुम याद आई हो


संगीत-सी ललित कविता-सी कोमल अयि कामिनी
किसी लय पर जो थिरकी हवा, तुम याद आई हो


जो तुम वियुक्त तो हर धड़कन लिथड़ी रक्ताक्त अश्रु में
कभी औचक जो मुस्कराया, तुम याद आई हो


जलती आग सी सीने में, है धुआँ-धुआँ साँसों का राज
जब फैली कहीं भी उजास, तुम याद आई हो


मरुस्थली सा जीवन, वसंत मात्र स्वप्न है सुजीत का
जब भी कूकी कोई कोकिला, तुम याद आई हो

ABHAY
12-02-2011, 09:51 AM
बेवज़ह बातों ही बातों में सुनाना क्या सही है
भूला-बिसरा याद अफसाना दिलाना क्या सही है

कुछ न कुछ तो काम लें संजींदगी से हम ए जानम
पल ही पल में रूठ जाना और मनाना क्या सही है

मुस्करा ऐसे कि जैसे मुस्कराती हैं बहारें
चार दिन की ज़िन्दगी घुट कर बिताना क्या सही है

ख्वाब में आकर मुझे आवाज़ कोई दे रहा है
बेरुखी दिखला के उसका दिल दुखाना क्या सही है

तुम इन्हें सहला नहीं पाए मेरे हमदर्द साथी
छेड़ कर सारी खरोचें दिल दुखाना क्या सही है

अब बड़े अनजान बनते हो हमारी ज़िन्दगी से
फूल जैसी ज़िन्दगी को यूँ सताना क्या सही है

ज़िन्दगी का बांकपन खो सा गया जाने कहाँ अब
सोचती हूँ ,तुम बिना महफ़िल सजाना क्या सही है .

ABHAY
12-02-2011, 09:53 AM
ऐ हसीं ता ज़िंदगी ओठों पै तेरा नाम हो |
पहलू में कायनात हो उसपे लिखा तेरा नाम हो |


ता उम्र मैं पीता रहूँ यारव वो मय तेरे हुश्न की,
हो हसीं रुखसत का दिन बाहों में तू हो जाम हो |


जाम तेरे वस्ल का और नूर उसके शबाब का,
उम्र भर छलका रहे यूंही ज़िंदगी की शाम हो |


नगमे तुम्हारे प्यार के और सिज़दा रब के नाम का,
पढ़ता रहूँ झुकता रहूँ यही ज़िंदगी का मुकाम हो |


चर्चे तेरे ज़लवों के हों और ज़लवा रब के नाम का,
सदके भी हों सज़दे भी हों यूही ज़िंदगी ये तमाम हो |


या रब तेरी दुनिया में क्या एसा भी कोई तौर है,
पीता रहूँ , ज़न्नत मिले जब रुखसते मुकाम हो |


है इब्तिदा , रुखसत के दिन ओठों पै तेरा नाम हो,
हाथ में कागज़-कलम स्याही से लिखा 'श्याम' हो ||

ABHAY
12-02-2011, 09:56 AM
यार पुराने छूट गए तो छूट गए

कांच के बर्तन टूट गए तो टूट गए

सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं

तीर कमाँ से छूट गए तो छूट गए

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे

मेरे सपने टूट गए तो टूट गए

इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये

भाग किसी के फूट गए तो फूट गए

छोड़ो रोना धोना रिष्ते नातों पर

कच्चे धागे टूट गए तो टूट गए

अब के बिछड़े तो मर जाएंगे परवाज़

हाथ अगर अब छूट गए तो छूट गए

Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:16 PM
थरथरी सी है आसमानों में
जोर कुछ तो है नातवानों में

कितना खामोश है जहां लेकिन
इक सदा आ रही है कानों में

कोई सोचे तो फ़र्क कितना है
हुस्न और इश्क के फ़सानों में

मौत के भी उडे हैं अक्सर होश
ज़िन्दगी के शराबखानों में

जिन की तामीर इश्क करता है
कौन रहता है उन मकानों में

इन्ही तिनकों में देख ऐ बुलबुल
बिजलियां भी हैं आशियानों में
फ़िराक़ गोरखपुरी

Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:18 PM
की वफ़ा हम से तो ग़ैर उस को जफ़ा कह्*ते हैं
होती आई है कि अच्*छों को बुरा कह्*ते हैं

आज हम अप्*नी परेशानी-ए ख़ातिर उन से
कह्*ने जाते तो हैं पर देखिये क्*या कह्*ते हैं

अग्*ले वक़्*तों के हैं यह लोग उंहें कुछ न कहो
जो मै-ओ-नग़्*मह को अन्*दोह-रुबा कह्*ते हैं

दिल में आ जाए है होती है जो फ़ुर्*सत ग़श से
और फिर कौन-से नाले को रसा कह्*ते हैं

है परे सर्*हद-ए इद्*राक से अप्*ना मस्*जूद
क़िब्*ले को अह्*ल-ए नज़र क़िब्*लह-नुमा कह्*ते हैं

पा-ए अफ़्*गार पह जब से तुझे रह्*म आया है
ख़ार-ए रह को तिरे हम मिह्*र-गिया कह्*ते हैं

इक शरर दिल में है उस से कोई घब्*राएगा क्*या
आग मत्*लूब है हम को जो हवा कह्*ते हैं

देखिये लाती है उस शोख़ की नख़्*वत क्*या रन्*ग
उस की हर बात पह हम नाम-ए ख़ुदा कह्*ते हैं

वह्*शत-ओ-शेफ़्*तह अब मर्*सियह कह्*वें शायद
मर गया ग़ालिब-ए आशुफ़्*तह-नवा कह्*ते हैं
मिर्ज़ा ग़ालिब

Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:21 PM
है दुनिया जिस का नाम मियाँ ये और तरह की बस्ती है।
जो महँगों को तो महँगी है और सस्तों को ये सस्ती है।
याँ हरदम झगड़े उठते हैं, हर आन अदालत बस्ती है।
गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।

जो और किसी का मन रक्खे, तो उसको भी अरमान मिले।
जो पान खिलावे पान मिले, जो रोटी दे तो नान मिले।
नुक़सान करे नुक़सान मिले, एहसान करे एहसान मिले।
जो जैसा जिसके साथ करे, फिर वैसा उसको आन मिले।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।

जो और किसी की जाँ बख़्शे तो उसकी भी हक़ जान रखे।
जो और किसी की आन रखे तो, उसकी भी हक़ आन रखे।
जो याँ का रहने वाला है, ये दिल में अपने जान रखे।
ये तुरत-फुरत का नक़्शा है, इस नक़्शे को पहचान रखे।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदलपरस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।

जो पार उतारे औरों को, उसकी भी पार उतरनी है।
जो ग़र्क़ करे फिर उसको भी, याँ डुबकूं-डुबकूं करनी है।
शमशीर, तीर, बन्दूक़, सिना और नश्तर तीर, नहरनी है।
याँ जैसी जैसी करनी है, फिर वैसी वैसी भरनी है।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।

जो और का ऊँचा बोल करे तो उसका भी बोल बाला है।
और दे पटके तो उसको भी, कोई और पटकने वाला है।
बे ज़ुल्मा ख़ता जिस ज़ालिम ने मज़लूम ज़िबह कर डाला है।
उस ज़ालिम के भी लोहू का फिर बहता नद्दी नाला है।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।

जो और किसी को नाहक़ में कोई झूठी बात लगाता है।
और कोई ग़रीब और बेचारा हक़ नाहक़ में लुट जाता है।
वो आप भी लूटा जाता है और लाठी-पाठी खाता है।
जो जैसा जैसा करता है, वो वैसा वैसा पाता है।
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।

है खटका उसके हाथ लगा, जो और किसी को दे खटका।
और ग़ैब से झटका खाता है, जो और किसी को दे झटका।
चीरे के बीच में चीरा है, और पटके बीच जो है पटका।
क्या कहिए और 'नज़ीर' आगे, है ज़ोर तमाशा झट पटका।
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इसहाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब बदस्ती है।।
नज़ीर अकबराबादी

Sikandar_Khan
13-02-2011, 12:23 PM
फिर कुछ इस दिल् को बेक़रारी है
सीना ज़ोया-ए-ज़ख़्म-ए-कारी है

फिर जिगर खोदने लगा नाख़ून
आमद-ए-फ़स्ल-ए-लालाकारी है

क़िब्ला-ए-मक़्सद-ए-निगाह-ए-नियाज़
फिर वही पर्दा-ए-अम्मारी है

चश्म-ए-दल्लल-ए-जिन्स-ए-रुसवाई
दिल ख़रीदार-ए-ज़ौक़-ए-ख़्बारी है

वही सदरंग नाला फ़र्साई
वही सदगूना अश्क़बारी है

दिल हवा-ए-ख़िराम-ए-नाज़ से फिर
महश्रिस्ताँ-ए-बेक़रारी है

जल्वा फिर अर्ज़-ए-नाज़ करता है
रोज़-ए-बाज़ार-ए-जाँसुपारी है

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है
मिर्ज़ा गालिब

Sikandar_Khan
15-02-2011, 01:01 PM
हम घूम चुके बस्ती-वन में
इक आस का फाँस लिए मन में

कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो

जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों

जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो

या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है

हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में

कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का

सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए

तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

इब्ने इंशा

Sikandar_Khan
15-02-2011, 01:08 PM
आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

दामे-हर-मौज में हैं हल्क़-ए-सदकामे-निहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक

हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक

पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होने तक

ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्म'अ हर रंग में जलती है सहर होने तक

मिर्ज़ा गालिब

Sikandar_Khan
27-02-2011, 02:57 AM
धोता हूँ जब मैं

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीमतन के पाँव
रखता है ज़िद से खेंच कर बाहर लगन के पाँव

दी सादगी से जान पड़ूँ कोहकन के पाँव
हैहात क्यों न टूट गए पीरज़न के पाँव

भागे थे हम बहुत सो उसी की सज़ा है ये
होकर असीर दाबते हैं राहज़न के पाँव

मरहम की जुस्तजू में फिरा हूँ जो दूर-दूर
तन से सिवा फ़िग़ार हैं इस ख़स्ता तन के पाँव

अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्तनवर्दी के बादे-मर्ग
हिलते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मेरे अंदर कफ़न के पाँव

है जोश-ए-गुल बहार में याँ तक कि हर तरफ़
उड़ते हुए उलझते हैं मुर्ग़-ए-चमन के पाँव

शब को किसी के ख़्वाब में आया न हो कहीं
दुखते हैं आज उस बुते-नाज़ुकबदन के पाँव


'ग़ालिब' मेरे कलाम में क्यों कर मज़ा न हो
पीता हूँ धो के खुसरौ-ए-शीरींसुख़न के पाँव
मिर्ज़ा ग़ालिब

Sikandar_Khan
14-03-2011, 01:13 AM
तुम मेरे पास रहो

तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मर्हमे-मुश्क लिये नश्तरे-अल्मास लिये
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले

दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगें
आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुलक़ुले-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न मने
जब कोई बात बनाये न बने

जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुनसान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
फैज़ अहमद फैज़

Kumar Anil
14-03-2011, 09:51 AM
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए

तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

इब्ने इंशा

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैँ । मुहब्बत का यही जज़्बात उसे औरोँ से अलग और महान बनाता है ।

ishu
18-03-2011, 12:58 AM
दोस्तों.. आपके लिए विशेष तौर पर मैं लाया हूँ मशहूरो मारुफ़ ग़ज़ल गायक "राहत इन्दौरी " साहब की कुछ ग़ज़लें... गौर फरमाइयेगा..

अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे

ishu
18-03-2011, 12:58 AM
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

ishu
18-03-2011, 01:01 AM
अब पेश हैं महान ग़ज़ल गायक "रहबर जौनपुरी" साहब की कुछ ग़ज़लें..

मुझको किस मोड़ पे लाया है मुक़द्दर मेरा
रास्ता रोकते हैं मील के पत्थर मेरा

आँखों-आँखों में गुज़र जाती हैं रातें सारी
अब मुझे ख़्वाब भी देता नहीं बिस्तर मेरा

ताज कोई है न दस्तार-ए-फ़ज़ीलत कोई
बार अब दोश पे लगता है मुझे सर मेरा

मैं परेशान बदलते हुए हालात से था
रख दिया वक़्त ने चेहरा ही बदल कर मेरा

सेहन-ओ-दीवार वही, ताक़-ओ-दर-ओ-बाम वही
अजनबी सा मुझे लगता है मगर घर मेरा

मैं किसी और से उम्मीद-ए-वफ़ा क्या रक्खूँ
ख़ुद ही जब बस नहीं चलता कोई मुझ पर मेरा

तुझसे नाकामी-ए-मंज़िल का गिला क्या रेहबर
चश्म-ए-बीना है न अब दिल है मुनव्वर मेरा

ishu
18-03-2011, 01:02 AM
इक छत तो बड़ी चीज़ है छप्पर नहीं रखते
जो घर को बनाते हैं वही घर नहीं रखते

हो प्यास बुझानी तो कुआँ खोदिए कोई
पीने के लिए लोग समन्दर नहीं रखते

मंज़िल पे पहुँचने का सिखाते हैं हुनर हम
राहों में किसी की कभी पत्थर नहीं रखते

हम अज़मत-ए-किरदार पे करते हैं भरोसा
एहसान की चोखट पे कभी सर नहीं रखते

आईना-ए-एहसास को जो ठेस लगाएँ
अल्फ़ाज़ हम ऐसे कभी लब पर नहीं रखते

वाबस्ता उन्हीं लोगों से रहते हैं अँधेरे
जो शम्मे दिल-ओ-जाँ को मुनव्वर नहीं रखत

ishu
18-03-2011, 01:17 AM
हमारे अलीगढ के मशहूर ग़ज़ल लेखक जिनकी ग़ज़लें दुनिया भर में मशहूर हैं..ज़नाब दानिश अलीगढ़ी साहब.. आज उन्हीं की कुछ ग़ज़लें आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ.. मुलाहिजा फरमाइयेगा...
क़दम क़दम पे ग़मों ने जिसे संभाला है
उसे तुम्हारी नवाज़िश ने मार डाला है

हर एक शब के लिए सुबह का उजाला है
वो शख़्स जिसको ग़म-ए-ज़िन्दगी ने पाला है

किसी के जिस्म की ख़ुशबू से दिल मोअत्तर है
किसी की याद मेरे ज़ेह्न का उजाला है

ख़ुशी ये है कि मुलाक़ात होने वाली है
ये रंज है कि वो मिलकर बिछड़ने वाला है

किसी के पाँव के छालों को किसने देखा है
ज़माना राह में काँटे बिछाने वाला है

वो लोग मुझसे उसूलों की बात करते थे
जिन्होंने अपने उसूलों को बेच डाला है

बुरा न मानिए दानिश कि आप अपने हैं
ये कहके उसने मुझे बज़्म से निकाला है

ishu
18-03-2011, 01:18 AM
2. दिल की बरबादी में कुछ उनकी अदा शामिल है
और कुछ मेरी वफ़ाओं की सज़ा शामिल है

नग़मग़ी ऎसे लुटाती हुई गुज़री है सबा
जैसे उसमें तेरी पायल की सदा शामिल है

ज़ख़्म कुछ और हरे और हरे होते हैं
तेरी यादों में भी पूरब की हवा शामिल है

है मेरा दोस्त कि वो दोस्त नुमा दुश्मन है
अब वफ़ा में भी तो ज़ालिम की जफ़ा होती है

उनको शोहरत की जो मेराज मिली है दानिश
इसमें अपना भी तो कुछ ख़ून-ए-वफ़ा शामिल है

Bond007
18-03-2011, 01:47 AM
हमारे अलीगढ के मशहूर ग़ज़ल लेखक जिनकी ग़ज़लें दुनिया भर में मशहूर हैं..ज़नाब दानिश अलीगढ़ी साहब.. आज उन्हीं की कुछ ग़ज़लें आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ.. मुलाहिजा फरमाइयेगा...
क़दम क़दम पे ग़मों ने जिसे संभाला है
उसे तुम्हारी नवाज़िश ने मार डाला है
....
....
बुरा न मानिए दानिश कि आप अपने हैं
ये कहके उसने मुझे बज़्म से निकाला है

:) ईशु जी! बहुत उत्तम कार्य है आपका फोरम पर| अच्छी शुरुआत की है| फोरम की प्रगति में आप सहायक होंगे ऐसी हमें आशा है| :bravo:

Sikandar_Khan
20-03-2011, 07:54 PM
आये हो तुम यहाँ क्यों
आये हो तुम यहाँ क्यों हाथों में लेके पत्थर
बस्ती है मुफ़लिसों की, शीशे के ये नहीं घर

पाबंदियाँ यहाँ है रस्मों-रिवायतों की
चलती हूँ इसलिये मैं तेरी डगर से हटकर

सहरा की धूप सर पर, तलुओं में भी हैं छाले
शिद्दत है तिश्नगी की, छलते सुराब उस पर

ज़िन्दा ज़मीर जिनका, डरते नहीं वो सच से
चलते हैं खोटे मन के, तो आइनों से बचकर

रहबर बिना किसी को मंज़िल कहाँ मिली है
हम कब से चल रहे हैं राहें बदल-बदल कर

महफ़िल में सबसे देवी हँसकर मिली है लेकिन
तन्हाइयों में रोई ख़ुद से लिपट-लिपट कर

देवी नागरानी

Sikandar_Khan
20-03-2011, 08:03 PM
थरथरी सी है आसमानों में

थरथरी सी है आसमानों में
जोर कुछ तो है नातवानों में

कितना खामोश है जहां लेकिन
इक सदा आ रही है कानों में

कोई सोचे तो फ़र्क कितना है
हुस्न और इश्क के फ़सानों में

मौत के भी उडे हैं अक्सर होश
ज़िन्दगी के शराबखानों में

जिन की तामीर इश्क करता है
कौन रहता है उन मकानों में

इन्ही तिनकों में देख ऐ बुलबुल
बिजलियां भी हैं आशियानों में

फ़िराक़ गोरखपुरी

Sikandar_Khan
22-03-2011, 01:59 AM
तल्ख़ी है बहुत ही जीवन में, थोड़ा सा रूमानी होलें हम
कुछ रंग तुम अपना छलकाओ, कुछ प्यार की मस्ती घोलें हम

गम क़ैस नहीं, फ़रहाद नहीं, जो होश गंवा बैठें अपना
क्या राज़ है अपनी उल्फ़त का, क्यूँ तुझपे ज़माना खोलें हम

बनवा के किसी ने ताजमहल, दुनिया को नया पैग़ाम दिया
इन अहदे-वफ़ा की कब्रों से, कुछ देर लिपट के रो ले हम

क्या इसने इनायत की हम पे, जो इसे तवज़्जो हम देते
क्यूँ फ़िक्र कर हम दुनिया की, क्यूँ इसके हक़ में बोले हम

ऐ दर्दे-मुहब्बत हो रुख़सत, दिल दे के उन्हें हम पछताये
जागे हैं बहुत रातों-रातों, कुछ देर सकूँ से सो लें हम

आँखों में अगर आये आँसू, तो ज़ब्त की हद में रहने दे
कहिये तो गिरा कर अश्क़ अपने, कुछ दामन और भिंगो ले हम

है मुँह में ज़ुबाँ तो अपने भी, होंठों को सिये बैठें हैं मगर
नव्वाब किसी की महफ़िल में, ये सोचतें हैं क्या बोले हम

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:02 AM
जब भी पहलू में यार होता है
दिल को हासिल क़रार होता है

उस सितम को सितम नहीं कहते
जो सितम बार-बार होता है

कोई हँसता है सुन के हाले-ग़म
और कोई अश्क बार होता है

हाथ डालें ज़रा संभल के आप
फूल के पास ख़ार होता है

आजकल क़ूचा-ए-सियासत में
झूठ का कारोबार होता है

भूल बैठे हैं करके वो वादा
और इधर इंतिज़ार होता है

शेख़ चलते तो हैं सूए-काबा
रुख मगर कूए-यार होता है

चंद ग़ज़लों के बाद ऐ नव्वाब
शायरों में सुमार होता है

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:05 AM
मुहब्बत का ज़ज्बा जगा कर के देखो
कभी दिल को तुम दिल बनाकर के देखो

हो तुम भी तभी तक कि जब तक कि हम हैं
न मानों तो हमको मिटाकर के देखो

कोई मुझपे इल्ज़ाम भरने से पहले
वफ़ायें मेरी आज़मा कर के देखो

ख़ुलूसो, मुहब्बत है क्या चीज़ ज़ाहिद
कभी मयकदे में ये आकर दे देखो

तुम्हें हम तो अपना बनाये हुए हैं
हमें तुम भी अपना बनाकर के देखो

न मिट जाये ग़म तो है ये मेरा ज़िम्मा
मगर शर्त है जाम उठाकर के देखो

भुलाना हमें इतना आसाँ नहीं है
है आसाँ तो हमको भुलाकर दे देखो

सियासत में नवाब बाज़ीगरी का
तमाशा क़रीब और जाकर के देखो

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:06 AM
ख़ुशी छिन गयी दिल लगाने के बाद
बहुत रोये हम मुस्कुराने के बाद

ख़ुदा जाने क्या हश्र होगा हमारा
तेरी बज़्म-से उठके जाने के बाद

नज़र लग न जाये कहीं फिर किसी की
हँसी आयी है एक ज़माने के बाद

करेंगे तुम्हारी तरह हम भी तौबा
मगर ज़ाहिदों जाम उठाने के बाद

किया इतना मजबूर शर्मो-हया ने
झुका लीं निगाहें मिलाने के बाद

अमाँ पायेगी फिर कहाँ बर्क़े सोज़ाँ
मेरा आशियाना जलाने के बाद

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:24 AM
–पं. प्रेम किशोर ‘पटाखा’

जब तलक लगती नहीं हैं बोलियाँ मेरे पिता,
तब तलक उठती नहीं हैं डोलियाँ मेरे पिता।

आज भी पगड़ी मिलेगी बेकसों की पाँव में,
ठोकरों में आज भी हैं पसलियाँ मेरे पिता।

बेघरों का आसरा थे जो कभी बरसात में,
उन दरख़्तों पर गिरी हैं बिजलियाँ मेरे पिता

आग से कैसे मचाएँ खूबसूरत ज़िन्दगी,
एक माचिस में कई हैं तीलियाँ मेरे पिता।

जब तलक ज़िंदा रहेगी जाल बुनने की प्रथा,
तब तलक फँसती रहेंगी मछलियाँ मेरे पिता।

जिसका जी चाहे नचायें और एक दिन फूँक दें,
हम नहीं है काठ को वी पुतलियाँ मेरे पिता।

मैंने बचपन में खिलौना तक कभी माँगा नहीं,
मेरा बेटा माँगता है गोलियाँ मेरे पिता।

आपको गुस्से में देखा और फिर देखा गगन,
माँ की आँखों-सी लगी हैं बदलियाँ मेरे पिता।

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:33 AM
सब तमन्नाएँ हों पूरी, कोई ख्वाहिश भी रहे
चाहता वो है, मुहब्बत मे नुमाइश भी रहे

आसमाँ चूमे मेरे पँख तेरी रहमत से
और किसी पेड की डाली पर रिहाइश भी रहे

उसने सौंपा नही मुझे मेरे हिस्से का वजूद
उसकी कोशिश है की मुझसे मेरी रंजिश भी रहे

मुझको मालूम है मेरा है वो मै उसका हूँ
उसकी चाहत है की रस्मों की ये बंदिश भी रहे

मौसमों मे रहे 'विश्वास' के कुछ ऐसे रिश्ते
कुछ अदावत भी रहे थोडी नवाज़िश भी रहे

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:34 AM
भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा
कोई ख़्वाबों में आकार बस लिया दो पल तो हंगामा
मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है , साजिश है
उसे बाहों में खुलकर कास लिया दो पल तो हंगामा

जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा
ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब
ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा

कलम को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा
गिरेबां अपना आंसू में भिगोता हूँ तो हंगामा
नही मुझ पर भी जो खुद की खबर वो है जमाने पर
मैं हंसता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा

इबारत से गुनाहों तक की मंजिल में है हंगामा
ज़रा-सी पी के आये बस तो महफ़िल में है हंगामा
कभी बचपन, जवानी और बुढापे में है हंगामा
जेहन में है कभी तो फिर कभी दिल में है हंगामा

हुए पैदा तो धरती पर हुआ आबाद हंगामा
जवानी को हमारी कर गया बर्बाद हंगामा
हमारे भाल पर तकदीर ने ये लिख दिया जैसे
हमारे सामने है और हमारे बाद हंगामा

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:36 AM
जब भी चिड़ियों को बुलाकर प्यार से दाने दिए,
इस नई तहज़ीब ने इस पर कई ताने दिए।

जिन उजालों ने किया अंधी गुफ़ाओं से रिहा,
बेड़ियाँ पहनाके हमने उनको तकख़ाने दिए।

हमने माँगी थी ज़रा-सी रोशनी घर के लिए,
आपने जलती हुई बस्ती के नज़राने दिए।

हादसे ऐसे भी गुज़रे उनके मेरे दरमियाँ,
लब रहे ख़ामोश और आँखों ने अफ़साने दिए।

ज़िंदगी खुशबू से अब तक इसलिए महरूम है,
हमने जिस्मों को चमन, रूहों को वीराने दिए।

आस्मानों को भी सजदों के लिए झुकना पड़ा,
वो भी क्या सदियाँ थीं, जिनने ऐसे दिवाने दिए।

ज़िंदगी चादर है, धुलके साफ़ हो जायेगी फिर,
इसलिए हमने भी इसमें दाग़ लग जाने दिए।

हाथ में तेज़ाब में फ़ाहे थे मरहम की जगह,
दोस्तों ने कब हमारे ज़ख्म मुरझाने दिए।

ज़िंदगी का ग़म नहीं, ग़म है हमें इस बात का,
उनने मुर्दे भी नहीं, क़ब्रों में दफ़नाने दिए।

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:37 AM
मेरा अपना तजुर्बा है तुम्हें बतला रहा हूँ मैं
कोई लब छू गया था तब अभी तक गा रहा हूँ मैं
फिराके यार में कैसे जिया जाये बिना तड़फे
जो मैं खुद ही नहीं समझा वही समझा रहा हूँ मैं

किसी पत्थर में मूरत है कोई पत्थर की मूरत है
लो हमने देख ली दुनिया जो इतनी ख़ूबसूरत है
ज़माना अपनी समझे पर मुझे अपनी खबर ये है
तुम्हें मेरी जरूरत है मुझे तेरी जरूरत है

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:38 AM
ऐसा अपनापन भी क्या जो अजनबी महसूस हो,
साथ रहकर भी मुझे तेरी कमी महसूस हो।

आग बस्ती में लगाकर बोलते हैं, यूँ जलो,
दूर से देखे कोई तो रोशनी महसूस हो।

भीड़ के लोगों सुनो, ये हुक्म है दरबार का,
भूख से ऐसे गिरी कि बन्दगी महसूस हो।

नाम था उसका बगावत कातिलों ने इसलिये,
क़त्ल भी ऐसे किया कि खुदकुशी महसूस हो।

शाख़ पर बैठे परिन्दे कह रहे थे कान में,
क्या रिहाई है कि हरदम बेबसी महसूस हो।

फूल मत दे मुझको, लेकिन बोल तो फूलों से बोल,
जिनको सुनकर तितलियाँ-सी ताज़गी महसूस हो।

आप उस ख़ाली जगह पे नाम लिख़ देना मेरा,
जब हरइक राय में किसी राय की कमी महसूस हो।

शर्त मुर्दों से लगाकर काट दी आधी सदी,
अब तो करवट लो कि जिससे ज़िंदगी महसूस हो।

हो अगर जज़्बे अमल की बेकली इंसान में,
सर पे तपती दोपहर भी चाँदनी महसूस हो।

सिर्फ़ इतने पर बदल सकता है दुनिया का निज़ाम,
कोई रोय, आँख में सबकी नमी महसूस हो।

दे रहा हूँ आपको अपना पता मैं इसलिए,
याद कर लेना कभी, मेरी कमी महसूस हो।

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:40 AM
आपसे किसने कहा स्वर्णिम शिखर बनकर दिखो,
शौक दिखने का है तो फिर नींव के अंदर दिखो।

चल पड़ी तो गर्द बनकर आस्मानों पर दिखो,
और अगर बैठो कहीं, तो मील का पत्थर दिखो।

सिर्फ़ दिखने के लिए दिखना कोई दिखना नहीं,
आदमी हो तुम अगर तो आदमी बनकर दिखो।

ज़िंदगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं,
पत्थरों के शहर में वो आईना बनकर दिखो।

आपको महसूस होगी तब हरइक दिल की जलन,
जब किसी धागे-सा जलकर मोम के भीतर दिखो।

एक ज़ुगनू ने कहा मैं भी तुम्हारे साथ हूँ,
वक़्त की इस धुंध में तुम रोशनी बनकर दिखो।

एक मर्यादा बनी है हम सभी के वास्ते,
गर तुम्हें बनना है मोती सीप के अंदर दिखो।

पंछी ! इनसे आ रही है, कातिलों की आहटें,
लड़के इन पूजाघरों से अपनी शाख़ों पर दिखो।

डर न जाए फूल बनने से कोई नाजुक कली,
तुम ना खिलते फूल पर तितली के टूटे पर दिखो।

कोई ऐसी शक्ल तो मुझको दिखे इस भीड़ में,
मैं जिसे देखूँ उसी में तुम मुझे अक्सर दिखो।

ऐशगाहें चाहती हैं सब लुटा चुकने के बाद,
तुम किसी तंदूर में हँसते हुए जलकर दिखो।

Sikandar_Khan
22-03-2011, 02:43 AM
आस होगी, न आसरा होगा
आने वाले दिनों में क्या होगा
मैं तुझे भूल जाऊंगा इक दिन
वक्त सब कुछ बदल चुका होगा
नाम हमने लिखा था आंखों में
आंसुओं ने मिटा दिया होगा
कितना दुश्वार था सफ़र उसका
वो सरे-शाम सो गया होगा
पतझड़ों की कहानियां पढ़ना
सारा मंज़र किताब-सा होगा
आसमां भर गया परिन्दों से
पेड़ कोई हरा गिरा होगा

Sikandar_Khan
22-03-2011, 03:52 AM
उफक़ के दरीचे से किरनों ने झांका
फ़ज़ा तन गई, रास्ते मुस्कुराये

सिमटने लगी नर्म कुहरे की चादर
जवां शाख़सारों ने घूंघट उठाये

परिन्दों की आवाज़ से खेत चौंके
पुरअसरार लै में रहट गुनगुनाये

हसीं शबनम-आलूद पगडंडियों से
लिपटने लगे-सब्ज़ पेड़ों के साये

वो दूर एक टीले पे आंचल सा झलका
तसव्वुर में लाखों दिये झिलमिलाये

Sikandar_Khan
22-03-2011, 03:52 AM
अंधियारी रात के आंगन में ये सुबह के क़दमों की आहट
ये भीगी-भीगी सर्द हवा, ये हल्की-हल्की धंधलाहट

गाड़ी में हूं तनहा महवे-सफ़र और नींद नहीं है आंखों में
भूले-बिसरे रूमानों के ख़्वाबों की ज़मीं है आंखों में

अगले दिन हाथ हिलाते हैं, पिछली पीतें याद आती हैं
गुमगश्ता ख़ुशियां आंखों में आंसू बनकर लहराती है

सीने वे वीरां गोशों में इक टीस-सी करवट लेती है
नाकाम उमंगें रोती हैं उम्मीद सहारे देती है

वो राहें ज़हन में६ घूमती हैं जिन राहों से आज आया हूं
कितनी उम्मीद से पहुंचा था, कितनी मायूसी लाया हूं

Sikandar_Khan
22-03-2011, 03:55 AM
अहदे-गुमगश्ता की तसवीर दिखाती क्यों हो ?
एक आवारा-ए-मंज़िल को२ सताती क्यों हो ?
वो हसीं अहद३ जो शर्मिंदा-ए-ईफ़ा न हुआ४,
उस हंसी अहद का मफ़हूम जताती क्यों हो ?
ज़िन्दगी शोला-ए-बेबाक५ बना लो अपनी,
ख़ुद को ख़ाकस्तरे-ख़ामोश६ बनाती क्यों हो ?
मैं तसव्वुफ़ के७ मराहिल का८ नहीं हूं क़ायल९,
मेरी तसवीर पे तुम फूल चढ़ाती क्यों हो ?
कौन कहता है कि आहें हैं मसाइब का१॰ इलाज,
जान को अपनी अ़बस११ रोग लगाती क्यों हो ?
एक सरकश से१२ मोहब्बत की तमन्ना रखकर,
ख़ुद को आईन के१३ फंदे में फंसाती क्यों हो ?
मैं समझता हूं तक़ददुस१४ को तमददुन१५ का फ़रेब,
तुम रसूमात को१६ ईमान बनाती क्यों हो ?
जब तुम्हें मुझसे ज़ियादा है ज़माने का ख़याल,
फिर मेरी याद में यूं अश्क१७ बहाती क्यों हो ?

त़ुम में हिम्मत है तो दुनिया से बगावत कर दो।
वर्ना मां-बाप जहां कहते हैं शादी कर लो।।

१. फुर्सत, अवकाश २. जिसकी कोई मंज़िल न हो ३. प्रण ४. जो पूरा न हुआ ५. धृष्ट शोला ६. मौन राख ७. सूफ़ीवाद ८. सीढ़ियों का ९. अनुयायी १॰. विपदाओं का ११. व्यर्थ १२. उद्दण्ड १३. कानून के १४. पवित्रता १५. संस्कृति १६. रीति-रिवाजों को १७. आंसू

Sikandar_Khan
24-03-2011, 10:51 AM
शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ
आँखें मेरी भीगी हुईं चेहरा तेरा उतरा हुआ

अब इन दिनों मेरी ग़ज़ल ख़ुश्बू की इक तस्वीर है
हर लफ़्ज़ गुंचे की तरह खिल कर तेरा चेहरा हुआ

मंदिर गये मस्जिद गये पीरों फ़कीरों से मिले
इक उस को पाने के लिये क्या क्या किया क्या क्या हुआ

शायद इसे भी ले गये अच्छे दिनों के क़ाफ़िले
इस बाग़ में इक फूल था तेरी तरह हँसता हुआ

अनमोल मोती प्यार के, दुनिया चुरा के ले गई
दिल की हवेली का कोई दरवाज़ा था टूटा हुआ

Sikandar_Khan
26-03-2011, 05:17 PM
अनमोल अपने आप से कब तक लड़ा करें
जो हो सके तो अपने भी हक़ में दुआ करें

हम से ख़ता हुई है कि इंसान हैं हम भी
नाराज़ अपने आप से कब तक रहा करें

अपने हज़ार चेहरे हैं, सारे हैं दिलनशीं
किसके वफ़ा निभाएं हम किससे जफ़ा करें

नंबर मिलाया फ़ोन पर दीदार कर लिया
मिलना सहल हुआ है तो अक्सर मिला करें

तेरे सिवा तो अपना कोई हमज़ुबां नहीं
तेरे सिवा करें भी तो किस से ग़िला करें

दी है कसम उदास न रहने की तो बता
जब तू न हो तो कैसे हम ये मोजिज़ा करें

Sikandar_Khan
26-03-2011, 05:51 PM
सौदा' गिरफ़्ता-दिल को न लाओ सुख़न के बीच
जूँ-ग़ुँचा सौ ज़बान है उसके दहन के बीच

पानी हो बह गये मिरे आज़ा नयन की राह
बाक़ी है जूँ-हुबाब नफ़स पैरहन के बीच

जिनने न देखी हो शफ़क़े-सुब्ह की बहार
आकर तेरे शहीद को देखे कफ़न के बीच

वो ख़ारे-सुर्ख़-रू नहीं अहले-जुनूँ के पास
पाबोस को मिरी जो न पहुँचा हो बन के बीच

आतिशकदे में देख कि शोला है बेक़रार
आराम दिलजलों को नहीं है वतन के बीच

बाद-अज़-शबाब हों तिरी अँखियाँ ज़ियादा मस्त
होता है ज़ोरे-कैफ़ शराबे-कुहन के बीच

'सौदा' मैं अपने यार से चाहा कि कुछ कहूँ
वैसी की इक निगह कि रही मन की मन के बीच

शब्दार्थ:
सुख़न = बातचीत ;जूँ-ग़ुँचा = कली की तरह ;दहन = मुँह ;आज़ा = अंग ;जूँ-हुबाब = बुलबुले की तरह ;नफ़स = साँस ;पैरहन = वस्त्र ;शफ़क़े-सुब्ह = उषा ;ख़ारे-सुर्ख़-रू = लाल हो चुका काँटा; पाबोस = पाँव चूमने के लिए ;बाद-अज़-शबाब = जवानी आने के बाद ;ज़ोरे-कैफ़ = मस्ती का ज़ोर ;शराबे-कुहन = पुरानी शराब

Sikandar_Khan
26-03-2011, 06:45 PM
'मोमिन' सू-ए-शर्क़ उस बुते-क़ाफ़िर का तो घर है
हम सिजदा किधर करते हैं और का'बा किधर है

हसरत अगर मैं देखूँ तो फ़लक़ क्योंकर न हो राम
उस नरगिसे-जादू को निगह पेशे-नज़र है

ख़त की मुझे क़ासिद को है ईनाम की ख़ाहिश
मैं दस्तनिगर1 ख़ुद हूँ, वह क्या दस्तनिगर है

अरमान निकलने दे बस ऐ बीमे-नज़ाकत2
हाँ हाथ तसव्वुर में मेरा ज़ेरे-कमर है

रिन्दों पे यह बेदाद ख़ुदा से नहीं डरता
ऐ मुहतसिब ऐसा तुझे क्या शाह का डर है

ऐसे दमे-आराम असर-ख़ुफ़्ता3 कब उठा
हमको अबस उम्मीद दुआहाए-सहर है

हम हाल कहे जायेंगे सुनिये कि न सुनिये
इतना ही तो याँ सुहबते-नासेह का असर है

वह ज़िबह करें और यहाँ जान फ़िदा हो
ऐसे से निभे यूँ यह हमारा ही जिगर है

अब नहीं जाती तेरे आ जाने की उम्मीद
गो फिर गयीं आँखें पर निगाह जानिबे-दर है

शब्दार्थ:
1. निर्धन, 2. नरमी का डर, 3. सुप्त प्रभाव

Sikandar_Khan
26-03-2011, 06:52 PM
हाथ में लेकर खड़ा है बर्फ़ की वो सिल्लियाँ
धूप की बस्ती में उसकी हैं यही उपलब्धियाँ

आसमा की झोपड़ी में एक बूढ़ा माहताब
पढ़ रहा होगा अँधेरे की पुरानी चिट्ठियाँ

फूल ने तितली से इकदिन बात की थी प्यारकी
मालियों ने नोंच दीं उस फूल की सब पत्तियाँ

मैं अंगूठी भेंट में जिस शख़्स को देने गया
उसके हाथों की सभी टूटी हुई थी उँगलियाँ

Sikandar_Khan
27-03-2011, 02:38 PM
अभी तो मै जवान हू !

हवा भी खुशगवार है गुलो पे भी निखार है
तरन्नुम हजार है बहार पुरबहार है

कहा चला है साक़िया
इधर तो लौट इधर तो आ
अरे ये देखता है क्या
उठा सुबू, सुबू उठा

सुबू उठा, प्याला भर, प्याला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र समा तो देख बेखबर

वो काली-काली बदलिया
उफक पे हो गई अया
वो एक हुजुमे-मैकशा
है सु-ए-मैकदा रवा

ये क्या गुमा है बदगुमा समझ न मुझको नातुवा

खयाले-जुहद अभी कहा
अभी तो मै जवान हू

न ग़म कशुदो-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बुद का न हस्त का न वादा-ए-असस्त का

उमीद और यास गुम
हवास गुम कयास गुम
नज़र से आस-पास गुम
हमा, बजुज़ गिलास गुम

न मय में कुछ कमी रहे कदह से हमदमी रहे
नशिस्त ये ज़मी रहे यही हुमाहुमी रहे

वो राग छेड़ मुतरिबा
तरबफज़ा, अलमरुबा
असर सदा-ए-साज का
जिगर में आग दे लगा

हर एक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया

पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मै जवान हू
हफ़ीज़ जालंधरी

Sikandar_Khan
01-04-2011, 07:09 PM
भूल गया घर-आँगन यादों से बाहर बाज़ार हुआ
आज बहुत दिन बाद बेख़ुदी में ख़ुद का दीदार हुआ

टूट गये नाते-रिश्ते सब, चैन लूटते हाथों से
औरों की आँसुओं-भरी आँखों से कितना प्यार हुआ

लगा कि हर रस्ता अपना है हर ज़मीन है अपनी ही
अपनेपन से हरा-भरा हर दिन जैसे त्यौहार हुआ

बैठा रहा चैन से, जाते लोग रहे क्या-क्या पाने
पर जब दी आवाज़ शजर ने जाने को लाचार हुआ

कल सोचूँगा-क्या करना है, कहता रहा मेरा रहबर
बीता कितना वक़्त और यह वादा कितनी बार हुआ

ख़ुद के लिए रहे बनते तुम तरह-तरह की दीवारें
खुली हवा से बह न सके, जीवन सारा बेकार हुआ

कब तक फैलाते जाओगे सौदे वहशी ख़्वाबों के
तुम भी अब दूकान समेटो, शाम हुई अंधियार हुआ

आओ थोड़ा वक़्त बचा है साथ-साथ हँस लें, गालें
लेन-देन का हिसाब जो हुआ सो मेरे यार हुआ

Sikandar_Khan
01-04-2011, 07:11 PM
कुछ अपनी कही आपकी कुछ उसकी कही है
पर इसके लिए यातना क्या-क्या न सही है
भटका कहाँ-कहाँ अमन-चैन के लिए
थक-थक के मगर घर की वही राह गही है
दस्तक दी किसी दर पे बयांबां में रात को
आवाज़-सी आदमी कि यहाँ कोई नहीं है
कुछ ख़्वाब रचे रात में की दिन से गुफ़्तगूं
बस मेरे सफ़र की यही सौग़ात रही है
तोड़ा है अब भी देवता पत्थर का किसी ने
लोगों ने कहा भागने पाय न, यही है
खोजो न इसमें दोस्तों बाज़ार की हँसी
गाता है इसमें दर्द, ये शायर की बही है
तुम लाख छिपाओ रहबरी आवाज़ में मगर
झुलसी हुई बस्ती ने कहा ये तो वही है
आँगन में सियासत की हँसी बनती रही मीत
अश्कों से अदब के वो बार-बार ढही है

Sikandar_Khan
01-04-2011, 07:12 PM
इस हाल में जाने न कैसे रह रहीं ये बस्तियाँ,
सुनता नहीं ऊपर कोई, कुछ कह रहीं ये बस्तियाँ

रोटी नहीं, पानी नहीं, अपने नहीं, सपने नहीं
वादे सियासत के कभी से सह रहीं ये बस्तियाँ

गर एक चिंगारी उठी तो ये धधक कर जल उठीं,
यदि टूट कर पानी गिरा तो बह रहीं ये बस्तियाँ

कोई सहारा है नहीं, मासूम लावारिस हैं ये
हैं लड़खड़ा कर उठ रहीं फिर ढर रहीं ये बस्तियाँ

ख़ामोश-सी लगतीं मगर विस्फोट होगा एक दिन
ज्वालामुखी-सी खुद के अंदर दहक रहीं ये बस्तियाँ

Sikandar_Khan
01-04-2011, 07:14 PM
आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा
सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा
आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में
हो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगा
था पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिन
हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा
लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे
आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा
क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर
चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगा
ख़ून से लथपथ हवाएँ ख़ौफ-सी उड़ती रहीं
आँसुओं से नम मिली वातास तो अच्छा लगा
है नहीं कुछ और बस इंसान तो इंसान है
है जगा यह आपमें अहसास तो अच्छा लगा
हँसी हँसते हाट की इन मरमरी महलों के बीच
हँस रहा घर-सा कोई आवास तो अच्छा लगा
रात कितनी भी धनी हो सुबह आयेगी ज़रूर
लौट आया आपका विश्वास तो अच्छा लगा
आ गया हूँ बाद मुद्दत के शहर से गाँव में
आज देखा चँदनी का हास तो अच्छा लगा
दोस्तों की दाद तो मिलती ही रहती है सदा
आज दुश्मन ने कहाशाबाश तो अच्छा लगा

Sikandar_Khan
07-04-2011, 03:21 PM
इब्*न-ए मर्*यम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

शर`-ओ-आईन पर मदार सही
ऐसे क़ातिल का क्*या करे कोई

चाल जैसे कड़ी कमान का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई

बात पर वां ज़बान कट्*ती है
वह कहें और सुना करे कोई

बक रहा हूं जुनूं में क्*या क्*या कुछ
कुछ न सम्*झे ख़ुदा करे कोई

न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई

रोक लो गर ग़लत चले कोई
बख़्*श दो गर ख़ता करे कोई

कौन है जो नहीं है हाजत-मन्*द
किस की हाजत रवा करे कोई

क्*या किया ख़िज़्*र ने सिकन्*दर से
अब किसे रह-नुमा करे कोई

जब तवक़्*क़ु` ही उठ गई ग़ालिब
क्*यूं किसी का गिला करे कोई

मिर्ज़ा ग़ालिब

Sikandar_Khan
07-04-2011, 03:25 PM
दर्द कभी बेजुबां नहीं होता
अनकही दास्ताँ नहीं होता
अश्क जब बेतरह छलकते हैं-
तो अफसाना बयां नहीं होता ?
मुस्कराके यूँ गम छिपाना क्या;
खुशनुमा गीत गुनगुनाना क्या !
दिल की गहराई में दफ़न होकर,
कोई जज्बा फ़ना नहीं होता
लौ उम्मीदों की थरथराती है
आरजू है -मचल ही जाती है
ऐसे ख्वाबों को पंख मत देना-
जिनका कोई आसमां नहीं होता
उनकी कातिल अदा को क्या कहिये
दोस्ती और जफा को क्या कहिये!
लब पे ठहरे हुए पयामों का
उनको कुछ भी गुमां नहीं होता
आँख हमसे चुराने वाले सुन
हमको संगदिल बुलाने वाले सुन
आग जो खुद लगाये जाते हो
ये न कहना, धुआं नहीं होता

जिया उल हक
08-04-2011, 04:36 AM
ख्वाहिशें, टूटे गिलासों सी निशानी हो गई
जिदंगी जैसे कि, बिधवा की जवानी हो गई
कुछ नया देता तुझे ए मौत
मैं पर क्या करू
जिंदगी की शक्ल भी बरसों पुरानी हो गई
मैं अभी कर्ज-ए-खिलौनों से उबर पाया नही
लोग कहते हैं तेरी गुड़िया शयानी हो गई
आओ हम मिलकर इसे खाली करे और फिर भरे
सोच जेहनो में नए मटके का पानी हो गई

दुश्मनी हर दिल में जैसे कि किसी बच्चे की जिद
दोस्ती दादा के चश्मे की कमानी हो गई
मई के सूरज की तरह, हर रास्तों की फितरतें
मन्जिलें बचपन की परियों की कहानी हो गई |

Sikandar_Khan
08-04-2011, 11:45 AM
तुम जमाना-आशना, तुमसे जमाना ना-आशना
और हम अपने लिए भी अजनबी, ना-आशना

रास्ते भर कि रिफाक़त भी बहुत है जानेमन
वरना मंजिल पर पहुच कर कौन किसका आशना

मुद्दते गुजरी इसी बस्ती में लेकिन अब तलक
लोग नावाकिफ, फ़ज़ा बेगाना, हम ना-आशना

हम भरे शहरो में भी तन्हा है जाने किस तरह
लोग वीराने में भी पैदा कर लेते है आशना

अपनी बर्बादी पे कितने खुश थे हम लेकिन फ़राज़
दोस्त दुश्मन का निकल आया है अपना आशना
अहमद फ़राज़

मायने
आशना=जान-पहचान वाला, जमाना-आशना=ज़माने को समझाने वाले, मौका परस्त, रिफाक़त=साथ

saajid
08-04-2011, 12:10 PM
एक अदनी सी शायरी मेरी भी
उलझा दिया दीमक ने ये किसी शरारत की ,
कागज़ तो नहीं चाटा , तहरीर मिटा दी है/

Sikandar_Khan
11-04-2011, 09:21 AM
सबकी हालत एक है नादा
कौन है गमगी, कौन है शादाँ

उसका पाना है वह करिश्मा
सोच तो मुश्किल, देख तो आसा

बादाकशो को फिक्र है जिसकी
बादा न सागर, बर्क न बारां

दुनिया को दुनिया करना है
ये मनसूबे, साज न सामां

ढूंढ़ ले मुझको दुनिया-दुनिया
सहारा-सहरा, जिन्दा-जिन्दा

उम्र 'फ़िराक' ने युही बसर की
कुछ गेम जाना, कुछ गमे दौरा
फ़िराक गोरखपुरी
मायने
शादाँ=खुश, बादाकश=शराब पीने वाले, साग़र=जाम, बर्क=बिजली, बारां=बारिश, सहारा=रेगिस्तान, जिन्दा=कैदखाना

Sikandar_Khan
11-04-2011, 09:26 AM
जिधर आँख पड़ती है , तू रूबरू है
तेरा जलवा सब में है सब जाय तू है

मेरी चश्म में क्या है? तेरा तसव्वुर
मेरे दिल में क्या है? तेरी आरजू है

बदन में महक है तेरे यासमन की
तेरे जुल्फे-मुशकि में अंबर की बू है

सादा पर्दा-ए-साज की यह नहीं है
कोई परदे में कर रहा गुफ्तगू है

कोई छूटता है यह दामन से कातिल
शहीदे-मुहब्बत का आखिर लहू है

'जफ़र' आपको ढूंढ़ मत ढूंढ़ उसको
वह तुझमे है, जिसकी तुझे जुस्तजू है
- बहादुर शाह जफ़र
मायने
जाय=जगह, चश्म=आँख, तसव्वुर=कल्पना, यासमन=चमेली, जुल्फे-मुशकि=खुशबूदार जुल्फे, अंबर=खुशबू, पर्दा-ए-साज=साज का पर्दा, जुस्तजू=तलाश, खोज

Sikandar_Khan
14-04-2011, 10:14 AM
इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ

बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

Sikandar_Khan
19-04-2011, 01:55 AM
अनमोल अपने आप से कब तक लड़ा करें
जो हो सके तो अपने भी हक़ में दुआ करें

हम से ख़ता हुई है कि इंसान हैं हम भी
नाराज़ अपने आप से कब तक रहा करें

अपने हज़ार चेहरे हैं, सारे हैं दिलनशीं
किसके वफ़ा निभाएं हम किससे जफ़ा करें

नंबर मिलाया फ़ोन पर दीदार कर लिया
मिलना सहल हुआ है तो अक्सर मिला करें

तेरे सिवा तो अपना कोई हमज़ुबां नहीं
तेरे सिवा करें भी तो किस से ग़िला करें

दी है कसम उदास न रहने की तो बता
जब तू न हो तो कैसे हम ये मोजिज़ा करें

Sikandar_Khan
19-04-2011, 01:58 AM
आपके एक ख़याल में मिलते रहे हम आपसे
यह भी है एक सिलसिला गो कोई सिलसिला नहीं।

गर्मे-सफ़र हैं आप तो हम भी हैं भीड़ में कहीं
अपना भी काफ़िला है कुछ आप ही का काफ़िला नहीं।

दर्द को पूछते थे वो, मेरी हँसी थमी नहीं
दिल को टटोलते थे वो, मेरा जिगर हिला नहीं।

आई बहार हुस्न का ख़ाबे-गराँ लिए हुए :
मेरे चमन कि क्या हुआ, जो कोई गुल खिला नहीं।

उसने किए बहुत जतन, हार के कह उठी नज़र :
सीनए-चाक का रफ़ू हमसे कभी सिला नहीं।

इश्क़ की शाइरी है ख़ाक़, हुस्न का ज़िक्र है मज़ाक
दर्द में गर चमक नहीं, रूह में गर जिला नहीं

कौन उठाए उसके नाज़, दिल तो उसी के पास है;
'शम्स' मज़े में हैं कि हम इश्क़ में मुब्तिला नहीं।

Sikandar_Khan
14-06-2011, 09:36 PM
शीशे मे अपना चेहरा देखा तो डर गया
जीने की चाह में क्यूँ इतना मैं मर गया

ऐ ज़िन्दगी अहसास की खुशबू कहाँ गई
तेरी रगों में इतना जहर कैसे भर गया

इक दिन जो मुलाकात हुई अपने आप से
मिलते ही नज़र जाने क्यों चेहरा उतर गया


आँखों की पुतलियों ने फिर फिर किया सवाल
इक आदमी था रहता, अब वो किधर गया

आखिर में शर्मसार हुई ज़िन्दगी की रात
मुज़रिम सा मुँह छिपा के जब अपने घर गया

Sikandar_Khan
23-08-2011, 10:26 PM
अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

आँखों में जो भर लोगे, तो काँटे-से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मन्दिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

Sikandar_Khan
23-08-2011, 10:27 PM
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ
मेरा लफ़्ज़-लफ़्ज़ हो आईना तुझे आईने में उतार लूँ

मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ

अगर आसमाँ की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-क़याम[1] हो
तो मैं मोतियों की दुकान से तेरी बालियाँ तेरे हार लूँ

कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूँ गुज़र गये
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम लेके पुकार लूँ

bhavna singh
16-09-2011, 01:26 AM
जाने कितनी दूरी थी
कि उम्र भर का सफर
भी कम ही पड़ा,
जाने कितनी नजदीकी थी
कि हर पल में
हजार बार मिले भी,
इश्क की इबारत में
ये उलटफेर भी
कमाल होते हैं...

malethia
16-09-2011, 01:38 AM
चलो माना के हमने उम्र भर धोखा ही खाया है
और माना ये कि नासमझी में अक्सर ही गंवाया है
अरे तूं तो सयानी थी कदम गिन गिन के रखती थी
मगर ऐ जिंदगी ये तो बता, तूने क्या पाया है
चले आते हैं ग़म तूं ही बता हम कब बुलाते हैं
खुशी तूं क्यों नही आती तुझे अक्सर बुलाया है
नही तन के तेरे कपडे बदल डालोगे पल भर में
यूं अपनी सोच या फितरत कहाँ कोई बदल पाया है
सही या गलत से तुम को कहाँ कुछ लेना देना है
किसीकी मानने में शायद फायदा नजर आया है
तुम्हे उस पार पहुंचाने को मैं तैयार था हर दम
किनारा समझकर मझधार क्यों खुद को डुबाया है

Sikandar_Khan
17-09-2011, 12:46 PM
किसी को हमने याँ अपना ना पाया जिसे पाया उसे बेगाना पाया
कहाँ ढूँढ़ा उसे किस जा ना पाया कोई पर ढूँढ़ने वाला न पाया

उड़ा कर आशियाँ सरसर ने मेरा किया साफ़ इस क़दर तिनका न पाया
से पाना नहीं आसॉं, कि हमने न जब तक आपको खोया, न पाया

दवाए-दर्दे-दिल मैं किस से पूछूँ तबीबे-इश्*क़ को ढूँढा न पाया
बहादुर शाह ज़फ़र

Sikandar_Khan
24-09-2011, 11:48 PM
अक्स निशाने पर था रक्खा किसी और का,
शीशा टूट-टूट कर बिखरा किसी और का।


दरवाजे पर देख मुझे मायूस हुए वो,
शायद उनको इंतज़ार था किसी और का।


बहुत दिनों के बाद कहीं से ख़त इक आया,
नाम मगर उस पर लिक्खा था किसी और का।


यादों का इक रेला मन को तरल कर गया,
आंचल भिगो रहा अब होगा किसी और का।


दोस्त हमारे कतरा कर यूं निकल गए,
मेरा चेहरा समझा होगा किसी और का।


जब दीवारें अपनेपन के बीच खड़ी हों,
अपना आंगन लगने लगता किसी और का।


सुबह धूप का टुकड़ा उतरा देहरी पर,
रुका नहीं वह मेहमान था किसी और का।

Sikandar_Khan
25-09-2011, 01:38 AM
एक दिया तो जल जाने दे,
सूरज को कुछ सुस्ताने दे।


पलट रहा क्यूं आईने को,
जो सच है वो दिखलाने दे।


एक सिरा तो थामो तुम भी,
उलझा है जो सुलझाने दे।


चिंगारी रख ऐसी दिल में,
अंगारों को शरमाने दे।


कैद न कर पंछी पिंजरे में,
उसे मुक्ति का सुर गाने दे।


यादें, इतनी जल्दी न जा,
आंखों को तो भर जाने दे।


बादल हूं बरसूंगा, पहले
परवत से तो टकराने दे।

Sikandar_Khan
12-10-2011, 06:14 PM
काश वो दौर लौट कर आए
आदमीयत जहाँ मे छा जाए
अहले महफिल उदास बैठे हैँ
जांफिजां गीत कोई तो गाए
मै भला और घर भला मेरा
कब तलक इस कदर जिया जाए
वक्ते रूख्सत मै देख लूं उसको
जाए कोई उसे बुला लाए
शाम होने लगी परीशां अब
दिल जला ताकी कुछ कहा जाए

Sikandar_Khan
31-10-2011, 06:01 PM
तुम जमाना-आशना, तुमसे जमाना ना-आशना
और हम अपने लिए भी अजनबी, ना-आशना
रास्ते भर कि रिफाक़त भी बहुत है जानेमन
वरना मंजिल पर पहुच कर कौन किसका आशना
मुद्दते गुजरी इसी बस्ती में लेकिन अब तलक
लोग नावाकिफ, फ़ज़ा बेगाना, हम ना-आशना
हम भरे शहरो में भी तन्हा है जाने किस तरह
लोग वीराने में भी पैदा कर लेते है आशना
अपनी बर्बादी पे कितने खुश थे हम लेकिन फ़राज़
दोस्त दुश्मन का निकल आया है अपना आशना
अहमद फ़राज़

Sikandar_Khan
31-10-2011, 06:03 PM
है मश्क़े-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी
चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
शिकवा-ए-ग़म तेरे हुज़ूर किया
रोशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
हसरत मोहानी

Sikandar_Khan
04-12-2012, 07:31 PM
अजब मौसम है, मेरे हर कद़म पे फूल रखता है
मुहब्बत में मुहब्बत का फरिश्ता साथ चलता है
मैं जब सो जाऊं, इन आंखों पे अपने होठ रख देना
यक़ीं आ जायेगा, पलकों तले भी दिल धड़कता है
हर आंसू में अकसर कोई तसवीर झिलमिलाती है
तुम्हें आंखें बतायेंगी, दिलों में कौन जलता है
बहुत से काम रुक जाते हैं, मैं बाहर नहीं जाता
तुम्हारी याद का मौसम कहां टाले से टलता है
मुहब्बत ग़म की बारिश हैं, ज़मीं सर-सब्ज होती है
बहुत से फूल खिलते हैं, जहां बादल बरसता है
बशीर बद्र

rajnish manga
04-12-2012, 10:25 PM
[QUOTE=Sikandar_Khan;28906]

जो नहीं है अपना उस पर ध्यान क्यों है
जो है पास में वो कब तक रहने वाला है ...

बाज़ार में शौहरत का खिलौना लेकर घूमने वाले
यह नहीं जानते कब वह टूटके बिखरने वाला है ...

:gm:
सिकंदर जी, आप की शायरी का रंग देख कर दंग रह गया हूँ. विलम्ब से विज़िट कर पाया, क्षमा चाहता हूँ. इधर काफी अरसे से आपकी कोई कविता सामने नहीं आयी. आपसे अनुरोध है कि इस सिलसिले को अवश्य आगे बढ़ाएँ.

Sikandar_Khan
04-12-2012, 11:07 PM
[QUOTE=Sikandar_Khan;28906]

जो नहीं है अपना उस पर ध्यान क्यों है
जो है पास में वो कब तक रहने वाला है ...

बाज़ार में शौहरत का खिलौना लेकर घूमने वाले
यह नहीं जानते कब वह टूटके बिखरने वाला है ...

:gm:
सिकंदर जी, आप की शायरी का रंग देख कर दंग रह गया हूँ. विलम्ब से विज़िट कर पाया, क्षमा चाहता हूँ. इधर काफी अरसे से आपकी कोई कविता सामने नहीं आयी. आपसे अनुरोध है कि इस सिलसिले को अवश्य आगे बढ़ाएँ.

रजनीश साहब ! आपकी जर्रेनवाजिश का शुक्रिया ! यहाँ पर एक गलती हो गई ! ये मेरी गज़ल नही है |

Sikandar_Khan
07-12-2012, 08:51 PM
शाम से रास्ता तकता होगा
चांद खिड़की में अकेला होगा
धूप की शाख़ पे तनहा-तनहा
वह मुहब्बत का परिंदा होगा
नींद में डूबी महकती सांसें
ख़्वाब में फूल-सा चेहरा होगा
बशीर बद्र

Sikandar_Khan
07-12-2012, 08:53 PM
मुझको अपनी नज़र ऐ ख़ुदा चाहिए
कुछ नहीं और इसके सिवा चाहिए
एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊंगा
ज़िन्दगी मुझको तेरा पता चाहिए
इस ज़माने ने लोगों को समझा दिया
तुमको आँखें नहीं, आईना चाहिए
तुमसे मेरी कोई दुश्मनी तो नहीं
सामने से हटो, रास्ता चाहिए
बशीर बद्र

abhisays
07-12-2012, 09:05 PM
बहुत ही खुबसूरत गजले हैं सिकंदर जी।

Sikandar_Khan
07-12-2012, 09:31 PM
बहुत ही खुबसूरत गजले हैं सिकंदर जी।

सब कॉपी पेस्ट का कमाल है |

rajnish manga
15-12-2012, 11:16 PM
सब कॉपी पेस्ट का कमाल है |

:gm:

ये शाहकार गजलें मोतियों और हीरों से बढ़ कर हैं. जिस प्रकार मोतियों के लिये समुद्र के गहरे पानी में उतरना पड़ता है और हीरों के लिये धरती का सीना चीरना पड़ता है ठीक उसी प्रकार नायाब गज़लों की खोज करने के लिये भी अथक परिश्रम की दरकार है. यह आपकी विनम्रता है जो आप इसे कॉपी पेस्ट का कमाल कह कर दोस्तों को निरुत्तर कर देते हैं. हम आपके इस जज्बे को सलाम करते हैं.

Sikandar_Khan
15-12-2012, 11:58 PM
:gm:

ये शाहकार गजलें मोतियों और हीरों से बढ़ कर हैं. जिस प्रकार मोतियों के लिये समुद्र के गहरे पानी में उतरना पड़ता है और हीरों के लिये धरती का सीना चीरना पड़ता है ठीक उसी प्रकार नायाब गज़लों की खोज करने के लिये भी अथक परिश्रम की दरकार है. यह आपकी विनम्रता है जो आप इसे कॉपी पेस्ट का कमाल कह कर दोस्तों को निरुत्तर कर देते हैं. हम आपके इस जज्बे को सलाम करते हैं.

रजनीश जी ! जर्रेनवाज़िश के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया |

bindujain
27-12-2012, 06:20 AM
जितनी बुरी कही जाती है
उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद
तुमसे मिली नहीं है दुनिया

चार घरों के एक मुहल्ले
के बाहर भी है आबादी
जैसी तुम्हें दिखाई दी है
सबकी वही नहीं है दुनिया

घर में ही मत इसे सजाओ,
इधर-उधर भी ले के जाओ
यूँ लगता है जैसे तुमसे
अब तक खुली नहीं है दुनिया

भाग रही है गेंद के पीछे
जाग रही है चाँद के नीचे
शोर भरे काले नारों से
अब तक डरी नहीं है दुनिया

-निदा फ़ाज़ली

jai_bhardwaj
27-12-2012, 08:36 PM
बहुत ही आकर्षक संग्रह है सिकंदर भाई। हार्दिक अभिनन्दन बन्धु।

abhisays
27-12-2012, 09:09 PM
सिकंदर जी, बहुत अच्छा सूत्र है, इसको आगे बढ़ाइए। :bravo::bravo::bravo:

jai_bhardwaj
28-12-2012, 07:44 PM
उसे तो खो ही चुके, फिर क्या ख़याल उसका
ये फ़िक्र किसे कि अब होगा क्या हाल उसका

वो एक शख्स जिसे खुद ही छोड़ बैठे थे
करके करना अब किस खातिर मलाल उसका

ये सोच कर न मिले फिर उसे कभी 'खालिद'
ना जाने होगा शर्मोहया से क्या हाल उसका

-खालिद शरीफ

jai_bhardwaj
28-12-2012, 07:58 PM
वो क्या दिन थे जब इक लडकी मेरे ख़्वाबों में रहती थी
वह मेरे साथ रोती थी, वह मेरे साथ हँसती थी

लिपट जाती थी मुझसे वह, मैं जब घर में कदम रखता
कहीं भी जब मैं जाता तो, वह रास्ता रोक लेती थी

वो कहती थी मोहब्बत का कोइ मौसम नहीं होता
वो सुबहोशाम मुहब्बत के सुनहरे ख्वाब बुनती थी

हम अक्सर चाँदनी रातों में सहरा की तरफ जाते
वो भीगी रेत पर मेरा और अपना नाम लिखती थी

वो दरिया के किनारे बैठ जाती थी कभी जाकर
मुझे उस वक्त सोहणी की तरह वो सच्ची लगती थी

बिछड़ जाने का उसके दिल में इक धड़का सा रहता था
वो मेरा हाथ गहरी नींद में भी थामे रखती थी

-हसन अब्बासी

bindujain
28-12-2012, 08:05 PM
एक बराह्मण ने कहा कि ये साल अच्छा है
ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तो
आग चुल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो
भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा
चैन की नींद हर इक शख्स़ यहां सोएगा
आंधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरस
प्यार की फ़सल उगाएगी जमीं अब के बरस
है यहीं अब न कोई शोर-शराबा होगा
ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा
ओस और धूप के सदमें न सहेगा कोई
अब मेरे देश में बेघर न रहेगा कोई

नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है

दिल के ख़ुश रखने को गा़लिब ये ख़याल अच्छा है

bindujain
28-12-2012, 08:09 PM
तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा,
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा,

जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह,
याद थे मुझको जो पैगाम-ऐ-जुबानी की तरह,
मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह,

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे,
सालाहा-साल मेरे नाम बराबर लिखे,
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे,

तेरे खुशबु मे बसे ख़त मैं जलाता कैसे,
प्यार मे डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे,
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे,

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ,[/center][/center]

bindujain
28-12-2012, 10:35 PM
सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं ,
जिसको देखा ही नहीं उसको खुदा कहते हैं !

फासले उम्र के कुछ और बड़ा देती है ,
जाने क्यों लोग उसे फिर भी दावा कहते हैं !

चंद्द मासूम से पत्तों का लहू है `फाकिर',
जिसको महबूब के हाथों की हीना कहते हैं !


सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं ,
जिसको देखा ही नहीं उसको खुदा कहते हैं !


- सुदर्शन फाकिर

bindujain
29-12-2012, 07:12 PM
क्या खबर थी इस तरह से वो जुदा हो जाएगा,
ख्वाब में भी उसका मिलना ख्वाब सा हो जाएगा,

ज़िन्दगी थी क़ैद हम-में क्या निकालोगे उसे,
मौत जब आ जायेगी तो खुद रिहा हो जाएगा,

दोस्त बनकर उसको चाहा ये कभी सोचा न था,
दोस्ती ही दोस्ती में वो खुदा हो जाएगा,

उसका जलवा होगा क्या जिसका के पर्दा नूर है,
जो भी उसको देख लेगा वो फ़िदा हो जाएगा..

bindujain
29-12-2012, 07:13 PM
खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे,
के अपने सिवा कुछ दिखाई न दे,

खतावार समझेगी दुनिया तुझे,
के इतनी जियादा सफाई न दे,

हंसो आज इतना के इस शोर में,
सदा सिसकियों की सुनायी न दे,

अभी तो बदन में लहू है बहुत,
कलम छीन ले रोशनाई न दे,

खुदा ऐसे एहसास का नाम है,
रहे सामने और दिखाई न दे..

bindujain
29-12-2012, 07:14 PM
ना मुहब्बत ना दोस्ती के लिए,
वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए,

दिल को अपने सज़ा न दे यूं ही,
सोच ले आज दो घडी के लिए,

हर कोई प्यार ढूढता है यहाँ,
अपनी तन्हा सी ज़िंदगी के लिए,

वक़्त के साथ साथ चलता रहे,
यही बेहतर है आदमी के लिए..

bindujain
29-12-2012, 11:38 PM
http://1.bp.blogspot.com/-nZdSbl0y_7c/Tbme_DhZNoI/AAAAAAAAEfI/ifwB4MJc-S0/s1600/naya_saal.gif

bindujain
02-01-2013, 05:30 PM
रंजिश ही सही , दिल ही दुखाने के लिए आ ,

आ फिर से मुझे छोर के जाने के लिए आ .

पहले से मरासिम न सही , फिर भी कभी तो

रस्मो रही दुनिया ही निभाने के लिए आ .

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम ?

तू मुझसे खफा है तो ज़माने के लिए आ .

जैसे तुझे आते हैं , न आने के बहाने ,

वैसे ही किस i रोज़ न जाने के लिए आ .

jai_bhardwaj
19-08-2014, 02:35 PM
इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ
मेरा वसूल है, पहले सलाम करता हूँ
मुखालफत से मेरी शख्सियत निखरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूँ
मैं डर गया हूँ बहुत सायादार पेड़ों से
ज़रा सी धूप बिछा कर कय्याम करता हूँ
मुझे खुदा ने ग़ज़ल का दयार बख्शा है
ये सल्तनत मैं मुहब्बत के नाम करता हूँ
-बशीर बद्र

jai_bhardwaj
19-08-2014, 02:37 PM
अब तेरी याद से वहशत नहीं होती मुझको
ज़ख्म खुलते हैं, अज़ीयत नहीं होती मुझको

अब कोई आये चला जाए, मैं खुश रहता हूँ
अब किसी शख्स की आदत नहीं होती मुझको

ऐसे बदला हूँ तेरे शहर का पानी पी कर
झूठ बोलूं तो नदामत नहीं होती मुझको

है अमानत में खयानत जो किसी की खातिर
कोई मरता है तो हैरत नहीं होती मुझको

इतना मसरूफ हूँ जीने की हवस में "मोहसिन"
सांस लेने की भी फुर्सत नहीं होती मुझको

-मोहसिन नक़वी

jai_bhardwaj
19-08-2014, 02:38 PM
उसका चेहरा भी सुनाता है कहानी उसकी
चाहती हूँ कि सुनूं उस से जबानी उसकी

वो सितमगर है तो अब उससे शिकायत कैसी
ये सितम करना भी आदत है पुरानी उसकी

उस जफ़ाकार को मालुम नहीं कि वो क्या है
बे-मुरव्वत को तस्वीर है दिखानी उसकी

एक वो है नज़र अंदाज करे है मुझको
इक मैं हूँ कि दिलोजान से दीवानी उसकी

तुझको उल्फत है "क़मर" उससे तो अब कह देना
सामने सब के सुना देना कहानी उसकी

- रेहाना क़मर

jai_bhardwaj
19-08-2014, 02:39 PM
लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

मैं न जुगनू हूँ न दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त'आल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का सम्भलने के लिए
और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यों हैं

- राहत इन्दोरी

rajnish manga
20-08-2014, 12:33 AM
ग़ ज़ ल
शायर: कैसर-उल-जाफ़री

जहां शिकस्ते-मुसाफ़त है पाँव धरना भी
मुझे वहीँ पे उतरना पड़ा ठहरना भी

दुआ करो, मिरी खुशबू पे तब्सिरा न करो
कि एक रात में खिलना भी था, बिखरना भी

तुम इतनी देर लगाया करो न आने में
कि भूल जाये कोई इंतज़ार करना भी

तेरी गली से जो गुज़रे तो आँख भर आई
भुला चुके हैं दरीचे सलाम करना भी

तुम इतने दिन तो मुहब्बत से जी लिए कैसर
जो हो सके तो सलीके के साथ मरना भी

(शिकस्ते-मुसाफ़त = सफ़र रोकना / तबसिरा = समीक्षा / दरीचे = खिड़कियाँ)

rajnish manga
20-08-2014, 12:40 AM
ग़ज़ल
अदम गोंडवी

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये.

jai_bhardwaj
22-08-2014, 01:10 PM
छोटी सी बे-रूखी पे शिकायत की बात है
और वो भी इसलिए कि मुहब्बत की बात है

मैंने कहा कि आये हो कितने दिनों के बाद
कहने लगे, हुज़ूर ये फुरसत की बात है

मैंने कहा कि मिल के भी हम क्यों न मिल सके
कहने लगे, हुज़ूर ये किस्मत की बात है

मैंने कहा कि रहते हो हर बात पर ख़फ़ा
कहने लगे, हुज़ूर ये ग़ुरबत की बात है

मैंने कहा कि देते हैं दिल, तुम भी लाओ दिल
कहने लगे कि यह तो तिज़ारत की बात है

मैंने कहा कभी है सितम और कभी करम
कहने लगे कि ये तो तबियत की बात है

(तिज़ारत = व्यापार/लेनदेन)

-क़मर जलालाबादी

jai_bhardwaj
22-08-2014, 01:12 PM
है सारे जग का तू दाता, ये जिम्मा ले लिया तूने
मगर जो जिसके का काबिल है, वही उसको दिया तूने

किसी को दे के दौलत तूने, उसकी छीन ली नींदे
किसी को मुफलिसी देकर भरोसा दे दिया तूने

किसी को इश्क दे कर तूने दुनिया लूट ली उसकी
किसी को सब्र देकर सारा आलम दे दिया तूने

मैं अपनी जात पर जब गौर करता हूँ तो कहता हूँ
बहुत कम के मैं काबिल था, बहुत कुछ दे दिया तूने

- क़मर जलालाबादी

rajnish manga
23-08-2014, 01:22 AM
एक महान शायर का दिल को छू लेने वाला कलाम प्रस्तुत करने के लिये आपका धन्यवाद.