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View Full Version : कतरनें


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Dark Saint Alaick
20-10-2011, 05:03 PM
मित्रो ! एक नया सूत्र शुरू कर रहा हूं ! शीर्षक से आपने शायद अंदाजा लगा लिया होगा ! क्या ... नहीं ? लीजिए, मैं ही स्पष्ट कर देता हूं ! इस सूत्र में मेरा कुछ नहीं होगा ! नेट पर इधर-उधर विचरण करते हुए जो कुछ श्रेष्ठ, मनमोहक, पठनीय और रोचक प्रतीत होगा: उसे यहां प्रस्तुत कर दूंगा ! बस, यही इस सूत्र में मेरा योगदान होगा ! ... तो शुरू करते हैं कतरनें एकत्र करने की यात्रा !

Dark Saint Alaick
20-10-2011, 05:07 PM
सफेद बालों वाली धूप

-पृथ्वी

धूप इन दिनों अपने बालों में फागुन की मेहंदी लगाकर आसमान की छत पर बैठी रहती है ! सहज स्मित के साथ ! सफेद होती लटों के बारे में सोचकर मंद मंद मुस्कुराते, यादों के गन्ने चूसते हुए ! यादें, जिनमें आज भी गुड़ की मिठास और धनिए की कुछ महक बाकी है !

यह थार की धूप है; जिसकी यादों में मावठ अब भी हौले-हौले बरसती है ! सपने नम- नरम बालू को चूमते हुए उड़ते हैं ! हौसले हर दसमी या पून्यू (पूर्णिमा) को पांच भजन पूरते हैं ! आसमान के चौबारे पर खड़ी फागुन की यह धूप देखती है सरसों की पकती बालियों को, चने के किशोर खेतों को, गेहूं के संदली जिस्म को ! किसान को, जिसके मेहनती बोसों, आलिंगनों, उच्छवासों ने खेतों को नख-शिख इतना सुंदर बना दिया है !

यह सोचते ही धूप खिलखिला पड़ती है और यूं ही मेहंदी के कुछ अनघड़ टुकड़े नीचे गिरते हैं और गेहूं के कई खेत मुस्कुराकर धानी हो जाते हैं ! माघ-फागुन की धूप कुछ यूं ही, टुकड़ों टुकड़ों में खेतों को पकाती है !

धूप को पता है कि यही मौसम है, जब प्रेम और मेहनत की कहानियां परवान चढ़नी हैं ! प्रेम खेतों का फसलों से, प्रेम धरा का मेह से, प्रेम हवाओं का खुशबुओं से और मेहनत किसान की ! मेहनत की कहानी खेत से शुरू होती है तो फसल, खलिहान और मंडी पर आकर समाप्त होती है ! या यूं कहें कि नए रूप में शुरू हो जाती है ! सपनों की कुछ किताबें झोले में आती हैं, नये जीवन की हल्दी हाथों पर रचती है और जीवन यूं ही चलता रहता है ज्यूं फागुन की धूप अपने मेहंदी लगे बालों को सुखाती है !

धूप के रेशमी बालों की कालस या घना काला रंग कोहरे, धुंध और बादलों की तरह उड़ता जा रहा है ! दूर देस से आये पखेरूओं की तरहां; यही कोमल गेसू आने वाले महीनों में जेठ की आंधियों से उलझे और रुखे हो जाने हैं यह बात धूप को भी पता है पर फिलहाल तो वह जीवन के इस मोड़ का आनंद ले रही है, जब मौसम बहुत नरम, नम और हरा है ! सफेद बालों वाली धूप, आजकल अपनी सांसों से लिपट गए मौसमों को जीती है !

Dark Saint Alaick
20-10-2011, 05:53 PM
ख्यालों के बेबहर पंछियों की बेतरतीब उड़ान .... बतकही यूँ भी !


उस दिन किस बारीकी से दिल का वह बंद कोना छुआ तुमने कि कोई सोया दर्द फिर से जाग उठा ...जब तुमने कहा कि कुछ घाव जो सूखे बिना भर जाते हैं, जीवन भर तकलीफ देते हैं और वह अपने पैरों की एडी में छिपा सा हल्का निशान सहला बैठी . उम्र के किस बीते पल में उस स्थान पर वह घाव हुआ था , कभी ललाई लिए एडी से बहता रक्त तो कभी पीले जख्म से रिसता मवाद...हर कुछ दिनों पर अपनी सूरत बदल लेता था . आम जख्म ही होता तो कोई इतना समय , इतने महीने लगता उसे ठीक होने में ...वह तो नासूर ही हो गया था ,डॉक्टर ने कह दिया कुछ देर और करते तो पैर ही काटना पड़ता ... ऑपरेशन टेबल पर बैठी वह रोई नहीं , बड़ी शांति से देखती रही डॉक्टर किस तरह उस जख्म को कैंची लगी रूई से साफ़ करते थे , मवाद बह कर जमा होता रहा वही नीचे एक बर्तन में , वह सिर्फ चुपचाप देखती रही . क्या दर्द नहीं हुआ होगा उसे , होता तो है ही , मगर वह नहीं रोई , सिर्फ देखती रही और डॉक्टर ने कह दिया बहुत हिम्मती है बच्ची और वह सोचती थी कोई निश्चेतक है जो दर्द को इस तरह गुजर जाने देता है ....आज वहां घाव नहीं है , देखने पर कुछ नजर नहीं आता , मगर भीतर खुजली चलने पर वह हाथ से टटोलकर एडी के उस खोखले स्थान को महसूस करती है , उसी जख्म को ....
और वह सोचती रही उन निशानों को , उन जख्मों को , जिनके कोई हल्के से निशान भी ऊपर से नजर नहीं आते थे ....वह जो उसकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था , बिछड़ा था उससे तब , जब्त किया था उसने ,जीवन की रीत सा ही तो हुआ था मिलना और बिछड़ना भी ...
क्यों किया था उसने ऐसा , समन्दर को कितनी लहरों ने छुआ होता ,क्या फर्क पड़ता है ...फिर उस एक लहर से ही शिकवा !! अपने हिस्से का आसमान तो उसने भी छुआ था , फिर क्या था, जो उसके भीतर ऐसा टूटा , बिना निशान भी जिसका दर्द एडी में हुए उस जख्म जैसा ही ....क्यों !!!
उसने खुद को शाबासी दी , एडी के मवाद जैसा कुछ निकला तो नहीं मगर जाने कौन सा निश्चेतक मस्तिष्क का वह हिस्सा शून्य कर गया कि दर्द हँसता- सा गुजर गया ...और अनजाने में उसने प्रेम के लिए अपने ह्रदय के कपाट हमेशा के लिए बंद कर दिए ... वह प्रश्न अनुत्तरित , वह जख्म अनछुआ ही रह जाता , जो उस दिन उसने कहा नहीं होता ...जख्मों का बिना सूखे भर जाना ठीक नहीं होता ....किस खूबी से छुआ था उसने बिना निशान वाले उस जख्म को !
उसने जोर से आँखें बंद कर ली , चीखी -चिल्लाई , मगर वह शांत सा उसकी अंगुली पकडे उसे आईने के सामने खड़ा कर गया ...देखो , यह तुम हो , जिसके भय से चीख कर अपनी आँखें बंद कर लेती हो , उसने उसे वह सब दिखाया जो वह नहीं देखना चाहती थी .... वह भौंचक थी , यह आईने में उसका ही अक्श था , जिस प्रेम को वह दूसरों में ढूंढती थी , नहीं पाने पर झुंझलाती थी , शिकायत करती थी , रोती थी , चीखती थी , वह स्वयं उसमे ही नहीं था ,या कहूँ खोया नहीं था , सूख गया था....जैसे बहते झरने के स्रोत पर कोई पत्थर की शिला अड़ गयी हो ... अब निर्झरणी- सा बहने लगा उसकी अपनी पलकों से ...आह! प्रेम , तुम मुझमे ही छिपे थे , मैंने तुम्हे कहाँ नहीं ढूँढा !
और दे गया सन्देश ,मैं सूरज अपनी धूप सबके लिए एक सी ही तो बिखेरता हूँ , कोई पौधा पत्थरों की ओट बना कर मुरझा जाए तो मेरा क्या कुसूर....मैं ही हूँ सागर , मेरी लहरें साथ साफ़ धुली चमकदार बालू रेत पर सुन्दर शीपियाँ छोड़ देता हूँ किनारे , सडा गला सब बहा ले जाता हूँ , मुझ जैसी गहराई , विशालता तुममे में ना सही , तुम हो प्रेम की कलकल बहती नदिया -सी , कभी शांत , कभी हलचल मचाती ... सडे गले पत्ते , सब अवांछित किनारे पर आ टिकेंगे , मत सोचो कि किसने क्या कहा , क्या समझा जबकि तुम समझती हो तुम क्या हो, तो किसी को समझाने की कोशिश मत करो , उन्हें खुद समझने दो....नदी को नाला समझने वालों की अपनी किस्मत , उनके हिस्से में तलछट ही है ! जो तुमसे नफरत करते हैं , तुम जैसा ही बनना चाह्ते हैं ....क्या- क्या नहीं समझाया उसने , कभी प्यार से , कभी गुस्से से , कभी डांट कर, कभी गले लगा कर !
और वह भरती गयी भीतर से , प्रेम से ! उसने पाया प्रेम कहीं बाहर नहीं ,है उसमे ही है , चीखना , झूटी मूठी शिकायत जैसी शरारतें करना छोड़ा नहीं है अभी उसने , मगर जानती है , प्रेम कही और नहीं है , स्वयं उसके भीतर है ! जीवन क्यारी की महकती बगिया की खुशबू -सा प्रेम ....कस्तूरी मृग की नाभि- सा स्वयं उसमे ही है !

-वाणी

Dark Saint Alaick
24-10-2011, 10:15 PM
हम बड़े क्यों हो जाते हैं !!!

-वाणी
सस्ता रिचार्ज आजकल के बच्चों को बहुत ललचाता है ...चूँकि sms के द्वारा बात करना फोन कॉल से सस्ता पड़ता है , इसलिए ज्यादा समय आजकल के बच्चों की अंगुलियाँ अपन मोबाइल पर ही थिरकती रहती है , वो चाहे परिवार के बीच हो या दोस्तों के बीच . ..कभी टोक दो उन्हें कि इतना समय टाइप करने में बर्बाद होता है , इतने में फोन ही कर लो ,तो जवाब मिलेगा , ये सस्ता है ...एक हमारे जैसे आलसीराम , फ़ोन तो बेचारा इधर -उधर पड़ा रहता है किसी कोने में , कभी मैसेज टोन सुनाई देने पर ढूंढना पड़ जाता है . इसलिए मायके और ससुराल की सारी खबर बच्चों के माध्यम से ही पता चलती रहती है , हम तो ज़रूरी होने पर ही फोन करते हैं या फिर मिलने पर सारी बात होती है .

इधर बहुत दिनों बाद भतीजा घर आया तो देखा कुछ नाराज , कुछ उदास सा लगा . थोडा कुरेदने पर पता चला कि महाशय इसलिए नाराज़ थी कि दोनों भाई -बहनों की लडाई में मैंने अपनी बेटी का पक्ष ले लिया था . मैंने समझाया कि उस समय वह सही थी , सिर्फ इसलिए , मैं पक्षपात नहीं करती हूँ , जो गलत होता है , उसे ही डांटती हूँ , मगर बेटा सुनने को तैयार नहीं ...
नहीं बुआ , आप दीदी का पक्ष ले रहे थे , जबकि वो गलत थी . इतनी देर में बिटिया रानी उठाकर आ गयी कमरे से बाहर और दोनों में वाद विवाद शुरू हो गया , तब समझ आया कि पिछले कुछ दिनों से दोनों में अबोला चल रहा था . दोनों को ही ये शिकायत , तुमने ऐसा कहा , तुमने वैसा कहा , और बात भी कुछ गंभीर नहीं थी , बस नोट्स के आदान प्रदान को लेकर कुछ ग़लतफ़हमी थी .
मैं बहुत देर तक समझाती रही , मगर उस पर कुछ असर नहीं . वो बस यही कहता रहा कि आप दीदी की मम्मी हैं , इसलिए उसका पक्ष ले रही है . मैंने बहुत समझाने की कोशिश की ,मगर वह सुनने को तैयार नहीं ..आखिर मैंने कह दिया ," अगर तुझे ऐसा लग रहा है कि दीदी ही गलत है , तो छोड़ ना , जाने दे , कौन तेरे सगी बहन है , कौन सी दीदी , किसकी दीदी , चल जाने दे , तू सोच ही मत "...
क्या जादू हुआ इन शब्दों का , भतीजा एक दम से शांत हो गया ...
अरे वाह , ऐसे कैसे , दीदी तो दीदी ही रहेगी , झगडा होने का ये मतलब थोड़े हैं कि दीदी ही नहीं है ...
अब मुझे हंसी आ गयी , फिर क्या परेशानी है !!
दोनों भाई- बहन देर तक आपस में बहस करते रहे , तूने उस दिन ऐसे कहा , वैसे कहा , ऐसा क्यों कहा , वैसा क्यों कहा , मैं घर के काम निपटाते सब सुन रही थी , जब नाश्ता बना कर लेकर आई तो देखा दोनों की आँखों से गंगा- जमना बह रही थी , मन का कलुष भी शायद इनके साथ बह कर निकल गया था ...
दोनों के सिर पर हाथ फेर कर मैंने कहा ," इतना सबकुछ इतने दिनों तक मन में क्यों छिपाए रखा था , पहले ही कह सुन लेते "...दोनों फिर से हंसी मजाक करते हुए नाश्ता करने लगे .
बच्चों के लडाई झगडे इतने से ही तो होते हैं , कुछ दिन कुछ महीने फिर सब कुछ वैसा ही , मगर वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं , तो सबकुछ बदल जाता है , कभी कभी लगता है , हम बड़े ही क्यों हो जाते हैं , वैसे ही बच्चे क्यों नहीं बने रहते ...सुनती हूँ माता -पिता की प्रोपर्टी और विरासत के लिए भाई- बहन एक दूसरे के खून के प्यासे , तो मन उदास हो जाता है .
ये लोंग बड़े क्यों हो जाते हैं !!!! शायद इसलिए ही कहा गया है मेरे भीतर का बच्चा बड़ों की देखकर दुनिया, बड़ा होने से डरता है!

कुछ शब्द कैसे जादू करते हैं , जब कोई लगातार नकारात्मक बातें कर रहा हो , एक बार उसकी हाँ में हाँ मिला दीजिये , देखिये उसका असर , बेशक इसके लिए ज़रूरी है दिल का सच्चा होना , और भावनाओं की ईमानदारी ...
" तू जो अच्छा समझे ये तुझपे छोड़ा है " ...वाद विवाद के बाद अक्सर अपने पति और बच्चों को कह देती हूँ , मुझे भी कहा किसी ने, आप भी कभी किसी खास अपने को कह कर तो देखिये!

Dark Saint Alaick
24-10-2011, 10:17 PM
फैज़ अहमद फैज़ के खत, दानिश इकबाल की आवाज़ और दुख का उजला पक्ष

-विपिन चौधरी


''दुख और नाखुशी दो मुखतलिफ और अलग-अलग चीज़ें हैं और बिलकुल मुमकिन है कि आदमी दुख भी सहता रहे और खुश भी रहें"। ये पंक्तियाँ फैज़ अहमद फैज़ ने जेल की चारदीवारी में रहते हुऐ अपनी पत्नी को १५ सितम्बर १९५७ को लिखी थी। ख़त के माध्यम से दुनिया के सामने दुख का अनोंखा और उजला पक्ष रखने वाले फैज़ को आज हम उंनकी जन्म शताब्दी पर याद कर रहे है जिसके तहत देश भर में उन्हें अलग -अलग तरीके से उन्हें याद किया जा रहा है। राजधानी दिल्ली में भी फैज़ की याद को समर्पित कई कार्यक्रम आयोजित किऐ जा रहे हैं । इसी कडी में एक खूबसूरत कार्यक्रम बीती रविवार को इंडिया हबिटैट सेन्टर की खुली छत पर आयोजित किया गया। रंगमंच और रेडियो के दो दिग्गजों दानिश इकबाल और सलीमा राजा ने फैज़ के लगभग ३०-३५ खतों के सार पढ़े। जिस नाटकीय लय में दोनों ने फैज़ के लिखे को अपनी आवाज़ दी वह बेहद दिल ओ दिमाग को सुकून देने के साथ कानो मै भी शहद घोलने वाला रहा, लगभग ढाई घंटें वहाँ मौजुद लोग मुग्ध हो उन्हें सुनते रहे। उस समय पूरा माहौल फैज़मय हो उठा जब इकबाल बानो और शौकत खान जैसे महान गायकों द्वारा गई उनकी तीन गज़लें को भी सुनाया गया ।

१९५० के उस दौर में जब पूरा उपमहाद्वीप राजनीतिक अशांति से गुज़र रहा था, तब इस प्रबुद्ध दम्पति के ज़ीवन में क्या उधल पुधल चल रही थी इसका पता हमें उनके द्वारा लिखे इन पत्रों से मिला। ये पत्र जीवन को तिरछी नज़र से भी देखने का साहस दिखाते हैं। फैज़ अपने पत्रों में अपनी पत्नि से बार-बार यह गिला कर रहे थे की उन्कें जेल मे रहने से उनहें घर और बहार दोनों की जिम्मेदारेयाँ संभालनी पर रही हैं।

जीवन के किसी मोड पर जब इन्सान का सामना दुःख से होता है तो वह लगभग विचार शुन्य हो जाता है। फैज़ के लिये उस खास घडी से उपजे दुःख के अलग मायने थे, तब समझ मे आता है की दुःख को कितनी शायस्तगी से जीया था फैज़ ने। दुख से घबराने वाले और दुख में ढूब जाने वाले हम सतही चीज़ों पर ही विचार करते रह जाते हैं। पर कहतें हैं कि सामान्यता से ठीक उलट जीवन को बेहतर तौर पर जीने का रास्ता कोई विलक्षण बुद्धी वाला ही खुल कर सामने रख सकता है और इसी सोच का सामने रखा फैज़ ने.

फैज़ के पत्रों के जवाब में उनकी प्रबुद्ध ब्रिटिश पत्नी अल्यस फैज़ के जवाब भी उतने ही गहन और माकूल थे। ये सभी ख़त निजी होते हुऐ भी सामाजिक दृष्टी से महताव्पूर्ण है और जीवन को नयी दिशा दिखाने का काम करते है जब जीवन में सरे राह चलते चलते कई तरह की परेशानियाँ हमें घेर लेती हैं तो उस वक़्त में कैसे उनसे पार पाया जा सकता है यह सोचने का विषय है। सबका दुख अलग-अलग होता है और दुख को देखने का नज़रिया भी। ज़ब हमारे लाख चाहते हुऐ भी जब कुछ अज़ीज चीज़ों की परछाई हमारे पास से बहुत दूर चली जाती हैं और जो चीज़े समय की तेज़ रफ़्तार में हमारे हाथ से छुट जाती है उनहें खोने का दर्द हमें बार बार सालता है । कुछ अति संवेदनशील लोगों के लिए दुख एक टानिक का काम भी करता है और यह भी सच है कि दुःख का वातावरण कला में पैनापन ले आता है तभी जब-जब भी समाज में बडे तौर पर विपत्ति आई है तब कला भी सघनता से उभर आई है। जैसे दक्षिण अफ्रीकन देशों की त्रासदी, नाइजीरिया का गृहयुद्ध, भारत-पाक विभाजन, सोवियत-रुस का विखंडन आदि एक बडी त्रासदी के रूप में जब समाज में उभरी तो कला मे पैनापन आया । नोबल पुरस्कार विजेता ब्रिटिश लेखिका डोरोथी लेंसिंग का मानना है "आँसू वास्तव में मोती हैं" और असदुल्ला खान ग़ालिब भी कह गए है "दर्द के फूल भी खिलते है बिखर जाते हैं, जख्म कैसे भी हो कुछ रोज़ में भर जाते है" लेकिन फैज़ ने दुःख -दर्द का जो मनोवाज्ञानिक विश्लेषण किया है वह बेमिसाल है। निजता बहुत अज़ीज़ चीज़ है मगर उससे इतना विस्तार देना भी ताकि उससे बाकी लोग भी सबक ले सके, यह बडी बात है।

भावनाओं का सार, खुशी का उत्साह, अवसाद की अकड़न, चिंता की चिंता, यह सब मस्तिक्ष में ख़ुशी औरउल्लास की भावनाओं की तरह ही एक आसमानी इंद्रधनुष की तरह से हैं जो क्षणभंगुर होता है।

जहाँ तक शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की संरचना को खंगाला के बाद यह निष्कर्ष निकला कि मस्तिष्क सिर्फ एक भावनात्मक केन्द्र नहीं है जैसा कि लंबे समय से यह माना जाता रहा है, बल्कि वहां अलग-अलग भावनाओं की सरंचना भी शामिल है। पुरुषों और महिलाओं के दिमाग मे सुख और दुख अलग- अलग तरह से असर डालते है। न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर जोसेफ फोरगस ने इस पर शोध कर यह परिंणाम निकाला कि नाकारात्मक मूड में लोगों की रचनाशीलाता अधिक बढ़ जाती है। पीडा एक सार्वभौमिक प्रेरक तत्व है, जब हम पीडा में उलझे होते हैं तो इससे बाहर आने के उपाय खोजनें लगते हैं और इसके उबरने के लिये अपनी गतिविधियाँ बढा देते हैं यह ठीक ऐसा ही है जैसे दलदल में फसें होनें पर उस से बाहर निकलनें के लिये हाथ-पाँव मारना। यह सच है जब हम दूर खडे होकर अपने दुख की अनुभूति को देखने, परखने और परिभाषित करने की शमता विकसित करेगें तभी दुसरों के दुख में हमारी भागीदारिता बढ सकेगी। इस मामले में कई संवेदनशील विभूतियों की तरह फैज़ भी धनी थे तभी वे दुख का सटीक विश्लेषण कर सके।

बहरहाल फैज़ अपने इसी खत में आगे लिखते है

"दुख और नाखुशी दो मुखतलिफ और अलग-अलग चीज़ें हैं और बिलकुल मुमकिन है कि आदमी दुख भी रहता रहे और खुश भी रहें। दुख और ना-खुशी खारिज़े चीज़ें हैं जो हमारी या हादसे की तरह बाहर से वारिद होते है, जैसे हमारी मौजुदा जुदाई हैं। या जैसे मेरे भाई की मौत है ,,, लेकिन नाखुशी जो इस दर्द से पैदा होती है अपने अंदर की चीज़ है ये अपने अंदर भी बैठी पनपती रहती है,,,और अगर आदमी एतीहात ना करे तो पुरी शक्सियत पर काबू पा लेती है,,,दुख दर्द से तो कोई बचाव नहीं ,,,लेकिन ना खुशी पर घल्बा पाया जा सकता है,,,बशर्त की आदमी किसी ऐसी चीज़ से लौ लगा ले की जिसकी खातिर जिंदा रहना अच्छा लगे"।

Dark Saint Alaick
24-10-2011, 10:22 PM
एक किस्सा....

-अशोक पांडे

फिर उसने कहा .....अल्लाह तुम पर मेहरबान हो! उसका करम तुम्हें नसीब हो!
एक दिन, शेख अल-जुनैद यात्रा पर निकल पड़े। और चलते-चलते उन्हें प्यास ने आ घेरा। वे व्याकुल हो गये। तभी उन्हें एक कुआं दिखा, जो इतना गहरा था कि उससे पानी निकालना मुमकिन न था। वहां कोई रस्सी-बाल्टी भी न थी। सो उन्होंने अपनी पगड़ी खोली और साफे को कुएं में लटकाया। उसका एक छोर किसी कदर कुएं के पानी तक जा पहुंचा।
वे बार बार साफे को इसी तरह कुएं के भीतर लटकाते फिर उसे बाहर खींच कर अपने मुंह में निचोड़ते।
तभी एक देहाती वहां आया और उसने उनसे कहा-
अरे, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? पानी से कहो कि ऊपर आ जाये। फिर तुम पानी अपने चुल्लू से पी लो।
ऐसा कह कर वह देहाती कुएं के जगत तक गया और उसने पानी से कहा-
`अल्लाह के नाम पर तू ऊपर आ जा! और पानी ऊपर आ गया। और फिर शेख अल-जुनैद और उस देहाती ने पानी पिया।
प्यास बुझाने के बाद शेख अल-जुनैद ने उस देहाती को देखा और उससे पूछा-
`तुम कौन हो ?
`अल्लाह ताला का बनाया एक बंदा। उसने जवाब दिया।
`और तुम्हारा शेख कौन है? अल-ज़ुनैद ने उससे पूछा।
`मेरा शेख है .....अल-जुनैद! हालांकि आह! अभी तक मेरी आंखों ने उन्हें कभी देखा नहीं। गांव वाले ने जवाब दिया।
`फिर तुम्हारे पास ऐसी ताकत कैसे आयी? शेख ने उससे सवाल किया।
`अपने शेख पर मेरे यकीन की वजह से! उस सीधे-सादे देहाती ने जवाब दिया।
और चला गया!

abhisays
24-10-2011, 11:40 PM
बहुत ही उम्दा कतरने हैं. :fantastic:

Dark Saint Alaick
25-10-2011, 04:36 PM
लाल किले में भी होता था दिवाली का जश्न


दोनों फिरकों के लोग एक दूसरे के धार्मिक त्यौहारों में शिकरत करते थे। विभिन्न धर्म के पड़ोसियों के बीच अमन चैन से रहने का चलन था। बादशाह इन मामलों में जिंदगी भर उसूलों का पालन करते थे। वे किले के अठपहलू बुर्ज में बैठकर हिंदुओं और मुसलमानों के त्यौहारों की तैयारियों और तमाशों को देखते थे। इस तरह से भलाई की भावनाएं बढती थीं। ये पंक्तियां एन्ड्रयूज की हैं, जिनमें दिल्ली के बादशाहों की दिवाली की एक झलक मिलती है। उर्दू अकादमी के सचिव अनीस आजमी कहते हैं बहुत मेलजोल का दौर था। दीवाली और नवरोज की तो जैसे धूम ही मच जाती थी। शाम को जश्न का नजारा देखने के लिए बादशाह किले के झरोखे में आते थे। बेगमें पर्दों से जश्न देखती थीं।

इतिहासकार फिरोज बख्त ने कहा, चांदनी चौक के कटरा नील में उन दिनों भी पूजा की कई दुकानें थीं और वहां से पूजा का सामान अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के पास भेजा जाता था। किले के अंदर भी दिवाली की रौनक होती थी। कटरा नील में ही मामचंद की दुकान है जहां से बेगम जीनत महल के लिए श्रृंगार का सामान आलता, मेहंदी, उबटन आदि जाता था। दिवाली के लिए खास तौर पर सामान भेजा जाता था। मामचंद के परदादा हकीम सौदागरमल यह सामान ले कर जाते थे।

महेश्वर दयाल के मुताबिक, दशहरे के बाद से ही दिवाली की तैयारी शुरू हो जाती थी। घरों की सफाई, पकवान, दुकानों की सजावट, नए बहीखाते....सब कुछ सिलसिलेवार तरीके से होता था। बाजार में खील, खांड के खिलौने, मिठाइयों और सूखे मेवों की खरीदी चरम पर होती। हिन्दू और मुसलमान मिल कर दिवाली मनाते थे। उन दिनों एक आने के 50 मिट्टी के दीए और चंद आनों का सेर भर सरसों का तेल मिलता था। दीये सरसों के तेल से जलते थे और मोमबत्ती केवल अमीर तथा रईस जलाते थे। किले में भी दीवाली बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी। बादशाह को सोने, चांदी और सात तरह के अनाजों के मिश्रण सतनाजे से तौला जाता था और बाद में इसे गरीबों में बांट दिया जाता था। सुबह गुसल करके बादशाह लिबास बदलते थे और नजराना कबूल करते थे। रात को किले की बुर्जियां रौशन की जाती थीं। खील, बताशे और खांड के खिलौने, हटड़ियां और गन्ने अमीरों और रईसों में बांटे जाते थे। पटरियां और दुकाने सामान से अटी रहती थीं। हलवाइयों की दिवाली के दौरान ही साल भर की कमाई हो जाती थी। सवा रूपये में कागजी बादाम आता था। यही भाव भुने हुए चिलगोजे का था। सेरों सूखा मेवा घर लाया जाता था। खाने के लिए भी और बांटने के लिए भी। शायद ही कोई मुफलिस और फकीर हो जिसे दिवाली के रोज मिठाई खाने को न मिलती हो।......दिवाली पर जुआ भी खेला जाता था और शहर में हिजड़े छल्ला दे रे मोरे साईं गाते फिरते और पैसे लेते। ( महेश्वर दयाल की किताब दिल्ली जो एक शहर है का एक अंश)

Dark Saint Alaick
27-10-2011, 10:53 AM
रोशन है कायनात दीवाली की रात है,
अपने वतन की अलग ही कुछ बात है.

यहाँ हर दिल में ख़ास रौशनी होती है.
प्रेम - मोहब्बत भरे सबके जज्बात है.

मंदिर - मस्जिद- गिरजाघर भी बोले,
एक ही मिट्टी से हमारी मुलाक़ात है.

जाति - जमात में जो बांटे हमसब को,
कह दो हमारी एक हिन्दुस्तानी जात है.

भ्रष्टाचार मिटाने को लड़ रहे हैं हमसब,
पर हम पर ये हो रहा कैसा आघात है ?

अब उठो जागो ऐ मेरे वतन के लोगों,
जम्हूरियत की अब तो निकली बरात है


-रोहतास (सासाराम, बिहार)

Dark Saint Alaick
29-10-2011, 01:45 PM
'गटारी' सेलिब्रेशन

कहा जाता है कि शराब ऐसी चीज है जिसे लेकर शायर लोग तनिक ज्यादा ही भावुक होते हैं, कोई शराब को खराब बताये तो अगिया बैताल हो जाते हैं। ताना मारते हुए कह भी देंगे कि तुम क्या जानों शराब क्या चीज है। आये तो हो बड़े शुचितावादी बनकर, लेकिन जिस सड़क पर खड़े हो उसमें आबकारी टैक्स से मिले पैसों का भी हिस्सा है। न जाने देश के कितने बांध, कितनी सड़के शराबियों के टैक्स देने के बल पर बने हैं और अब भी बने जा रहे हैं।

इतना ही नहीं, कुछ अति संवेदनशील कवि तो तमाम मौजूदा चीजों से तुलना कर साबित करने लगेंगे कि शराब बहुत बढ़िया चीज है, इसे वो न समझो, फलां न जानो। ऐसा ही किसी शायर ने कभी कहा था कि - अरे यह मय है मय, मग़स ( मधुमक्खी) की कै तो नहीं।

बहरहाल इस वक्त जब मैं यह लेख लिख रहा हूं तब यहां मुंबई तमाम शराब की दुकानें, बार, पब गुलज़ार हैं। मौका है विशेष शराब सेवन का जिसे कि स्थानीय भाषा में 'गटारी' कहा जाता है। यह गटारी अक्सर श्रावण महीने से जोड़कर देखा जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि श्रावण महीने में मांस-मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिये। दाढ़ी और बाल काटने से भी बचने की कोशिश होती है। इसलिये जो पियक्कड़ होते हैं वह श्रावण आने के पहले ही जुट लेते हैं क्योंकि अगले एक महीने तक सुखाड़ रहेगा। यह अलग बात है कि कुछ लोग 'गटारी' वाले दिन को एक्सट्रा लेने के बाद पूरे श्रावण महिने में भी डोज लेते रहने से नहीं चूकते। उनका डोज मिस नहीं होना चाहिये। कई शराबी तो यह कहते पाये जाते हैं कि न पिउं तो हाथ पैर कांपने लगते हैं। कोई काम नहीं होता :)

दूसरी ओर 'गटारी' शब्द को लेकर भी बड़ी मौजूं बात सुनने में आई है जिसके अनुसार शराबी इसे गटारी अमावस्या इसलिये कहते हैं क्योंकि इस दिन ढेर सारी शराब गटक कर गटर में गिरने का दिन होता है। यह अलग बात है कि मुंबई के गटर अब कंक्रीट के जंगलों से ढंक चुके हैं। इस गटारी अमावस्या के बारे में यहां तक प्रचलित है कि कुछ कम्पनियों में वर्करों को इस दिन के लिये विशेष भत्ता दिया जाता है। उस भत्ते को 'खरची' का नाम दिया जाता है। कहीं भी गटारी शब्द का उल्लेख नहीं होता। बाद में मिली हुई इस 'खरची' को वर्कर की तनख्वाह में से एडजस्ट कर लिया जाता है। यह सिलसिला काफी पहले से चला आ रहा है।

इस गटारी के कुछ साइड इफेक्ट भी दिखते हैं जैसे कि थर्ड शिफ्ट में काम करने वालों की संख्या में उस दिन भारी कमी आती है। लोग एब्सेंट ज्यादा होते हैं। प्रॉडक्शन घटता है। निर्माण क्षेत्र से जुड़े कार्यों पर भी असर पड़ता है। दूसरी ओर पुलिस को भी काफी मुस्तैदी रखनी पड़ती है। बार आदि अलग से टेबल लगवाते हैं या कुछ इंतजाम करते हैं। कुल मिलाकर वह सारा कुछ होता है जो शराब के धंधे, उससे जुड़े फायदों नफा नुकसान आदि से जुड़ा होता है।

एक चलन यह भी देखा गया है कि पहले जहां गटारी केवल एक शाम की होती थी अब उसमें तीन चार शामें होने लगी हैं। पीने वालों की संख्या बदस्तूर बढ़ती जा रही है। बस मौका होना चाहिये। वैसे भी माना जाता है कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये :)

चलते चलते कुछ शराब से जुड़ी पंक्तियां । जहां तक मैं समझता हूँ शराब अच्छी चीज है या बुरी यह अलग बात है लेकिन शराब को लेकर जो शेर बने हैं वो काफी दिलकश हैं। मसलन,

देखा किये वो मस्त निगाहों से बार बार
जब तक शराब आये, कई दौर हो गये

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मेरी तबाही का इल्जाम अब शराब पे है
मैं करता भी क्या तुम पे आ रही थी बात

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रह गई जाम में अंगड़ाइयां लेके शराब
हमसे मांगी न गई उनसे पिलाई न गई

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जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता जहां पर खुदा ना हो

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फिलहाल प्यासा फिल्म देख रहा हूँ। गजब की पंक्तियां हैं इस फिल्म में।

आज सजन मोहे अंग लगा लो जनम सफल हो जाय......ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है.....हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा दें तो......वाह साहिर लुधियानवी.....वाह !

-सतीश पंचम

Dark Saint Alaick
29-10-2011, 01:49 PM
श्रीलाल शुक्ल जी का जाना

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=13103&stc=1&d=1319876309

श्रीलाल शुक्ल जी का जाना एक अजीब तरह के खालीपन से भर गया है। जब से वे अस्पाताल में थे, हम रोज़ सुबह दुआएं करते थे कि आज का दिन भी उनके लिए ठीक-ठाक बल्कि पहले से बेहतर गुज़रे और वे जल्द चंगे हो कर वापिस अपने घर लौट आयें। अपना भरपूर जीवन जीयें। हम कि*तना चाहते रहे कि वे ज्ञानपीठ सम्मान पूरी सज-धज के साथ लेते, हम सब उन अविस्मरणीय पलों के साक्षी बनते जब वे ज्ञानपीठ सम्मान लेने के बाद मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपना चुटीला भाषण पढ़ते और हम सब ठहाके लगाते हुए अपने प्रिय रचनाकार के शब्द-शब्द को सम्मानित होते देखते। लेकिन ऐसा नहीं होना था।
राग दरबारी मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक थी। जब भी किसी नये पाठक को कोई किताब उपहार में देने की बात आती, वह किताब राग दरबारी ही होती और किताब पाने वाला हमेशा-हमेशा के लिए इस बात का अहसान मानता कि कितनी अच्छी किताब से वह हिंदी साहित्य पढ़ने की शुरुआत कर रहा है। राग दरबारी कहीं से भी पढ़ना शुरू करो, हर बार नये अर्थ खोलती थी। पचासों बार उसके शब्द-शब्द का आनंद लिया होगा।
श्रीलाल शुक्ल जी से मेरी रू ब रू दो ही मुलाकातें थीं! दोनों ही मुलाकातें उनके घर पर। दोनों ही यादगार मुलाकातें। पहली बार कई बरस पहले अखिलेश जी भरी बरसात में रात के वक्त उनके घर पर ले गये थे। मैंने आदरवश उनके पैर छूए थे तो वे नाराज़ होते हुए से बोले थे कि ये क्या करते हो, हम जिस किस्म की विचारधारा का लेखन करते हैं, उसमें ये पैर-वैर छूना नहीं चलता लेकिन मैं उन्हें कैसे बताता कि उनके जैसे कथा मनीषी के पैर छू कर ही आदर दिखाया जा सकता है और उनसे आशीर्वाद पाया जा सकता है।
दूसरी बार कोई चार बरस पहले लखनऊ जाने पर उनके घर गया था। मेरे साथ मेरे बैंक के वरिष्ठ अधिकारी श्याम सुंदर जी थे। श्याम सुंदर जी तमिल भाषी हैं लेकिन कई भाषाएं जानते हैं, हिंदी में कविता करते हैं और सबसे बड़ी बात राग दरबारी उनकी भी प्रिय पुस्तक थी। उस वक्त संयोग से शुक्लि जी घर पर अकेले थे। मैं हैरान हुआ मैं उनकी स्मृति में अभी भी बना हुआ था। उन्होंने मुझे कथा दशक नाम के कहानी संग्रह की भी याद दिलायी। मैंने इस संग्रह का कथा यूके के लिए संपादन किया था। इसमें कथा यूके के इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित दस रचनाकारों की कहानियां हैं। शायद श्रीलाल शुक्ल जी ने साक्षात्कार पत्रिका में अपने किसी इंटरव्यू में इस किताब की तारीफ भी की थी। इस मुलाकात में उन्होंने कहा था कि मैं उन्हें ये किताब दोबारा भेज दूं। मैं ये जान कर भी हैरान हुआ था कि उन्होंने मेरी कहानियां भी पढ़ रखी थीं।
तभी वे चुटकी लेते हुए बोले थे आप लोग आये हैं और घर पर कोई भी नहीं है। देर से आयेंगे। कैसे खातिरदारी करूं। चाय बनाने में कई झंझट हैं। गैस जलाओ, चाय का भगोना खोजो, फिर पत्ती, चीनी, दूध सब जुटाओ, छानो, कपों में डालो, फिर कुछ साथ में खाने के लिए चाहिये, ये सब नहीं हो पायेगा। ऐसा करो, व्हिस्की ले लो थोड़ी थोड़ी। मैं तो लूंगा नहीं, डॉक्टर ने मना कर रखा है, तुम्हारे लिए ले आता हूं। एक दम आसान है पैग बनाना। गिलास लो, जितनी लेनी है डालो, सोडा, पानी, बर्फ कुछ भी चलता है और पैग तैयार।
उस दिन हमने बेशक उनके बनाये पैग नहीं लिये थे लेकिन इतने बड़े रचनाकार के सहज, सौम्य और पारदर्शी व्यक्तित्व से अभिभूत हो कर लौटे थे।
मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि
-सूरज प्रकाश

ndhebar
29-10-2011, 02:29 PM
बेहतरीन सूत्र, पर रचनाकारों को धन्यवाद सहित अर्ज करूँगा
रचना किसी की हो, प्रस्तुतकर्ता धन्यवाद के पात्र हैं
आखिर इन्ही की वजह से तो हम इनको पढ़ पाए

Dark Saint Alaick
31-10-2011, 12:09 PM
मौत से हुये साक्षात्कार ने किया प्रेरित

(जनसंवेदना मानव सेवा)

भोपाल। वाक्या करीब पांच साल पुराना है। महाराष्ट्र प्रवास के दौरान रेलवे लाइन पार करते समय एक ट्रेन के नीचे आते मैं बाल-बाल बचा। तभी एक ने कमेन्ट्स किया, बच गये वरना लावारिस की तरह मरते और अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई नहीं मिलता। उस अंजान व्यक्ति की यह अंतिम बात मुझे चुभ गई। भोपाल आकर लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार की जानकारी ली तो हेैरत में पड़ गया। पुलिस के पास न तो कोई फंड, न दीगर व्यवस्थायें, न कोई ऐसी संस्था जो इस काम में पुलिस का हाथ बंटाती हो। तब ही लावारिस व गरीब लोगों की मौत पर उनके अंतिम संस्कार कराने में हाथ बंटाने के लिये जन संवेदना नामक संस्था का गठन किया। विषय संवेदनशील था लेकिन एकदम नया। उद्देश्य जानने के बाद लोग मौके पर तो संवेदनायें जताते लेकिन पीट फेरते ही मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकते। दूसरों की बात ही क्यों की जाये, शुरुआत में तो परिजनों के गले भी मेरी बात नहीं बैठी। मैं अपने ध्येय पर कायम रहा। शुरुआत में काफी दिक्कतें आना स्वाभाविक है। अपना मिशन जारी रखा। पांच साल बाद अब संस्था को देश के अनेक राज्यों के लोग मदद कर रहे हैं। विशेषकर राजस्थान के लोग इस मामले में अधिक संवेदनशील हैं। मप्र खासकर भोपाल में अब तक अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। बहरहाल, संस्था अपने मिशन में जुटी रही और आज मुझ्र यह बताते हुये संतोष है कि जनसंवेदना अब तक सात सौ से अधिक लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार में सहयोग प्रदान कर चुकी है। राजधानी के प्रत्येक थाने के पुलिस कर्मियों को जनसंवेदना की सेवाओं की जानकारी है। जरुरत के समय वह संस्था की मदद लेते हैं। अब भी मेरा ज्यादातर समय अपने ध्येय को पूरा करने में गुजरता है। लीक से हटकर कार्य करने में तकलीफ होना स्वाभाविक है। कहते हैं-संतोष से बड़ा कोई सुख नहीं। पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, भाग्य-दुर्भाग्य सब इसी धरती पर है। व्यक्ति की मौत के बाद ही सही, लेकिन मानव सेवा के इस पुण्य कार्य ने मुझ्र अभूतपूर्व आत्मिक सुख प्रदान किया है।
(सौजन्य से रवि अवस्थी)

Dark Saint Alaick
31-10-2011, 02:07 PM
एक अमेरिकन मुझसे बोला भाई साहब बताइये आपका भारत महान है !
तो सँसार के इतने आविष्यकरो मेँ आपके देश का क्या योगदान है ?
मैँ बोला रे अमेरिकन सुन,सँसार की पहली फायर प्रूफ लेडी भारत मेँ हुई थी ! नाम था "होलिका"
आग मैँ जलती नही थी,इसलिये उस वक्त फायर ब्रिगेड चलती नही थी !!
सँसार की पहली वाटर प्रूफ बिल्डिँग भारत मेँ हुई नाम था भगवान विष्णु शैया "शेषनाग" ! शेषनाग पाताल गये धरती पर रहे "विशेषसनाग"!
दुनिया के पहले पत्रकार "नारदजी" हुये जो किसी राजव्यवस्था से नही डरते थे ! तीने लोक की सनसनी खेज रिपोर्टिँग करते थे !!
दुनिया के पहले कॉँमेन्टेटर "सँजय" हुऐ जिनहोने नया इतिहास बनाया ! महाभारत के युद्ध का आँखो देखा हाल अँधे "ध्रतराष्ट्र" को उन्ही ने सुनाया !!
दादागिरी करना भी दुनिया हमने सिखाया क्योँ वर्षो पहले हमारे "शनिदेव" ने ऐसा आतँक मचाया !! कि "हफ्ता" वसूली का रिवाज उन्ही के शिष्यो ने चलाया ! आज भी उनके शिष्य हर शनिवार को आते है ! उनका फोटो दिखाते है हफ्ता ले जाते है !!
अमेरिकन बोला दोस्त फालतू की बाते मत बनाओ ! कोई ढँग का आविष्यकार हो तो बताओ !!
(जैसे हमने इँसान की किडनी बदल दी, बाईपास सर्जरी कर दी आदि)
मैँ बोला रे अमेरिकन सर्जरी का तो आइडिया ही दुनिया को हमने दिया था !
तू ही बता "गणेशजी" का ऑपरेशन क्या तेरे बाप ने किया था!!
अमेरिकन हडबडाया, गुस्से मैँ बडबडाया ! देखते ही देखते चलता फिरता नजर आया !!
तब से पूरी दुनिया को भान है ! दुनिया में मुल्क कितने ही हो सब मे मेरा "भारत" महान है !!

-प्रशांत वर्मा

Dark Saint Alaick
31-10-2011, 02:57 PM
दुखते हैं खुशबू रचते हाथ


-गीताश्री


यहां इस गली में बनती हैं
मुल्क की मशहूर अगरबत्तियां
इन्ही गंदे मुहल्ले के गंदे लोग
बनाते हैं केवड़ा, गुलाब, खस और
रातरानी अगरबत्तियां.
दुनिया की सारी गंदगी के बीच
दुनिया की सारी खुशबू
रचते रहते हैं हाथ।
---अरुण कमल की कविता

मैंने कुछ साल पहले अचानक नेट पर अपने प्रिय कवि अरुण कमल जी की कविता खूशबू रचते हाथ पढी थी। कविता मेरे जेहन में दर्ज हो गई थी। ये उस कौम पर लिखी गई है जिसकी तरफ हमारा ध्यान कभी जाता ही नहीं। मैं सोचती रही कि कहां किस शहर में मिलेंगी ये औरते जो हमारे लिए खूशबू रचती है। कवि ने उन्हें कहीं किसी गली में तो देखा होगा ना..अचानक मैं पिछले साल उज्जैन गई। ट्रेन से आने जाने का प्लान था। आदतन जब ट्रेन किसी शहर में प्रवेश करने लगती है तो मुझे जार्ज डो का एक प्रसिध कथन याद आने लगता है...किसी शहर को देखने का सबसे अच्छा तरीका है ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर उसे देखें..और मैं एसा करती हूं जब भी कभी ट्रेन से जाती हूं। उज्जैन के करीब पहुंचते ही ट्रेन के दरवाजे पर आई..धीमी होती ट्रेन और धीमे धीमे आती हवा में महक सी थी। पहले लगा कि महाकाल की नगरी है मंदिर से आती होगी..लोकिन पटरियों के एकदम पास नजर गई और मैं दंग रह गई। अरुण कमल जी की कविता..साक्षात..लाइव..कविता की पंक्तियां याद आने लगीं..हाथ ही हाथ थे..जो खूशबू रच रहे थे। खिलखिला रहे थे..खूशबू में सने हाथ ट्रेन के यात्रियों को टा टा बाय बाय भी कह रहे थे। मुझे कविता के किरदार पहली बार मिले..निराला की भिक्षुक कविता के बाद..
फिर तो इन गलियों में गई अपनी लोकल सहेली मधुलिका के साथ। वहां जाकर जो कुछ मिला उसे यहां लिख डाला। कवि होती तो कविता लिखती..तब भी अऱुण कमल से ज्यादा अच्छा नहीं लिख पाती..पत्रकार हूं सो लेक लेश लिख डाला..फोटो खींचे..उनसे बातें की..खूशबू भरी..उनकी पीड़ा लेकर घर लौट आई..ट्रेन को लौटना होता है..

भोर के इंतजार में एक गली

अब खूशबू रचते हाथ दुखने लगे हैं।
उज्जैन की ऊंची नीची, आड़ी तिरछी, तंग गलियों में अगरबत्ती बनाते बनाते तीस वर्षीया संध्या गोमे की उंगलिया पीड़ा गई हैं। कंधे दुखने लगे हैं। अब दुआ के लिए भी हाथ उठाने में दिक्कत होती है। फिर भी एक दिन में वह पांच किलो तक अगरबत्ती बना लेती है। रीना आकोदिया के गले में हमेशा खराश रहती है। कच्चे माल से निकलने वाला धूल उसके फेफड़े में जम रहा है। परिवार चलाना है तो उसे किसी भी हालत में अगरबत्ती बनाना ही होगा। पुष्पा गोमे बताती है, हम रोज का बीस से पचास रुपये तक कमा लेते हैं। घर के बाहर काम करने नहीं जा सकते। हमें घर बैठे काम चाहिए। इसके अलावा और कोई रोजगार यहां है नहीं..क्या करे?
ये महाकाल और कालिदास की नगरी उज्जैन की एक गली है योगेश्वर टेकरी। शायद ऐसे ही किसी गली में कभी अरुण कमल ने संध्या, पुष्पा, रीना, पिंकी जैसो की बहदाली देखी होगी। तमाम पूजाघरो को सुंगध से भर देने वाले हाथ अब बेहाल हैं। लगातार एक ही जगह बैठकर अगरबत्ती बनाते बनाते उनका जीवन कई तरह की मुश्किलो से भर गया है। उनका स्वास्थ्य तो खराब हो ही रहा है घर की माली हालत भी ठीक नहीं हो पा रही है। फैक्ट्री मालिक और बिचौलिए के शोषण दौर निरंतर जारी है। रीना बताती है, बहुत सी औरतो का घर इसी से चलता है। क्या करें। सभी हमारा शोषण करते हैं। कच्चा माल देते हैं साढे सात किलो, लेकिन बनाने के बाद वे पांच किलो तौलते हैं। धूल से बीमारी हो रही है। रीना की तरह ही इस गली की तमाम औरतें शोषण के दोहरे मार से बिलबिलाई हुई हैं। इनका कोई ना कोई संगठन है ना इनके हक में आवाज उठाने वाला कोई स्थानीय नेता। घर के पुरुष सदस्यो को भी इनकी सुधि नहीं है। खुद तो वे दिनभर बैठकर इसतरह का काम करेंगे नहीं। घर की महिलाओं के ऊपर लाद दिया है पूरा कारोबार। उनका ज्यादातर वक्त चौक चौराहो पर बैठकर चाय पीने या बीड़ी का धुंआ उड़ाने में जाता है। शाम को बिचौलिए से पैसे लेने जरुर पहुंच जाते हैं। कम रकम हाथ लगी तो हो हल्ला मचाते हैं। औरत पर दोहरी मार। कम अगरबत्ती बनाने का इल्जाम भी झेलो। अब तक किसी स्वंयसेवी संगठन की नजर इनकी बदहाली पर नहीं पड़ी है। नवगठित एनजीओ भोर की सर्वेसर्वा मधुलिका पसारी ने जब पहली बार फरवरी, 2010 को मेरे साथ इस गली का दौरा किया तो मेरे साथ साथ वह दंग रह गईं। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि खुशबू रचने वाले हाथों को किन मुश्किलो को सामना करना पड़ रहा है। अब तक उपेक्षित इस धंधे में लगी महिला मजदूरो का कोई यूनियन भी नहीं है। पिंकी टटावत बताती है यहां यूनियन नहीं बनती। मैं अगर बनाना चाहूं तो बीच के लोग खत्म कर देते हैं। हम काम करना तो नहीं बंद कर सकते ना। काम बंद होगा तो परिवार कैसे चलेगा?
संध्या बौखला कर कहती है, हमें साढे सात किलो माल देता है बदले में पांच किलो लेता है। वजन में माल कम हो गया ना। हमारी मजदूरी वैसे भी कम है ऊपर से डंडी मार देते हैं। कमसेकम हमारी मजदूरी तो बढा देते।
पूरी तरह से औरतो के कंधो पर टिका है ये धंधा। पांच साल की उम्र से लड़कियां भी निपुण हो जाती है अगरबत्ती बनाने में। घर में जिनती महिला सदस्य होती हैं वे सब घरेलु कामकाज निपटाने के बाद सुबह 11 बजे से शाम पांच या छह बजे तक एक ही जगह पर बैठकर बांस की पतली स्टिक पर मसाला चढाती रहती हैं, सुखाती हैं फिर इनका बंडल बना कर बिचौलिए का इंतजार करती हैं। बदले में वो चंद रुपये दे जाता है। इन पैसो से ना पेट भर पा रहा है ना किस्मत बदल पा रही है। पूरे शहर में और कोई धंधा नहीं है। सारे मिल बंद हो चुके हैं।
देश में उज्जैन पांचवे नंबर का अगरबत्ती उत्पादक शहर है। लगभग 100 अगरबत्ती बनाने वाली फैक्ट्री वहां है। यहां से बनने वाली अगरबत्ती की आपूर्ति देश के कई राज्यो जैसे, गुजरात, राजस्थान, उतर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली में होती है। इस व्यसाय को गृह उधोग का दर्जा प्राप्त है इसलिए सरकार ने कई तरह की छूट दे रखी है। अगरबत्ती व्यसाय से पिछले पचास साल से जुड़े व्यवसायी फखरुद्दीन से बातचीत के दौरान उन वजहो का पता चलता है जो मजदूर महिलाओं के शोषण
का वायस बनी हुई हैं।
वह बताते हैं, उज्जैन की अगरबत्ती गुणवत्ता में कमजोर है। सस्ती बिकती है, मजदूर भी निपुण नहीं हैं। ये कारोबार वहीं फले-फूलेगा जहां गरीब वर्ग है। वैसे भी राजनीति की वजह से कपड़ा मिलें, पाइप फैक्ट्री समेत कई कारखाने बंद हो गए। मजदूर क्या करें। मजबूरन उन्हें इस धंधे में लगना पड़ा।
फरुद्दीन महिला मजदूरो के शोषण के लिए छोटे छोटे कारोबारियो को दोषी ठहराते हैं। उनका कहना है कि छोटे कारोबारियो से हम बड़े कारोबारी बेहद परेशान हैं। उनकी वजह से मध्य प्रदेश के हर गांव में अब अगरबत्तियां बनने लगी हैं। चूंकि किलो के हिसाब से बेचना है तो मोटी अगरबत्तियां बनने लगीं हैं। बारीक बनाएंगे तो वजन कम होगा। धीरे धीरे बारीक बनाना भूल जाते हैं। इसीलिए कच्चा मान बाहर नहीं भेजते, अपनी फैक्टरी में ही मजदूरो को रखकर काम करवाते हैं और उन्हें मीनीमम वेजेस से ज्यादा देते हैं।
अंत में..मधुलिका कहती हैं, अब मुझे कुछ करना पड़ेगा। भोर को एक उद्देश्य मिल गया है। हो सकता है इनकी पहल पर एक नई भोर इन गलियों में आए।

Dark Saint Alaick
01-11-2011, 07:35 PM
सात अरबवें बच्चे के नाम दुनिया की पाती


सात अरबवें इंसान के तौर पर जन्म लेने वाले मेरे प्यारे रेशम के गोले से शिशु इस धरती पर तुम्हारा स्वागत है। धरती के किसी भी कोने में भी चाहे तुमने जन्म लिया हो मुझे उम्मीद है कि तुम एक अच्छे घर में अपने माता-पिता की महफूज पनाह में होगे। तुम्हें लगेगा कि मैंने ऐसा क्यों कहा। क्या सब बच्चे माता पिता के पास सुरक्षित नहीं होते। नहीं मेरे लाल, इस दुनिया में जन्म लेने वाला हर बच्चा इतना खुश किस्मत नहीं होता कि उसे माता-पिता का प्यार दुलार नसीब हो। इस दुनिया में सैकडों ऐसे बच्चे हैं जिन्हें नाजायज कहा जाता है। तुम इतने छोटे हो कि नाजायज का मतलब नहीं समझोगे। तेजी से बढ रही दुनिया में बहुत से ऐसे बच्चे हैं जिनका जन्म अवैध हैं ! इनके आने पर किसी तरह की खुशियां नहीं मनाई जाती, बल्कि इन्हें छिपा कर रखा जाता है और मौका लगते ही इन्हें सूनसान इलाकों, कचरा घरों या अनाथालयों में फेंक दिया जाता है। सिंगापुर की एक वेबसाईट में दुनिया के निवासियों की तरफ से दुनिया में जन्में सात अरबवें बच्चे के नाम यह भावुक पत्र लिखा गया है। इस पत्र में धरती के इस नये मेहमान से कहा गया है कि मेरे बच्चे, माता-पिता, भाई-बहन और अन्य चाहने वालों की छत्र छाया में धीरे-धीरे जब तुम बडे होने लगोगे तो तुम्हें अच्छे खिलाने-पिलाने, अच्छी शिक्षा और अच्छा माहौल देने की चिंता उन्हें सताने लगेगी, क्योंकि आसान सी दिखने वाली ये बातें इतनी आसान भी नहीं हैं मेरे चांद।... मासूम बच्चे ... अपने माता-पिता की गोद में चढ कर जब तुम पार्क में जाओगे और अपने नन्हें-नन्हें कदमों से हरी घास में यहां-वहां दौडोगे तो तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा। तुम्हें खिलखिलाता देख बाग-बगीचे, फूल-पत्ती, चिडियां, गिलहरी भी खुश हो जायेंगी, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि हरी-भरी और रंग-बिरंगी दिखने वाली यह दुनिया अंदर से खोखली होती जा रही है। प्रदूषण के कारण जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उत्पादन लगातार घट रहा है। मिट्टी की उर्वरक क्षमता गिर रही है ! जल स्तर भी घट रहा है। उनकी जगह कंक्रीट की भयावह गगनचुंबी इमारतें है। जंगल खत्म होते जा रहे है। हवा रोशनी सब कुछ रोक रही है। आबादी तेजी से बढ रही है। अपराध, बेरोजगारी, असंतोष सब कुछ बढता जा रहा है। तुम्हारे जन्म पर मैं बहुत खुश हूं, लेकिन भविष्य में तुम्हारे सामने आने वाली ढेरों चुनौतियों को देख कर चिंतित भी।
नन्हें फरिश्ते मैं इस बात पर भी शर्मिन्दा भी हूं कि तुम्हारे लिए एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए मैं कुछ भी नहीं कर रहा/रही या दुनियाभर में जो भी प्रयास किये जा रहे है वे बहुत बडा बदलाव लाने में सक्षम नहीं है। लेकिन तमाम चिंताओ, आशंकाओं और मुश्किलों के बावजूद सात अरबवें बच्चें के तौर पर दुनिया में जन्म लेने वाले प्यारे बच्चे तुम्हारा तहे दिल से इस धरती पर स्वागत है। तुम इस दुनिया को बेहतर बनाने की शुरुआत करो... इस दुआ के साथ इस दुनिया में तुम्हारे संगी साथी।

Dark Saint Alaick
02-11-2011, 05:41 PM
मैच फिक्सिंग में 200 साल पहले दी गयी थी पहली सजा


पाकिस्तानी क्रिकेटरों सलमान बट और मोहम्मद आसिफ भले ही अब स्पाट फिक्सिंग के दोषी करार दिये गये हों लेकिन भद्रजनों के खेल में मैच फिक्सिंग की शुरुआत लगभग 200 साल पहले हो गयी थी और तब एक क्रिकेटर पर आजीवन प्रतिबंध भी लगा था।

लंदन के साउथवर्क क्राउन कोर्ट ने कल बट और आसिफ को गलत तरीके से राशि स्वीकार करने का षड्यंत्र रचने और धोखाधड़ी की साजिश रचने का दोषी पाया। इस साजिश में शामिल तीसरे आरोपी मोहम्मद आमिर के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया गया क्योंकि उन्होने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया था।

दिलचस्प तथ्य यह है कि क्रिकेट में फिक्सिंग की शुरुआत तब हो गयी थी जबकि टेस्ट क्रिकेट भी नहीं खेला जाता था। सबसे पहले 1817 से 1820 के आसपास इस खेल की अखंडता खतरे में पड़ती नजर आयी थी। इसी दौरान विलियम लैंबार्ट नामक बल्लेबाज पर मैच फिक्सिंग के लिये प्रतिबंध लगाया गया था जिसके बाद वह फिर कभी क्रिकेट नहीं खेल पाए थे।

यह वह जमाना जबकि सिंगल विकेट क्रिकेट भी खेली जाती थी और तब इस तरह के मैचों पर सट्टा लगाना आसान होता था। इतिहासविद डेविड अंडरडाउन ने अपनी किताब स्टार्ट आफ प्ले-क्रिकेट एंड कल्चर इन एटीन्थ सेंचुरी इंग्लैंड में लिखा है कि असल में सिंगल विकेट क्रिकेट में पूरे 11 खिलाड़ी नहीं होते थे और इसलिए उन्हें फिक्स करना आसान था।

अंडरडाउन के अनुसार, लोग हमेशा क्रिकेट पर सट्टा लगाते थे विशेषकर ड्यूक, राजा और लार्ड्स जो देश चलाते थे। लेकिन धोखाधड़ी या किसी हद तक मैच फिक्सिंग के कुछ आरोप भी लगे थे।

मैच फिक्सिंग के पहले वाकये का जिक्र 1817 में मिलता है। अंडरडाउन के अनुसार उस साल इंग्लैंड और नाटिंघम के बीच खेले गये मैच में कुछ खिलाड़ियों ने जानबूझकर लचर प्रदर्शन किया था। इनमें विलियम लैंबार्ट भी शामिल थे जिन्हें उस समय का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज माना जाता था।

नाटिंघम की तरफ से खेलने वाले लैंबार्ट पर आरोप लगा था कि उन्होंने उस मैच में जानबूझकर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। लैंबार्ट के ही साथी फ्रेडरिक बियुक्लर्क ने इसकी शिकायत एमसीसी से की जिसने लैंबार्ट को लार्ड्स में खेलने से प्रतिबंधित कर दिया था। इस तरह से लैंबार्ट दुनिया के पहले ऐसे क्रिकेटर थे जिन पर मैच फिक्सिंग के लिये प्रतिबंध लगा था।

लैंबार्ट बेहतरीन बल्लेबाज थे। वह पहले ऐसे बल्लेबाज भी थे जिन्होंने पहली बार एक मैच की दोनों पारियों में शतक जमाया था। मई 1817 में बनाया गया उनका यह रिकार्ड 76 साल तक उनके नाम पर रहा था। उन्होंने अपने कैरियर में कुल 64 प्रथम श्रेणी मैच खेले जिनमें उन्होंने 3013 रन बनाये।

इंग्लैंड और नाटिंघम के बीच फिक्स हुए उस मैच के बारे में कहा जाता है कि दोनों टीमों के कुछ खिलाड़ियों ने जानबूझकर अपने विकेट गंवाये, कैच टपकाये और यहां तक कि ओवरथ्रो से रन दिये। इसी तरह के एक ओवरथ्रो को बचाने के प्रयास में बियुक्लर्क की उंगली चोटिल हो गयी थी।

एमसीसी ने इसके बाद मैच फिक्सिंग को लेकर कुछ कड़े कदम उठाये थे और 1820 में लार्ड्स में सटोरियों के आने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस घटना के बाद मैच फिक्सिंग की अगली घटना का जिक्र 1873 में मिलता है जब सर्रे के खिलाड़ी टेड पूली ने यार्कशर से हारने के लिये 50 पौंड लिये थे। सर्रे ने पूली को तब निलंबित कर दिया था। लैंबार्ट के जमाने के दिग्गज बल्लेबाजों में विलियम बेलडैम (सिल्वर बिली) भी शामिल थे। उनसे लंदन में तब एक सटोरिये ने कहा था, यदि आप मेरी बात मानोगे तो बड़ा पैसा बना सकते हो। बाद में बिली ने इस पर कहा था कि वह तो झांसे में नहीं आये लेकिन कई अन्य थे जो इन लोगों (सटोरियों) की बात मान लेते थे।

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 09:03 PM
उर्वशी, किसके ‘उर’ बसी


उपजाऊपन या बहुत कुछ उत्पन्न करने के अर्थ में उर्वर शब्द हिन्दी में सामान्यतौर पर खूब प्रचलित है। उर्वर बनाने की क्रिया उर्वरण है और उर्वर होने की अवस्था या भाव को उर्वरता कह सकते हैं। धरती पर अन्न उपजानेवाली, अन्नदायिनी के रूप में पृथ्वी को भी उर्वरा कहा जाता है। इसका अर्थ खेती योग्य उपजाऊ ज़मीन भी होता है। इसी कड़ी में उर्वी भी आता है जिसका अर्थ भी धरती है। बांग्ला में यह उरबी है और पूर्वी बोलियों में उर्बि भी है और उरा भी। इसी तरह हृदय, मन या चित्त के लिए हिन्दी और इसकी बोलियों में उर शब्द भी प्रचलित है। जाइज़ संतान के लिए हिन्दी में औरस शब्द प्रचलित है। इन तमाम शब्दों का मूल संस्कृत का उरस् माना जाता है जिसका अर्थ है सीना, छाती, वक्षस्थल, स्तन, हृदय, चित्त आदि। रीतिकालीन साहित्य में स्त्री के अंगों की चर्चा आम बात थी। साहित्यिक हिन्दी में स्त्री के स्तनों के लिए उरसिज या उरोज जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। पृथ्वी के अर्थ में उर्वी का अर्थ चौड़ा, प्रशस्त, विशाल और सपाट क्षेत्र भी है।
ख्यात भाषाविद् डॉ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि संस्कृत में उर शब्द खेत के लिए प्रयुक्त नहीं होता किन्तु उर्वरा खेती लायक भूमि को कहते हैं। इसी उर् से पृथ्वी के लिए उर्वी शब्द बना है। उर्वरता का समृद्धि से रिश्ता है। उरु शब्द का अर्थ है विस्तृत, चौड़ा, विशाल आदि। मोनियर विलियम्स ने भी ग्रीक भाषा का एउरुस् अर्थात प्रशस्त, विशद इसी उरु का प्रतिरूप बताया है। जॉन प्लैट्स के कोश में भी उरु का अर्थ चौड़ा और विस्तृत बताया गया है। डॉ शर्मा कहते कि संस्कत में उर् जैसी कोई क्रिया नहीं है। वे इस संदर्भ में द्रविड़ भाषा परिवार से कुछ उदाहरण देते हुए इस शब्द शृंखला की रिश्तेदारी द्रविड़ भाषाओं से स्थापित करते हैं। तमिल में उळू शब्द जोतने, खंरोचने के लिए प्रयुक्त होता है। किसान के लिए उळवन शब्द है। तुलु में यह ड-कार होकर ऊडूनि, हुडुनि हो जाता है जिसमें जोतने का भाव है। तमिल में उळ का अर्थ है भीतर। उरई का अर्थ है निवास करना। कन्नड़ में उरुवु का अर्थ है विस्तृत, विशद। तुलु में उर्वि, उर्बि का अर्थ है वृद्धि। ये तमाम शब्द उर्वर की उपजाऊ वाली अर्थप्रक्रिया से जुड़ते हैं।
रामविलास जी उर् और ऊर का रिश्ता भारोपीय पुर और पूर से भी जोड़ते हैं जिसमें आश्रय का भाव है, निवास का भाव है जो क्षेत्र में भी है। उर्वि यानी पृथ्वी का अर्थ भी क्षेत्र है। पुर का मूल भारोपीय रूप पोल है। ग्रीक में यह पॉलिस है जिसका अर्थ है नगर। पॉलितेस यानी नागरिक और पॉलितिकोस यानी नागरिक संबंधी। रूसी में यही पोल शब्द खेत की अर्थवत्ता रखता है। ग्रीक में भी पोलोस उस भूमि को कहते हैं जो जोती गई है। स्पष्ट है कि संस्कृत के प व्यंजन से जुड़ी गति और चलने की क्रिया ही इस शब्द शृंखला में उभर रही है। भूमि को जोतना यानी चलते हुए उसकी सतह को उलटना-पलटना। संस्कृत का पुर गाँव भी है, नगर भी। बुर्ज, बर्ग भी इसी शृंखला में आते हैं। द्रविड़ भाषा में इसी पुर और पूर में प के व में बदलने से उर् और ऊर् शब्द मिलते हैं। तंजावुर का वुर इसका उदाहरण है। इनका मूलार्थ संभवतः आवास था। वैसे संस्कृत के उरु में निहित विशद की व्याख्या जंघा या वक्ष में हो जाती है। यही दोनों अंग हैं जो सुविस्तृत होते हैं। इसीलिए उर अगर वक्ष है तो उरु का अर्थ जंघा है। विस्तार के इसी भाव की व्याख्या उर्वी में होती है जिसका अर्थ है पृथ्वी, जिसके अनंत विस्तार को देखकर प्राचीनकाल में मनुष्य चकित होता रहा है। जिस पर विभिन्न जीवों का वास है। साहित्यिक भाषा में उर अर्थात हृदय भी आश्रयस्थली है और सहृदय व्यक्ति के उर में पूरा संसार बसता है। उरस् का रिश्ता दरअसल संस्कृत के ऋ से है जिसमें महान, श्रेष्ठ, अतिशय का भाव है। स्पष्ट है कि महान और बड़ा जैसे भावों से ही विस्तार, विस्तृत जैसे अर्थ विकसित हुए। क्षेत्र के अर्थ में उर्वी शब्द सामने आया। कृषि संस्कृति के विकास के साथ जोतने की क्रिया के लिए उर्वरा जैसा शब्द विकसित हुआ जिसमें भूमि को उलट-पुलट कर खेती लायक बनाने की क्रिया शामिल है। पोषण पाने के भाव को अगर देखें तो इस शब्द शृंखला में स्तनों के लिए उरोज और उरसिज शब्दों का अर्थ स्पष्ट होता है।
डॉ राजबली पाण्डेय हिन्दू धर्मकोश में लिखते हैं कि कृषि भूमि को व्यक्त करने के लिए क्षेत्र के साथ साथ उर्वरा शब्द का प्रयोग भी ऋग्वेद और परवर्ती साहित्य में मिलता है। वैदिककाल में भी खेतों की पैमाइश होती थी। गहरी खेती होती थी साथ ही खाद भी दी जाती थी। आज कृत्रिम या रासायनिक खाद के लिए उर्वरक शब्द खूब प्रचलित है जो इसी कड़ी का हिस्सा है। इन सब बातों का उर्वरता से रिश्ता है। ज़मीन और पशुओं के लिए संघर्ष होते थे जो समूहों के शक्ति परीक्षण की वजह बनते थे। स्वामित्व के झगड़े इन्हीं संघर्षों से ही तय होते थे। इन संदर्भों में उर्वराजित् या उर्वरापति जैसे शब्द उल्लेखनीय हैं जिनमें भूस्वामिन् का भाव है। इस कड़ी का एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द है उर्वशी जो स्वर्ग की अप्सरा है और जिसका उल्लेख पौराणिक साहित्य में कई जगहों पर है। एक सामान्य सा अर्थ जो उर्वशी का बताया जाता है वह है पुरुष के हृद्य को वश में कर लेनेवाली- (उर+वशी)। जाहिर है यह अर्थ उर्वशी के अप्सरा होने अर्थात अपार रूप लावण्य की स्वामिनी होने के चलते विकसित हुआ है। दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार नारायणमुनि की जंघा से उत्पन्न होने के कारण उर्वशी को यह नाम मिला। भाव यह है कि जिसका जंघाओं अर्थात उरु में वास हो वह उर्वशी। यह व्युत्पत्ति हरिवंशपुराण में बताई गई है।
(शब्दों का सफर से साभार )

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 09:09 PM
बारिशों से, बारिशों में लिखे खत

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=13255&stc=1&d=1320334723

इक तरफा प्यार भी इक तरफे खतों की तरह होता है...किसी लेखक की बेहद खूबसूरत कवितायें पढ़ कर हो जाने वाले मासूम प्यार जैसा. किसी नाज़ुक लड़की के नर्म हाथों से लिखे मुलायम, खुशबूदार ख़त जब किसी लेखक तक पहुँचते हैं तो उसे कैसा लगता होगा? घुमावदार लेखनी में क्या लड़की के चेहरे का कटीलापन नज़र आता है? क्या सियाही के रंग से पता चलता है की उसकी आँखें कैसी है? काली, नीली या हरी.
हाथ के लिखे खतों में जिंदगी होती है...लड़की को मालूम भी नहीं होता की कब उसके दुपट्टे का एक धागा साथ चला गया है ख़त के तो कभी पुलाव बनाते हुए इलायची की खुशबू. लेखक सोचता की लड़की कभी अपना पता तो लिखती की जवाब देता उसे...कि कैसे उसके ख़त रातों की रौशनी बन जाते हैं. पर लड़की बड़ी शर्मीली थी, दुनिया का लिहाज करती थी...घर की इज्ज़त का ध्यान रखती थी...और आप तो जानते ही हैं कि जिन लड़कियों के ख़त आते है उन्हें अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता.
तो हम बात कर रहे थे इकतरफी मुहब्बत की...या कि इकतरफी चिट्ठियों की भी. ऐसी चिट्ठी लिखना खुदा के साथ बात करने जैसा होता है...वो कभी सीधा जवाब नहीं देता. आप बस इसी में खुश हो जाते हैं कि आपकी चिट्ठियां उस तक पहुँच रही हैं...कभी जो आपको पक्का पता चल जाए कि खुदा आपके ख़त यानि कि दुआएं सच में खोल के पढ़ता है तो आप इतने परेशान हो जायेंगे कि अगली दुआ मांगने के पहले सोचेंगे. गोया कि जैसे आपने पिछली शाम बस इतना माँगा था कि वो गहरी काली आँखों वाली लड़की एक बार बस आँख उठा कर आपकी सलामी का जवाब दे दे. आप जानते कि दुआ कबूल होने वाली है तो खुदा से ये न पूछ लेते कि लड़की से आगे बात कैसे की जाए...भरी बारिश...टपकती दुकान की छत के नीचे अचकचाए खड़ा तो नहीं रहना पड़ता...और लड़की भी बिना छतरी के भीगते घर को न निकलती. न ये क़यामत होती न आपको उससे प्यार होता. आप तो बस एक बार नज़र उठा कर 'वालेकुम अस्सलाम' से ही खुश थे.
यूँ कि बारिशों में किसी ख़ास का नाम न घुला तो तब भी तो बारिशें खूबसूरत होती हैं...अबकी बारिश में यादें यूँ घुल गयीं कि हर शख्स उसके रंग में रंग नज़र आता है. जिधर नज़र फेरें कहीं उसकी आँखें, कहीं भीगी जुल्फें तो कहीं उसी भीगी मेहंदी दुपट्टे का रंग नज़र आता है. हाय मुहब्बत भी क्या क्या खेल किया करती है आशिकों से! घर पर बिरयानी बन रही है और मन जोगी हो चला है, लेखक अब शायर हो ही जाए शायद, यूँ भी उसके चाहने वाले कब से मिन्नत कर रहे हैं उर्दू की चाशनी जुबान में लिखने को. कब सुनी है लेखक ने उनकी बात भला कितने को किस्से लिए चलता है अपने संग, हसीं ठहाके, दर्द, तन्हाई, मुफलिसी, जलालत...लय के लिए फुर्सत कहाँ लेखक की जिंदगी में.
कौन यकीन करे कि लेखक साहब आजकल बारिश में ताल ढूंढ लेते हैं, मीटर बिना सेट किये सब बंध जाता है कि जैसे जिंदगी खातून की आँखों में बंध गयी है. आजकल लेखक ने खुदा को बैरंग चिट्ठियां भेजनी शुरू कर दी हैं...पहले तो सारे वादे दुआ कबूल होने के पहले पूरे कर दिए जाते थे...पर आजकल लेखक ने उधारी खाता भी शुरू करवा लिया है खुदा के यहाँ. दुआएं क़ुबूल होती जा रहीं हैं और खुदा मेहरबान.
कुछ रिश्ते एक तरफ से ही पूरी शिद्दत से निभाए जा सकते हैं. जहाँ दूसरी तरफ से जवाब आने लगे, खतों की खुशबू ख़त्म हो जाती है. वो नर्म, नाज़ुक हाथों वाली लड़की याद तो है आपको, जो लेखक को ख़त लिखा करती थी? जी...जैसा कि आपने सोचा...और खुदा ने चाहा...लेखक को अनजाने उसी से प्यार हुआ. दोनों ने एक दुसरे को क़ुबूल कर लिया.
मियां बीवी भला एक दुसरे को ख़त लिखते हैं कभी? नहीं न...तो बस एक खूबसूरत सिलसिले का अंत हो गया. तभी न कहती हूँ...सबसे खूबसूरत प्रेम कहानियां वो होती हैं जहाँ लोग बिछड़ जाते हैं.
आप किसी को ख़त लिखते हैं तो उनमें अपना नाम कभी न लिखा कीजिए.

-पूजा उपाध्याय

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 09:45 PM
फाउंटेन पेन से निकले अजीबो गरीब किस्से

-पूजा उपाध्याय

नयी कलम से लिखा पहला वाक्य काटने में बड़ा दुःख होता है, वैसे ही जैसे किसी से पहली मुलाकात में प्यार हो जाए और अगले ही दिन उसके पिताजी के तबादले की खबर आये.
'तुम खोते जा रहे हो.' तथ्य की कसौटी पर ये वाक्य ज्यादा सही उतरता है मगर पिछले वाक्य का सरकटा भूत पीछा भी तो नहीं छोड़ रहा. तुम्हारे बिना अब रोया भी नहीं जाता, कई बार तो ये भी लगता है की मेरा दुःख महज एक स्वांग तो नहीं, जिसे किसी दर्शक की जरूरत आन पड़ती हो, समय समय पर. इस वाक्य को लिखने के लिए खुद को धिक्कारती हूँ, मन के अंधियारे कोने तलाशती भी हूँ तो दुःख में कोई मिलावट नज़र नहीं आती. एकदम खालिस दुःख, जिसका न कोई आदि है न अंत.
स्याही की नयी बोतल खोलनी थी, उसके कब्जे सदियों बंद रहने के कारण मजबूती से जकड़ गए थे. मैंने आखिरी बार किसी को दवात खरीदते कब देखा याद नहीं. आज भी 'चेलपार्क' की पूरी बोतल १५ रुपये में आ जाती है. बताओ इससे सस्ता प्यार का इज़हार और किसी माध्यम से मुमकिन है? अर्चिस का ढंग का कार्ड अब ५० रुपये से कम में नहीं आता. गरीब के पास उपाय क्या है कविता करने के सिवा. तुम्हें शर्म नहीं आती उसकी कविता में रस ढूँढ़ते हुए. दरअसल जिसे तुम श्रृंगार रस समझ रहे हो वो मजबूरी और दर्द में निकला वीभत्स रस है. अगर हर कवि अपनी कविता के पीछे की कहानी भी लिख दे तो लोग कविता पढना बंद कर देंगे. इतना गहन अंधकार, दर्द की ऐसी भीषण ज्वाला सहने की शक्ति सब में नहीं है.
सरस्वती जब लेखनी को आशीर्वाद देती हैं तो उसके साथ दर्द की कभी न ख़त्म होने वाली पूँजी भी देती हैं और उसे महसूस करके लिखने की हिम्मत भी. बहुत जरूरी है इन दो पायदानों के बीच संतुलन बनाये रखना वरना तो कवि पागल होके मर जाए...या मर के पागल हो जाए. बस उतनी भर की दूरी बनाये रखना जितने में लिखा जा सके. इस नज़रिए से देखोगे तो कवि किसी ब्रेन सर्जन से कम नहीं होता. ये जानते हुए भी की हर बार मरीज के मर जाने की सम्भावना होती है वो पूरी तन्मयता से शल्य-क्रिया करता है. कवि(जो कि अपनी कविता के पीछे की कहानी नहीं बताता) जानते हुए कि पढने वाला शायद अनदेखी कर आगे बढ़ ले, या फिर निराशा के गर्त में चले जाए दर्द को शब्द देता है. वैसे कवि का लिखना उस यंत्रणा से निकलने की छटपटाहट मात्र है. इस अर्थ में कहा नहीं जा सकता कि सरस्वती का वरदान है या अभिशाप.
तुम किसी अनजान रास्ते पर चल निकले हो ऐसा भी नहीं है(शायद दुःख इस बात का ही ज्यादा है) तुम यहीं चल रहे हो, समानांतर सड़क पर. गाहे बगाहे तुम्हारा हँसना इधर सुनाई देता है, कभी कभार तो ऐसा भी लगता है जैसे तुम्हें देखा हो- आँख भर भीगती चांदनी में तुम्हें देखा हो. एक कदम के फासले पर. लिखते हुए पन्ना पूरा भर गया है, देखती हूँ तो पाती हूँ कि लिखा चाहे जो भी है, चेहरा तुम्हारा ही उभरकर आता है. बड़े दिनों बाद ख़त लिखा है तुम्हें, सोच रही हूँ गिराऊं या नहीं.

हमेशा की तरह, तुम्हारे लिए कलम खरीदी है और तुम्हें देने के पहले खुद उससे काफी देर बहुत कुछ लिखा है. कल तुम्हें डाक से भेज दूँगी. तुम आजकल निब वाली पेन से लिखते हो क्या?

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 09:50 PM
कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता

-अनूप शुक्ला

दुनिया में यह अफ़वाह लोगों ने सच सी मान ली है कि इश्क जवानों का चोंचला है। बुढ़ापे में इश्क नहीं होता। बुजुर्ग लोग केवल जवानों की हरकतें देखकर आह भरते हैं। इस अफ़वाह को फ़ैलाने में आलसी कवियों का हाथ-पैर भी रहा जिन्होंने भीड़- भावना से केवल जवानों के प्रेम का चित्रण किया।

हालांकि इसके खिलाफ़ भी लोगों ने लिखा। एक शेर जो हमें जो याद हैं वे ठेले-खिदमत हैं जो अक्सर शिवओम अम्बरजी सुनाते हैं:

कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता,
आम तब तक मजा नहीं देता जब तक पिलपिला नहीं होता।


ब्लाग-जगत में हमारे सबसे बड़े-बुजुर्गों में भैया लक्ष्मीनारायण गुप्त कानपुर के ही हैं। हमारे ही स्कूल बी.एन.एस.डी. इंटर कालेज के उत्पाद हैं। आजकल अमेरिकियों को गणित पढ़ाते हैं। प्रेम पर जित्ती बोल्ड कवितायें उन्होंने लिखीं हैं उत्ती शायद किसी तथाकथित नौजवान ने भी न लिखी होंगी।

लक्ष्मीजी ने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें आल्हा छंद का किस्सा था। उसको और कुछ कविताओं को लेकर हमने भी आल्हा छंद में प्रेम-कथा लिखी थी। हालांकि इसमें नाम लक्ष्मीजी का है लेकिन जो कोई भी इसे अपनी कथा मानना चाहे तो बाशौक मान सकता है। हमें कौनौ एतराज न होगा। हां, मानने से पहले अपने बेटर-हाफ़ से अनुमति ले लेगा तो अच्छा रहेगा।

आम तौर पर माना जाता है कि प्रेम के बारे में लिखने के लिये अंदाज मुलायम होना चाहिये। इसी बात को गलत ठहराने के लिये हमने यहां वीररस का प्रयोग किया है। आप मुलाहिजा फ़र्मायें, इश्क के दरिया में डूब जायें। यह रिठेल केवल उन लोगों के लिये है जिन्होंने इसे पहले बांचा नहीं। लोग दुबारा पढ़ना चाहे तो उसके लिये भी कोई रोक नहीं है।


वीर रस में प्रेम पचीसी

हमारे पिछली पोस्ट पर समीरजी ने टिप्पणी की :-

मजाक का लहज़ा, और इतनी गहराई के साथ अभिव्यक्ति, मान गये आपकी लेखनी का लोहा, कुछ तो उधार दे दो, अनूप भाई, ब्याज चाहे जो ले लो.

सच में हम पढ़कर बहुत शरमाये। लाल से हो गये। सच्चाई तो यह है कि हर लेख को पोस्ट करने के पहले तथा बाद तमाम कमियां नज़र आतीं हैं। लेकिन पोस्ट करने की हड़बड़ी तथा बाद में आलस्य के चलते किसी सुधार की कोई संभावना नहीं बन पाती।

अपनी हर पोस्ट लिखने के पहले (डर के मारे प्रार्थना करते हुये)मैं नंदनजी का शेर दोहराता हूं:-

मैं कोई बात तो कह लूं कभी करीने से
खुदारा मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।

जबसे रविरतलामीजी ने बताया कि हम सब लोग कूडा़ परोसते हैं तबसे यह डर अउर बढ़ गया। हालांकि रविजी ने पिछली पोस्ट की एक लाइन की तारीफ की थी लेकिन वह हमारी नहीं थी लिहाजा हम उनकी तारीफ के गुनहगार नहीं हुये।

बहुत दिनों से ई-कविता तथा ब्लागजगत में कविता की खेती देखकर हमारे मन में भी कुछ कविता की फसलें कुलबुला रहीं थीं। यह सोचा भी था कि हिंदी ब्लाग जगत तथा ई-कविता की भावभूमि,विषय-वस्तु पर कुछ लेख लिखा जाय ।सोचा तो यह भी था कि ब्लागरों की मन:स्थिति का जायजा लिया जाय कि कौन सी ऐसी स्थितियां हैं कि ब्लागजगत में विद्रोह का परचम लहराने वाले साथी

यूँ तो सीधा खडा हुआ हूँ,
पर भीतर से डरा हुआ हूँ.

तुमको क्या बतलाऊँ यारो,
जिन्दा हूँ, पर मरा हुआ हूँ.

जैसी, निराशावादी मूड की, कवितायें लिख रहे हैं।

लेकिन फिर यह सोचकर कि शायद इतनी काबिलियत तथा कूवत नहीं है मुझमे मैंने अपने पांव वापस खींच लिये क्रीज में। यह भी सोचा कि किसी के विद्रोही तेवर का जायजा लेने का हमें क्या अधिकार है!

इसके अलावा दो लोगों की नकल करने का मुझे मन किया। एक तो लक्ष्मी गुप्त जी की कविता पढ़कर आल्हा लिखने का मन किया । दूसरे समीरलाल जी की कुंडलिया पढ़कर कुछ कुंडलियों पर हाथ साफ करने का मन किया।

बहरहाल,आज सोचा कि पहले पहली चीज पर ही हाथ साफ किया जाय। सो आल्हा छंद की ऐसी तैसी कर रहा हूं। बात लक्ष्मीजी के बहाने कह रहा हूं क्योंकि इस खुराफात की जड़ में उनका ही हाथ है। इसके अलावा बाकी सब काल्पनिक तथा मौजार्थ है। कुछ लगे तो लिखियेगा जरूर।

सुमिरन करके लक्ष्मीजी को सब मित्रन का ध्यान लगाय,
लिखौं कहानी प्रेम युद्ध की यारों पढ़ियो आंख दबाय।

पढ़िकै रगड़ा लक्ष्मीजी का भौजी गयीं सनाका खाय,
आंख तरेरी,मुंह बिचकाया नैनन लीन्ह कटारी काढ़।

इकतिस बरस लौं चूल्हा फूंका कबहूं देखा न दिन रात
जो-जो मागेव वहै खवाया तिस पर ऐसन भीतरघात।

हम तौ तरसेन तारीफन का मुंह ते बोल सुना ना कान
उनकी मठरी,पान,चाय का इतना विकट करेव गुनगान।

तुमहि पियारी उनकी मठरी उनका तुम्हें रचा है पान
हमरा चोला बहुत दुखी है सुन तो सैंया कान लगाय।

करैं बहाना लक्ष्मी भैया, भौजी एक दिहिन न कान,
उइ तौ हमरे परम मित्र हैं यहिते उनका किया बखान।

नमक हमैं उइ रहैं खवाइन यहिते भवा तारीफाचार
वर्ना तुम सम को बनवइया, तुम सम कउन इहां हुशियार।

सुनि हुशियारी अपने अंदर भौजी बोली फिर इठलाय,
हमतौ बोलिबे तबही तुमते जब तुम लिखौ प्रेम का भाव।

भइया अइठें वाहवाही में अपना सीना लिया फुलाय
लिखबे अइसा प्रेमकांड हम सबकी हवा, हवा हुइ जाय।

भौजी हंसिके मौज लिहिन तब अइसा हमें लगत न भाय,
तुम बस ताकत हौ चातक सा तुमते और किया न जाय।

भैया गर्जे ,क्या कहती हो इलू अस्त्र हम देब चलाय,
भौजी हंसी, कहते क्या हो,तुरत नमूना देव दिखाय।

बातन बातन बतझड़ हुइगै औ बातन मां बाढ़ि गय रार
बहुतै बातैं तुम मारत हो कहिके आज दिखाओ प्यार।

उचकि के बैठे लैपटाप पर बत्ती सारी लिहिन बुझाय,
मैसेंजर पर बिजी लगाया,आंखिन ऐनक लीन लगाय।

सुमिरन करके मातु शारदे ,पानी भौजी से मंगवाय
खटखट-खटखट टीपन लागे उनसे कहूं रुका ना जाय।

सब कुछ हमका नहीं दिखाइन बहुतै थ्वारा दीन्ह दिखाय,
जो हम देखा आपहु द्याखौ अपनी आप बतावौ राय।

बड़े-बड़े मजनू हमने देखे,देखे बड़े-बड़े फरहाद
लैला देखीं लाखों हमने कइयों शीरी की है याद।

याद हमें है प्रेमयुद्ध की सुनलो भइया कान लगाय,
बात रसीली कुछ कहते हैं,जोगी-साधू सब भग जांय।

आंख मूंद कर हमने देखा कितना मचा हुआ घमसान
प्रेमयुद्ध में कितने खपिगे,कितनेन के निकल गये थे प्रान।

भवा मुकाबिला जब प्रेमिन का वर्णन कछू किया ना जाय,
फिर भी कोशिश हम करते हैं, मातु शारदे होव सहाय।

चुंबन के संग चुंबन भिरिगे औ नैनन ते नयन के तीर
सांसैं जूझी सांसन के संग चलने लगे अनंग के तीर।

नयन नदी में नयना डूबे,दिल सागर में उठिगा ज्वार
बतरस की तब चली सिरोही,घायल का सुख कहा न जाय।

तारीफन के गोला छूटैं, झूठ की बमबारी दई कराय
न कोऊ हारा न कोऊ जीता,दोनों सीना रहे फुलाय।

इनकी बातैं इनपै छ्वाड़व अब कमरौ का सुनौ हवाल,
कोना-कोना चहकन लागा,सबके हाल भये बेहाल।

सर-सर,सर-सर पंखा चलता परदा फहर-फहर फहराय,
चदरा गुंथिगे चदरन के संग,तकिया तकियन का लिहिन दबाय।

चुरमुर, चुरमुर खटिया ब्वालै मच्छर ब्लागरन अस भन्नाय
दिव्य कहानी दिव्य प्रेम की जो कोई सुनै इसे तर जाय ।

आंक मूंद कै कान बंद कइ द्*याखब सारा कारोबार
जहां पसीना गिरिहै इनका तंह दै देब रक्त की धार।

सुनिकै भनभन मच्छरजी की चूहन के भी लगि गय आग
तुरतै चुहियन का बुलवाइन अउर कबड्डी ख्यालन लाग।

किट-किट दांत बजि रहे ,पूछैं झण्डा अस फहराय
म्वाछैं फरकैं जीतू जैसी ,बदन पसीना रहे बहाय।

दबा-दबउल भीषण हुइगै फिर तौ हाल कहा न जाय,
गैस का गोला बम अस फूटा,खटमल गिरे तुरत गस खाय।

तब बजा नगाड़ा प्रेमयुद्ध का चारों ओर भवा गुलज़ार
खुशियां जीतीं धकापेल तब,मनहूसन की हुइगै हार।

हरा-हरा सब मौसम हुइगा,फिर तौ सबके लगिगै आग
अंग-अंग फरकैं,सब रंग बरसैं,लगे विधातौ ख्यालन फाग।

इहां की बातैं हियनै छ्वाड़व आगे लिखब मुनासिब नाय
बच्चा जो कोऊ पढ़ि ल्याहै तो हमका तुरत लेहै दौराय।

भैया बोले हंसि के ब्वालौ कैसा लिखा प्यार का हाल
अब तौ मानेव हमहूं है सरस्वती के सच्चे लाल।

भौजी बोलीं तुमसा बौढ़म हमें दिखा ना दूजा भाय,
हमतौ सोचा इलू कहोगे ,आजौ तरस गये ये कान।

चलौ सुनावौ अब कुछ दुसरा, देवरन का भी कहौ हवाल
कइसे लफड़ा करत हैं लरिका नयी उमर का का है हाल?

भैया बोले मुस्का के तब नयी उमर की अजबै चाल
बीच सड़क पर कन्या डांटति छत पर कान करति है लाल।

डांटि-डांटि के सुनै पहाडा़, मुर्गौ कबहूं देय बनाय
सिर झटकावै,मुंह बिचकावै, कबहूं तनिक देय मुस्काय।

बाल हिलावै,ऐंठ दिखावै , नखरा ढेर देय बिखराय,
छत पर आवै ,मुंहौ फुलावै लेय मनौना सब करवाय।

इतनेव पर बस करै इशारा, इनका गूंगा देय बनाय
दिल धड़कावै,हवा सरकावै ,पैंटौ ढीली देय कराय।

कुछ दिन मौका देकर देखा ,प्रेमी पूरा बौड़म आय,
पकड़ के पहुंची रतलामै तब,अपना घर भी लिया बसाय।

भउजी की मुसकान देखि के भइया के भी बढ़ि गै भाव
बूढ़े देवर को छोडो़ अब सुन लो क्वारन के भी हाल।

ये है तुम्हरे बबुआ देवर चिरक्वारें और चिर बेताब
बने हिमालय से ठहरे हैं ,कन्या इनके लिये दोआब।

दूर भागतीं इनसे जाती ,लिये सागर से मिलने की ताब
जो टकराती सहम भागती ,जैसे बोझिल कोई किताब।

नखरे किसके चाहें उठाना ,वो धरता सैंडिल की नोक
जो मिलने की रखे तमन्ना, उसे दूर ये देते फेंक।

ये हैं धरती के सच्चे प्रतिनिधि तंबू पोल पर लिया लगाय,
कन्या रखी विपरीत पोल पर, गड़बड़ गति हो न जाय।

सुनिके देवर की अल्हड़ता भौजी मंद-मंद मुस्कांय,
भैया समझे तुरत इशारा सबको कीन्हा फौरन बाय।

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 11:22 PM
क्योंकि शकीरा के पुट्ठे झूठ नहीं बोलते !

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=13256&stc=1&d=1320342695

ये हिंदुस्तान को क्या हो रेला है भई? इन्डिया से शादीशुदा बालबच्चेदार मित्र चैटिया रहे हैं. शकीरा अपने इंडिया मे आ रेली बाबा! उसका वो गाना देखाना है हिप्स डोंट लाई! अर्थात नितंब असत्य नहीं बोलते. हम बोले -

अबे आती है तो आने दे तेरे को क्या?
अबे पता है एक टिकट कित्ते की?
कित्ते की?
३६५० रुपये की!
क्या? चरया गया है क्या साईं?
बंदा ज्यादा बकझक करने के बज़ाए कडी थमा देता है -
देख ले भई!
अबे रुक.
मैं दनाक से केल्कुलेटर खोल के ४३.९३ आजकल के कंवर्जन रेट से भाग दे कर देखता हूं ताकी मामला अपनी डिफ़ाल्ट करंसी मे समझ में आए -

अबे ८३ डालर!!
हव्व
कौन जाएगा देखने?
जनता जाएगी
देसी जनता?
हव्व!
इत्ता पैसा है उनके कने?
हव्व!
क्या बोल रिया है बे?
सही बोल रिया हूं यार!!

शकीरा मेरी फ़ेवरेट पॉप कलाकार हैं, लेकिन इस भाव में तो मैं उनका कंसर्ट कतई ना देखूं!

*-*-*

कल अंतर्यामिणी बता रही थीं की शहर में लायन किंग कंसर्ट हाल में शो करने आएंगे. शायद दफ़्तर वालों की कंसर्ट हाल को दी जाने वाली कार्पोरेट स्पांसरशिप के चलते मिलने वाली मुफ़्त टिकटें पाने का मौका हाथ लगे तो देख आएं.

पत्नी: और अगर टिकटें ना मिलें तो?
स्वामी: हमऊं खरीद के देख लेंगे!
पत्नी: हे हे पता है एक टिकट कितने की है?
स्वामी: कित्ते की?
पत्नी: ८० डालर
स्वामी: रहने दे भई, ये ज़रा महंगी है. हम बिना लायन किंग के ही भले.

भईये अपने इंडिया की महंगाई देख कर तो यहां बैठ के पसीना आ जाता है उससे ज्यादा वहां का उपभोक्तावाद देख कर. मेरे हाई थिंकिंग सिंपल लिविंग वाले इंडिया को अमरीका की हवा लग गई है. लगता है ये नव-भोक्ता चलते दुनिया को पीछे छोड देंगे!

*-*-*

मैं अपने से जरा दूर वाले दफ़्तर में बैठी अमरीकी महिला से पूछता हूं औसत कंसर्ट का टिकट कितने का होता है? वो बोली ५०-६०.. लेकिन मैं काफ़ी समय से किसी कंसर्ट में नही गई!

मैं मुस्कुरा देता हूं मैं भी नहीं गया! लेकिन मेरे भारतीय मित्र शकीरा के कंसर्ट में जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं भारत में अस्सी डालर का टिकट ले कर!
पागल हो गए हैं क्या? वो पूछती है!
उन्हें प्रत्यक्ष कंफ़र्म करना है की शकीरा के हिप्स डोंट लाई!

इस भाव में?
हां!
सचमुच पागल हो गए हैं इस प्रकार के कंसर्ट पर यहां वो बच्चे पैसा खर्च करते हैं जो खुद कमाते हैं फ़िर भी माता-पिता के साथ उनके घर में रहते हैं और अपनी कमाई से ऐश करते हैं वहां कौन करेगा ऐसी चीज़ पर पैसा खर्च?
भारत की जनता करेगी!
इतना पैसा है जनता के पास?
पता नहीं!

मुझे समझ नहीं आया हां बोलू या ना! अभी भी पशोपेश में हूँ! :(

(ई-स्वामी से साभार)

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 11:31 PM
तुम्हारा प्यार, प्यार और हमारा प्यार लफ़डा?


एक बहुत करीबी मित्र से फोन पर बात हो रही थी. वो बोला की उसका साला अपनी पडोसन से प्रेम विवाह कर रहा है. घर वाले राजी खुशी मान गए हैं.

ये वो ही घर वाले हैं, जिन्होंने मित्र की साली की शादी उसकी पसंद लडके से नहीं होनें दी थी और जबरदस्ती कहीं और कर दी थी.

जब कन्या के प्रेम का ज़िक्र हमारे सामने किया गया था तब टांका भिड गया है, ईलू-ईलू का चक्कर है, लफ़डा चल रहा है, नैन-मटक्का हो गया है जैसे वाक्यांशों से उसके प्रेम में पड जाने का दबी ज़बान से इशारा किया गया था. कन्या की शादी कहीं और कर दी गई! आज उसकी गोद में एक पप्पू खेलता है. जबकि वहीं इन साले महाराज के प्रेम प्रकरण की परिणीति विवाह में हो रही है! लडका इकलौता है, उसने पिता का काम काज संभाल लिया है. पिता को डर होगा कहीं फ़िल्मी स्टाईल में बाग़ी ना हो जाए जो दबाव बेटी पर चल गया बेटे पर ना चला. मैं सोचता हूं की क्या वो बहन अपने भाई (और पिता) से कभी पूछेगी कि जी तुम्हारा प्यार, प्यार और हमारा प्यार लफ़डा? शायद वो नहीं पूछेगी क्योंकि वो भी उसे एक लफ़डा मान कर भुला देने में ही समझदारी मानती होगी/दर्शाती होगी! यही होता है.

कमाऊ पुत्र का प्यार, प्यार हो गया! निरीह पुत्री का प्यार लफ़डा कह कर खारिज कर दिया गया! पुत्री का प्यार इसलिये खारिज कर दिया गया की उसे जो लडका पसंद था उसका सामाजिक स्तर यानी आर्थिक आधार कमजोर था. घटनाओं को परिपेक्ष्य विशेष में देखने की कोशिश करता हूं और एक लाठी से सबको हांकने से भी बचता हूं लेकिन बहुत हद तक क्या उपरोक्त घटना हमारे समाज के चलन की तरफ़ इशारा नहीं करती?

मैंने कहीं व्यंग्य किया था की प्रेम के नुस्खे, नियम पत्र-पत्रिकाओं में उपलब्ध हैं. प्रेम के हर चरण में किए जाने वाले कार्य एक पूर्वनिर्धारित नीति के तहत किए जाने होते हैं. प्रेम अंधा नही होता, बाकायदा सोच-समझ कर उगता और ढलता है.

विलुप्तप्राय:वस्था को प्राप्त हो चुका प्रेम इतना लाचार है की उसके अस्तित्व तो क्या उसकी भावनात्मक अस्मिता को भी घर/समाज वालों की स्वीकृत पर आश्रित होना होता है! अन्यथा वो बेचारा लफ़डा/चक्कर/टांका हो के रह जाता है! यदी कहीं अपवादस्वरूप दो लोग सचमुच प्रेम कर बैठें जो बाकयदा सोच-समझ कर उगाया गया तथाकथित प्रेम ना हो, तो उनके प्रेम को अधिक सक्षम पार्टी द्वारा लफ़डा करार दे दिया जाना आम है! ये प्रेम का लफ़डा या चक्कर करार दिया जाना बिल्कुल वैसा ही विसंगत है जैसा देवी की पूजा करने वाले समाज में कन्या भ्रूण-हत्याएं होना. ये दुष्कर्म इतना आम है की अखबारों और न्यूज़ पोर्टल्स की, रोज़मर्रा की भाषा में है!

आज ही का वेबदुनिया के लेख की भाषा पर गौर कीजिये जो हाल में सुर्खियों में आए किन्ही दयानन्द पाण्डे के बारे में है -

सुधाकर के नजदीकी लोगों की मानें तो शुरुआत से ही उसे बेहिसाब धन कमाने का भूत सवार था। उसके पिता उदयभानधर द्विवेदी पुलिस के सबइंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। जब सुधाकर के पिता नवाबगंज में तैनात थे, उस समय सुधाकर का पड़ोस में रहने वाली एक लड़की दीपा के साथ चक्कर चल पड़ा।
कहा जाता है कि गैर बिरादरी की होने के कारण दीपा को सुधाकर के परिवार वालों ने स्वीकार नहीं किया। कुछ जानकार लोगों का कहना है कि इसी लड़की के साथ सुधाकर ने आर्य समाज विधि से शादी भी की, लेकिन उसके विवाह को परिवार वालों ने स्वीकृति नहीं दी। वेबदुनिया

याद दिला दूं की यहां मैं दयानन्द पाण्डे के निजी जीवन की बात नहीं कर रहा. वेबदुनिया की भाषा पर ध्यान दिलवा रहा हूं जो हमारे समाज की सोच और मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है. ये वो ही समाज है जहां दुनिया में सर्वाधिक प्रेम कथाओं वाली फ़िल्में और गाने बनते हैं- पलभर के लिये कोई हमें प्यार कर ले.. झूठा ही सही!

हमारी आम भाषा से हमारी आम सोच का पता चलता है. अभी हम अपने आस-पास प्रेम पनपने दे सकने जैसे समाज नहीं बने भयावह है, नहीं क्या?

(ई-स्वामी से साभार)

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 11:39 PM
एक देसी, एक बीयरएक किस्सा !



सुरक्षा पडताल से दरवाजा नंबर ४२ तक की सामान खींच कदमताल काफ़ी लंबी थी. मुझे डर हुआ की मेरे डीओ की परतों के नीचे से पसीना अपनी उपस्थिती ज़ाहिर ना करने लगे. गर्मी लग रही थी, शरीर का तापमान कम करने के अलावा आगे लंबी दूरी की उडान के लिये खुद को तैयार करना था.

मैं बैठा कुछ देर तक प्रथम श्रेणी सीट की आरामदायक चौडाई महसूस करता रहा. मैं इस आराम से अनुकूलित हो सकता हूं! मैंनें सोचा.

मेरी मां ने एकबार पूछा था तू शराब पीता है? धरती पर आम तौर पे छूता नहीं और आसमान में आम तौर पे छोडता नहीं ..ये जवाव सुन कर मां मुस्कुराईं तो नहीं, पर वो निश्चिंत हो गईं थीं!

जब २२ घंटे की उडान के बाद मुझसे मिलने पहली बार भारत से यहां आईं तो बोलीं इतनी लंबी और पकाऊ फ़्लाईट में तो कोई भी पीने लगे.. सारे पीने वाले जल्दी ही खर्राटे लेने लगे थे!

हजारों मील हवाई धक्के खा चुकने के बाद, एयरलाईन्स वालों नें आज वफ़ादारी का सिला दिया, कोच श्रेणी में यात्रा करने वाले को मुफ़्त का प्रथम श्रेणी उच्चत्व प्राप्त हुआ था.. आम तौर पर सूफ़ी में रहने वाले नाचीज़ का फ़ील गुड एक ग्लास बीयर पी लेने के बाद और भी सेट होने लगा .. ये चिट्ठा लिखने के लिये आदर्श समय था.

मैं मिल्लर कंपनी की बीयर पी रहा था.. इसकी डिस्टिलरी मिलवॉकी,विस्कॉंसिन में मेरे दफ़्तर के रास्ते में पडती थी. वहां यह बीयर पहली बार पिलाते हुए मित्र नें मुझे एक मजेदार किस्सा भी सुनाया था ..मित्र कहने लगा की उसके दफ़्तर की सच्ची घटना है.. भरोसा नहीं हुआ था.. लेकिन बीयर पी कर सुना गया किस्सा बीयर पी कर दोहराया भी तो जा सकता है सो झेलें -

अप्पा पिल्लई नामक साफ़्टवेयर इंजीनियर h1 वीसा पर अमरीका मित्र की कंपनी में पधारा. गूढ दक्षिण भारतीय होने की वजह से जब वो अंग्रेजी बोलता तब भी यूं लगता जैसे कोई दक्षिण भारतीय भाषा ही बोल रहा है.

अप्पा कोई भी बात सीधे नहीं कहता था.

अप्पा एक बार अपने बॉस हैरी के पास गया और बोला हैरी आर यूं एंग्री?

हैरी ने जवाब दिया नो अप्पा .. आई ऐम नाट ऐंग्री!

अप्पा फ़िर बोला ..इट्स १२:३० .. यू आर नाट ऐंग्री?

हैरी संयत हो कर बोला नो अप्पा.. व्हाई वुड आई बी ऐंग्री?

अप्पा नें झल्ला कर मूंह की तरफ़ हाथ से खाने का इशारा करते हुए बोला ऐंग्री?.. ऐंग्री??

ओह .. हंग्री यू मीन? .. हैरी के पल्ले पडा!

दफ़्तर के लोग साथ में एक रेस्टोरंट जाने का कार्यक्रम बना रहे थे और अप्पा नें सोचा की हैरी को भी साथ लें लें!

हैरी मस्त किस्म का बॉस था, आते शुक्रवार वो सबको यूं भी अपने साथ खाने पर ले जाने वाला था.. बोला अगर सारे अपना काम खत्म कर लें तो शुक्रवार को खाने के बाद सप्ताहांत के लिये चंपत हो जाएं ..उसे कोई समस्या नहीं होगी!

तो अब अप्पा नें खुशी-खुशी दफ़्तर में ही पित्जा मंगवा कर काम खत्म करने आईडिया उछाला!

अप्पा स्पीकर फ़ोन पर पित्ज़ा का ऑर्डर दे रहा है .. ताकी सब अपनी फ़रमाईशें बता सकें ..

अप्पा: हैल्लो .. एस .. आई वान्डू औऊडर पी जा!

पीज्जा वाली भैन जी: से यू वान्ट टू पाऊडर व्हाट?

अप्पा: पी जा ..पी जा.. पी एझ इन पैरोट.. आई एझ इन इडिओट..झेड एझ इन झेब्रा.. अनादर झेड एझ इन अनादर झेब्रा.. ए एझ इन अप्पा.. पीजा

पीज्जा वाली भैन जी: ओह पित्ज़ा.. मे आई हैव यूअर नेम प्लीज़!

अप्पा: येस .. इस्ट अप्पा पिल्लई!

पीज्जा वाली भैन जी: एप्पा.. कैन यू स्पैल इट फ़ार मी?

अप्पा: सिंपिल .. सी अप्पा पिल्लई..Appa .. A एझ इन अप्पा, P एझ इन पिल्लई, अनादर P एझ इन अनादर पिलाई, आनादर A एझ इन अनादर अप्पा .. नऊ माई सरनेम.. P एझ इन पिल्लई ..

पीज्जा वाली भैन जी: ओह माई गाड .. कैन यू होल्ड फ़ार ए सेकेंड .. दूसरी ओर से कुछ देर तक संगीत बजता रहा ..फ़िर पिज्जा वाली ने फोन काट दिया! दफ़्तर में सभी का हंस हंस के बुरा हाल था फ़िर किसी और मित्र नें पिज्जा का ऑर्डर पूरा किया!

टेक ऑफ़ के लिये विमान तैयार है .. अगली पोस्ट, कोई और किस्सा ऐसे ही कहीं से समय चुरा कर!
(ई-स्वामी से साभार)

Dark Saint Alaick
03-11-2011, 11:42 PM
वो बोली, इट्स ओके !


वो कार्पोरेट सेल्स के काम से जुडी हुई औरत थी. प्रोफ़ाईल गढूं? किसी गोरी महिला के हिसाब से औसत से कम ऊंचाई, लगभग पांच फ़ुट पांच इंच. इकहरी से कुछ औंस उपर. आंखें चमकीली, कत्थई और शरारती. करीने से किये गए मेक-अप में छुपाए साल जोड कर उम्र मुझसे ज़रा अधिक. बातचीत का सिलसिला उसी ने शुरु किया, वर्ना जैसा की अक्सर होता आया, पूरी फ़्लाईट के दौरान मेरा हैडफ़ोनग्रस्त सिर पुस्तक में ही घुसा रहता.

कुछ आधारभूत नीयम हैं जो लंबे अनुभव के बाद बनाए हैं -

सहयात्री अगर भारतीय महिला है, चाहे जितनी पढी लिखी या आधूनिक दिखे, एकदम दरकिनार कर दो. बातचीत का सिलसिला शुरु करना तो दूर, यदि हम अभिवादन भी कर देंगे तो वो असहज हो जाएगी या एटिट्यूड देगी. जो भी करेगी, जाहिर कर देगी की उसकी निगाह में हम प्रेम चोपडा या शक्ति कपूर की श्रेणी के जीव हैं, और आऊऽऽ..शीलाऽऽ या जमीलाऽऽ टाईप कुछ कह कर उस पे कूदने वाले हैं! तो इतराने मौका ही नहीं देने का, कुढ़ जाए अच्छा!

बाकी महिलाओं के केस में निर्भर करता है की वे कितनी अधिक यात्राएं करती रही हैं. अनुभवी और सहज सहयात्री अलग से दिख जाती हैं. व्यवसाय का असर भी आता है मसलन मार्केटिंग जैसे सेवा क्षेत्रों से जुडी महिलाएं अधिक सहज होती हैं. फ़िर भी अपना अंगूठा टेक नीयम ये है की हैडफ़ोन लगा और मस्त में किताब पढ! साथ बैठी महिला अगर सुंदर है तो सीट पर बैठते वक्त एक हल्की पडताल ले, और ज्यादा ही सुंदर है तो प्लेन से उतरते वक्त दूसरी इस से ज्यादा भाव देना नहीं बनता.

पर ये वाली अलग थी, पास बैठी हाथ मिला कर अपना नाम बताया और भीड भरी फ़्लाईट पर एक टिप्पणी की. मेरे हाथ में जो पुस्तक थी उसका शीर्षक देखा, पूछा कैसी पुस्तक है आदी. ह्म्म चतरी! ये जाते जाते अपना कार्ड देगी, बायोडाटा मांग सकती है, किसी रिक्रूटिंग कंपनी से जुडी हो सकती है. मैं उसे प्रोफ़ाईल में फ़िट करने लगा. हुआ भी वही! सटीक रे सटीक.. पता सी मैन्नू चल कोई नी, साथ बैठी है तो मार ले गप्पें.

दो ग्लास वाईन पी चुकने के बाद बडे आराम से बतिया रही थी. उसे चढी-वढी नहीं थी, बता सकता था वो अभ्यस्त पियक्कड थी.

मेरी मां मेरे यहां रहने आई हुई है.. मेरे पीछे से मेरी चड्डियों के ड्रॉअर तक की झडती ले चुकी है!

तुम्हें कैसे पता?

टोकती है मैं इतनी छोटी और झीनी चड्डियां क्यूं पहनती हूं!.. फ़िर पूछा तो बताने लगी की मेरे कपडों के खाने में देखा उसने.

मैं मुस्कुरा दिया, वो भी!

तुम हमेशा हैडफ़ोन लगाए किताब पढते हो यात्रा करते समय?

हाँ- ये मेरा सिग्नल है की मैं अभी बातचीत नहीं करना चाहता!

तो क्या तुम मुझसे भी बातचीत करना नहीं चाहते थे? मैं तो अपने सहयात्रियों से बात कर लेती हूं!

तुम सुंदर औरत हो, नियंत्रण तुम्हारे हाथ में है, चाहो तो बात करो, चाहो तो ना करो!

सच है! वो हंसी.

और फ़िर सांक्खिकी के हिसाब से तुम जैसी सहयात्री मिलना मुश्किल है, तो फ़ोकट मुस्कुराहटें क्यूं ज़ाया करूं?

फ़िर तो तुम नेटवर्किंग कर ही नहीं सकते!.. देखो ये मछली पकडने के जैसा है.. संख्या के कोई माईने नहीं हैं, कोशिश करते रहने के हैं. मैं कोशिश करती हूं कभी सफ़ल होती हूं और कभी असफ़ल!

मैने मन ही मन सोचा (पट्ठी तेरा एक व्यवसायिक ध्येय है, तुम सफ़र में भी काम कर रही हो. दिलचस्पी तुम्हे इस सहयात्री में नहीं है अपने काम में है! वर्ना तुम भी बात नहीं करतीं- वक्त काटने के लिये भी नहीं!)

लेकिन प्रत्यक्ष में कहा आजकल लोग वक्त काटने के लिये भी अब किसी से बात करना पसंद नहीं करते.. देखो ना अपनी निजता, सुरक्षा के अलावा ऐसे ही व्यव्हारिक कारण हैं की लोग सार्वजनिक स्थानों पर अपने अपने मोबाईल, आई-पाड, लैपटाप में खोए रहने का जतन करते हैं चाहे काम से थके हुए ही क्यों ना हों.. होते सारे अकेले हैं लेकिन अहं के चलते स्वीकारें कैसे.. बेहतर है खुद को व्यस्त दिखाएं!

लेकिन इस बनावटी बर्ताव में भी कई जगह सेंधमारी की जा सकती है. तुम्हें बताऊं नेटवर्किंग करने की एक अच्छी ट्रिक?.. वो है व्यक्तिगत स्पर्श!

कैसे?

जब भी तुम्हें कहीं कभी अच्छी सेवा मिले. कोई अपना काम ठीक से करता हुआ मिले तो ऐसे व्यक्ति के अधिकारी को एक हस्तलिखित संदेश भेजो. ई-मेल भेज दोगे तो वो असर नहीं आएगा. एक अच्छा ईमानदार हस्तलिखित संदेश भेजने के बाद तुम देखोगे की अधिकारी और वो व्यक्ति दोनों तुम्हारे बेहतर सहयोगी बन गए हैं!

ये तो बढिया है! .. थेंक्यू नोट!

मुझे तुम पुरुषों पर कई बार तरस आता है.. आम तौर पर तो हमारा मुस्कुराना भर काफ़ी है, अगर हम किसी पुरुष को कोई निवेदन करते हुए जरा आत्मियता से कंधे पर थपथपा दें; ना भी चाह रहे हों, तब भी वो हमारा काम कर देते हैं. पर तुम लोग स्त्रीयों को अक्सर ऐसा वाला व्यक्तिगत स्पर्श नहीं दे सकते!

अरे यहां तो मुस्कुराने पर भी खलनायक हो चुकने का आभास दिया जाता है!

वो हंसने लगी यस वी हैव द पावर..लेकिन पता है एक बार मैं एक ऐसे ग्रुप में फ़ंस गई थी जहां पर मैं अकेली महिला थी और समूह के पुरुष मुझे अपनी गैंग में स्वीकारने को तैयार ही नहीं थे, ये कंधा थपथपाने वाली आत्मीय स्पर्श भी तब काम नहीं किया!

फ़िर क्या किया तुमनें?

मैनें अपने ब्वायफ़्रैंड से बात की और उसने एक लाजवाब ट्रिक बताई!

क्या?

जब मैं अपने समूह के मर्दों के साथ एक बडी टेबल पर बैठी काम कर रही थी और मुझे हवा सरकानी थी, मैंने बडे आत्मविश्वास से एक ओर झुक कर पूरे जोरदार ध्वन्यात्मक तरीके से काम सरेआम संपन्न किया.. सारे मर्द पहले तो चौंके और फ़िर क्या हंसे!.. गैंग ने तुरंत काम खत्म होने के बाद मुझे अपने साथ खाने पर आने की दावत दे दी!.. तुम पुरुष लोग कितने जंगली और ज़ाहिल होते हो तुम्हारा बाण्डिंग का तरीका है ये?!

ये है खूबसूरत होने का फ़ायदा..अरे ये सोचो की हम कितने फ़रागदिल होते हैं!.. यही काम कोई पुरुष किसी महिलाओं के समूह में कर दे तो बेचारे का क्या हाल हो!

देखो डबल स्टैंडर्डज़ तो दोनो तरफ़ हैं!

मैने गौर से उसकी तरफ़ देखा जैसे शिकायती लहज़े में कह रहा होऊं चल झूट्ठी, अभी दो मिनट पहले तो हम पे तरस खा रही थीहर कहीं तो तुम्हें ज्यादा एडवांटेज मिलता है! हद्द है!!

उसने मेरे चेहरे पर भाव पढे, बडे ही इत्मिनान से मुस्कुराई, बहुत अश्वस्त हो के मेरा कंधा थपथपाया और बोली इट्स ओके!

ओके मानो लाचार भाव से मैने कहा!

हवाईज़हाज ज़मीन से लगा, उसने संपर्क में रहने की हिदायत समेत अपना कार्ड दिया और हम अपने रास्ते हो लिये.

(तो दोहरे मापदंडों की हकीकत चाहे जो है, इट्स ओके! सही है ना!)

(ई-स्वामी से साभार)

Dark Saint Alaick
04-11-2011, 09:51 PM
कार्पोरेट देवियां और उनकी प्रेरक कहानियां

कंपनी जगत में सफलता के सोपान चढते हुए आज अनेक महिलाएं विख्यात कंपनियों के सर्वोच्च पदों को संभाल रही है। इन दृढ निश्चयी महिलाओं ने आत्मविश्वास से घर और कंपनी की जिम्मेदारी में संतुलन बना कर चलने का अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। लेखिका सोनिया गोलानी की नई किताब कार्पोरेट डीवाज यानी कंपनीजगत की देवियां में भारत की ऐसी 18 प्रमुख महिलाओं की कहानी हैं। इसमें उनकी प्रेरणा और उनके उत्साह के स्रोतों को तलाशने की कोशिश है। अंतरंग बातचीत के जरिए यह किताब उन अपारंपरिक शैली और गुप्त मंत्र का खुलासा करती है जिसका उपयोग वे अपने पेशे में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने के लिए करती हैं। पुस्तक के अनुसा इन सारी महिलाओं का एक ही जुनून है - काम और जीवन के प्रति संतुलित रवैया। ब्रिटैनिया इंडस्ट्रीज की प्रबंध निदेशक विनीता बाली विनिर्माण क्षेत्र से संबंधित अपने उद्योग में अपनी बेजोड़ नेतृत्व क्षमता की धाक जमाए हुए हैं। वह आसपास की सकारात्मक चीजों से प्रेरणा ग्रहण करती हैं- फिर चाहे वह खूबसूरत सूर्यास्त हो या फिर शास्त्रीय संगीत। इसी तरह आज वित्तीय जगत में चर्चित चंदा कोचर ने अपने बैंक आईसीआईसीआई बैंक में प्रबंधन प्रशिक्षु के रूप में कदम रखा था। आज वह इसकी प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी हैं। उन्होंने बैंक के साथ अपने लंबे संबंध के बारे में कहा सौभाग्य से मुझे नए कारोबार तैयार करने, चलाने और उन्हें बढाने का मौका मिला। इस प्रक्रिया में तरह तरह के नए अनुभव हुए मैंने अलग-अलग चीजें सीखीं । इससे काम के प्रति कभी उब नहीं हुई।

एक और कहानी राजश्री पथी की है जो राजश्री शुगर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड की अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक हैं जिन्हें तमिलनाडु के एक दूर-दराज इलाके को गन्ने के लहलहाते क्षेत्र में बदलने और अपेक्षाकृत संकीर्ण मानसिकता वाले सामाजिक माहौल में चीनी का सफल विनिर्माण कारोबार चलाने का श्रेय जाता है। उन्होंने अपनी जीवन के सफर के बारे में कहा मैंने हर उस चुनौती को झेला है जिसका सामना एक औरत, इंसान को करना पड़ता है। मेरे रास्ते में जो भी परिस्थितियां आईं उसमें मैंने अपना बेहतरीन प्रदर्शन किया और हर स्थिति में अच्छा इंसान बने रहने की कोशिश की। जब आप अपने साथ ईमानदार होते हैं और ज्यादा लोगों की बेहतरी के लिए काम करते हैं तो आप देखेंगे कि चमत्कार हो रहा है, मुश्किल परिस्थितियों में रास्ता मिलने लगता है और आप किसी ब्रह्मांडीय शक्ति, सर्वोच्च सत्ता, अपने से परे किसी सत्ता पर भरोसा करने लगते जिसकी ओर आप रुख कर सकते हैं। मुंबई की गोलानी अपनी परामर्श कंपनी मैनेजमेंट कंसल्टैंट ग्रुप का दशक भर से प्रबंधन कर रही है। उनकी इस पुस्तक में एक्सिस बैंक की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी शिखा शर्मा, क्रेडिट सुईस इंडिया की प्रबंध निदेशक वेदिका भंडारकर, गोदरेज समूह की कार्यकारी निदेशक तान्या दुबाश, यूबीएस इंडिया के प्रमुख (कंट्री) मनीषा गिरोत्रा, वेलस्पन रिटेल लिमिटेड की कार्यकारी निदेशक दीपाली गोयंका, जिंदल सॉ लिमिटेड की प्रबंध निदेशक स्मिनु की कहानी भी शामिल हैं।

Dark Saint Alaick
09-11-2011, 04:13 PM
बनारस के घाटों पर कल होगा अदभुत नजारा


वाराणसी ! उत्तर प्रदेश में देश की धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी के ऐतिहासिक गंगा घाटों पर कल देव दीपावली पर देवलोक का नजारा देखने को मिलेगा । नीचे कल कल बहती सदा नीरा गंगा की लहरें, घाटों की सीढियों पर जगमगाते लाखों दीपक एवं गंगा के समानांतर बहती हुई दर्शकों को जनधारा देव दीपावली की नाम से आधी रात तक अनूठा दृश्य प्रस्तुत करती है ।
विश्वास, आशा एवं उत्सव के इस अनुपम दृश्य को देखने के उत्सुक देश विदेश के लोग खिंचे चले आते हैं । प्रमुख घाटों पर तिल रखने की जगह नहीं रहती । दुनिया के कोने कोने से पहुंचे देशी-विदेशी पर्यटकों से शहर के होटल एवं धर्मशालाएं पूरी तरह भर गयी हैं । इस अदभुत नजारों को दिखाने का फायदा नाविक भी उठाते हैं और किराये कई गुना बढा देते हैं ।
देव दीपावली का यह तिलस्मी आकर्षण अब अंतर्राष्ट्रीय रूप लेता जा रहा है । दीपावली के पद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को काशी में गंगा के अर्द्ध चन्द्राकार घाटों पर दीपों का अद्भुत जगमग प्रकाश देवलोक जैसा वातावरण प्रतुत करता है । पिछले दस-बारह साल में ही पूरे देश एवं विदेशों में आकर्षण का केन्द्र बन चुका देव दीपावली महोत्सव देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी की संस्कृति की पहचान बन चुका है ।
गंगा के करीब ।0 किलोमीटर में फैले अर्द्धचन्द्राकार घाटों तथा लहरों में जगमगाते-इठलाते बहते दीप एक अलौकिक दृश्य उपस्थित करते हैं । कल शाम होते ही सभी घाट दीपों की रोशनी से नहा उठेंगे ।
शाम गंगा पूजन के बाद काशी के सभी 80 घाटों पर दीपों की लौ जगमगा उठेगी । गंगा घाट ही नहीं अब तो नगर के तालाबों, कुओं एवं सरोवरों पर भी देव दीपावली की परम्परा बन चुकी है ।
देव दीपावली महोत्सव काशी में सामूहिक प्रयास का अदभुत नमूना पेश करता है । बिना किसी सरकारी मदद के लोग अपने घाटों पर लोग न केवल दीप जलाते है बल्कि हफ्तों पूर्व से घाटों की साफ सफाई में जुट जाते हैं ।
कल के ही दिन दशाश्वमेध घाट पर बने राष्ट्र्रीय राजधानी दिल्ली स्थित इंडिया गेट की प्रतिकृति पर सेना के तीनों अंगों के जवानों द्वारा देश के लिए शहीद जवानों को श्रद्धासुमन अर्पित किया जाता है तथा सेना के जवान बैंड की धुन बिखेरते हैं ।
शरद ऋतु को भगवान श्रीकृष्ण की महा रासलीला का काल माना गया है । श्रीमदभागवत गीता के अनुसार शरद पूर्णिमा की चांदनी में श्रीकृष्ण का महारास सम्पन्न हुआ था । एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने देवताओं की प्रार्थना पर राक्षस त्रिपुरा सुर का वध किया था । परम्परा और आधुनिकता का अदभुत संगम देव दीपावली धर्म परायण महारानी अहिल्याबाई से भी जुडा है । अहिल्याबाई होल्कर ने प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर पत्थरों से बना खूबसूरत हजारों दीप स्तंभ स्थापित किया था जो इस परम्परा का साक्षी है । आधुनिक देव दीपावली की शुरुआत दो दशक पूर्व यहीं से हुई थी ।

Dark Saint Alaick
09-11-2011, 04:50 PM
वर्ल्ड हैडेक डे पर विशेष

सिरदर्द में दर्दनिवारक दवाओं के अधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए


नयी दिल्ली ! सिरदर्द से अक्सर पीड़ित रहने वाले लोगों को इसके लिए हमेशा दर्दनिवारक दवाओं का इस्तेमाल करने की बजाय चिकित्सक से सम्पर्क करके जांच करानी चाहिए ताकि मूल कारण का पता लग सके क्योंकि इन दवाओं का यकृत सहित पूरे शरीर पर विपरीत प्रभाव हो सकता है। राजधानी दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल की चिकित्सक डा. विद्या कुमारी का कहना है कि सिरदर्द के कई कारण हो सकते हैं जिनमें आंखों में विकार सबसे आम है। उन्होंने बताया कि रेटीना के आकार में परिवर्तन के चलते आंखों द्वारा देखे जाने वाली चीजें रेटीना पर ठीक तरह से प्रतिबिंबित नहीं हो पातीं जिसके कारण लोगों को पास या दूर की चीजें देखने में परेशानी होती है। उन्होंने बताया कि चीजों को देखने के लिए आंखों पर अधिक जोर पड़ने के कारण इसका प्रभाव माथे की तंत्रिकाओं पर पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप सिरदर्द की समस्या सामने आती है। उन्होंने बताया कि आंखों की जांच नेत्रचिकित्सक से कराकर और सही नम्बर के चश्मे लेकर इस समस्या से निजात मिल सकती है।
डा. विद्या ने बताया कि साइनस की समस्या तथा सर्दी के चलते भी सिरदर्द हो सकता है। सिरदर्द में नाक की तंत्रिकाओं में सूजन आ जाती है जिसके चलते सिरदर्द हो सकता है। इसके साथ ही उच्च रक्तचाप के कारण भी सिरदर्द की समस्या हो सकती है। इसका भी पता चिकित्सक से जांच कराकर ही चल सकता है तथा इसकी दवा लेकर बीमारी का इलाज हो सकता है। उन्होंने बताया कि कुछ लोगों को धूप अथवा शोर से भी सिरदर्द की समस्या हो सकती है। यदि किसी मरीज को धूप अथवा शोर से सिरदर्द की समस्या हो रही है तो उसे इससे बचने की सलाह दी जाती है। उन्होंने बताया कि सिरदर्द की समस्या से ग्रसित मरीज के मामले में चिकित्सक सबसे पहले उनकी आंखों की जांच कराने के साथ ही रक्तजांच, रक्तचाप जांचते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार यह देखने में आता है कि कुछ लोगों को तनाव या चिंता के कारण भी सिरदर्द की समस्या हो जाती है। मरीज जब चिकित्सक के पास जाते हैं तो उनसे बातचीत के आधार पर वह इसकी पहचान कर लेते हैं और उन्हें इससे बचने की सलाह देते हैं। वहीं डा. मनीषा का कहना है कि कई बार सिरदर्द का कारण शरीर में कोई और समस्या के चलते हो सकता है। शरीर में कहीं ट्यूमर बनने पर भी इसका प्रभाव सिरदर्द के रूप में सामने आ सकता है। उन्होंने कहा कि इसीलिए सलाह दी जाती है कि जिन लोगों को अक्सर सिरदर्द की समस्या होती है उन्हें इसके लिए हमेशा दर्दनिवारक दवा लेने की बजाय इसके कारणों का पता लगाने के लिए चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। दर्दनिवारक दवा के इस्तेमाल से सिरदर्द में तात्कालिक लाभ तो मिल जाता है लेकिन इसका शरीर पर विपरीत प्रभाव भी हो सकता है। इसके अलावा मूल कारण उसी तरह से बरकरार रहता है।

Dark Saint Alaick
13-11-2011, 04:02 PM
जरा बेमानी सा है कुछ के लिये यह बाल दिवस........


-हिमांशु सिंह

हर साल बाल दिवस बच्चों की दो तस्वीरों के साथ हाजिर होता है। पहली तस्वीर वह जिसमें बच्चे सुबह उठकर, अच्छे कपड़े पहनकर, टिफिन लेकर स्कूल के लिये रवाना होते हैं और दूसरी तस्वीर वह जिसमें बच्चों को दोपहर की अदद रोटी की जुगाड़ के लिये मेहनत करने काम पर निकलना होता है।

महानगरों के खाते-पीते बच्चों के लिये आज का दिन बाल दिवस की मस्ती भरे कार्यक्रमों का है। लेकिन सीलमपुर का जहीन, जगतपुरी का अमन और कापसहेड़ा की चुनिया ऐसे बच्चे हैं जिनके लिये यह बाल दिवस जरा बेमानी सा है। आज भी उन्हें रोज की तरह जिंदगी की जंग लड़ने के लिये मशक्कत करने निकलना है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में बाल श्रमिकों की संख्या 24.6 करोड़ है जिनमें से भारत में 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं। दिन भर काम करने के बाद सिर्फ मालिकोंं की प्रताड़ना, उनके अपशब्द और कई मामलों में उनकी यौन कुंठाओं की तृप्ति ही ऐसे बच्चों की तकदीर बनती है।

गैर सरकारी संगठन सेव द चिल्ड्रन की प्रिया सुब्रमण्यम बताती हैं कि जहां एक ओर सरकार अपनी योजना शिक्षा का हक की बात कर रही है वहीं देश में छह करोड़ बच्चे विद्यालय से दूर हैं। प्रिया की नजर में यह विडंबना है कि जो सरकार बालश्रम उन्मूलन के कार्यक्रम को सही तरह अंजाम नहीं दे पाई उसने शिक्षा का अधिकार जैसी योजना चलाई। बालश्रम उन्मूलमन कानून में खामियां गिनाते हुये वह कहती हैं कृषि को भी सरकार ने बालश्रम के दायरे में क्यों नहीं रखा।

आजादी की आधी सदी बीत जाने के बाद, सूचकांक के रोज जादुई आंकड़े छू लेने और विकास दर के नये नये दावों के बाद भी झुग्गियों में रह रहे करोड़ों बच्चों के लिये कुछ भी नहीं बदला हैै। अभी भी कॉलोनियों के बाहर पडे कूड़े में जूठन तलाशते और दो जून की रोटी के लिये तरसते बच्चों की संख्या से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि बच्चों के संरक्षण और विकास के नाम पर साल दर साल हो रही योजनाओं का ऐलान कितना बेमानी सा है।

देश में 44 हजार बच्चे हर साल गायब हो जाते हैं। यह बच्चे कहां गये इसका किसी को कुछ पता नहीं चलता। ऐसे बच्चों के यौन शोषण के मामले जितने तंग बस्तियों में हैं उससे कहीं ज्यादा आलीशान इमारतों और बंगलों में सामने आते हैं।

स्माइल फांडडेशन के निदेशक एच एन सहाय का कहना है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में कागजी आंकड़े और जमीनी हकीकत में बहुत फर्क है। उनका मानना है कि सरकार की बाल अधिकारों से जुड़ी योजनाओं में बुनियादी खामियां हैं।

सहाय कहते हैं कि जो बच्चे कभी पाठशाला ही नहीं जा पाये हैं उनके लिये शिक्षा का अधिकार अभी भी बेमानी है। उन्हें पहले अनौपचारिक शिक्षा के जरिये काबिल बनाना चाहिये तब जाकर उन्हें मुख्य शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाना चाहिये।

देश में हर साल 17.6 लाख बच्चों की मौत ऐसी बीमारियों से हो जाती है जिनका इलाज संभव है। ऐसी चुनौतियां इस बात का संकेत हैं कि बाल दिवस के मायने तभी होंगे जब जहीन, अमन और चुनिया जैसे बच्चों को भी बेहतर जीवन मिलेगा।

Dark Saint Alaick
14-11-2011, 05:36 PM
(15 नवंबर को पुण्यतिथि पर)

विनोबा भावे ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक रुप से सत्याग्रह को अपनाया

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=13691&stc=1&d=1321275981

भूदान आंदोलन के जरिए समाज के भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच की गहरी खाई को पाटने में अतुल्य योगदान देने वाले आचार्य विनोबा भावे को महात्मा गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी कहा जाता है। गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव सुरेंद्र कुमार के अनुसार महात्मा गांधी की ओर से वर्ष 1940 में विनोबा को पहला व्यैक्तिक सत्याग्रही कहा जाना इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने सैद्धांतिक और व्यावहारिक रुप से सत्याग्रह को अपनाया। विनोबा भावे भूदान आंदोलन को यज्ञ की संज्ञा दिया करते थे और उनका कहना था कि आंदोलन में भागीदारी करनी पड़ती है, जबकि यज्ञ में आहूति देनी पड़ती है। लिहाजा भूदान आंदोलन के तहत भूस्वामियों को अपनी भूमि की आहुति देनी पड़ी।

सुरेंद्र कुमार ने कहा, विनोबा भावे ने भूदान के जरिए समाज में गहराई तक मौजूद असमानता को दूर करने में काफी हद तक सफलता हासिल की, हालांकि बाद में उस विचार को पूरी तरह कार्यान्वित नहीं किए जाने के कारण उनका सपना पूरी तरह साकार नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि अगर विनोबा ने वह आंदोलन नहीं शुरू किया होता, तो समाज में फैली असमानता से उपजे असंतोष से देश में बड़े पैमाने पर हिंसा भी हो सकती थी। विनोबा मूल रूप से एक सामाजिक विचारक थे और उनका जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिला के गागोदे गांव में हुआ था। शुरुआती शिक्षा के बाद वह संस्कृत में अध्ययन के लिए काशी गए। विनोबा के नेतृत्व में तेलांगाना आंदोलन के दौरान उस क्षेत्र की एक हरिजन बस्ती में भूदान आंदोलन की नींव पड़ी और जल्द ही यह पूरे देश में भूमिहीन मजदूरों की समस्या के हल के तौर पर लोकप्रिय हो गया। इस आंदोलन के तहत उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, उड़ीसा समेत कई राज्यों में बड़े-बड़े भूखंडों के मालिकों ने अपनी जमीन दान दी। देश की आजादी के आंदोलन के दौरान विनोबा को कई बार जेल जाना पड़ा। अपने आंदोलन के दौरान 13 वर्षों तक देश के विभिन्न भागों की पदयात्रा करने वाले विनोबा का निधन 15 नवंबर 1982 को हुआ। आचार्य विनोबा भावे को वर्ष 1958 में सामुदायिक सेवा के लिए पहले मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वर्ष 1983 में उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।

Dark Saint Alaick
14-11-2011, 07:03 PM
50वें साल में प्रवेश कर गया यसुदास का गायन कैरियर

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=13707&stc=1&d=1321281167

तिरूअनंतपुरम ! भारतीय संगीत के दिग्गज के जे यसुदास ने पार्श्वगायक के तौर पर आज 50 वें साल में प्रवेश कर लिया। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में 50,000 से अधिक गीतों के लिए अपने स्वर दिये हैं जिसमें उनकी मातृभाषा मलयालम भी शामिल है। यसुदास ने सबसे पहले 14 नवंबर 1961 को एक संत-सुधारक श्रीनारायन गुरू की एक कविता की चार पंक्तियों को गुनगुनाया था। इस गीत को मलयालम फिल्म कलप्पडुकल में लिया गया था जिसका संगीत एम बी श्रीनिवास ने दिया था। उस समय देश के सबसे अधिक सुने जाने वाले गायकों में शामिल यसुदास के सैकड़ों ऐसे गीत हैं जो आज भी लोगों को उनके मधुर स्वर के कारण बार-बार याद आते हैं। मलयालम के अलावा, तमिल, हिन्दी, तेलगु, कन्नड़, बंगाली, गुजराती जैसे क्षेत्रीय और विदेशी भाषाओं में रशियन, अरबी, लैटिन और अंग्रेजी भाषाओं में भी गायिकी की है। संगीत समीक्षकों के मुताबिक, यसुदास की आवाज में इतनी मिठास होने का कारण उनका अभ्यास, प्रतिबद्धता और कड़ी मेहनत है।
यसुदास की आवाज में काफी विविधता है जिसके कारण उन्होंने विविध प्रकार के गीत गाये। महान गायक यसुदास ने तीन पीढियों की महिला गायिकाओं के साथ युगलबंदी की है जिसमें से कई कलाकार जैसे पी सुशीला एस जानकी, पी लीला, वानी जयराम, चित्रा और सुजाता मशहूर गायिका रही हैं। यसुदास ने महान संगीतकारों जैसे डी देवराजन, एम एस बाबूराज, के राघवन, एम एस विश्वनाथन और एम के अर्जुन के लिए गीत गया है। उन्हें गायकी के लिए सात बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार का खिताब दिया गया है। मलयालम, तमिल, कन्नड, तेलगु और बांगला जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में गायन के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक लिए उन्होंने राज्य पुरस्कार से नवाजा गया है।

Dark Saint Alaick
23-11-2011, 06:25 PM
इंटरनेट ने लौटाई परंपरागत कश्मीरी संगीत की खोई लोकप्रियता


श्रीनगर ! इंटरनेट कश्मीर के परंपरागत संगीत के उद्धारक के रूप में सामने आया है। चाहे वह चकेर हो या सूफी संगीत, बॉलीवुड और टेलीविजन के मुकाबले पिछले दो दशकों से यह पिछड़ गया था लेकिन इंटरनेट ने उसे उसकी खोई लोकप्रियता वापस दिला दी है। केबल चैनलों और टीवी धारावाहिकों के आने से पहले परंपरागत कश्मीरी संगीत ही लोगों के मनोरंजन का एकमात्र माध्यम हुआ करता था। कश्मीरी संगीत कार्यक्रम स्थानीय इलाकों में घाटी के एकमात्र रेडियो स्टेशन से प्रसारित किए जाते थे। वह चकेर और सूफी कश्मीरी गायकों का स्वर्णिम दौर था। उस दौर के गायकों का नाम आज भी कश्मीर के पिछली पीढी को उस दौर की याद दिलाता है। कश्मीरी संगीत आंतकवाद से भी प्रभावित हुआ क्योंकि कुछ आतंकी संगठनों ने गाना गाने और सुनने को इस्लाम के विरूद्ध घोषित कर दिया था। राज्य सरकारें भी गायकों और संगीत को प्रोत्साहन देने में असफल रही। केबल चैनलों के आने से लोगों ने कश्मीरी संगीत सुनना और कम कर दिया। लेकिन अब एक बार फिर से कश्मीरी संगीत की धुन वादी में गूंजने लगी है। इंटरनेट ने तकनीक प्रिय युवाओं को कश्मीरी संगीत के पुराने गौरव की ओर मोड़ दिया है। अब्दुल गफ्फार कनीहामी का गाया 23 साल पुराना गीत मौज पिछले साल यूट्यूब पर अपलोड किया गया जिसे अभी तक हजारों लोगों ने देखा और सुना है। यूट्यूब द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से पता चला है कि यह वीडियो दुनिया भर में लोगों ने देखा जिसमें दुनिया के अलग अलग हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी शामिल हैं।
कनीहामी ने अपने जवानी के दिनों में यह गीत गाया था। आज दो दशक बाद कनीहामी इस पर बात करते हुए कहते हैं कि इंटरनेट ने घाटी के गुम हो चुके संगीत कलाकारों को युवाओं के बीच वापसी का मौका दिया है। कनीहामी ने पीटीआई से बात करते हुए कहा, इंटरनेट कश्मीरी संगीत को बढावा दे रहा है। उन्होंने कहा, युवाओं के लिए पांच-छह घंटे निकालकर महफिलों में आकर गाना गाना और संगीत सुनना मुश्किल काम है। लेकिन इंटरनेट के माध्यम से वह घर बैठे हमारा संगीत सुन सकते हंै। कनीहामी कश्मीर गुलावकर (गायकों) समाज के महासचिव और वरिष्ठ गायक हैं जिन्हें कश्मीरी संगीत की अलग-अलग विधाओं और काव्य रूपों की पूरी समझ है। उन्होंने कहा, सूफी संगीत के अपने छिपे हुए अर्थ हैं, इसे इसी रूप में गाया जाता है। इसे समझने के लिए संयम और समझ होना जरूरी है। वहीं चकेर लोक संगीत है। यह गतिशील है इसमें सामाजिक मुद्दों, हास्य, पुरानी कहानियों आदि का मिश्रण होता है। दूसरे कश्मीरी कलाकार जिनके वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं उनमें गुलजार अहमद गनी, अली मोहम्मद शेख, अब्दुल राशिद हफीज, मोहम्मद सुल्तान भट, गुलाम मोहम्मद दार, वाहिद जिलानी और गुलाम हसन सोफी के नाम शामिल हैं। कश्मीरी सूफी संगीत के पुरोधा मोहम्मद अब्दुल्ला तिबतबाकल के संगीत को भी इंटरनेट के माध्यम से नया जीवन मिला है। उनके वीडियो भी काफी लोग पसंद कर रहे हैं।
एक अन्य कश्मीरी गायक वाहिद जिलानी ने कहा कि इंटरनेट द्वारा कश्मीरी संगीत का प्रचार एक अच्छा संकेत है लेकिन लोगों को इन वीडियो और गानों को अपलोड करते समय ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह हमारी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिलानी ने कहा, कई बार जो वीडियो अपलोड किए जाते हैं वे देखने लायक नहीं होते। उनमें कविताओं को अश्लील वीडियो के साथ मिला दिया जाता है। उन्होंने कहा कि वैसे समय बदल रहा है और इंटरनेट इन गानों को नये दर्शकों तक पहुंचा रहा है जिससे कश्मीरी संगीत के विकास में जरूर मदद मिलेगी। कनीहामी ने भी कहा कि कश्मीरी संगीत उद्योग में बदलाव जरूर आया है लेकिन कुछ विकास नहीं हुआ है। उन्होंने सरकारी संस्थाओं के भ्रष्टाचार में शामिल होने की शिकायत करते हुए कहा कि कश्मीरी कलाकारों को एक पिंजड़े में बंद कर दिया गया है जहां से उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है।

Dark Saint Alaick
27-11-2011, 04:24 PM
बड़े भैय्या के मुकाबले लोकसभा में अधिक सक्रिय हैं वरूण गांधी

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14009&stc=1&d=1322394785 http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14010&stc=1&d=1322394785

नयी दिल्ली ! उत्तर प्रदेश में इन दिनों चुनावी पिच तैयार करने में जुटे राहुल गांधी लोकसभा में सक्रियता के मुकाबले में छोटे भाई वरूण गांधी से पिछड़ गए हैं । 15वीं लोकसभा का कार्यकाल शुरू होने के बाद अभी तक वरूण न केवल हाजिरी के मामले में राहुल से आगे रहे हैं, बल्कि सवाल पूछने के मामले में भी उन्होंने बड़े भाई से बाजी मार ली है । लोकसभा सचिवालय से मिली जानकारी के अनुसार 15वीं लोकसभा में कांग्रेस महासचिव राहुल की हाजिरी का प्रतिशत 43 था, वहीं उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से भाजपा सांसद वरूण की उपस्थिति का आंकड़ा 64 फीसदी रहा है। वरूण की मां और राहुल की चाची मेनका गांधी की हाजिरी का आंकड़ा लोकसभा में 70 फीसदी रहा है । इसी प्रकार वरूण गांधी ने जहां लोकसभा में दो विभिन्न मुद्दों पर चर्चाओं में हिस्सा लिया तो वहीं राहुल गांधी ने केवल एक चर्चा में भागीदारी की । लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवाल पूछने के मामले में भी वरूण गांधी काफी आगे हैं । वरूण गांधी ने प्रश्नकाल के दौरान 389 पूरक और अनुपूरक सवाल किए, जबकि राहुल गांधी ने कोई सवाल नहीं किया।
लोकसभा सचिवालय से प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि न केवल वरूण गांधी, राहुल गांधी के मुकाबले अधिक सक्रिय हैं, बल्कि उनकी मां तथा आंवला (उत्तर प्रदेश) से सांसद मेनका गांधी भी लोकसभा में सक्रिय भूमिका अदा करती हैं । वरूण और मेनका गांधी ने अभी तक एक एक गैरसरकारी विधेयक पेश किया है, जबकि राहुल गांधी यहां भी छोटे भाई से पीछे रह गए हैं । उन्होंने कोई गैर सरकारी विधेयक आज तक किसी भी मुद्दे पर पेश नहीं किया। लोकसभा में मेनका गांधी का हाजिरी का प्रतिशत जहां 70 फीसदी रहा है, वहीं उन्होंने अब तक पांच बार विभिन्न मुद्दों पर हुई चर्चाओं में भाग लिया है तथा 138 पूरक और अनुपूरक सवाल किए हैं । उन्होंने एक निजी विधेयक भी पेश किया है । देवरानी के मुकाबले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की उपस्थिति का प्रतिशत लोकसभा में केवल 42 फीसदी रहा है।

Dark Saint Alaick
27-11-2011, 07:05 PM
आज हरिवंश राय बच्चन की जयंती पर

सांप्रदायिकता और जातिवाद पर एक प्रहार है बच्चन की मधुशाला

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14016&stc=1&d=1322404536

मधुशाला के मायने बहुत से लोगों के लिए अलग हो सकते हैं, लेकिन इस एक शब्द के पर्यायवाची ढूंढने निकलें तो जुबान पर बरबस एक ही नाम आता है हरिवंश राय बच्चन। बच्चन की यह अद्भुत रचना अपने निराले काव्य शिल्प और शब्दों के सटीक चयन के कारण हिन्दी काव्य प्रेमियों के दिल पर आज भी राज कर रही है। बच्चन की इस कृति में हाला, प्याला, मधुशाला और मधुबाला जैसे चार प्रतीकों के जरिए कई क्रांतिकारी और मर्मस्पर्शी भावों को अभिव्यक्ति दी गई है।

युवा कवि और कथाकार विपिन कुमार शर्मा का कहना है कि मधुशाला में डॉ. बच्चन ने सरल लेकिन चुभते शब्दों में सांप्रदायिकता, जातिवाद और व्यवस्था के खिलाफ भी आवाज उठाई है। विपिन ने कहा, शराब को जीवन की उपमा देकर बच्चन ने मधुशाला के माध्यम से साप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की सीख दी।

हिन्दू और मुसलमान के बीच कटुता पर प्रहार करते हुए बच्चन ने लिखा:

मुसलमान और हिन्दू हैं दो,

एक मगर उनका प्याला,

एक मगर उनका मदिरालय,

एक मगर उनकी हाला,

दोनों रहते एक न जब तक,

मंदिर मस्जिद में जाते,

मंदिर-मस्जिद बैर कराते,

मेल कराती मधुशाला

हरिवंश राय बच्चन ने हालांकि मधुशाला पर दो किताबें लिखीं। एक किताब खैय्याम की मधुशाला थी। यह मधुशाला मूलत: फारसी में लिखी गई उमर खैय्याम की रचना से प्रेरित है और इस मूल रचना का रचनाकाल बच्चन की मधुशाला से आठ सौ वर्ष पहले का है। उन्होंने जो दूसरी मधुशाला लिखी, वह पाठकों के बीच काफी चर्चित हुई और उसकी लाखों प्रतियां बिकीं। इस मधुशाला को हर उम्र के लोगों ने सराहा और इसे एक कालजयी कृति के तौर पर पहचान मिली। बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के पास स्थित प्रतापगढ जिले के बाबूपट्टी गांव में हुआ था। वर्ष 1926 में 19 साल के हरिवंश राय ने 14 वर्षीय श्यामा से विवाह किया। लेकिन 1936 में श्यामा का टीबी से देहांत हो गया। 1941 में उन्होंने तेजी से विवाह किया।

वर्ष 1955 में हरिवंश राय दिल्ली आ गए और विदेश मंत्रालय में आॅफिसर आॅन स्पेशल ड्यूटी के पद पर दस साल काम किया। इसी दौरान वह आधिकारिक भाषा के तौर पर हिंदी के विकास से जुड़े और अनुवाद तथा लेखन से उन्होंने इस भाषा को समृद्ध किया। उन्होंने शेक्सपीयर के मैकबेथ और ओथेलो तथा भागवद् गीता का हिन्दी अनुवाद किया। वर्ष 1966 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। तीन साल बाद उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से और 1976 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने एक नवंबर 1984 लिखी जो उनकी अंतिम कविता थी। मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन मेरा परिचय कहने वाले हरिवंश ने 18 जनवरी 2003 को अंतिम सांस ली।

Dark Saint Alaick
28-11-2011, 05:23 PM
29 नवंबर को जे आर डी टाटा की पुण्यतिथि पर

भारतीय नागर विमानन के भी जनक थे टाटा समूह के शीर्ष पुरुष

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14067&stc=1&d=1322484785

सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित देश के प्रसिद्ध उद्योगपति जे आर डी टाटा न केवल टाटा समूह को शिखर पर ले जाने वाले व्यवसायी थे बल्कि वह भारतीय नागर विमानन के जनक भी थे। विप्रो लिमिटेड के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी का कहना है कि जेआरडी टाटा ने हमेशा ही बड़े सपने देखे। उन्होंने हमेशा ही राष्ट्रीय सीमा के पार देखा, जबकि कई भारतीय उद्योगपतियों ने अपने आप को राष्ट्रीय सीमा से घेरे रखा। इससे जेआरडी को न केवल टाटा समूह को बल्कि भारतीय उद्योग को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर लाने में मदद मिली।
फ्रांस के पेरिस में 29 जुलाई, 1904 को जन्मे जेआरडी टाटा का बचपन का ज्यादातर समय फ्रांस में ही गुजरा, अतएव फ्रेंच उनकी पहली भाषा थी। उनके पिता रतनजी दादाभाई टाटा पारसी थे और मां सुजान फ्रांसीसी महिला थीं। प्रारंभ में विमान उड़ाने का प्रशिक्षण लेने वाले जेआरडी टाटा को 10 फरवरी, 1929 को पायलट का लाइसेंस मिला। भारत में पहली बार यह लाइसेंस मिला था। उन्होंने 1932 में भारत की पहली वाणिज्यिक एयरलाइन टाटा एयरलाइन शुरू की, जो 1946 में एयर इंडिया बन गयी। उन्हें विमानन क्षेत्र का जनक माना जाता है।
जे आर डी टाटा 1925 में अवैतनिक एप्रेंटिस के रूप में टाटा एंड संस से जुड़े। सन् 1938 में वह उसके अध्यक्ष चुने गए और भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घराने के प्रमुख बने। उन्होंने इस्पात, इंजीनियरिंग, उर्जा, रसायन आदि में गहरी रूचि ली। कई दशक की अध्यक्षता के दौरान उन्होंने टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढाकर 100 तक पहुंचा दी तथा इसकी परिसंपत्ति 62 करोड़ रूपए से 100 अरब रूपए तक पहुंच गयी। जे आर डी टाटा ने ऐसा करने में उच्च नैतिक मापदंडों पालन किया तथा रिश्वत और कालाधन से बिल्कुल परहेज किया।
वह सर दोराबजी टाटा न्यास की स्थापना से लेकर करीब आधी शताब्दी तक तक उसके न्यासी रहे। उनके मार्गदर्शन में सन् 1941 में न्यास ने एशिया के प्रथम कैंसर अस्पताल टाटा मेमोरियल सेंटर फार कैंसर, रिसर्च एंड ट्रीटमेंट खोला। न्यास ने टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज, टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च तथा नेशनल सेंटर फार परफार्मिंग आर्ट की भी स्थापना की। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. डी. सुब्बाराव का कहना है कि देश के विकास के लिये जे आर डी टाटा पूरी तरह कटिबद्ध थे और वह कमजोर वर्ग के उत्थान के प्रति समर्पित थे।
सुब्बाराव के अनुसार एक बार जब जेआरडी टाटा ने मदर टेरेसा से कहा कि भारत की गरीबी उन्हें व्यथित कर देती है, तब मदर ने उनसे कहा था, मिस्टर टाटा, आप अधिक उद्योग धंधे खोलिए, लोगों को अधिकाधिक रोजगार दीजिए और बाकी ईश्वर के भरोसे छोड़िए।
टाटा ने कंपनी के मामलों में कर्मचारियों को अपनी आवाज रखने देने के लिए प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संबंध कार्यक्रम शुरू किया। कर्मचारियों के कल्याण में विश्वास रखने वाले टाटा ने आठ घंटे के काम, मुफ्त चिकित्सा सहायता, भविष्य निधि, दुर्घटना मुआवजा योजना शुरू की। उनका मानना था कि घर से काम पर निकलने से लेकर घर लौटने तक कर्मचारी ड्यूटी पर है। वह 89 वर्ष की उम्र में स्विटरजरलैंड के जिनीवा में 29 नवंबर, 1993 को चल बसे। उनके सम्मान में संसद की कार्यवाही स्थगित की गई, जबकि गैर संसद सदस्य के लिए ऐसा नहीं होता है।

Dark Saint Alaick
01-12-2011, 06:51 PM
दो दिसंबर को जन्मदिन पर

बच्चों की पत्रिका 'चंदामामा' की स्थापना की थी बी. नागी रेड्डी ने

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14092&stc=1&d=1322749260

सामाजिक सरोकारों से जुड़े सहज विषयों को मसाले में लपेट कर बॉक्स आफिस पर सफल बनाने का नुस्खा अच्छी तरह समझने वाले फिल्म निर्माता निर्देशक बी. नागी रेड्डी ने बच्चों की पत्रिका चंदामामा की स्थापना की थी और आज करीब 65 साल बाद भी इस पत्रिका का सफर जारी है।

फिल्म समीक्षक माया सिंह ने बताया बी. नागी रेड्डी की दिलचस्पी लेखन में शुरू से ही रही। 1945 में उन्होंने आंध्र ज्योति नामक तेलुगु अखबार निकाला। 1947 में उन्होंने बच्चों की पत्रिका चंदामामा शुरू की। आज करीब 65 साल बाद भी चंदामामा बच्चों की पसंदीदा पत्रिका है और लगभग दर्जन भर भाषाओं में इसका प्रकाशन हो रहा है।

फिल्म समीक्षक के. के. यादव ने बताया बी. नागी रेड्डी की फिल्मों को बहुत अधिक गहराई वाली फिल्मों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लेकिन उनकी फिल्मों की खासियत यह थी कि वह विषय को दिलचस्प तरीके से उठाते थे और फिल्म को बॉक्स आफिस पर सफल बनाने के लिए गीत, संगीत, एक्शन, रोमांच, थ्रिलर आदि का भरपूर इस्तेमाल करते थे।

वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक आलोक शर्मा ने कहा उनकी बनाई फिल्म पाताल भैरवी का शीर्षक ही बता देता है कि यह कैसी फिल्म होगी। लेकिन अपने समय में यह फिल्म हिट रही और इसका कारण फिल्म निर्माण से जुड़े हर तत्व का बेहद खूबसूरती से इस्तेमाल करना था। फिल्म निर्माण को वह एक ऐसी कला समझते थे जिसमें उनके अनुसार, कई प्रयोग करने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। यही वजह है कि चेन्नई में उन्होंने विजय वाहिनी स्टूडियो स्थापित किया जो अपने दौर में एशिया का सबसे बड़ा फिल्म स्टूडियो था।

यादव के अनुसार, श्रीमान श्रीमती में उन्होंने हास्य के साथ सभी पक्षों को एक कसी हुई पटकथा में पिरोया और यह एक यादगार फिल्म बनी। इसमें भी विषय आम व्यक्ति से जुड़ा हुआ ही था लेकिन पेश करने का अंदाज निराला था। यही बी नागी रेड्डी की खासियत थी।

आंध्रप्रदेश के कडप्पा जिले के पोट्टिपाडु गांव में दो दिसंबर 1912 को जन्मे बोम्मीरेड्डी नागी रेड्डी (बी. नागी रेड्डी) ने अपने करिअर की शुरूआत तेलुगु फिल्म निर्माता के तौर पर की थी। उन्होंने अपने मित्र और साझीदार अलुर चक्रपाणि के साथ मिल कर चार दशक में चार दक्षिण भारतीय भाषाओं और हिन्दी में 50 से अधिक फिल्में बनाइ। पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक घटनाक्रम और मसाला फिल्मों को दर्शकों के पसंदीदा विषयों के जरिये पेश करने वाले बी नागी ने अपने मित्र चक्रपाणि के निधन के बाद फिल्में बनाना ही बंद कर दिया। इसके बाद वह समाज सेवा में जुट गए। वर्ष 1972 में उन्होंने विजय मेडिकल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट की स्थापना की। इस ट्रस्ट ने 1972 में ही विजय अस्पताल की और 1987 में विजय स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की।

उन्होंने पाताल भैरवी, मिसम्मा, माया बाजार, गुंडम्मा कथा, राम और श्याम, श्रीमान श्रीमती, जूली तथा स्वर्ग नरक फिल्में बनाइ। हिन्दी, तेलुगु और तमिल सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान मिले। भारत सरकार ने 1986 में उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के सम्मान प्रदान किया। आंध्रप्रदेश सरकार ने 1987 में उन्हें रघुपति वेंकैया अवार्ड, तमिलनाडु सरकार ने 1972 में कलैमामनी अवार्ड से सम्मानित किया। 25 फरवरी 2004 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

Dark Saint Alaick
02-12-2011, 05:26 PM
तीन दिसंबर को जयंती पर
खुदीराम : 19 साल की उम्र में देश पर कर दी जान निसार

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14139&stc=1&d=1322830594

भारत की जंग ए आजादी का इतिहास क्रांति की एक से बढकर एक घटनाओं से भरा पड़ा है। इसी कड़ी में खुदीराम बोस का भी नाम शामिल है जो केवल 19 साल की उम्र में देश के लिए मर मिटे। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में तीन दिसंबर 1889 को जन्मे खुदीराम बोस ने आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए नौवीं कक्षा के बाद ही पढाई छोड़ दी थी । उन्होंने रेवोल्यूशनरी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और वंदेमातरम लिखे पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल विभाजन के विरोध में 1905 में चले आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही ।

इतिहासकार शिरोल ने खुदीराम के बारे में लिखा है कि बंगाल के इस वीर को लोग अपना आदर्श मानने लगे थे। साहस के मामले में खुदीराम का कोई जवाब नहीं था । 28 फरवरी 1906 को जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो वह कैद से भाग निकले । दो महीने बाद वह फिर से पकड़े गए, लेकिन 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया। प्रोफेसर कांति प्रसाद के अनुसार खुदीराम का क्रांतिकारी व्यक्तित्व बचपन में ही दिखाई देने लगा था । एक बार खुदीराम ने क्रांतिकारी नेता हेमचंद्र कानूनगो का रास्ता रोककर अंग्रेजों को मारने के लिए उनसे बंदूक मांगी। खुदीराम की मांग से हेमचंद्र यह सोचकर आश्चर्यचकित रह गए कि इस बालक को कैसे पता कि उनके पास बंदूक मिल सकती है।

खुदीराम ने छह दिसंबर 1907 को नारायणगढ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, लेकिन वह बच गया। उन्होंने 1908 में दो अंग्रेज अधिकारियों वाटसन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन ये दोनों भी बच निकले। बंगाल का यह वीर क्रांतिकारी मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा था । इस जज ने कई क्रांतिकारियों को कड़ा दंड दिया था। खुदीराम ने अपने साथी प्रफुल्ल चंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई। दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम से हमला किया लेकिन उस समय इस गाड़ी में किंग्सफोर्ड की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं सवार थीं जो मारी गईं। इन क्रांतिकारियों को इसका काफी अफसोस हुआ।

पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। खुदीराम पकड़े गए, जबकि प्रफुल्ल चंद चाकी ने खुद को गोली मारकर जान दे दी। ग्यारह अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम को फांसी दे दी गई। देश के लिए शहीद होने के समय खुदीराम की उम्र मात्र 19 साल थी। बलिदान के बाद यह वीर इतना प्रसिद्ध हो गया कि बंगाल के जुलाहे खुदीराम लिखी धोती बुनने लगे। शिरोल ने लिखा है, बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। स्कूल बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

Dark Saint Alaick
04-12-2011, 12:24 PM
शाहन के शाह/सूफी संतों ने दिलायी मिटती पहचान एक महामनीषी को

हिन्दू ने ललद्यद तो मुस्लिमों ने लाल अरीफा में खोजी आस्था

वह पगली-सी महिला तो अपने में मस्त थी। लेकिन कुछ शरारती बच्चों ने उसे छेड़ना शुरू कर दिया। पगली ने कोई प्रतिकार नहीं किया। यह देखकर बच्चे कुछ ज्यादा ही वाचाल हो गये। पूरे इलाके में यह माहौल किसी खासे मनोरंजक प्रहसन से कम नहीं था। बच्चों के हो-हल्ले ने बाजार में मौजूद लोगों को भी आकर्षित कर लिया। कुछ ने शरारती बच्चों को उकसाया तो कुछ खुद ही इस खेल में शामिल हो गये। कुछ ऐसे भी लोग थे, जो सक्रिय तो नहीं रहे, लेकिन मन ही मन उस पगली को परेशान देखकर विह्वल हो उठे। मामला भड़कता देख एक दुकानदार ने हस्तक्षेप कर ही दिया और शरारती बच्चों को डांट कर भगाते हुए पगली को अपनी दूकान पर ले आया। पानी पिलाया, बोला: इन लोगों को तुमने डांटा क्यों नहीं।

पगली ने कोई जवाब देने के बजाय दुकानदार से थोड़ा कपड़ा मांगा। मिलते ही उसके दो टुकडे कर दोनों को तुलवा लिया। दोनों का वजन बराबर था। अब एक को दाहिने और दूसरे को बायें कंधे पर रख कर बाजार निकल गयीं। कोई निंदा करता तो दाहिने टुकड़े पर गांठ लगा लेतीं और प्रशंसा करने पर बांयें कंधे के टुकड़े पर। शाम को वापस लौटीं तो दोनों टुकड़े दुकानदार को देते हुए बोली : इसे तौल दीजिए।

दोनों टुकड़ों को गौर से दुकानदार ने देखा एक में गांठें ही गांठें थी, जबकि दूसरे में बस चंद ही गांठ। बहरहाल, तौल कर बताया कि दोनों टुकड़ों के वजन में कोई अंतर नहीं है। पगली ने जवाब दिया : किसी की निंदा या प्रशंसा की गांठों से क्या असर पड़ता है। दुकानदार अवाक रह गया। फौरन पगली के पैरों पर गिर पड़ा। यह थीं लल्लेश्वरी उर्फ लालदेई। बस इसी एक घटना से लल्लेश्वरी के सामने कश्मीरी लोग नतमस्तक हो गये। इसके बाद तो इस महिला के ज्ञान के मानसरोवर से वह अद्भुत बातें लोगों के सामने फूट पड़ी जिसकी ओर लोग अब तक अज्ञान बने हुए थे। उनकी वाणी से फूटे काव्य रूपी वाक्यों को कश्मीरी समाज ने वाख के नाम से सम्मानित कर बाकायद पूजना शुरू कर दिया। यह परम्परा आज तक कायम है।

यह चौदहवीं शताब्दी की बात है। श्रीनगर में पोंपोर के पास ही है सिमपुर गांव। मात्र 15 किलोमीटर दूर। यहां के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी थीं ललदेई। शुरू से ही शिव की उपासना में लीन रहने के चलते वे अपने आसपास की घटनाओं के प्रति बहुत ज्यादा लिप्त नहीं रहती थीं। पास के ही पद्यपुरा गांव के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में उनका विवाह हुआ। हालांकि लल्लेश्वरी खुद भी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन वे अपने अनपढ़ पति को स्वीकार नहीं कर सकीं। उन्हें लगता था कि स्वयं को अभिव्यक्त कर पाने लायक क्षमता तो मानव में होनी ही चाहिए। बस, उन्होंने घर-परिवार को छोड़ दिया और शिव-साधना का मार्ग अख्तियार कर लिया। भावनाओं का समंदर हिलोरें तो ले ही रहा था, अब वह जन-जन तक पहुंचने लगा। बस कुछ ही समय के भीतर ललद्यद की रचनाएं घर-घर पहुंच गयीं। बाद में तो उन्हें कश्मीरी भाषा और साहित्य की विधात्री देवी तक की उपाधि जन-जन ने दे दी।

यह वह दौर था जब कश्मीर में दो परस्पर विरोधी संस्कृतियों में घमासान मचा हुआ था। राजनीतिक अशांति जनमानस को बुरी तरह मथ रही थी। प्रताड़ना के नये-नये किस्से लिखे और सुने जा रहे थे। लेकिन इसके साथ ही एक ओर जहां ब्राह्मण भक्तिवाद लोगों को एकजुट कर ताकत दे रहा था, वहीं सूफीवाद भी लोगों में प्रेम और अपनत्व का भाव पैदा करने का अभियान छेड़ हुए था। अचानक ही कश्मीर में इन दोनों भक्ति-संस्कृतियों का मिलन हो गया। शिवभक्ति में लीन ललद्यद को सूफी शेख नूरउद्दीन का साथ मिल गया। लेकिन अब तक ललदेई ने कुण्डलिनी योग के साथ हठयोग, ज्ञान योग, मंत्रयोग और भक्तियोग में महारथ हासिल कर ली थी। इधर-उधर भटकने के बजाय वे ईश्वर को अपने आसपास ही खोजने की वकालत करती हैं।

उनका कहना था कि मैंने शिव को पा लिया है, और यह मुझे कहीं और नहीं, बल्कि खुद अपनी ही जमीन पर खड़ी आस्थाओं में मिल गया। बाद के करीब छह सौ वर्षों तक उन्हें केवल हिन्दू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम धर्मगुरुओं ने पूरे सम्मान के साथ याद किया। चाहे वे 18 वीं शताब्दी की रूपा भवानी रही हों या फिर 19 वीं सदी के परमानन्द, सभी ने ललदेई की जमकर प्रशंसा की और जाहिर है इनकी लीकें ललद्यद की राह से ही गुजरीं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि वे हिन्दुओं तक ही सीमित रहीं। बल्कि हकीकत तो यह रही कि हिन्दू तो उनका नाम तक बिगाड़ चुके थे। ललिता का नाम बिगड़ कर लाल हो गया। पहचान तक खत्म हो जाती अगर सूफियों ने उन्हें न सहेजा होता। वह तो सन 1654 में बाबा दाउद मुश्काती ने अपनी किताब असरारूल-अबरार में उनके बारे में न लिखा होता। सन 1746 में लिखी वाकियाते-कश्मीर में भी उन पर खूब लिखा गया।

दरअसल, ललद्यद ने कश्मीर में तब प्रचलित सिद्धज्ञान के आधार पर पनपे प्रकाश में स्वयं की शुद्धता, मसलन सदाचार व मानव कल्याण को न केवल खुद अपनाया, बल्कि अपने भाव-व्यवहार से दूसरों को भी इसी राह पर चलने की प्रेरणा दी। बाद के साहित्यकारों और आलोचकों ने उन्हें कश्मीरी संस्कृति का कबीर तक मान लिया। लल्लेश्वरी के नाम एक नहीं, अनेक हैं। लोगों ने उन्हें मनमाने नामों से पुकारा है। जिसमें जो भाव आया, उसने उन्हें इसी भाव से पुकार लिया। किसी ने उन्हें ललेश्वरी कहा, तो किसी ने लल्लेश्वरी, ललद्यद, ललारिफा, लला अथवा ललदेवी तक कह दिया। किसी की निगाह में वे दैवीय क्षमताओं से युक्त साक्षात भगवान की प्रतिमूर्ति हैं तो कोई उन्हें कश्मीरी भाषा की महान कवि मानता है। एक ओर जहां उनके नाम पर स्थापित प्रचीन मंदिर में बाकायदा उनकी उपासना होती है, वहीं लाल-वाख के नाम से विख्यात उनके प्रवचनों का संकलन कश्मीरी साहित्य का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग समझा जाता है।

दरअसल, संत परम्परा को कश्मीर में श्रेष्ठ बनाने के लिए लल्लेश्वरी का योगदान महानतम माना जाता है। कहा जाता है कि शिव की भक्ति में हमेशा लीन रहने वाली इस कवयित्री के जीवन में सत्य, शिव और सुंदर का अपूर्व समन्वय और संयोजन था। वह विरक्ति के साथ ही भक्ति की भी प्रतीक थीं। उन्होंने विरक्ति की ऊंचाइयों का स्पर्श किया और इसी माध्यम से शिव स्वरूप में स्वयं को लीन करते हुए वे अपने तन-मन की सुध तक भूल जाती थीं। वे गली-कूचों में घूमती रहती थीं। शेख नूरउद्दीन को ललदेई के बारे में यह बात महज यूं ही नहीं कहनी पड़ी होगी:- उन्होंने ईश्वरीय प्रेम का अमृत पिया, और हे मेरे मौला, मुझे भी वैसा ही तर कर दे। सन 1320 में जन्मी लाल अरीफा यानी ललद्यद सन 1389 में परमशिव में स्थाई आश्रय पा गयीं। लेकिन किंवदंती के अनुसार अंत समय में उनके हिन्दू-मुसलमान भक्त उनके पास भीड़ की शक्ल में मौजूद थे कि अचानक ही उनकी देह से एक शिव-आकार की ज्योति निकली और इसके पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वह अनंत आकाश में शिवलीन हो गयी।

-कुमार सौवीर

Dark Saint Alaick
04-12-2011, 04:16 PM
पांच दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस पर

स्वयंसेवक जुड़ते जाते हैं और बढता जाता है कारवां...


देश में बढते भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाले गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन को जन जन तक पहुंचाने में स्वयंसेवकों ने भगीरथ प्रयास किया, जिसकी बदौलत इसे देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भरपूर समर्थन मिला। टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य मनीष सिसौदिया ने बताया कि अन्ना का भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया जा रहा पूरा आंदोलन स्वयंसेवकों पर आधारित है । उन्होंने कहा, जन लोकपाल के लिये चलाये जा रहे इस आंदोलन के दौरान हमने स्वयंसेवकों को कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया। हमने केवल स्वयंसेवकों को अपना विचार बताया और लोग इससे जुड़ते चले गये । पूरे आंदोलन के दौरान हमेशा हमने यही किया जैसे जंतर मंतर पर जब अन्ना जी अनशन करने वाले थे तब हमने संदेश दिया 74 साल का बूढा आदमी आपके बच्चों के लिये अनशन कर रहा है। आप अपने देश के लिये क्या कर रहे हैं ।
उन्होंने कहा, स्वयंसेवकों को यदि ठीक ढंग से यह बता दिया जाये कि क्या करना है और क्यूं करना है तो वह अपने आप आंदोलन से जुड़ते जाते हैं और उसे आगे बढाते हैं । दिल्ली में अन्ना जी से जुड़े हुए 150 समर्पित स्वयंसेवक हैं, जो अपना काम करने के साथ साथ इस आंदोलन के लिये अपना समय दे रहे हैं ।
टीम अन्ना की साइबर मीडिया की कमान संभालने वाले स्वयंसेवक शिवेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि इस आंदोलन की शुरूआत 30 जनवरी 2011 को भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला मैदान से जंतर मंतर तक रैली निकाले जाने से हुई । इसके बाद उन्होंने फेसबुक के जरिये देश के अन्य शहरों मुंबई, औरंगाबाद, पटना और वाराणसी में अपने साथियों को ऐसी ही रैली के लिये सहमत किया। उन्होंने कहा, इसी के साथ फेसबुक पेज के जरिये हमारे अभियान की शुरूआत हो गई और हमने लोगों को उनके अपने शहर में जुड़ने, एकजुट होने और स्वयंसेवक बनने के लिये आमंत्रित करना शुरू किया । इस अभियान को जबर्दस्त समर्थन मिला और हमने 30 जनवरी को 60 शहरों में बेहद आसानी से रैली निकाली।
शिवेंद्र ने कहा, सब कुछ स्वयंसेवकों द्वारा आयोजित किया जाता था और हम केवल उन्हें दिशा निर्देश भेज देते थे । हम उन्हें शांतिपूर्वक रैली निकालने और अपनी मांगों को रखने के बारे में बताते थे। इस दौरान अमेरिका में रह रहे कुछ भारतीयों ने भी हमारे फेसबुक पेज के जरिये हमसे संपर्क किया । मैंने उनसे अमेरिका के शहरों में इसी तरह के विरोध प्रदर्शन आयोजित करने का अनुरोध किया और चार लोगों ने बहुत उत्सुकता के साथ इसका जवाब दिया। इन भारतीयों ने अमेरिका के न्यूयार्क, लास एंजिलिस, वाशिंगटन डीसी और शिकागो में भ्रष्टाचार के खिलाफ रैली निकली । हमारे इस आंदोलन का वैश्विक स्तर पर विस्तार केवल स्वयंसेवकों से मिली मदद की वजह से हुआ और यह लगातार बढ रहा है।

इस आंदोलन को मिली अपार सफलता पर सिसौदिया ने कहा, यदि लोगों को यह लग गया कि कोई आंदोलन मेरे फायदे के लिये है तो अपने आप वह इससे जुड़ जाते हैं । आज के समय में हरेक व्यक्ति अपनी पहचान ढूंढ रहा है । अन्ना जी के आंदोलन के साथ जुड़कर लोगों को लगा कि यह देश और समाज के लिये उपयोगी है और इसीलिये लोग इससे जुड़ते गये। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र स्वयंसेवकों के योगदान के बारे में जन जागरूकता बढाने के लिये वर्ष 1985 से आज के दिन को अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस के रूप में मना रहा है। इस बार संयुक्त राष्ट्र स्वयंसेवकों की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी करने जा रहा है।

Dark Saint Alaick
04-12-2011, 06:25 PM
श्रद्धांजलि
तू तो न आए तेरी याद सताए

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14157&stc=1&d=1323006914

ताउम्र जिंदगी का जश्न मनाने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद सही मायने में एक अभिनेता थे जिन्होंने अंतिम सांस तक अपने कर्म से मुंह नहीं फेरा। देव साहब की तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में एक ऐसे शख्स की है जिसका पैमाना न केवल जिंदगी की रूमानियत से लबरेज था बल्कि जिसकी मौजूदगी आसपास के माहौल को भी नयी ताजगी से भर देती थी। इस करिश्माई कलाकार ने मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया के दर्शन के साथ जिंदगी को जिया । यह उनकी 1961 में आयी फिल्म हम दोनों का एक सदाबहार गीत है और इसी को उन्होंने जीवन में लफ्ज दर लफ्ज उतार लिया था।
देव साहब ने बीती रात लंदन में दुनिया को गुडबॉय कह दिया। सुनते हैं कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। वैसे तो वह जिंदगी के 88 पड़ाव पार कर चुके थे लेकिन वो नाम जिसे देव आनंद कहा जाता है, उसका जिक्र आने पर अब भी नजरों के सामने एक २०-25 साल के छैल छबीले नौजवान की शरारती मुस्कान वाली तस्वीर तैर जाती है जिसकी आंखों में पूरी कायनात के लिए मुहब्बत का सुरूर है। देव साहब के अभिनय और जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कलाकारों ने फिल्मों में नायक की भूमिकाएं करना छोड़ दिया था उस समय भी देव आनंद के दिल में रूमानियत का तूफान हिलोरे ले रहा था और अपने से कहीं छोटी उम्र की नायिकाओं पर अपनी लहराती जुल्फों और हालीवुड अभिनेता ग्रेगोरी पैक मार्का इठलाती टेढी चाल से वह भारी पड़ते रहे। जिद्दी से शुरू होकर देव साहब का फिल्मी सफर जानी मेरा नाम , देस परदेस, हरे रामा हरे कृष्ण जैसी फिल्मों से होते हुए एक लंबे दौर से गुजरा और अपने अंतिम सांस तक वह काम करते रहे । उनकी नयी फिल्म चार्जशीट रिलीज होने के लिए तैयार है और वह अपनी फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा की अगली कड़ी पर भी काम कर रहे थे, लेकिन इस नयी परियोजना पर काम करने के लिए देव साहब नहीं रहे। बीते सितंबर में अपने 88वें जन्मदिन पर दिए एक अंतिम साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, मेरी जिंदगी में कुछ नहीं बदला है और 88वें साल में मैं अपनी जिंदगी के खूबसूरत पड़ाव पर हूं। मैं उसी तरह उत्साहित हूं, जिस तरह 20 साल की उम्र में होता था। मेरे पास करने के लिए बहुत काम है और मुझे चार्जशीट के रिलीज होने का इंतजार है। मैं दर्शकों की मांग के अनुसार, हरे रामा हरे कृष्णा आज की पटकथा पर काम कर रहा हूं।
देव साहब की फिल्में न केवल उनकी आधुनिक संवेदनशीलता को बयां करती थीं बल्कि साथ ही भविष्य की एक नयी इबारत भी पेश करती थीं । वह हमेशा कहते थे कि उनकी फिल्में उनके दुनियावी नजरिए को पेश करती हैं और इसीलिए सामाजिक रूप से प्रासंगिक मुद्दों पर ही आकर बात टिकती है। उनकी फिल्मों के शीर्षक अव्वल नंबर, सौ करोड़, सेंसर, मिस्टर प्राइम मिनिस्टर तथा चार्जशीट इसी बात का उदाहरण हैं। वर्ष 2007 में देव साहब ने अपने संस्मरण रोमांसिंग विद लाइफ में स्वीकार किया था कि उन्होंने जिंदगी में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और हमेशा भविष्य को आशावादी तथा विश्वास के नजरिए से देखा। अविभाजित पंजाब प्रांत में 26 सितंबर 1923 को धर्मदेव पिशोरीमल आनंद के नाम से पैदा हुए देव आनंद ने लाहौर के गवर्नमेंट लॉ कालेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की शिक्षा हासिल की थी। नामी गिरामी वकील किशोरीमल के वह दूसरे नंबर के बेटे थे । देव की छोटी बहन शीलकांता कपूर है, जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्माता शेखर कपूर की मां हैं । उनके बड़े भाई चेतन आनंद और छोटे भाई विजय आनंद थे। अभिनय के प्रति उनकी दीवानगी उन्हें अपने गृह नगर से मुंबई ले आयी जहां उन्होंने 160 रूपये प्रति माह के वेतन पर चर्चगेट पर सेना के सेंसर आफिस में कामकाज संभाल लिया । उनका काम था सैनिकों द्वारा अपने परिजनों को लिखे जाने वाले पत्रों को पढना ।
उन्हें पहली फिल्म 1946 में हम एक हैं मिली । पुणे के प्रभात स्टूडियो की इस फिल्म ने उनके कैरियर को कोई रफ्तार नहीं दी। इसी दौर में उनकी दोस्ती साथी कलाकार गुरू दत्त से हो गयी और दोनों के बीच एक समझौता हुआ । समझौता यह था कि यदि गुरू दत्त ने फिल्म बनायी तो उसमें देव आनंद अभिनय करेंगे। देव आनंद को पहला बड़ा ब्रेक अशोक कुमार ने जिद्दी में दिया । बांबे टाकीज की इस फिल्म में देव साहब के साथ कामिनी कौशल थी और 1948 में आयी इस फिल्म ने सफलता के झंडे गाड़ दिए। 1949 में देव आनंद खुद निर्माता की भूमिका में आ गए और नवकेतन नाम से अपनी फिल्म कंपनी की शुरूआत की और अपने वादे के अनुसार उन्होंने गुरू दत्त को बाजी (1951) के निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी । दोनों की यह जोड़ी नए अवतार में बेहद सफल रही। 40 के उत्तरार्द्ध में देव साहब को गायिका अभिनेत्री सुरैया के साथ कुछ फिल्मों में काम करने का मौका मिला जो उस जमाने की स्थापित अभिनेत्री थी। इन फिल्मों की शूटिंग के दौरान उनकी सुरैया से नजरें लड़ गयीं और प्रेम की चिंगारी ऐसी भड़की कि इस जोड़ी को दर्शकों ने सिल्वर स्क्रीन पर हाथों हाथ लिया । इन्होंने एक के बाद एक सात सफल फिल्में दी, जिनमें विद्या (1948), जीत (1949 ), अफसर (1950 ), नीली (1950 ), दो सितारे (1951 ) तथा सनम (1951 ) थीं । विद्या के गाने किनारे किनारे चले जाएंगे की शूटिंग के दौरान सुरैया और देव आनंद के बीच प्यार का पहला अंकुर फूटा था। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान नाव डूबने लगी, तो देव साहब ने ही जान की बाजी लगाकर सुरैया को डूबने से बचाया था। बेचैन दिल को देव अधिक समय तक संभाल नहीं पाए और जीत के सेट पर सुरैया के सामने प्यार का इजहार कर दिया, लेकिन सुरैया की नानी ने हिंदू होने के कारण देव साहब के साथ उनके संबंधों का विरोध किया। इसी वजह से सुरैया तमाम उम्र कुंवारी बैठी रहीं। नवकेतन के बैनर तले देव साहब ने 2011 तक 31 फिल्में बनायीं। ग्रेगोरी पैक स्टाइल में उनका डायलाग बोलने का अंदाज, उनकी खूबसूरती पर चार चांद लगाते उनके हैट (टोपी) और एक तरफ झुककर, हाथों को ढीला छोड़कर हिलाते हुए चलने की अदा ... उस जमाने में लड़कियां देव साहब के लिए पागल रहती थीं ।
जाल, दुश्मन, काला बाजार और बंबई का बाबू फिल्मों में उन्होंने नायक की भूमिका को नए और नकारात्मक तरीके से पेश किया। अभी तक उनके अलोचक उन्हें कलाकार के बजाय शिल्पकार अधिक मानते थे, लेकिन काला पानी जैसी फिल्मों से उन्होंने अपने आलोचकों की बोलती बंद कर दी। उसके बाद 1961 में आयी हम दोनों और 1966 में आयी गाइड ने तो बालीवुड इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कर दिया। 1970 में उनकी सफलता की कहानी का सफर जारी रहा और जानी मेरा नाम तथा ज्वैल थीफ ने उन्हें नयी उंचाइयों पर पहुंचा दिया जिनका निर्देशन उनके भाई विजय आनंद ने किया था। वर्ष 2002 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित देव साहब राजनीतिक रूप से भी सक्रिय रहे थे। उन्होंने फिल्मी हस्तियों का एक समूह बनाया, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में लगाए गए आपातकाल के खिलाफ आवाज उठायी थी। 1977 के संसदीय चुनाव में उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव प्रचार किया और नेशनल पार्टी आफ इंडिया का भी गठन किया, जिसे बाद में उन्होंने भंग कर दिया। कुछ भी कहिए 1923 से शुरू हुआ देव साहब का सफर अब मंजिल पर पहुंच कर एक नई मंजिल की ओर निकल गया है। ऐसे में दिल से बस एक सदा निकलती है - अभी न जाओ छोड़कर।

Dark Saint Alaick
04-12-2011, 06:33 PM
संस्मरण/प्रसून सोनवलकर
जब अपनी नायिका जीनत से प्रेम करने लगे थे देव आनंद

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14161&stc=1&d=1323007740

वर्ष 1971 में अपनी फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा की कामयाबी के बाद सदाबहार हीरो देव आनंद महसूस करने लगे थे कि वह अपनी खोज और इस फिल्म की नायिका जीनत अमान से प्रेम करने लगे हैं। जीनत के प्रति अपनी भावना का इजहार करते हुए देव आनंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विथ लाइफ में लिखा है कि फिल्म की कामयाबी के बाद जब अखबारों और पत्रिकाओं में उनके रोमांटिक संबंधों के बारे में लिखा जाने लगा तो उन्हें अच्छा लगने लगा था। उन्होंने अपने प्रेम की घोषणा करीब करीब कर ही दी थी, लेकिन जब उन्होंने जीनत को राज कपूर के करीब देखा, तो उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए। राज कपूर अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम में जीनत को नायिका बनाना चाहते थे। वर्ष 2007 में प्रकाशित इस पुस्तक में देव आनंद ने लिखा है, कहीं भी और कभी भी जब जीनत के बारे में चर्चा होती, तो मुझे अच्छा लगता। उसी प्रकार मेरी चर्चा होने पर वह खुश होती। अवचेतन अवस्था में हम दोनों एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ गए थे।
देव आनंद ने स्वीकार किया कि उन्हें उस समय ईर्ष्या हुई जब उनकी अगली फिल्म इश्क इश्क इश्क के प्रीमियर पर राज कपूर ने लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से जीनत को चूम लिया। उन्होंने महसूस किया कि वह जीनत से प्रेम करने लगे थे और मुंबई के 'द ताज' में एक रोमांटिक भेंट के दौरान इसकी घोषणा करना चाहते थे। देव आनंद ने लिखा है, अचानक, एक दिन मैंने महसूस किया कि मैं जीनत से प्रेम करने लगा हूं.. और इसे उन्हें बताना चाहता था..। इसके लिए उन्होंने होटल ताज को चुना था जहां वे दोनों एक बार पहले भी साथ साथ खाना खा चुके थे। उन्होंने लिखा कि पार्टी में कुछ देर ठहरने के बाद जीनत के साथ भेंटस्थल पर जाने की व्यवस्था कर ली थी, लेकिन पार्टी में नशे में राज कपूर ने अपनी बांहें फैला दी..... जीनत ने भी जवाबी प्रतिक्रिया व्यक्त की....।
देव आनंद को संदेह था कि इसमें कुछ तो है। उन्होंने याद किया कि उन दिनों अफवाह थी कि जीनत सत्यम शिवम सुंदरम की नायिका की भूमिका के लिए स्क्रीन टेस्ट की खातिर राज कपूर के स्टूडियो गई थी। उन्होंने लिखा, अफवाहें सच होने लगी थीं। मेरा मन दुखी हो गया था। देव आनंद के लिए स्थिति और बदल गई, जब नशे में राज कपूर ने जीनत से कहा कि वह उसके सामने सिर्फ सफेद साड़ी में दिखने का अपना वादा तोड़ रही है...। दुखी देव आनंद ने लिखा कि जीनत अब उनके लिए वह जीनत नहीं रह गई थी।

Dark Saint Alaick
04-12-2011, 08:00 PM
जब देव साहब ने रफी के लिए गाया

यह तो सभी जानते हैं कि रफी साहब ने देव साहब की बहुत सारी फिल्मों में उनके सदाबहार गानों को अपनी आवाज दी है, लेकिन इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को होगी कि इन दोनों ने 1966 में बनी फिल्म प्यार मोहब्बत में साथ गाया है। सदाबहार नायक देव साहब ने इसके बारे में इसी साल 31 जुलाई को आयोजित रफी की 31वीं पुण्यतिथि पर लोगों के साथ सांझा किया था। देव साहब ने उस समारोह में कहा था कि वह रफी की आवाज के प्रशंसक थे और उन्हें वह पसंद थे। देव साहब ने ट्विटर पर लिखा था, मैंने कभी गाना नहीं गाया, लेकिन रफी के गाने प्यार मोहब्बत के सिवा ये जिंदगी क्या जिंदगी... में जो हुर्र्रे....हुर्रे है वह मेरी आवाज है। मैने बस उतना ही गाया। उन्होंने कभी अपने ट्विटर के पन्ने पर लिखा था, रफी अमर हैं हम उन्हें हमेशा अपने पास, अपने दिलों और आत्मा में महसूस करते हैं। मैं उनकी आवाज का कायल हूं।

Dark Saint Alaick
04-12-2011, 08:32 PM
संस्मरण
देव साहब के जाने से फिल्मी दुनिया ने वटवृक्ष खो दिया : नीरज

जब चले जाओगे तुम सावन की तरह । याद बहुत आओगे प्रथम प्यार के चुंबन की तरह ।। इन शब्दों के बीच सदाबहार अभिनेता देव आनंद को भरे मन से याद करते हुए प्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज ने कहा कि देव साहब के जाने से फिल्मी दुनिया ने वटवृक्ष खो दिया। देव आनंद की कई फिल्मों के लिए गाने लिख चुके नीरज ने अलीगढ से बताया, एक कवि सम्मेलन के दौरान मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई थी और इसके बाद उनकी फिल्म प्रेम पुजारी से जुड़ा रिश्ता आखिरी फिल्म चार्जशीट तक बना रहा। हालांकि, मैंने फिल्मों के लिए 1973 में लिखना छोड़ दिया था।
भरे मन से नीरज ने कहा, देव साहब के रूप में फिल्म जगत ने एक वटवृक्ष खो दिया, जो फिल्मों के अपने साथियों को हमेशा याद रखा करते थे। शायद यही बड़ा कारण था कि उनकी फिल्म सेंसर और चार्जशीट के लिए भी मैंने गाने लिखे। उनके निधन को व्यक्तिगत नुकसान बताते हुए उन्होंने कहा, देव साहब के साथ फिल्म जगत से मेरा आखिरी संपर्क भी खत्म हो गया। जीनत अमान और टीना मुनीम सहित कई युवाओं को उन्होंने मौका दिया था। युवाओं को अवसर देने में वह कभी झिझकते नहीं थे।
उन्होंने कहा, देव साहब 88 साल की उम्र में भी एक युवा की तरह जोश ओ खरोश के साथ काम करते थे और मैं उनके सामने खुद को बूढा महसूस करता था। वह अपनी फिल्मों के शीर्षक में अखबारों और बोलचाल के शब्दों का खुलकर इस्तेमाल करते थे। नीरज ने कहा, देव साहब नया विचार दर्शकों के सामने रखने वाले फिल्मकार थे और देव आनंद नियम, संयम और समय के पाबंद थे, जो अपनी जिंदगी को बेहद व्यवस्थित और सलीके के साथ जीने वाले व्यक्ति थे।
देव साहब के मित्र और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने बताया, देव साहब भले ही पाश्चात्य जीवन शैली को पसंद करते थे, लेकिन वह कभी भी शराब और सिगरेट को हाथ नहीं लगाते थे। वह चाय भी शहद के साथ लेते थे। फिल्मों में भी कभी वह सिगरेट के धुंए को अंदर नहीं लेते थे।
नेताम ने बताया कि वह देव साहब से पहली दफा 1973 में मुंबई के उनके कार्यालय में मिले थे, उस वक्त वह केंद्र में मंत्री थे। देव आनंद को उन्होंने बस्तर आमंत्रित किया था और वह 1974 में अपनी यूनिट के तीन चार लोगों के साथ बस्तर आये और बेलाडिला सहित कई स्थानों का भ्रमण किया।
देव आनंद जैसे रचनात्मक और जुनूनी व्यक्ति ने भले ही प्रत्यक्ष रूप से राजनीति से खुद को हमेशा दूर रखा हो, लेकिन उन्हें न केवल देश की राजनीति की गहरी समझ थी बल्कि वैश्विक राजनीति के बारे में भी वह अच्छी जानकारी रखते थे।
उन्होंने कहा कि देव आनंद को जानने वाला हर व्यक्ति बतायेगा कि वह कितने खुशमिजाज और जिंदादिल इंसान थे। जानने वाले एवं अनजान हर उम्र के लोगों से वह इतने उत्साह और गर्मजोशी के साथ मिलते थे जैसे उसे वर्षों से जानते हों।

Dark Saint Alaick
04-12-2011, 08:32 PM
संस्मरण
देव आनंद ने इंदौर में इंदौर-महू साढे छह आना की आवाज लगाई थी

इन्दौर ! मशहूर निर्माता-निदेशक और सदाबहार अभिनेता देव आनंद ने मध्य प्रदेश के इंदौर के रेलवे स्टेशन पर खडे होकर महू जाने के लिए यात्रियों को इंदौर-महू साढे छह आना की आवाज लगाई थी। देव आनंद ने वर्ष ।953 में बनी टेक्सी ड्रायवर के अलावा फिल्म नौ दो ग्यारह और पेइंग गेस्ट की शूटिंग इंदौर में की थी। देव आनंद पर दो लोकप्रिय गाने फिल्माए थे। देव आनंद की इंदौर से जुडी यादो को समेटते हुए प्रसिद्ध सिनेमा पत्रकार राम ताम्रकर ने बताया कि देव आनंद की फिल्म गाइड की सिल्वर जुबली पर यहां आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अलका सिनेमाघर में आयें थे। उस समय पूरा जेलरोड उनके चाहने वालों से भर गया था।
उन्होंने बताया कि देव आनंद अपनी फिल्म टेक्सी ड्रायवर के कुछ दृष्यो को इंदौर में शूटिंग करने के लिए आए थे। इस फिल्म की कहानी के अनुसार आगरा से मुबंई जाते समय वह इंदौर के रेलवे स्टेशन पर अपना ट्रक खडा करके सवारियां ढूंढने के लिए 'इंदौर-महू साढे छह आना' की आवाज लगाते है। यह फिल्म 1954 में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म 'नौ दो ग्यारह' में इंदौर जिले के मानपुर के खतरनाक घाट में कल्पना कार्तिक के साथ मस्ती भरा गाना ..हम हैं राही प्यार के हमसे कुछ न बोलिये.. फिल्माया था। इसके अतिरिक्त फिल्म 'पेइंग गेस्ट' का एक गीत.. छोड दो आंचल .. भी नर्मदा नदी के किनारे देव आनंद ने फिल्माया था।

anoop
04-12-2011, 08:58 PM
बहुत जबर्दस्त लिखा आपने अलैक जी.

Dark Saint Alaick
05-12-2011, 07:30 PM
छह दिसंबर को डॉ. अंबेडकर की पुण्यतिथि पर

देश को अतुलनीय संविधान दिया अंबेडकर ने

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14170&stc=1&d=1323097210

भारतीय संविधान के निर्माता डा भीमराव अंबेडकर ने आजादी के बाद देश को एकसूत्र में पिरोकर एक नयी ताकत के रूप में उभरने का मार्ग प्रशस्त करने के लिये ऐसे संविधान का निर्माण किया जो विश्व के लिये मिसाल बन गया। अंबेडकर ने संविधान निर्माण में उदारवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए न केवल सभी वर्गों के हितों का ध्यान रखा बल्कि पिछडे वर्ग के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए कई प्रावधान किए। उन्होंने संविधान बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि देश की एकता और अखंडता अक्षुण्य रहे। अंबेडकर ने संविधान में मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व, सामाजिक न्याय सहित अनेक बातों को शामिल कर इसका मूल ढांचा बनाया। संविधान में मतपत्र से मतदान, बहस के नियम, कार्यसूची के प्रयोग आदि को शामिल करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है।

संविधान विशेषज्ञ सुब्रतो मुखर्जी के अनुसार संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चार प्रमुख लोगों, पं. जवाहरलाल नेहरु, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और राजेन्द्र प्रसाद को अंबेडकर पर पूरा विश्वास था, इसीलिए उन्होंने संविधान निर्माण की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी। अंबेडकर उस विश्वास पर एकदम खरे उतरे। अंबेडकर संविधान निर्माण के लिए बनाई गई प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।

प्रख्यात विधिवेत्ता अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के मउ में हुआ। अंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त की और कोलंबिया विश्वविद्यालय तथा लंदन स्कूल आफ इकॉनामिक्स से डॉक्टरेट की डिग्रियां हासिल कीं। 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के बाद अंबेडकर देश के पहले कानून मंत्री बने।

संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर राजनीतिक और सामाजिक समता के पैराकार होने के साथ ही आर्थिक सुधारों के प्रबल समर्थक भी थे। उनका सपना कृषि क्षेत्र और ग्रामीण भारत को बुलंदी पर देखने का था। जानकार भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा, डॉक्टर अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण की बात हमेशा की जाती है, लेकिन उनके आर्थिक नजरिये के बारे में चर्चा बहुत कम होती है। वह एक प्रखर अर्थशास्त्री थे और उन्होंने हमेशा आर्थिक सुधारों का समर्थन किया।

प्रसाद के मुताबिक कृषि को लेकर अंबेडकर की नीति अलग थी। उन्होंने कहा, अंबेडकर ने 1952 के चुनाव में अपनी पार्टी के घोषणापत्र में कृषि को प्राथमिकता दी थी। वह कृषि को औद्योगिक रूप देना चाहते थे ताकि समाज के निचले तबके का शोषण न हो और देश में समृद्धि भी आये। कुछ जानकार अंबेडकर की नीतियों में समाजवाद का पहलू भी देखते हैं। अंबेडकर पर अध्ययन करने वाले लेखक मस्तराम कपूर के अनुसार डॉक्टर अंबेडकर की नीतियां समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया से मिलती थीं। कई ऐसे मौके आये जब लोहिया और अंबेडकर की राय एक दिखी।

सामाजिक सुधार और समता की राह पर चलते हुए अंबेडकर ने हिंदू और इस्लाम से भी अपनी असहमति दिखाई। इसी का नतीजा था कि जीविन के आखिरी दिनों में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। विदेश नीति के मामले पर अंबेडकर की सोच बड़ी दूरगामी थी। अंबेडकर स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री रहे। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया का गठन किया, हालांकि चुनावी राजनीति में ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। छह दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया था।

Dark Saint Alaick
05-12-2011, 07:39 PM
छह दिसंबर को मुहर्रम पर
सच्चाई के लिए लड़ने का पैगाम देता है ‘आशूरा’ मुहर्रम


इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की 10वीं तारीख ‘आशूरा’ सच्चाई के लिए लड़ने और इंसानियत का झंडा हमेश बुलंद रखने की कोशिश करने का पैगाम देती है। इसी पैगाम को लेकर हजरत हुसैन भी आगे बढे थे और कर्बला के मैदान में शहादत पाई। मुहर्रम की 10वीं तारीख को इस्लाम के मानने वाले दोनों धड़ों शिया एवं सुन्नी अलग-अलग नजरिए से देखते हैं और इसको लेकर उनके अकीदों में भी फर्क है। इसके बावजूद इन दोनों तबकों के लोग पैगम्बर के नवासे हजरत हुसैन के असल पैगाम को मानते हैं।

दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद का कहना है, ‘‘मुहर्रम इस्लामी तारीख का पहला महीना है। मजहबी नजरिए से इस महीने की बहुत अहमियत है। इसकी 10वीं तारीख ‘आशूरा’ की और भी ज्यादा अहमियत है क्योंकि इसी दिन हजरत हुसैन ने सच्चाई और हक के लिए लड़ते हुए शहादत पाई थी। यह दिन उनके पैगाम पर गौर करने और इबादत करने का है।’’ मुहर्रम की 10वीं तारीख को कर्बला (इराक) के मैदान में हजरत हुसैन यजीद की सेना के साथ लड़ते हुए शहीद हो गए थे। उनके साथ 72 लोग भी शहीद हुए थे। इनमें कई मासूम बच्चे भी शामिल थे। हुसैन पैगम्बर की प्यारी बेटी हजरत फातिमा के बेटे थे। हुसैन के वालिद हजरत अली थे।

मुहर्रम के शुरुआती 10 दिनों में सुन्नी समुदाय के लोग रोजा रखते हैं और इबादत करते हैं, हालांकि शिया समुदाय के लोगों का नजरिया इससे थोड़ा अलग है। इस दौरान शिया लोग कई मजहबी पाबंदियों का एहतराम करते हैं। वे लोग सूरज ढलने तक कुछ नहीं खाते हैं और अशूरा के दिन ये लोग मातम करने के साथ ही ताजिया निकालते हैं। इन 10 दिनों में शिया समुदाय लोग मजलिस (सभाएं) करते हैं। इनमें हजरत हुसैन और उनसे जुड़े वाकयों को बयां किया जाता है। लोग उनकी शहादत को लेकर गम और फख्र का इजहार करते हैं। मुफ्ती मुकर्रम कहते हैं, ‘‘आम तौर पर लोग मातम करते हैं और ताजिया निकालते हैं। हमें हजरत हुसैन के असल पैगाम को समझना होगा। उन्होंने सच्चाई के लिए लड़ने और इंसानियत का पैगाम दिया था। आज के दौर में उनका पैगाम और भी अहम हो जाता है।’’

Dark Saint Alaick
07-12-2011, 05:02 AM
महिलाओं की गहनों के लिए चाह बरकरार, पसंद बदल गई

नयी दिल्ली ! सोना चाहे कितना भी महंगा क्यों न हो जाए, इस पीली चमकीली धातु के गहने हमेशा महिलाओं की पहली चाहत रहे हैं, लेकिन बदलते ट्रेंड और हालात के साथ आज की महिलाएं जरूरत, अवसर और बजट के हिसाब से अपने गहनों का चुनाव करती हैं। ज्वेलरी डिजाइनर माहिषी लूथरा ने बताया हर महिला सुंदर दिखना चाहती है और इसके लिए वह हरसंभव कोशिश करती है। गहने इसी कोशिश का हिस्सा हैं। आज की महिलाएं भारी भरकम और परंपरागत गहने केवल शादी ब्याह में पहनना पसंद करती हैं। पार्टी और अन्य अवसरों के लिए उनकी पसंद अलग होती है। महंगाई को देखते हुए वह अपने बजट के अनुसार, गहने चुनती हैं। उन्होंने कहा कि सोने में निवेश को अच्छा निवेश माना जाता है लेकिन ज्यादातर महिलाएं सोने के गहने पहनने के लिए खरीदती हैं और निवेश वाली बात उनके मन में नहीं रहती। जिन घरों में बेटियां हैं, उन घरों की महिलाएं उनकी शादी को ध्यान में रखकर गहने खरीदती हैं। एमएमटीसी के पैनल में ज्वलेरी डिजाइनर पूजा जुनेजा का कहना है कि हाल के वर्षों में दुल्हन के गहनों को लेकर पसंद काफी बदल गई है। पहले जहां महिलाएं सिर्फ सोने के गहने पसंद करतीं थीं वहीं आजकल सोने के साथ हीरे, कुंदन आदि का काफी चलन है। ज्वेलरी डिजाइनर राजवी ने कहा जो हंसुली पहले ग्रामीण महिलाओं का गहना मानी जाती थी और बीच में लगभग पूरी तरह उपेक्षित हो गई थी, अब उसकी बहुत मांग है। इसका श्रेय छोटे पर्दे को ही है। पूजा ने कहा ब्राइडल ज्वेलरी में पोलकी सेट की बहुत मांग हैं पहले शादियों में गहनों का खर्च कुल शादी के खर्च का 20 प्रतिशत होता था वहीं अब यह बढकर 40-50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। दुल्हन के अलावा परिवार की अन्य महिलाएं भारी भरकम एवं परंपरागत गहने पहनती हैं। करधन, बाजूबंद जैसे जो गहने पहले लगभग उपेक्षित हो गए थे, उनकी अब फिर से पूछ होने लगी है। उन्होंने बताया कि आजकल चेंजेबल गहनों की भी बहुत मांग हैै। इनमें रंगीन नग जडे होते हैं और उन्हें इस तरह डिजाइन किया जाता है कि कपड़ों के रंग के हिसाब से इनके नग बदले जा सकते हैं। ऐसे गहनों की कीमत और परंपरागत गहनों की कीमत में अधिक अंतर नहीं होता। इसके अलावा, इनसे कई अवसरों पर काम चलाया जा सकता है ! फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में किरदारों द्वारा पहने गए गहनों से महिलाएं कितना प्रभावित होतीं हैं? इस सवाल पर राजवी सिंह ने कहा कि फिल्मों से तो महिलाएं हमेशा से प्रभावित होतीं रही हैं, लेकिन छोटे पर्दे ने अब उनकी पसंद को गहरे तक प्रभावित कर दिया है। विभिन्न धारावाहिकों के महिला किरदारों द्वारा पहने जाने वाले गहने औरतों को खूब लुभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि विभिन्न चैनलों पर विभिन्न प्रांतों के सीरियल दिखाए जा रहे हैं, इससे महिलाओं को गहनों के नये नये डिजाइन नजर आते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब और बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित धारावाहिकों में महिला पात्र स्थानीय परिवेश और आभूषणों में दिखाई देती हैं।

Dark Saint Alaick
10-12-2011, 04:30 PM
11 दिसंबर को रेडियो दिवस पर विशेष
समय के साथ बदल रहा है रेडियो


सेटेलाइट टीवी, इंटरनेट और आईपीटीवी के इस दौर में सूचना का परंपरागत माध्यम रेडियो समय के साथ न केवल बदल रहा है बल्कि दिन प्रतिदिन नयी तकनीकों से खुद को लैस कर रहा है। आकाशवाणी दिल्ली के स्टेशन डायरेक्टर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने बताया कि बाजार में टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट आ जाने के बावजूद सूचना का परंपरागत माध्यम रेडियो न केवल अपना अस्तित्व बनाये हुए है बल्कि बदलती हुई जरूरतों के लिहाज से अपने में बदलाव लाकर यह तकनीक के साथ कदम ताल कर रहा है। वाजपेयी ने कहा, समय के साथ रेडियो में बदलाव आ रहा है और इसकी गुणवत्ता सुधारने के लिये नित नयी तकनीक अपनायी जा रही है । इसी प्रयास के तहत रेडियो के मीडियम वेव पर आवाज की गुणवत्ता सुधारने के लिये हम जल्द ही फ्रांस की डीआरएम तकनीक अपनाने जा रहे हैं।

उन्होंने कहा, रेडियो के श्रोता लगातार बढ रहे हैं और मोबाइल पर रेडियो सुनने की व्यवस्था ने सराहनीय योगदान दिया है । इससे लाखों श्रोता बढ गये हैं । इसके अलावा हमने श्रोताओं के लिये डाक्टरों से फोन पर बात जैसे विशेष कार्यक्रम शुरू किये हैं।

आकाशवाणी के संस्कृत प्रभाग में लंबे समय से समाचार वाचक बलदेवानंद सागर ने कहा, दुनिया में अब विभिन्न शोधों से यह बात सामने आ रही है कि रेडियो की पहुंच दृश्य माध्यमों से ज्यादा है । रेडियो की आवाज से व्यक्ति परेशान नहीं होता है और अपना काम करते हुए रेडियो सुनता रहता है। रेडियो की दुनिया में आ रहे बदलावों पर सागर ने कहा, आज सामुदायिक रेडियो और एफएम की वजह से रेडियो का दायरा काफी बढ गया है । पहले एनलॉग और एकास्टिक साउंड थे और अब डिजिटल साउंड का जमाना है । वैज्ञानिकों के बीच इससे भी बढकर सुपर डिजिटल तकनीक लाये जाने की बात होने लगी है। एफएम आज आकाशवाणी के दूसरे स्टेशनों से ज्यादा प्रभावी हो गया है । लोग ज्यादा से ज्यादा समय तक रेडियो सुनने लगे हैं । टीवी के आने पर कुछ समय के लिये रेडियो का संक्रमण काल आया था लेकिन अब फिर से रेडियो अपना प्रभाव बढाने लगा है ।

वाजपेयी ने कहा कि युवाओं के लिये युववाणी, किसानों के लिये कृषि जगत लोगों में पहले से ही बहुत लोकप्रिय है । इन कार्यक्रमों से आज के समय में रेडियो की प्रासंगिकता और बढ गई हैै । उन्होंने कहा, आज प्रतिदिन 40 से 45 करोड़ लोग आकाशवाणी के विभिन्न कार्यक्रम और समाचार सुनते हैं । ये श्रोता अफ्रीका महाद्वीप से लेकर अमेरिका तक फैले हैं। उन्होंने बताया कि आकाशवाणी जल्द ही इंटरनेट पर समाचारों और कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण करने जा रही है । वाजपेयी ने कहा कि आकाशवाणी दिल्ली लोगों से जुड़ने के लिये खुद ही पहल कर रही है और उनके पास जा रही है । देश के विभिन्न महाविद्यालयों, गांवों और कस्बों में कार्यक्रम आयोेजित किये जा रहे हैं । इसके अलावा हम कव्वाली, वाद्यवृंत, मुशायरा और नौटंकी जैसे परंपरागत कलाओं से लोगों को जोड़े रखने के लिये एक पूरी योजना के साथ काम कर रहे हैं। गौरतलब है कि रेडियो के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिये विश्व के कई देशों में आज के दिन को रेडियो दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Dark Saint Alaick
11-12-2011, 06:01 PM
हर दिन हजारों लोगों की जिंदगी से खिलवाड़


सेक्स संबंधी बीमारी हो या जोड़ों का दर्द, सभी बीमारियों के सफल इलाज का दावा करने वाले नीम हकीमों की आज कल बाढ़ सी आ गयी है। जगह जगह तंबू लगाकर प्रशासन की नाक के नीचे बैठे ये खतरनाक डॉक्टर हर दिन हजारों लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। भीड़भाड़ वाले कई चौराहों और बस अड्डों तथा रेलवे स्टेशनों के पास इन नीम हकीमोंं के तंबू लगे दिखाई देते हैं। तंबूओं के बाहर लगे बैनर पर लिखा होता है - सेक्स संबंधी बीमारी है, स्त्री रोग है, जोड़ों का दर्द है या फिर मर्दाना कमजोरी, बच्चे नहीं हो रहे तो हमारे पास इसका समुचित और पक्का इलाज है। अंतर्राज्यीय बस अड्डे के निकट तंबू लगा कर लोगों का इलाज कर रहे एक कथित हकीम ने काफी मान मनौव्वल के बाद अपना नाम जाहिर न करने की शर्त के साथ बताया, हम बरसों पहले उत्तार प्रदेश से यहां आए थे। पिछले बीस साल से यहीं काम कर रहे हैं। तालीम के बारे में पूछने पर वह इतराकर बोले, अजी किताबें पढ़ने से क्या होता है। हमारा तजुर्बा ही हमारी पढ़ाई है। हम उन सभी बीमारियों का इलाज कर सकते हैं, जिसका इलाज करने का दावा करते हैं। किसी को शक हो तो आजमा कर देख ले।
जब हकीम से पूछा गया कि क्या उन्होंने स्वास्थ्य विभाग से कोई लाइसेंस लिया है अथवा कोई डिग्री है, तो वह तमककर बोले, मरीजों का इलाज करना तो खुदा की इबादत करने जैसा है। उसके लिए हमें किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं है और रही बात डिग्री की तो हमें सब बीमारियों के नुस्खे जबानी याद हैं। हमारे हाथ की शफा से ही मरीज ठीक हो जाते है। आमदनी के बारे में पूछने पर वह थोड़ा हिचकिचाने के बाद बोले, रोजाना एक से डेढ हजार रूपए की दवाएं बिक जाती हैं। वह अपनी दवाओं के नाम और नुस्खे बताने पर बिल्कुल राजी नहीं हुए। ये नीम-हकीम जालंधर के सिटी और छावनी रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, बीएमसी चौक, पठानकोेट रोड, होशियारपुर रोड, करतारपुर रोड और नकोदर रोड जैसे स्थानों पर आज कल सेक्स संबंधी विभिन्न बीमारियों के साथ साथ जोडों का दर्द, पेट की बीमारी, गैस आदि तमाम बीमारियों का इलाज करते हुए देखे जा सकते हैं। कई तंबुुओं में जाने पर पता चला कि चिकित्सा के नाम पर ठगी करने वाले इन लोगों के जाल में वे लोग फंसते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर, अशिक्षित अथवा श्रमिक वर्ग के लोग होते हैं। उप्र के बलिया जिला निवासी श्रमिक सुभाष राय ने बताया कि इस चिकित्सक ने पैसे ले लिये लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई है। पिछले आठ महीने से वह छावनी स्टेशन पर मौजूद इस नीम हकीम से अपना इलाज करा रहे हैं। इस बारे में शहर के एक आयुर्वेदाचार्य डॉ. अजय शर्मा ने कहा, यह दुखद है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस ओर से आंख बंद किये हुए हंै। ये नीम हकीम न केवल लोगों की जिंदगी से खेल रहे हैं, बल्कि आयुर्वेद और उसकी सेवा करने वाले को भी बदनाम कर रहे हैं। बिना किसी शिक्षा के ये नीम हकीम लोगों को आयुर्वेद के नाम पर कोई भी जड़, तना, पत्ती, भभूत या चूर्ण देते हैं जिसका असर उनके शरीर और स्वास्थ्य पर पड़ता है। ये लोग सेक्स संबंधी बीमारी का इलाज करने का झूठा दावा करते हैं। ऐसी किसी बीमारी के शिकार लोग कम पैसों में इलाज के लालच में और संकोचवश किसी बड़े डाक्टर के पास न जा पाने के चलते इनके चंगुल में फंस जाते हैं। यह घातक है।

Dark Saint Alaick
11-12-2011, 06:56 PM
12 दिसंबर को पुण्यतिथि पर

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचनाओं में स्त्री विमर्श को उठाया था

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14321&stc=1&d=1323613595

आचार्य हजारी प्रसादी द्विवेद्वी की प्रेरणा से ब्रजभाषा के बजाय खड़ी बोली को काव्यभाषा का स्थान दिलाने वाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने उस काल में ही स्त्री विमर्श को महत्वपूर्ण स्थान दिया और मानवीय मूल्यों को जीवन में उतारने पर बल दिया था।

कवि प्रेम जन्मेजय कहते हैं कि आज के इस स्त्री विमर्श के युग से बहुत पहले ही मैथिलीशरण गुप्त ने इस पर चर्चा शुरू की थी और अपनी रचना साकेत के माध्यम से लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की पीड़ा को उजागर किया था। जन्मेजय ने कहा कि गुप्त की रचना में उर्मिला सामंती परिवेश में अपनी शिकायत रखती हैं और स्वाभिमान का परिचय देती हैं जबकि वाल्मीकि और तुलसीदास उर्मिला के दर्द को नहीं देख पाए ।

झांसी के चिरगांव में तीन अगस्त 1886 में जन्मे मैथिलीशरण गुप्त की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा घर में हुई। उन्होंने घर में हिंदी, बांग्ला और संस्कृति साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी ने उनका मार्गदर्शन किया। बारह साल की अवस्था में उन्होंने ब्रजभाषा में कविता रचना शुरू कर दी। बाद में वह महावीर प्रसाद द्विवेद्वी के संपर्क में आए और उनकी कविताएं खड़ी बोली में सरस्वती में प्रकाशित होने लगीं।

सन् 1919 में उनका प्रथम काव्य संग्रह रंग में भंग बाद में जयद्रथ वध प्रकाशित हुआ। उन्होंने सन् 1914 में राष्ट्रीय भावनाओं से ओत प्रोत भारत भारती का प्रकाशन किया और लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता छा गयी क्योंकि उन दिनों देश में आजादी का आंदोलन चल रहा था।

स्वत: प्रेस स्थापित कर उन्होंने अपनी पुस्तकें छापनी शुरू कर दीं। उन्होंने महत्वपूर्ण कृति साकेत और अन्य ग्रंथ पंचवटी आदि 1931 में पूरे किए। सन् 1932 में उन्होंने यशोधरा लिखी। इसी समय वह महात्मा गांधी के संपर्क में आए और गांधीजी ने उन्हें राष्ट्रकवि की संज्ञा दी। सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के तहत वह जेल गए। आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि से सम्मानित किया।

आजादी के बाद उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया। सन् 1953 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सन् 1962 में अभिनंदन ग्रंथ भेंट किया। हिंदू विश्वविद्यालय ने भी उन्हें डी लिट से सम्मानित किया।

जन्मेजय कहते हैं कि साहित्य रचना में आज के व्यावासायिक दृष्टिकोण के विपरीत उनका लेखन कर्म जीवन मूल्य के प्रति समर्पित और वह राष्ट्रप्रेम के झंडाबरदार रहे। डॉ नगेंद्र के अनुसार मैथिलीशरण गुप्त सच्चे राष्ट्रकवि थे। महान साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में उनके काव्य के भीतर भारत की प्राचीन संस्कृति एक बार फिर तरूणावस्था को प्राप्त हुई। मैथिलीशरण गुप्त 12 दिसंबर, 1964 को चल बसे।

Dark Saint Alaick
12-12-2011, 10:07 PM
पुण्यतिथि 13 दिसंबर पर

स्मिता पाटिल ने दिया समानांतर फिल्मों को नया आयाम

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14362&stc=1&d=1323711439

भारतीय सिनेमा के नभमंडल में स्मिता पाटिल ऐसे ध्रुव तारे की तरह हैं, जिन्होंने अपने सशक्त अभिनय से समानांतर सिनेमा के साथ.-साथ व्यावसायिक सिनेमा में भी दर्शकों के बीच अपनी खास पहचान बनाई ! स्मिता पाटिल के उत्कृष्ट अभिनय से सजी फिल्में भूमिका, मंथन, चक्र, शक्ति, निशांत और नमकहलाल आज भी दर्शकों दिलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ती है। स्मिता पाटिल अभिनीत फिल्मों पर यदि एक नजर डालें, तो हम पायेगें कि पर्दे पर वह जो कुछ भी करती थीं, वह उनके द्वारा निभायी गयी भूमिका का जरूरी हिस्सा लगता था। 17 अक्तूबर 1955 को पुणे शहर में जन्मी स्मिता पाटिल ने अपनी स्कूल की पढाई महाराष्ट्र से पूरी की। उनके पिता शिवाजी राय पाटिल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री थे, जबकि उनकी मां समाजसेविका थी। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मराठी टेलीविजन में बतौर समाचार वाचिका काम करने लगी। इसी दौरान उनकी मुलाकात जाने-माने निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल से हुई।
श्याम बेनेगल उन दिनों अपनी फिल्म 'चरण दास चोर' बनाने की तैयारी में थे। श्याम बेनेगल को स्मिता पाटिल में एक उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और उन्होंने अपनी फिल्म 'चरण दास चोर' में स्मिता पाटिल को एक छोटी सी भूमिका निभाने का अवसर दिया। भारतीय सिनेमा जगत में 'चरण दास चोर' को ऐतिहासिक फिल्म के तौर पर याद किया जाता है, क्योंकि इसी फिल्म के माध्यम से श्याम बेनेगल और स्मिता पाटिल के रूप में कलात्मक फिल्मों के दो दिग्गजों का आगमन हुआ। श्याम बेनेगल ने स्मिता पाटिल के बारे मे एक बार कहा था, मैंने पहली नजर में ही समझ लिया था कि स्मिता पाटिल में गजब की स्क्रीन उपस्थिति है, जिसका उपयोग रूपहले पर्दे पर किया जा सकता है। फिल्म 'चरण दास चोर' हालांकि बाल फिल्म थी, लेकिन इस फिल्म के जरिये स्मिता पाटिल ने बता दिया था कि हिंदी फिल्मों मे खासकर यथार्थवादी सिनेमा में एक नया नाम स्मिता पाटिल के रूप में जुड़ गया है।
इसके बाद वर्ष 1975 में श्याम बेनेगल द्वारा ही निर्मित फिल्म 'निशांत' में स्मिता को काम करने का मौका मिला। वर्ष 1977 स्मिता पाटिल के सिने कैरियर में अहम पड़ाव साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 'भूमिका' और 'मंथन' जैसी सफल फिल्में प्रदर्शित हुयी। दुग्ध क्रांति पर बनी फिल्म 'मंथन' में दर्शकों को स्मिता पाटिल के अभिनय के नये रंग देखने को मिले। इस फिल्म के निर्माण के लिये गुजरात के लगभग पांच लाख किसानों ने प्रति दिन मिलने वाली अपनी मजदूरी में से दो-दो रूपये फिल्म निर्माताओं को दिये और बाद में जब यह फिल्म प्रदर्शित हुयी तो बॉक्स आफिस पर सुपरहिट साबित हुयी।
वर्ष 1977 में स्मिता पाटिल की 'भूमिका' भी प्रदर्शित हुयी, जिसमें उन्होंने 30 -40 के दशक में मराठी रंगमच की अभिनेत्री हंसा वाडेकर की निजी जिंदगी को रूपहले पर्दे पर बखूबी साकार किया। फिल्म 'भूमिका' में अपने दमदार अभिनय केलिये वह राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित की गईं। मंथन और भूमिका जैसी फिल्मों मे उन्होंने कलात्मक फिल्मो के महारथी नसीरूदीन शाह, शबाना आजमी, अमोल पालेकर और अमरीश पुरी जैसे कलाकारो के साथ काम किया और सशक्त अदाकारी का जौहर दिखाकर अपना सिक्का जमाने में कामयाब हुईं।
भूमिका से स्मिता पाटिल का जो सफर शुरू हुआ वह चक्र, निशांत, आक्रोश, गिद्ध, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है और मिर्च मसाला जैसी फिल्मों तक जारी रहा। वर्ष ।980 में प्रदर्शित फिल्म 'चक्र' में स्मिता पाटिल ने झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाली महिला के किरदार को रूपहले पर्दे पर जीवंत कर दिया। इसके साथ ही फिल्म 'चक्र' के लिए वह दूसरी बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित की गईं।
अस्सी के दशक में स्मिता पाटिल ने व्यावसायिक सिनेमा की ओर अपना रूख किया। इस दौरान उन्हें सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ 'नमक हलाल' और 'शक्ति' जैसी फिल्मों में काम करने का अवसर मिला, जिनकी सफलता ने बाद स्मिता पाटिल को व्यावसायिक सिनेमा में भी स्थापित कर दिया। अस्सी के दशक में स्मिता पाटिल ने व्यावसायिक सिनेमा के साथ-साथ समानांतर सिनेमा से अपना सामंजस्य बिठाए रखा। इस दौरान उनकी सुबह, बाजार, भींगी पलकें, अर्द्धसत्य और मंडी जैसी कलात्मक फिल्में और दर्द का रिश्ता, कसम पैदा करने वाले की, आखिर क्यों, गुलामी, अमृत, नजराना और डांस डांस जैसी व्यावसायिक फिल्में प्रदर्शित हुईं, जिसमें स्मिता पाटिल के अभिनय के विविध रूप दर्शकों को देखने को मिले।
वर्ष 1985 में स्मिता पाटिल की फिल्म 'मिर्च मसाला' प्रदर्शित हुई। सौराष्ट्र की आजादी के पूर्व की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'मिर्च मसाला' ने निर्देशक केतन मेहता को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। सामंतवादी व्यवस्था के बीच पिसती औरत की संघर्ष की कहानी बयां करती यह फिल्म आज भी स्मिता पाटिल के सशक्त अभिनय के लिए याद की जाती है।
वर्ष 1985 में भारतीय सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुये वह पदमश्री से सम्मानित की गयी। हिंदी फिल्मों के अलावा स्मिता पाटिल ने मराठी, गुजराती, तेलगू, बंग्ला, कन्नड़ और मलयालम फिल्मों में भी अपनी कला का जौहर दिखाया । इसके अलावे स्मिता पाटिल को महान फिल्मकार सत्यजीत रे के साथ भी काम करने का मौका मिला। मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित टेलीफिल्म 'सदगति' स्मिता पाटिल अभिनीत श्रेष्ठ फिल्मों में आज भी याद की जाती है। लगभग दो दशक तक अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाने वाली यह अभिनेत्री महज 31 वर्ष की उम्र में 13 दिसंबर 1986 को इस दुनिया को अलविदा कह गई। उनकी मौत के बाद वर्ष 1988 में उनकी फिल्म 'वारिस' प्रदर्शित हुई, जो स्मिता पाटिल के सिने कैरियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है।

Dark Saint Alaick
13-12-2011, 06:49 PM
लोकसेवा का संगीत सुनाते हैं उस्ताद अकबर खां

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14398&stc=1&d=1323785933

भारत की पश्चिमी सरहद पर रेतीले धोरों की धरती जैसलमेर कलाकारों की खान है, जहां विभिन्न विधाओं में माहिर एक से बढ़कर एक कलाकारों की सुदीर्घ श्रृंखला विद्यमान है। कलाकारों की इस खान में बहुमूल्य हीरा हैं - उस्ताद अकबर खां। बहत्तर साल के अकबर खां का उत्साह किसी युवा से कम नहीं है।
आज भी वे कला और संस्कृति के लिए जीते हुए बहुत कुछ कर गुजरने के जज्बे के साथ जुटे हुए हैं। अकबर खां में वे सभी गुण हैं जो एक अच्छे कलाकार की पहचान होते हैं। कोमल भावनाओंं से भरे और दिल के साफ अकबर खां का सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व हर किसी को प्रभावित किए बिना नहीं रहता।
अकबर खां का मौलिक हुनर बचपन से ही झरने लगा था। निरंतर अभ्यास की बदौलत रियासत काल में दरबारी लोक गायक कलाकार के रूप में ख्याति पाने वाले अकबर खां उम्र के इस पड़ाव में भी लोक गायकी के प्रति समर्पित जीवन का पर्याय बने हुए हैं।
ग्यारह जुलाई 1939 को जैसाण की सरजमीं पर पैदा हुए उस्ताद अकबर खां ’जैसलमेरी आलम खां’ आज कला जगत में जानी-मानी हस्ती हंै। साधारण साक्षर अकबर खां को संगीत का हुनर विरासत में मिला। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उन्हें पिता आरब खां से मिली।
अकबर खां ने घर-परिवार चलाने के लिए शिक्षा विभाग में नौकरी की और वहीं से जमादार के रूप में सेवानिवृत्त हुए। राजकीय सेवा के साथ-साथ संगीत व संस्कृति जगत की सेवा तथा हमेशा कुछ न कुछ नया सीखने व करने का जो जज्बा यौवन पर रहा, वह आज भी पूरे उत्साह से लबरेज दिखाई देता है।
वंश परम्परा से पारिवारिक लोक संगीत में दक्ष कलाकारों की श्रृंखला में जुड़े उस्ताद अकबर खां वास्तव में उस्ताद हैं जिनकी रगों में पीढ़ियों से सांगीतिक लहू बह रहा है।
सन् 1973 में पहली बार मांगणियार गायकों का सम्मेलन आयोजित करने में अकबर खां की सराहनीय भूमिका रही। इस पर रूपायन संस्थान बोरुंदा की ओर से उन्हें सराहना पत्र भी भेंट किया गया।
आकाशवाणी और दूरदर्शन के कई केन्द्रों से उस्ताद अकबर खां के कार्यक्रमों का प्रसारण हो चुका है। इसके साथ ही लोक चेतना, सामाजिक सरोकारों के कई कार्यक्रमों, योजनाओं, परियोजनाओं के जागरूकता कार्यक्रमों से जुड़े रहे अकबर खां ने अनगिनत स्कूलों व अन्य संस्थाओं में वार्ताओं, लोकगीत गायन, संगीतिक प्रस्तुतियों आदि के माध्यम से अपनी सशक्त व ऐतिहासिक भागीदारी का इतिहास कायम किया है।
अद्भुत कला कौशल व माधुर्य से परिपूर्ण गायकी को लेकर प्रदेश तथा देश की कई हस्तियों व संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित व अभिनन्दित किया जा चुका है। लोक कला के संरक्षण व विकास में प्रशंसनीय सेवाओं के उपलक्ष में अकबर खां को स्वाधीनता दिवस -1999 के जिला स्तरीय समारोह में जिला प्रशासन की ओर से सम्मानित भी किया गया। इसी प्रकार जैसलमेर स्थापना दिवस पर 26 अगस्त, 1996 को कवि तेज लोक कला विकास समिति द्वारा उत्कृष्ट आलमखाना (राजगायक ) एवं अन्तर्राष्टीय ख्याति प्राप्त कलाकार के रूप में उन्हें सम्मानित किया गया।
भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर में 28 अप्रेल 1979 को हुए राजस्थान लोकानुरंजन मेले में देवीलाल सामार ने उस्ताद अकबर खां का अभिनन्दन किया व लोक कला के उन्नयन, विकास व प्रचार-प्रसार में उनके बहुमूल्य योगदान की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
उस्ताद अकबर खां का बोध वाक्य है- ’जागो-जगाओ, काम की ज्योति जगाओ, सुस्ती, नशा, क्रोध हटाओ, देश बचाओ’, एक अकेला थक जाएगा, मिल कर बोझ उठाओ ।’
इस बोध वाक्य की उन्होंने बाकायदा मोहर बनवा रखी है जिसे वे पत्र व्यवहार में इस्तेमाल करते रहे हैं। माण्ड गायक उस्ताद अकबर खां को सन् 1996 में मांड सम्मान से नवाजा जा चुका है। उस्ताद अकबर खां देश की कई नामी हस्तियों के समक्ष अपनी गायकी का प्रदर्शन कर चुके हैं। स्व. ज्ञानी जैलसिंह, स्व. नीलम संजीव रेड्डी, एम. हिदायतुल्ला, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर सहित देश-विदेश की कई हस्तियों के समक्ष वे अपने फन की धाक जमा चुके हैं।
हिन्दी फिल्म रुदाली, नन्हे जैसलमेर, लम्हे, कृष्णा, सात रंग के सपने, जोर, मीनाक्षी, रेशमा और शेरा, रजिया सुल्तान सहित कई भारतीय एवं विदेशी फिल्मों में उन्होंने अपनी लोक संगीत की शानदार प्रस्तुतियों का रिकार्ड बनाया है। यूनेस्को वर्ल्ड म्यूजिक वेबसाइट पर भी अकबर की प्रस्तुति समाहित है।

Dark Saint Alaick
18-12-2011, 04:12 PM
विशेष बातचीत

कड़े इम्तहान से गुजरा, तब बने मिजाज वाले गीत : नीरज

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14461&stc=1&d=1324208479

अठहत्तर की उम्र में भी वही जज्बा और आवाज में वही दम खम जो जवानी में हुआ करता था, पर हिन्दी फिल्मों के गानों और संगीत के लगातार गिरते स्तर पर गहरी चिन्ता और नाराजगी ही शायद नीरज को फिल्मी दुनिया से बांध कर नहीं रख सकी । इस मशहूर गीतकार ने जब फिल्म उद्योग का रूख किया, तो शुरूआत में सचिन देव बर्मन जैसे संगीतकारों ने उन्हें हर कसौटी पर कसा, लेकिन बाद में उन्हीं के साथ कई यादगार गीत भी उन्होंने किए।

गोपालदास नीरज ने बताया, मैं शायद उनके लिए (फिल्म उद्योग के लिए) अनफिट हो गया था । दूसरे सचिन देव बर्मन और शंकर-जयकिशन जैसे संगीतकारों के किसी न किसी कारण से फिल्मों में संगीत नहीं देने के बाद तो रूकने का मतलब ही नहीं था।

मुंबई फिल्म उद्योग में नीरज के नाम से गीत लिखने वाले इस गीतकार का कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे गीत देशभर में लोकप्रिय हुआ। राज कपूर की मेरा नाम जोकर के लिए लिखा गया ऐ भाई जरा देख के चलो और प्रेम पुजारी का शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब गीत हर खासो आम की जुबां पर चढ़ गए।

देव आनंद के निधन से काफी दु:खी नीरज ने उनके साथ बिताए दिनों को याद करते हुए कहा, देव साहब नायाब शख्सियत थे। उन्होंने मुझे ब्रेक दिया। एस. डी. बर्मन से कहा कि एक बार इसे आजमा कर देखो तो बड़ी मुश्किल से बर्मन साहब ने मेरे गीतों को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि देव साहब और बर्मन ने उनके साथ कई तरह के प्रयोग किए और बर्मन तो उन्हें अकसर इतनी कड़ी और आड़ी-तिरछी धुनें देते थे कि कई बार लिखना मुश्किल लगता था, लेकिन आखिर में निभा ले गया।

नीरज ने बताया, हिन्दी फिल्मों में राज कपूर ने भी गीत-संगीत को लेकर काफी प्रयोग किए। मेरा नाम जोकर के लिए जब ऐ भाई जरा देख के चलो लिखा गया, तो उसमें पूरे जीवन का दर्शन था। ये दुनिया सर्कस है और हम सब जोकर। वो (ईश्वर) नचा रहा है।

उन्होंने कहा कि उस जमाने में कई बार हम गीतकार संगीत रचना में भी काफी मददगार होते थे । ये काम बर्मन साहब के साथ खूब किया। वो मुझे घर बुला लेते थे और वहां बैठकर हमने कई यादगार गीत इंडस्ट्री को दिए।

शर्मीली के आज मदहोश हुआ जाए रे और खिलते हैं गुल यहां जैसे यादगार गीत लिख चुके नीरज ने बताया कि आजकल का संगीत कानफोडू हो गया है और गीत के बोल तो समझिए, पता ही नहीं चलता कि कौन क्या कहना चाह रहा है और मकसद क्या है।

उन्होंने कहा, मैंने भी तोड़ मरोड़ के कई गीत लिखे, लेकिन भाषा के साथ कभी समझौता नहीं किया और सरल से सरल शब्द गीतों में फिट करने की कोशिश की, ताकि अनपढ़ आदमी को भी आसानी से समझ आ सके।

नीरज के गीतों को लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और मन्ना डे सहित उस जमाने के सभी मशहूर फिल्मी गायकों ने सुर दिए। किशोर का गाया फूलों के रंग से और धीरे से जाना खटियन में, लता का गाया राधा ने माला जपी श्याम की और रंगीला रे, रफी का गाया लिखे जो खत तुझे और मन्ना डे का गाया ऐ भाई जरा देख के चलो कुछ ऐसे गीत इस फनकार ने लिखे हैं, जो वक्त की बंदिशों से परे हैं।

Dark Saint Alaick
18-12-2011, 06:37 PM
19 दिसंबर को काकोरी के नायकों के शहादत दिवस पर विशेष

बिस्मिल, अशफाक : जीये वतन के लिए, मरे वतन के लिए

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14463&stc=1&d=1324217203 http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14464&stc=1&d=1324217203

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास आजादी के मतवालों के एक से बढकर एक कारनामों से भरा पड़ा है । रामप्रसाद बिस्मिल तथा अशफाक उल्ला खान के नाम इसे और भी गौरवमय बना देते हैं। जंग ए आजादी की इसी कड़ी में 1925 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जब नौ अगस्त को चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया।

इन जांबाजों ने जो खजाना लूटा, दरअसल वह हिन्दुस्तानियों के ही खून पसीने की कमाई थी, जिस पर अंग्रेजों का कब्जा था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और जंग ए आजादी को जारी रखने के लिए करना चाहते थे। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई। ट्रेन से खजाना लुट जाने से ब्रितानिया हुकूमत बुरी तरह तिलमिला गई और अपनी बर्बरता तेज कर दी। आखिर इस घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद हाथ नहीं आए।

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए) के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया, जिनमें से रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। गोरी हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया, जिसकी बड़े पैमाने पर निन्दा हुई। डकैती जैसे अपराध में फांसी की सजा अपने आप में एक विचित्र घटना थी। फांसी के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर हुई, लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी दे दी गई।

रामप्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी दी गई । जीवन की अंतिम घड़ी में भी इन महान देशभक्तों के चेहरे पर मौत का कोई भय नहीं था । दोनों हंसते हंसते भारत मां के चरणों में अपने प्राण अर्पित कर गए। काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी उच्च शिक्षित थे। बिस्मिल जहां प्रसिद्ध कवि थे, वहीं भाषाई ज्ञान में भी निपुण थे। उन्हें अंग्रेजी, हिन्दुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था। अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे। क्रांतिकारियों ने काकोरी की घटना को काफी चतुराई से अंजाम दिया था। इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए थे। बिस्मिल ने अपने चार अलग अलग नाम रखे और अशफाक ने अपना नाम कुमारजी रखा था। इन दोनों वीरों की शहादत ने देशवासियों के मन में क्रांति की एक अजीब सी लहर पैदा कर दी थी।

Dark Saint Alaick
18-12-2011, 06:51 PM
19 दिसंबर को गोवा मुक्ति दिवस पर

गोवा और दमन-दीव इस तरह हुए विदेशियों के चंगुल से मुक्त


भारत को यूं तो 1947 में ही आजादी मिल गई थी, लेकिन इसके 14 साल बाद भी गोवा पर पुर्तगालियों का शासन था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के बार-बार के आग्रह के बावजूद पुर्तगाली झुकने को तैयार नहीं हुए। उस समय दमन-दीव भी गोवा का हिस्सा था।

पुर्तगाली यह सोचकर बैठे थे कि भारत शक्ति के इस्तेमाल की हमेशा निन्दा करता रहा है, इसलिए वह हमला नहीं करेगा। उनके इस हठ को देखते हुए नेहरू और मेनन को कहना पड़ा कि यदि सभी राजनयिक प्रयास विफल हुए, तो भारत के पास ताकत का इस्तेमाल ही एकमात्र विकल्प रह जाएगा।

पुर्तगाल जब किसी तरह नहीं माना, तो नवम्बर 1961 में भारतीय सेना के तीनों अंगों को युद्ध के लिए तैयार हो जाने के आदेश मिले । मेजर जनरल के.पी. कैंडेथ को 17 इन्फैंट्री डिवीजन और 50 पैरा ब्रिगेड का प्रभार मिला। भारतीय सेना की तैयारियों के बावजूद पुर्तगालियों की हेकड़ी नहीं गई। भारतीय वायु सेना के पास उस समय छह हंटर स्क्वाड्रन और चार कैनबरा स्क्वाड्रन थे। गोवा अभियान में हवाई कार्रवाई की जिम्मेदारी एयर वाइस मार्शल एरलिक पिंटो के पास थी। सेना ने अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देते हुए आखिरकार दो दिसंबर को गोवा मुक्ति का अभियान शुरू कर दिया। वायु सेना ने आठ और नौ दिसंबर को पुर्तगालियों के ठिकाने पर अचूक बमबारी की। सेना और वायु सेना के हमलों से पुर्तगाली तिलमिला गए। आखिरकार 19 दिसंबर 1961 को तत्कालीन पुर्तगाली गवर्नर मैन्यू वासलो डे सिल्वा ने भारत के सामने समर्पण समझौते पर दस्तखत कर दिए।

इस तरह भारत ने गोवा और दमन दीव को मुक्त करा लिया और वहां पुर्तगालियों के 451 साल पुराने औपनिवेशक शासन को खत्म कर दिया। पुर्तगालियों को जहां भारत के हमले का सामना करना पड़ रहा था, वहीं उन्हें गोवा के लोगों का रोष भी झेलना पड़ रहा था। दमन-दीव पहले गोवा प्रशासन से जुड़ा था, लेकिन 30 मई 1987 में इसे अलग से केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। गोवा और दमन-दीव में हर साल 19 दिसंबर को मुक्ति दिवस मनाया जाता है। गोवा मुक्ति युद्ध में जहां 30 पुर्तगाली मारे गए, वहीं 22 भारतीय वीरगति को प्राप्त हुए। घायल पुर्तगालियों की संख्या 57 थी, जबकि घायल भारतीयों की संख्या 54 थी। इसके साथ ही भारत ने चार हजार 668 पुर्तगालियों को बंदी बना लिया था।

Dark Saint Alaick
19-12-2011, 05:06 PM
शहादत दिवस पर
फांसी से पहले रोशन ने दो साल की जेल भी काटी थी

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14466&stc=1&d=1324297917

काकोरी ट्रेन लूट कांड में आज के दिन ही इलाहाबाद में फांसी की सजा के पहले इस कांड के सबसे उम्र दराज सदस्य ठाकुर रोशन सिंह ने दो साल के कैद की सजा भी काटी थी। बरेली और शाहजहांपुर में असहयोग आन्दोलन चला रहे रोशन सिंह को बरेली में हुए गोलीकांड में दो साल के कैद की सजा दी गयी थी। उनका जन्म 22 जनवरी ।894 में शाहजहांपुर के नेवादा गांव में हुआ था । उनके पिता का नाम जगदीश सिंह उर्फ जंगी सिंह था । रोशन सिंह मिडिल तक शिक्षा पाने के बाद प्राइमरी स्कूल में शिक्षक हुए और बाद में मातृवेदी संस्था के सदस्य बने।
शिरगंज, बिचपुरी, मैनपुरी एवं अन्य डकैतियों में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। जब असहयोग आंदोलन चला, तो उनका यह शौर्य बल और चमक उठा। उन्होंने शाहजहांपुर और बरेली के गांवों में घूम घूमकर असहयोग का प्रचार किया। इन दिनों इसी सिलसिले में बरेली में गोली चली और उन्हें दो वर्ष की कडी कैद की सजा हुई।
इसके बाद आजादी का यह दीवाना काकोरी ट्रेन डकैती में शामिल हुआ। काकोरी कांड में पकडे जाने वालों में रोशन सिंह ही शारीरिक दृष्टि से सबसे अधिक बलवान थे। वह एक अचूक निशानेबाज भी थे।
न्यायाधीश हेमिल्टन ने पहले उन्हें पांच साल के कैद की सजा दी, जिसे बाद में फांसी की सजा में बदल दिया गया। उन्हें भारतीय दंड विधि संहिता की धारा 396 के तहत मौत हो जाने तक फांसी की सजा दी। साथ में यह भी कहा कि यदि अपील करना चाहे तो हफ्ते भर के अंदर अपील कर सकते हैं।
रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनकर जैसे सबको काठ मार गया था। अन्याय की कल्पना तो की जा सकती थी, पर ऐसे अन्याय की कल्पना सपने में भी नहीं थी। अब रोशन सिंह ने सबको एक दूसरे का मुंह ताकते देखा, तो वे चौंके, क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं के बराबर आती थी। उन्होंने बगल में खड़े व्यक्ति से से पूछा कि फाइव इयर्स... फाइव इयर्स इससे आगे भी तो कुछ था, वह क्या था। उस व्यक्ति ने उनकी कमर में हाथ डालते हुए कहा, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल.और राजेन्द्र नाथ लाहिडी के साथ-साथ आपको भी फांसी मिली है, जबकि इनके वकील व साथियों का ख्याल था कि रोशन सिंह को फांसी की सजा नहीं मिलेगी।
फांसी की खबर सुनकर रोशन सिंह एकदम उछल पडे। वह सबसे ज्यादा उम्र के थे, पर उनका अपराध सबसे हल्का था। सभी किंकर्तव्यविमूढ होकर उन्हें देख रहे थे। उस कर्मयोगी के तेजस्वी चेहरे पर स्वाभाविक शांति थी। वात्सल्य भरी दृष्टि से बिस्मिल, अशफाक और राजेन्द्र लाहिडी की ओर देखकर वे बोले, तुम लोग अकेले जाना चाहते थे न। फिर उन्होंने गोरे जज हेमिल्टन से हंसकर कहा, मुझे नया जीवन देने के लिए आपको धन्यवाद। आपने लडकों के सामने मेरी बुजुर्गी की लाज रख ली।
फांसी दिए जाने के काफी समय पूर्व जेल में बांग्ला भाषा अच्छी तरह सीख लेने पर एक दिन बिस्मिल ने कहा, ठाकुर तुम्हें तो फांसी होने वाली है, बांग्ला सीखकर क्या करोगे। मुस्कारते हुए ठाकुर रोशन सिंह ने कहा, पंडितजी इस जन्म में नहीं, तो क्या अगले जन्म में भी कुछ काम न आएगी।
जेल आकर रोशन सिंह लगभग मौन हो गए। जरूरत से ज्यादा न बोलते। मराठी का अखबार पढते और उसी में मस्त रहते। फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद एक दिन वकील ने आकर कहा आपकी अपील कर दी गई है। उत्तर मिला, कोई बात नहीं। फिर एक दिन जेल अधीक्षक ने कहा, आपकी अपील खारिज हो गई। फिर वही उत्तर था, कोई बात नहीं।
फांसी के एक दिन पहले मिलने आए लोगों से उन्होंने कहा कि तुम लोग मेरी फिकर मत करो। भगवान को अपने सभी पुत्रों का ख्याल है।
ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 को मलाका जेल, वर्तमान में इलाहाबाद का स्वरुपरानी नेहरू अस्पताल परिसर में फांसी दी गई थी। फांसी से पहले 13 दिसम्बर को अपने मित्र को एक पत्र लिखा। पत्र में लिखा गया, मेरी इसी सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी। आप मेरे लिए हरगिज रंज न करें। मेरी मौत खुशी का प्रतीक होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूरी है। मैं दो साल से बच्चों से अलग हूं। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला, इससे मेरा मोह छूट गया और कोई कामना बाकी नहीं रही। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वालों की होती है ।
जिदंगी जिंदा दिलों की जान ए रोशन ।
यूं तो लाखों पैदा होते हैं और फना होते हैं।
फांसी वाले दिन यानी 19 दिसम्बर 1927 को रोशन सिंह मुस्कराते हुए हाथ में गीता लेकर मलाका जेल स्थित फांसीघर की ओर चल पडे और वंदेमातरम का उच्च नारा लगाते हुए भारत माता की जय का उद्घोष किया और ओम का स्मरण करते हुए फांसी पर झूल गए। देशप्रेम की वेदी पर इस वीर ने स्वयं को न्यौछावर कर दिया।

Dark Saint Alaick
19-12-2011, 05:24 PM
20 दिसंबर कैरोलिंग दिवस पर विशेष

क्रिसमस का उल्लास झलकता है कैरल गीतों में

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14467&stc=1&d=1324299089

दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढाने वाले प्रभु यीशु मसीह के जन्मदिन क्रिसमस से ठीक पहले उनके संदेशों को भजनों (कैरल) के माध्यम से घर घर तक पहुंचाने की प्रथा को विश्व के विभिन्न हिस्सों में गो कैरोलिंग दिवस के रूप में मनाया जाता है। क्रिसमस से ठीक पहले आज के दिन ईसाई धर्मावलंबी रंग बिरंगे कपड़े पहनकर एक दूसरे के घर जाते हैं और भजनों के माध्यम से प्रभु के संदेश का प्रचार प्रसार करते हैं।

प्रभु की भक्ति में डूबे श्रद्धालुओं के समूह में भजन गायन का यह सिलसिला क्रिसमस के बाद भी कई दिनों तक जारी रहता है । कैरल एक तरह का भजन होता है जिसके बोल क्रिसमस या शीत रितु पर आधारित होते हैं । ये कैरल क्रिसमस से पहले गाये जाते हैं। ईसाई मान्यता के अनुसार कैरल गाने की शुरूआत यीशु मसीह के जन्म के समय से हुई । प्रभु का जन्म जैसे ही एक गौशाला में हुआ वैसे ही स्वर्ग से आये दूतों ने उनके सम्मान में कैरल गाना शुरू कर दिया और तभी से ईसाई धर्मावलंबी क्रिसमस के पहले ही कैरल गाना शुरू कर देते हैं। गो कैरोलिंग दिवस एक ऐसा मौका होता है जब लोग बडे धूमधाम से प्रभु यीशु की महिमा, उनके जन्म की परिस्थितियों, उनके संदेशों, मां मरियम द्वारा सहे गये कष्टों के बारे में भजन गाते हैं ।

प्रभु यीशु मसीह का जन्म बहुत कष्टमय परिस्थितियों में हुआ। उनकी मां मरियम और उनके पालक पिता जोजफ जनगणना में नाम दर्ज कराने के लिये जा रहे थे। इसी दौरान मां मरियम को प्रसव पीड़ा हुयी लेकिन किसी ने उन्हें रूकने के लिये अपने मकान में जगह नहीं दी। अंतत: एक दम्पती ने उन्हें अपनी गौशाला में शरण दी, जहां प्रभु यीशू मसीह का जन्म हुआ। भारत में भी यह दिन बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर समेत समूचे पूर्वोत्तर भारत में लोग विशेषकर युवा बेहद उत्साह के साथ टोलियों में निकलते हैं और रातभर घर-घर जाकर कैरल गाते हैं। कैरल गाने के बाद लोग गर्मागर्म चाकलेट और मीठा बिस्कुट खाते हैं।

Dark Saint Alaick
19-12-2011, 06:14 PM
ठंड से बचने के लिये शराब का सहारा न लें रक्तचाप और दिल के रोगी

अचानक शुरू हुई कड़ाके की ठंड में उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारी से पीड़ित लोग थोड़ा एलर्ट रहें और शरीर को गर्म रखने के लिये दो पैग व्हिस्की या रम से दूर ही रहें तो उनकी सेहत के लिये अच्छा है । इस दौरान खान पान का तो बहुत ही ध्यान रखें और क्योंकि इस मौसम में जरा सी लापरवाही उनके लिये परेशानी का सबब बन सकती है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने पर मजबूर कर सकती है। डाक्टरों का मानना है कि इस समय पड़ रही ठंड उच्च रक्तचाप के मरीजों तथा दिल की बीमारी से ग्रस्त मरीजों के लिये परेशानी का कारण बन सकती है, इस लिये सर्दी से तो बचाव करें ही साथ ही साथ खान पान पर भी ध्यान दें और तेल और मक्खन से बने खादय पदार्थो से पूरी तरह बचें। उनका कहना है कि इसके अलावा इस मौसम में शराब का इस्तेमाल तो कतई न करें क्योंकि व्हिस्की और रम के दो पैग उस समय तो उनकी ठंड कम कर देंगे लेकिन इससे उनका ब्लड प्रेशर अचानक बढ जाएगा और ब्लड शुगर में भी अचानक बढोत्तरी हो जाएगी । इस मौसम में ऐसे रोगी एक बार अपने डाक्टर से मिल कर अपनी दवाओं पर जरूर चर्चा कर लें, ऐसा करना उनके लिये लाभप्रद ही होगा और हो सके तो डाक्टर के संपर्क में लगातार रहें । संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (पीजीआई) के कार्डियोलोजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर सुदीप कुमार ने बताया कि सर्दियां बच्चों और बुजुर्गो के लिये तो खतरनाक होती ही हैं लेकिन उन लोगों के लिये सबसे अधिक परेशानी का कारण बनती है, जो कि उच्च रक्तचाप के मरीज हो या दिल की किसी बीमारी से पीड़ित हो ।
डाक्टरों के अनुसार कड़ाके की सर्दी में उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिये सबसे बड़ी परेशानी यह है कि ठंड की वजह से पसीना नहीं निकलता है और शरीर में नमक (साल्ट) का स्तर बढ जाता है जिससे रक्तचाप बढ जाता है । पीजीआई के कार्डियालोजिस्ट प्रो कुमार ने बताया कि इसके अतिरिक्त सर्दी में ज्यादा काम न करने से शारीरिक गतिविधियां भी कम हो जाती हैं और लोग व्यायाम वगैरह से भी कतराते है, जिससे रक्तचाप बढने की संभावना बढ जाती है और फिर बढे हुये रक्तचाप के कारण उनमें ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ जाता है । सर्दी के मौसम में खून की धमनियों में सिकुड़न की वजह से खून में थक्का जमने की संभावना बढ जाती है जो कि दिल के रोगियों के लिये परेशानी का कारण बनती है। ऐसे में इस तरह के रोगियों को सर्दी के मौसम में पराठे,पूरी और अधिक चिकनाई वाले खादय पदार्थो से बचना चाहिये क्योंकि सर्दी में दिल को आम दिनों की तुलना में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है जो कभी कभी उस पर भारी पड़ जाती है। वह कहते हैं कि लोगों के मन में एक गलतफहमी है कि सर्दी के दिनों में गर्म चीजें जैसे गुड़ से बनी गजक या तिल के लडडू आदि खाने से या व्हिस्की या रम के दो पैग गुनगुने पानी से लेने से सर्दी भाग जाएगी। उन्होने कहा कि ऐसा करने से आप को तुरंत तो गर्मी का एहसास हो जाएगा लेकिन आप का रक्तचाप और ब्लड शुगर बढ जाएगा जो आपके स्वास्थ्य के लिये काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है और आपको अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है । इसी कारण ठंड के मौसम में अस्पतालों के कार्डियोलोजी विभाग में अचानक मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हो जाता है ।
संजय गांधी पीजीआई के डा सुदीप कहते हंै कि इस ठंड के मौसम में उच्च रक्तचाप और दिल के मरीज सुबह सुबह की मार्निंग वाक से बचें और हो सके तो शाम को वाक या एक्सरसाइज करें और कम से कम इतना जरूर करें कि वाक या एक्सरसाइज में आपके शरीर से पसीना निकलने लगे । इसके लिये जरूरी नहीं है कि आप खुले मैदान में जाये आप किसी हेल्थ क्लब या अपने घर में ही व्यायाम कर सकते हैं और अपने को चुस्त दुरूस्त रख सकते हैं । प्रो कुमार कहते हैं कि इसके अलावा सात या आठ घंटे की अपनी नींद जरूर पूरी करें क्योंकि नींद न पूरी होने से तनाव होता है और तनाव ब्लड प्रेशर बढने का एक बड़ा कारण है । सर्दी में अगर घर से काम के सिलसिले में बाहर निकलना ही है तो अपने शरीर और कानों को गर्म कपड़े से ढंक कर निकले, क्योंकि जरा सी लापरवाही आपके लिये परेशानी का कारण बन सकती है । उधर शहर के जिला सरकारी अस्पताल काशीराम अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा डीपी मिश्रा ने माना कि सर्दियों के मौसम में उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारी के रोगियों की संख्या में इजाफा हुआ है लेकिन अस्पताल में ऐसे रोगियों के लिये चिकित्सा के सभी इंतजाम हैं और किसी भी रोगी को लौटाया नहीं जा रहा है ।

Dark Saint Alaick
20-12-2011, 06:46 PM
पत्नी और बच्चों को भारतीय नागरिकता दिलाने को परेशान है एक पाकिस्तानी हिंदू


जालंधर ! पाकिस्तान के स्यालकोट के धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक हालात से बेजार होकर 16 साल पहले जालंधर आये एक हिंदू परिवार का 70 वर्षीय मुखिया खुद तो भारत का नागरिक है, लेकिन अपनी पाकिस्तानी पत्नी और बच्चों को भारतीय बनाने की जद्दो जहद में वर्षों से परेशान है। पाकिस्तान में बसे हिंदू, सिख और इसाई परिवार वहां के कट्टरपंथियों के जुल्मो सितम से परेशान होकर अकसर अपना घरबार छोड़कर अपने वतन लौट आने को मजबूर हो जाते हैं। इसी क्रम में मुल्क राज (70 ) अपनी पत्नी कमलावंती (64 ) तथा चार बेटे और चार बेटियों के साथ 1995 में अपना कारोबार और घरबार सब वहां छोड कर यहां आ गए थे।

इस बारे में मुल्क राज ने बातचीत में कहा, मैं अपने पूरे परिवार के साथ 1995 में यहां आ गया था। हम यहां जैसे तैसे अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। नागरिकता के संबंध में भारत सरकार द्वारा निर्धारित सभी शर्तों को पूरा करने के बाद हमने नागरिकता के लिए आवेदन किया। वर्ष 2009 में सरकार ने मुझे, मेरे दो बेटों और एक बेटी को नागरिकता दे दी, लेकिन पत्नी और अन्य बच्चों को नहीं दी।

उन्होंने रूंधे गले से कहा, इस बुढापे में कागज दुरूस्त रखने के लिए मुझे बार बार दिल्ली जाना पड़ता है । सरकार ने मेरी पत्नी को नागरिकता नहीं दी है । हमारी एक ही गुजारिश है कि कमलावंती के साथ साथ बच्चों को भी नागरिकता दे दी जाए।

मुल्क राज ने कहा, हम दस लोग आये थे और हमारे पास कुल आठ पासपोर्ट थे। दोनो छोटे बच्चे नाबालिग थे इसलिए उनका नाम उनकी मां के पासपोर्ट पर दर्ज है। मुझे हर वक्त यही चिंता लगी रहती है कि किसी तरह पूरे परिवार को भारत की नगरिकता मिल जाये । हमें अपने सभी दस्तावेज दुरूस्त करा कर रखने पडते हैं । बच्चों की शादी भी यहीं कर दी है । पोते भी हैं लेकिन चिंता एक ही बात की है कि पत्नी और अन्य बच्चे भारतीय हो जाएं।

मुल्क राज के साथ बैठी उनकी पत्नी कमलावंती का कहना है, भगवान सब ठीक करेगा । वह हमारी जरूर सुनेगा और मुझे तथा हमारे बच्चों को यहां की नागरिकता जरूर मिलेगी । कम से कम बच्चों को नागरिकता मिल जाये तो मैं चैन से मर सकूंगी।

दूसरी ओर जालंधर में रह रहे पाकिस्तानी हिंदू परिवारों के लिए काम करने वाले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भगत मनोहर लाल ने कहा, मुल्क राज का परिवार ऐसा अकेला परिवार नहीं है। जालंधर में लगभग दो सौ ऐसे परिवार हैं। कई परिवार ऐसे हैं जिनमें पति को नागरिकता मिल गयी है तो पत्नी को नहीं । किसी परिवार में बच्चों को नागरिकता मिल गयी है तो उनके मातापिता को नहीं। केंद्र सरकार इन लोगों के साथ अन्याय कर रही है। सरकार को इन लोगों के बारे में एक बार जरूर सोचना चाहिए । ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि पति भारत में रहे और पत्नी पाकिस्तान में। वह वापस पाकिस्तान नहीं जाना चाहते हैं इसलिए उन्हें सरकार तत्काल नागरिकता दे।

भगत मनोहर लाल ने कहा, आगामी 23 दिसंबर को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के समक्ष मैं इस मुद्दे को उठाउंगा और प्रयास करूंगा कि वह अपने स्तर पर इन लोगों की समस्या के समाधान में सहयोग दें ।

इस बारे में जालंधर के उपायुक्त प्रियांक भारती ने कहा, नागरिकता के संबंध में आवेदन मिलने पर पुलिस की जांच के बाद तत्काल उसे गृह मंत्रालय भेज दिया जाता है। इस तरह के लंबित मामलों की मुझे कोई जानकारी नहीं है ।

उन्होंने कहा, इस बारे में ब्यौरा मिलने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है । हालांकि, अगर ऐसा मामला है कि पत्नी को नागरिकता नहीं मिली है और पति को मिल गयी है और हमारे पास आकर वह अपना मामला रखते हैं तो मैं उसे दिल्ली भेज दूंगा ।

स्यालकोट से आए एक अन्य परिवार के मुखिया दिलीप कुमार (69) ने कहा कि हमारा पूरा परिवार एक ही दिन भारत आये था और हमें नागरिकता दे दी गयी है लेकिन हमारे परिवार के अन्य सदस्यों को नहीं। हम चाहते हैं कि सरकार हम पर रहम करे और हमें नागरिकता दे दे।

गौरतलब है कि मुल्क राज और दिलीप कुमार के पास अब भारतीय पासपोर्ट है, जबकि इनके परिजनों के पास नागरिकता नहीं मिलने के कारण अभी भी पाकिस्तान का पासपोर्ट है। कमलावंती से यह पूछे जाने पर कि सरकार अगर उन्हें भारत से जाने के लिए कहे, तो वह क्या करेंगी, उन्होंने कहा, मैं अपने पति और बच्चों को छोड कर कहीं नहीं जाउंगी। अब तो इस बुढापे में केवल भगवान के यहां जाने के बारे में सोचती हूं।

Dark Saint Alaick
21-12-2011, 08:23 PM
जन्मदिवस पर
हार्डी ने पहचानी थी सबसे पहले रामानुजन की प्रतिभा

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14520&stc=1&d=1324482786

गौस, यूलर, जैकोबी जैसे सर्वकालीन महानतम गणितज्ञों की पंक्ति में शामिल श्रीनिवास रामानुजन की प्रतिभा को सबसे पहले अंग्रेज गणितज्ञ जी एच हार्डी ने पहचाना था। हार्डी ही रामानुजन को त्रिनिटी कॉलेज ले गए जहां से उनकी गणितीय प्रतिभा को पूरी दुनिया ने मानना शुरू किया। 22 दिसंबर, 1887 को तमिलनाडु के इरोड में जन्मे महान गणितज्ञ रामानुजम ने गणित को रचनात्मक बनाते हुए कई प्रयोग किए। उन्होंने बीजगणित, ज्यामिति, संख्या सिद्धांत और कलन जैसी अलग अलग गणितीय विधाओं में बहुत सारे सिद्धांत सूत्र दिए। हाइपर ज्योमेट्रिक सिरीज, इलीप्टीकल फंक्शनरीज, डाइवरजेंट सिरीज, बरनौलीज नंबर जैसे गणित के क्षेत्रों में दिए असाधारण योगदान के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।

रामानुजन के योगदान को याद करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के केशव महाविद्यालय में गणित के प्रोफेसर हेमन्त सिंह ने कहा, रामानुजन का भारतीय गणित के विकास में बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने अंक सूत्रों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके दिए सूत्र आज भी गणित के छात्रों के काम आ रहे हैं। रामानुजन न केवल भारतीय गणित बल्कि विश्व के गणितीय इतिहास में विद्वानों की पहले पंक्ति में आते हैं।

गणित और अंकों के प्रति रामानुजन के प्रेम को देखकर उन्हें अंकों का मित्र भी कहा जाता था। रामानुजन उच्च गणित के पुरोधाओं में से एक थे। 1906 में चेन्नई विश्वविद्यालय में फाईन आर्ट्स विषय में दाखिला न मिलने पर रामानुजन ने खुद से ही पढना और गणित के सूत्रों को हल करना शुरू कर दिया। उन्होने प्रसिद्ध गणितज्ञ जी एस कार की लिखी गणित की किताब से पढना शुरू किया और गणित के सूत्रों से प्रयोग करने लगे। इस दौरान रामानुजन ने कई विदेशी गणितज्ञों को अपने हल किए गए सूत्र और अनसुलझे प्रमेयों की लंबी सूची भेजी, लेकिन किसी ने भी उनके पत्र और प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया। इसी बीच 1909 में उनकी शादी हो गयी। 1910 में उन्होंने जी एच हार्डी को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने हार्डी से मदद मांगी और हार्डी ने उनका उत्साहवर्धन करते उचित जवाब भी दिया। रामानुजन की विद्वता से प्रभावित होकर हार्डी उन्हें त्रिनिटी ले गए जहां रामानुजन की पढाई और शोध दोबारा शुरू हुई। यहां से रामानुजन ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और दुनिया भर में उनकी ख्याति फैलती गयी।

रामानुजन की जीवनी द मैन हू न्यू इन्फिनिटी में लेखक रॉबर्ट कनिगेल ने लिखा है कि रामानुजन का जीवन संघर्षमय रहा। ब्रिटेन के त्रिनिटी कॉलेज तक की उनकी यात्रा उतार चढाव से भरी रही। उन्हें ब्रिटेन में नस्लभेद का भी शिकार होना पड़ा। 1918 में वह त्रिनिटी कॉलेज में फैलोशिप के लिए निर्वाचित होने वाले पहले भारतीय बने। कार्नगिल के अनुसार रामानुजन ताउम्र स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ित रहे। ब्रिटेन में उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया। उन्हें विटामिन की कमी और तपेदिक बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसी बीच वह 1919 में भारत लौट आये। बीमार चल रहे रामानुजन की सेवा में उनकी पत्नी जानकीअम्मल लगी रहीं लेकिन इतने सालों तक एक दूसरे से दूर रहे इस दंपति का मिलना शायद विधि को मंजूर नहीं था। एक वर्ष बाद ही 1920 में इस महान गणितज्ञ की मौत हो गयी। 32 साल की अल्पायु में ही दुनिया छोड़कर जाने वाली इस महान प्रतिभा की आभा से गणित की दुनिया आज भी चमक रही है, जिसे देखकर लगता है कि वर्तमान पीढी की तरह ही आने वाली पीढियां भी इस नायक के जीवन और गणितीय विद्वता के प्रति उत्सुकता और रूचि दिखाएंगी।

Ranveer
21-12-2011, 10:43 PM
19 दिसंबर को काकोरी के नायकों के शहादत दिवस पर विशेष

बिस्मिल, अशफाक : जीये वतन के लिए, मरे वतन के लिए



भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास आजादी के मतवालों के एक से बढकर एक कारनामों से भरा पड़ा है । रामप्रसाद बिस्मिल तथा अशफाक उल्ला खान के नाम इसे और भी गौरवमय बना देते हैं। जंग ए आजादी की इसी कड़ी में 1925 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जब नौ अगस्त को चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया।

इन जांबाजों ने जो खजाना लूटा, दरअसल वह हिन्दुस्तानियों के ही खून पसीने की कमाई थी, जिस पर अंग्रेजों का कब्जा था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और जंग ए आजादी को जारी रखने के लिए करना चाहते थे। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई। ट्रेन से खजाना लुट जाने से ब्रितानिया हुकूमत बुरी तरह तिलमिला गई और अपनी बर्बरता तेज कर दी। आखिर इस घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद हाथ नहीं आए।

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए) के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया, जिनमें से रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। गोरी हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया, जिसकी बड़े पैमाने पर निन्दा हुई। डकैती जैसे अपराध में फांसी की सजा अपने आप में एक विचित्र घटना थी। फांसी के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर हुई, लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी दे दी गई।

रामप्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी दी गई । जीवन की अंतिम घड़ी में भी इन महान देशभक्तों के चेहरे पर मौत का कोई भय नहीं था । दोनों हंसते हंसते भारत मां के चरणों में अपने प्राण अर्पित कर गए। काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी उच्च शिक्षित थे। बिस्मिल जहां प्रसिद्ध कवि थे, वहीं भाषाई ज्ञान में भी निपुण थे। उन्हें अंग्रेजी, हिन्दुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था। अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे। क्रांतिकारियों ने काकोरी की घटना को काफी चतुराई से अंजाम दिया था। इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए थे। बिस्मिल ने अपने चार अलग अलग नाम रखे और अशफाक ने अपना नाम कुमारजी रखा था। इन दोनों वीरों की शहादत ने देशवासियों के मन में क्रांति की एक अजीब सी लहर पैदा कर दी थी।

अशफाक उल्ला खान संभवतः सबसे पहले भारतीय क्रांतिकारी मुसलमान जिन्हे फांसी दी गई थी (कम उम्र मे )। उस समय नेहरू और कई प्रमुख नेता रोज जेल मे इनके लिए अपने घर से खाना लेकर जाते थे ।

Dark Saint Alaick
22-12-2011, 03:51 AM
भिखारी ठाकुर : भोजपुरी लोक का सिरमौर

http://myhindiforum.com/attachment.php?attachmentid=14529&stc=1&d=1324509642

भिखारी ठाकुर को मैं तब से जानता हूं जब मेरी उम्र सात साल की थी। संभवतः 1944 का साल रहा होगा। मेरे गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर ओझवलिया नाम का एक गांव है। उस गांव में गृहस्थ जीवन में रहकर साधुवृत्ति वाले एक आचारी थे। उनसे गांव वालों का बांस की कोठी को लेकर झगड़ा था। आचारी पर बांस नहीं काटने की बंदिश थी। इस संकट में आचारी को एक चतुराई सुझी कि क्यों न भिखारी ठाकुर का नाच गांव में कराया जाये। नाच सुनकर लोगों की भीड़ उमड़ेगी। गांव और ज्वार के लोग नाच देखने में विभोर रहेंगे। ऐसे में आचारी का मकसद आसानी से पूरा हो जायेगा।

भिखारी ठाकुर उस दौरान कोलकाता में रहते थे। आचारी कोलकाता गये और भिखारी ठाकुर के नाम का अनुबन्ध कर आये। निश्चित तिथि पर भिखारी ठाकुर की मंडली ओझवलिया पहुंच गयी। हजारों की भीड़ नाच देखने उमड़ पड़ी। दस कोस पैदल चलकर लोग नाच देखने आये थे। लोगों का ध्यान जब नाच देखने में लगा था-आचारी ने बांस काटने की अपनी कार्रवाई शुरू करा दी। लोगों को बांस काटने की भनक जैसे ही लगी-मारपीट शुरू हो गयी। नाच बन्द हो गया। दूसरे दिन उस इलाके के लोगों को जब इस बात का अहसास हुआ कि यह भिखारी के प्रति इस इलाके की जनता का बहुत बड़ा अपमान है। अतः लोगों ने मेरे गांव में भिखारी का नाच कराने का निर्णय लिया और नाच हुआ भी। मैं बच्चा था इसलिए मुझे याद नहीं है कि नाच में क्या-क्या हुआ लेकिन मेरे इलाके में यह घटना किवदंती की तरह आज भी लोगों की जेहन में है। नाच की शुरूआत में भिखारी ठाकुर ने आचारी वाली घटना पर एक कविता लिखी थी जिसे उन्होंने गाकर सुनाया था। कविता की शुरू की पंक्तियां बहुत दिनों तक लोगों को याद थी जिसकी पहली पंक्ति थी-सबके ठगले भिखारी, भिखारी के ठगले आचारी।

इस तरह भिखारी ठाकुर से मेरी पहली मुलाकात मेरे अपने गांव में हुई थी। भिखारी ठाकुर को मैंने दूसरी बार पटना के गांधी मैदान में महीनों पहले सरकारी प्रदर्शनों के दौरान देखा था और प्रदर्शनी के सांस्कृतिक मंच पर उनके गीत और कविताएं सुनी थी। वह 1958 का साल था और मैं बी.ए. का विद्यार्थी था। मेरी तीसरी और अंतिम मुलाकात 1965 में हुई। हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार नई कविता पर बहस कर रहे थे। अचानक किसी का ध्यान भिखारी ठाकुर पर पड़ा। वे श्रोताओं के बीच अंतिम पंक्ति में बैठे थे। लोगों ने आग्रह करके उनको मंच पर बुलाया और उनसे कविताएं पढ़वायी। केदारनाथ सिंह ने हाल ही में इस प्रसंग को हिन्दुस्तान में लिखा है और उसका शीर्षक दिया है-नयी कविता के मंच पर भिखारी ठाकुर। उस मंच पर केदारनाथ सिंह, विजय मोहन सिंह, चन्द्रभूषण तिवारी, बद्रीनाथ तिवारी, मधुकर सिंह आदि मौजूद थे।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर को अनगढ़ हीरा कहा था तो प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने उन्हें भोजपुरी का शेक्सपीयर कहा। डा॰ केदारनाथ सिंह लिखते हैं-भिखारी ठाकुर मौखिक परम्परा के भीतर से उभरकर आये थे, पर इनके नाटक और गीत हमें लिखित रूप में उपलब्ध हैं। कोरा मनोरंजन उनका उद्देश्य नहीं था। उनकी हर कृति किसी न किसी सामाजिक विकृति या कुरीति पर चोट करती है और ऐसा करते हुए उसका सबसे धारदार हथियार होता है-व्यंग्य। डा. उदयनारायण तिवारी लिखते हैं-भिखारी ठाकुर वास्तव में भोजपुरी के जनकवि हैं। इनकी कविता में भोजपुरी जनता अपने सुख-दुख एवं भलाई-बुराई को प्रतयक्ष रूप से देखती है। इस तरह बहुत सारे हिन्दी साहित्य के विद्वानों ने भिखारी ठाकुर की प्रशंसा की है।

संजीव ने सूत्रधार नाम से एक उपन्यास उनके जीवन को आधार बनाकर लिखा है। कुछ लोगों ने पी.एचडी., डि.लिट्. और डिजरटेशन इनके नाटकों, गीतों और भजनों पर लिखे हैं। इनमें से कुछ का प्रकाशन भी हुआ है। भिखारी ठाकुर की स्मृति को संजोने के लिए उनके गांव कुतुबपुर (सारण) में भिखारी ठाकुर आश्रम भी निर्मित है जहां नियमित उन पर कार्यक्रम और गोष्ठियां आयोजित होती रहती है।

भिखारी ठाकुर ने अपना जीवन चरित लिखा है। यह जीवन चरित भोजपुरी कविता में है। इन्होंने स्वयं लिखा है कि उनका जन्म 1887 ई. पौष मास शुक्ल पक्ष पंचमी सोमवार के 12 बजे दिन में हुआ था। उनका देहावसान 1971 ई. में हुआ था। उनकी कोई विधिवत शिक्षा-दीक्षा नहीं हुई थी। उन्होंने अपने साधना से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया था और स्वाध्याय से कुछ धार्मिक ग्रंथों का परायण किया था-जिसमें रामचरित मानस प्रमुख था। भिखारी ठाकुर एक अत्यंत पिछड़ी नाई जाति में जन्में थे। उनके घर में एक गाय थी और तीन-चार बछिया थी जिसे वे अपने सगे-साथियों के साथ बचपन में चराया करते थे। इन्हीं साथियों के साथ मिलकर वे रामलीला और दूसरे नाटकों के अभिनय की नकल करते थे। उनका कंठ सुमधुर था। उनकी सुरीली आवाज में जादू था। एक ओर वे परिवार के जीवन-यापन के सहयोग में पशुओं की देखभाल किया करते थे तो दूसरी ओर गृहस्थों और जजमानों के दाढ़ी-बाल बनाते थे।

कुछ लेखकों ने भिखारी ठाकुर पर बचपन में सवर्णों द्वारा शोषण-उत्पीड़न का सवाल बिना किसी जांच-पड़ताल के उठाया है और उनके द्वारा नाच मंडली स्थापित करने की वजह भी इसे ही बतला दिया है। लेकिन ऐसे लेखकों का इलजाम गलत है। अगड़ी जातियों द्वारा दलितों और पिछड़ी जातियों पर शोषण-उत्पीड़न उस काल में होता था लेकिन ये जातियां उस अवधि में प्रतिकार या प्रोटेस्ट की स्थिति में नहीं थी। इसलिए भिखारी ठाकुर ने किसी प्रतिकार में अपना पेशा छोड़ा था और नाच मंडली खड़ी की थी- ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता है।

भिखारी ठाकुर को बचपन से ही रामलीला, रासलीला, सत्संग, प्रवचन, भजन-कीर्तन आदि से बेहद लगाव था। परिणामतः काम से फुर्सत पाकर रात में वे ऐसे अनुष्ठानों में भाग लेते थे और उन पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा था। उनके बचपन के दिनों में बंगाल और बिहार में जितने प्रकार के नाच, नाटक, गीत-संगीत प्रचलित थे-उनको वे बड़ी तन्मयता से देखते थे और उन सबों का प्रयोग उन्होंने अपने द्वारा गठित बिदेशिया नाच में किया था। उनके द्वारा तैयार बिदेशिया नाच बाद में चलकर एक शैली बन गया जो पचास-साठ वर्षों तक बिहार, उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों और कोलकाता में रहनेवाली हिन्दी भाषी जनता विशेष रूप से भोजपुरी भाषी किसान-मजदूर जनता के लिए मनोरंजन का महत्वपूर्ण साधन बना रहा।

मुस्लिम और अंग्रेजी शासनकाल में औरतों पर हो रहे अत्याचारों ने उन्हें घरों की चहारदीवारी में कैद कर दिया था। उनका कोई सार्वजनिक चेहरा नहीं रह गया था। उनकी पर्दादारी और अशिक्षा एक तरह से उनके लिए काल बन गयी थी। ऐसी स्थिति में नाटकों में स्त्री पात्रों का मिलना असंभव था। इसके साथ ही अभिजात वर्ग के लोगों में यह धारणा विकसित हुई थी कि नचनिया-बजनिया का का निम्न जातियों का है। सवर्ण इसमें भागीदारी करें-ऐसी बात वे सोच भी नहीं सकते थे। भिखारी ठाकुर के नाचों में स्त्री पात्रों की भूमिका कम उम्र के लड़के किया करते थे। उनकी नाच मंडली में अधिसंख्य सदस्य दलित और पिछड़ी जातियों से ही आते थे। भिखारी ठाकुर के नाटकों में पात्रों के नाम भी वही होते थे जो दलित और पिछड़ी जातियों में प्रचलित थे। उन्होंने अपने नाटकों में दलित, शोषित, अशिक्षित और उपेक्षित तबकों के साथ घटित होनेवाली घटनाओं का विशेष उल्लेख किया है। बाल-विवाह, अनमेल विवाह, धन के लिए बेटियों को बेचने का अपराध, सम्पत्ति के लोभ में संयुक्त परिवार का विघटन, बहुविवाह, चरित्रहीनता, अपराध, नशाखोरी, चोरी, जुआ खेलना आदि कुछ ऐसी प्रचलित कुप्रवृत्तियां ऐसे वर्गों में व्याप्त थीं, जिससे उनका सामाजिक और आर्थिक जीवन दुखमय हो जाता था। भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों के माध्यम से इन कुरीतियों पर प्रहार करने का प्रयास किया। गांव-देहात के लोगों पर इन नाटकों का बड़ा प्रभाव पड़ा और लोगों ने इन कुरीतियों से निजात पाने की दिशा में पहल भी की।

विगत शताब्दी का पचास वर्ष विशेषकर 1915 से 1965 का कालखण्ड उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले और बिहार के भोजपुरी भाषा-भाषी जिलों में आम लोगों के मनोरंजन के साधन, रामलीला, जात्रा, भांड, धोबी, नेटुआ, गोई आदि नाच होते थे। चैती फसल कटने और आषाढ़ में फसल लगने के बीच के समय में किसानी से जीवन-यापन करनेवाली जनता के मनोरंजन का एकमात्र साधन ये नाच होते थे जिसे लोग शादी-विवाह और उत्सव के अवसर पर मंगवाते थे। (इन क्षेत्रों में शादी-विवाह गर्मी के महीने में ही होते थे।) एक व्यक्ति के खर्च से हजारों लोगों का बिना अधेली खर्च किये मनोरंजन होता था। इन नाचों में गाये गीत गांव के चरवाहा, हलवाहा, बनिहारा सालों भर गुनगुनाता था और खेतों में किये गये श्रम से अपनी थकान मिटाता था। भिखारी ठाकुर के बिदेशिया नाच ने इस विधा में नया आयाम जोड़ा। भोजपुरी क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक सांस्कृतिक समस्याओं को केन्द्र में रखकर इस क्षेत्र की जनता की भाषा में उन्होंने अपने नाटक और गीत लिखे और उनका स्वयं मंचन किया। जनता अपनी समस्याओं को अपनी भाषा में सुनकर ज्यादा प्रभावित होती थी। इस तरह भिखारी ठाकुर के नाटकों के प्रभाव अन्य नाटकों की तुलना में ज्यादा प्रभावी होते थे।

(बिहार खोज खबर)

Dark Saint Alaick
22-12-2011, 03:33 PM
23 दिसंबर किसान दिवस पर विशेष

अपनी आजीविका के अपहरण से परेशान आज का किसान


किसानों की आत्महत्या, न्यूनतम समर्थन मूल्य और भूमि अधिग्रहण पर विवाद के बीच किसानों के मुद्दे पर सरकार की चुनौतियां कम नहीं होने वाली हैं। देश की तरक्की के दावे करने वाले समृद्ध लोगों के लिये किसान दिवस पर ऐसे अनेक अन्नदाताओं के पास शिकायतों की फेहरिस्त है। एक तरफ जहां किसानों की आत्महत्या को लेकर विपक्षी दलों ने कल ही संसद परिसर में धरना देकर मांग की है कि किसानों के मुद्दे पर संयुक्त संसदीय समिति या स्थायी समिति का तुरंत गठन किया जाए, दूसरी तरफ सड़कों पर अपना आलू फेंक रहे पंजाब के किसान मंजीत सिंह कहते हैं कि एक किलो आलू की लागत तीन से चार रुपये की आती है, जिसका दाम अब सिर्फ तीस पैसे प्रति किलो रह गया है। वहीं खाद सब्सिडी को लेकर सरकार और खाद उत्पादकों की सांठगांठ से किसान त्रस्त हो रहा है। ऐसे हालात में कल ही आंध्रप्रदेश में किसानों ने कृषि छुट्टी का ऐलान किया है, वह आमदनी नहीं होने के कारण खेती नहीं करना चाहते हैं। देश के अन्य हिस्सों में भी किसान खेती से विमुख हो रहे हैं।

वरिष्ठ अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा का कहना है कि आने वाला साल भी किसानों के लिये चुनौती पूर्ण रहेगा। उनका मानना है कि सरकार पूंजी की ताकत के सामने घुटने टेककर किसानों की आजीविका का अपहरण कर रही है और किसानों के हितों के नाम पर विदेशी निवेश को आमंत्रित कर रही है। काबरा का कहना है खुद को किसानों का हितैषी बताने वाले राजनीतिक दलों के लिये मंत्री पद अहम हो जाते हैं और वे सरकार के ही साथ हो लेते हैं। खेती और कृषि मामलों पर विशेष राय रखने वाली शिक्षाविद् जया मेहता कहती हैं कि सरकार सिर्फ कॉस्मेटिक नीतियों को ही बढावा देती है जिनसे किसानों के हित सुरक्षित नहीं होते।

महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में कर्ज से दबे किसान आत्महत्या का रास्ता पकड़ रहे हैं, तो उत्तर भारत में अपने हक के लिए लड़ने वाले किसानों को कभी पुलिसिया लाठी तो कभी बंदूक की गोली का सामना करना पड़ा। औद्योगिक उन्नति के नाम पर किसानों से उनकी जमीन छीनकर उद्योगपति मॉल, इंडस्ट्री और रेसिंग ट्रैक बना रहे हैं। अलीगढ के टप्पल निवासी किसान भोलाराम बताते हैं कि ऐक्सपे्रसवे परियोजना के लिये निजी कंपनी और प्रशासनिक अधिकारियों ने जमीन अधिग्रहण के लिये करार पर उनके हस्ताक्षर कराने के लिये कई हथकंडे अपनाए। उनसे लुभावने वायदे किये गये। परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी, जमीन के हिसाब से प्रति महीने निश्चित राशि के वायदे जब झूठे निकले तो छलावे के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा।

भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख राकेश टिकैत की मांग है कि सरकार को कृषि कैबिनेट का गठन करना चाहिये। उनका कहना है कि बुग्गी में सफर करने वाले किसान नेताआेंं के लिये हवाई जहाज की सवारी प्यारी हो जाती है और वे किसानों को छोड़ कुर्सी का ध्यान रखते हैं। किसान नेता गोविंद सिंह तेवतिया ने मांग की कि सरकार को किसानों की समस्याओं के निपटारे के लिये एक आयोग का गठन करना चाहिये। उनका कहना है कि जमीन के बदले सरकार किसानों को मुआवजा तो देती है पर