ब्रेल साक्षरता जागरुकता माह पर विशेष
बिंदुओं ने फैलाया अंधेरी दुनिया में उजाला
पढने के लिए आंखों की जरूरत होती है लेकिन ब्रेल वह लिपि है जो नेत्रहीनों के जीवन में ज्ञान का उजियारा भर सकती है। ब्रेल लिपि में लिखे अक्षर वास्तव में बिंदुओं से बनते हैं और नेत्रहीन व्यक्ति हाथों के स्पर्श से ब्रेल लिपि में लिखे अक्षरों को पहचान कर बिना किसी की मदद के इन्हें पढ सकते हैं। ब्रेल का आविष्कार 1824 में लुइस ब्रेल ने किया था। उसके पहले नेत्रहीन लोगों को अपनी परेशानियों का हल अपने ही तरीकों से निकालना होता था, लेकिन बिंदुओं के उपयोग से बने इस तंत्र के आविष्कार ने उन लोगों की दुनिया में क्रांति ला दी जो लोग आंखों में रोशनी न होने की वजह से देख ही नहीं पाते। नेत्रहीनों और दृष्टिबाधित लोगों के लिए काम करने वाली संस्था ‘दृष्टि’ की संयोजक अनु शर्मा ने बताया ‘नेत्रहीनों के लिए सरकार की ओर से बहुत से दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। इन्हीं में से एक दिशानिर्देश सभी सरकारी और निजी कार्यालयों में ब्रेल में काम करने की सुविधा देने का है, लेकिन अब भी बहुत से कार्यालय नेत्रहीनों के लिए पारिवारिक माहौल नहीं देते।’ नेत्रहीनों को ब्रेल की शिक्षा देने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता और ब्रेल प्रशिक्षक आनंद अग्निहोत्री ने कहा, ‘जरूरी नहीं है कि आप नेत्रहीनों की मदद उन्हें ब्रेल का प्रशिक्षण देकर ही करें। इस बात को समझना जरूरी है कि आम जनजीवन में छोटे-छोटे काम करके भी आप उनकी मदद कर सकते हैं। लेकिन अगर ब्रेल की सुविधा में विस्तार हो जाए तो क्या कहने।’ आनंद ने अपने रोजमर्रा के अनुभवों के आधार पर कहा, ‘आम तौर पर नेत्रहीन किसी से मदद लेना पसंद नहीं करते और इतने प्रशिक्षित हो जाते हैं कि अपने दैनिक कार्य खुद कर सकें, लेकिन आप मेट्रो में, बसों में और सड़कों पर उनकी मदद कर सकते हैं। जो देख नहीं सकते, वे भी हमारी तरह ही इंसान हैं और उनके साथ ‘असामान्य’ लोगों की तरह व्यवहार उन्हें तकलीफ देता है।’ उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि गरीब परिवारों में पैदा होने वाले नेत्रहीन बच्चों को शिक्षा-दीक्षा देने के लिए सरकारी स्तर पर और मदद की जरूरत है। साथ ही उन्होंने कहा ‘हमारे देश की साहित्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। अगर अधिक से अधिक संख्या में किताबें ब्रेल लिपि में उपलब्ध हों तो ज्ञान का उजियारा अंधकार भरे जीवन को रौशन कर देगा।’ अनु के मुताबिक, ‘देखने में आता है कि कार्यालयों में न तो नेत्रहीनों को उचित सुविधाएं मिलती हैं और न ही कोई उनकी मदद के लिए आगे आता है। स्वाभिमान से जीने के इच्छुक नेत्रहीनों को कार्यालयों के चक्कर लगवाना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। ऐसे में समाज में जागरुकता लाकर ही परिवर्तन लाया जा सकता है।’ ब्रेल का आविष्कार करने वाले लुइस ब्रेल का जन्म जनवरी में हुआ था, इसके चलते जनवरी को ‘ब्रेल साक्षरता जागरुकता माह’ के रूप में मनाया जाता है।