जन्मतिथि पर विशेष
आशावादी व्यक्तित्व के धनी ‘हुसैन’
देश के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन एक व्यावहारिक और आशावादी व्यक्तित्व के इंसान थे। इसके अलावा शुरू से ही शिक्षा के प्रति उनका रुझान था। साधारण वेशभूषा, सरल स्वभाव एवं सात्विक आचरण के कारण वह विद्यार्थी जीवन में ‘मुर्शिद’ के नाम से विख्यात हुए। हुसैन देश की शिक्षा प्रणाली को रोजगार से जोड़ने के पैरोकार थे। डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी, 1897 को हैदराबाद के सम्पन्न पठान परिवार में हुआ था। उनके पिता वकील थे। जब जाकिर मात्र नौ वर्ष के थे, तब उनके पिता का संरक्षण उनसे सदा के लिए छिन गया। इस घटना के बाद उनका पूरा परिवार कायमगंज लौट आया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इटावा के इस्लामिया हाई स्कूल में हुई। इन्होंने अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कालेज से अर्थशास्त्र की स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में ही डाक्टरेट किया। अध्ययनकाल में उनकी गणना सदैव सुयोग्य एवं शिष्ट छात्रों में की जाती थी। अपनी साधारण वेशभूषा, सरल स्वभाव एवं सात्विक आचरण के कारण ये विद्यार्थी जीवन में ‘मुर्शिद’ के नाम से विख्यात हुए। तीन मई,1969 को हृदय की गति बंद हो जाने से इनका असामयिक निधन हो गया। वह देश के ऐसे पहले राष्ट्रपति थे जिनका कार्यालय में निधन हुआ।
जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना : वर्ष1920 में जब जाकिर एम.ए.ओ. कालेज में एम.ए. के छात्र थे तभी महात्मा गांधी अली बंधुओं के साथ अलीगढ़ आए। उन्होंने कालेज के छात्रों एवं अध्यापकों के समक्ष देशभक्ति की भावनाओं से ओतप्रोत ओजस्वी भाषण किया। बापू ने अंग्रेज सरकार द्वारा संचालित अथवा नियंत्रित शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार कर राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने के लिए छात्रों एवं अध्यापकों का आहृवान किया। यहीं पर गांधी के भाषण का जाकिर पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा और उसी वक्त उन्होंने कालेज त्याग दिया। उन्होंने कतिपय छात्रों एवं अध्यापकों के सहयोग से एक राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान की स्थापना की जो बाद में ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ के नाम से विख्यात हुआ। उन्होंने इस संस्था का पोषण 40 वर्षों तक किया।
अध्यापन : हुसैन उच्च अध्ययन हेतु बर्लिन चले गए। वहां पर उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएचडी. की उपाधि प्राप्त की करने के बाद देश की सेवा करने के लिए अपने देश लौट आए। वे जामिया मिलिया के वाइस चांसलर बनाए गए। 29 वर्ष की अल्पायु में इतने गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित होना इनके व्यक्तित्व की अहमीयता का द्योतक है। उस्मानिया विश्वविद्यालय के 600 रुपए मासिक के आमंत्रण को अस्वीकार कर पावन कर्तव्य की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने जामिया मिलिया में केवल 75 रुपए मासिक वेतन पर अध्यापन किया। विषम आर्थिक स्थितियों में भी वह निराश नहीं हुए एवं संस्था की अस्तित्व रक्षा के लिए सतत संघर्ष करते रहे। जामिया मिलिया उनके त्यागमय जीवन की महान पूंजी और उनकी 22 वर्षों की मौन साधना और घोर तपस्या का ज्वलंत उदाहरण है। वह देश की अनेक शिक्षण समितियों से सम्बद्ध रहे। हुसैन महात्मा गांधी द्वारा विकसित की गई बुनियादी शिक्षा अभियान के सूत्रधार थे। यहां तक कि हुसैन हिंदुस्तानी तालीमी संघ, सेवाग्राम, विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग आदि अनेक शिक्षण समितियों के सदस्य तथा सभापति भी रह चुके थे। वर्ष 1937 में जब प्रांतों को कुछ सीमा तक स्वायत्तता मिली और महात्मा गांधी ने जनप्रिय प्रांतीय सरकारों से बुनियादी शिक्षा के प्रसार पर बल देने का अनुरोध किया तब गांधी के आमंत्रण पर हुसैन ने बुनियादी शिक्षा सम्बंधी राष्ट्रीय समिति की अध्यक्षता स्वीकार की। देश के विभाजन के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के अनुरोध पर उन्होंने अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर का कार्यभार संभाला। उस समय विश्वविद्यालय पृथक्तावादी मुसलमानों के षड्यंत्र का केंद्र था। ऐसी स्थिति में उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन का गम्भीर उत्तरदायित्व ग्रहण किया और आठ वर्षों तक कुशलतापूर्वक उसका निर्वाह किया। इसके अलावा उन्होंने कई बार यूनेस्को में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।
राजनैतिक सफर : डॉ. हुसैन के कार्यों को देखते हुए वर्ष 1952 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। वर्ष 1957 में वह बिहार के राज्यपाल नियुक्त होने के बाद वह वर्ष 1962 में भारत के उपराष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हुए। राज्यसभा के अध्यक्ष पद पर भी उन्होंने जिस निष्पक्षता और योग्यता का परिचय दिया वह इनके उत्तराधिकारियों के लिए अनुकरणीय थी। वर्ष1967 में डा. हुसैन भारत के तृतीय राष्ट्रपति के रूप में चुने गए। अपने कार्यकाल की अल्प अवधि में उन्होंने अपने पद की गरिमा बढ़ाई।
लेखक भी रहे हुसैन : जाकिर हुसैन जितने अच्छे इंसान और नेता थे उतने ही सफल लेखक भी थे। इनकी कृतियों में एक ओर ज्ञान विज्ञान की गुरु गंभीर धारा प्रवाहित होती है वहीं दूसरी ओर ‘अबू की बकरी’ जैसी लोकप्रिय बालोपयोगी रचनाओं की प्रचुरता है। उन्होंने प्लेटो द्वारा रचित पुस्तक ‘रिपब्लिक’ का उर्दू में अनुवाद किया। शिक्षा से सम्बंधित अनेक ग्रंथों एवं कहानियों के अतिरिक्त हुसैन ने अर्थशास्त्र पर भी एक ग्रंथ की रचना की। ‘एलिमेंट्स आव एकानामिक्स’ तथा अर्थशास्त्र की अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का उर्दू में अनुवाद किया। सुंदर हस्तलिपि में अपनी प्रगाढ़ रुचि का उपयोग उन्होंने गालिब की कविताओं के अत्यंत मनोहर प्रकाशन में किया। वह उर्दू के शीर्षस्य संस्मरणलेखक भी थे।
अनुशासनप्रिय व्यक्तित्त्व के धनी : डॉ. हुसैन बेहद अनुशासनप्रिय व्यक्तित्त्व के धनी थे। वह चाहते थे कि जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र अत्यंत अनुशासित रहें, जिनमें साफ-सुथरे कपडे और पॉलिश से चमकते जूते होना सर्वोपरि था। इसके लिए डॉ. हुसैन ने एक लिखित आदेश भी निकाला किंतु छात्रों ने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। छात्र अपनी मनमर्जी से ही चलते थे, जिसके कारण जामिया विश्वविद्यालय का अनुशासन बिगड़ने लगा। यह देखकर डॉ. हुसैन ने छात्रों को अलग तरीके से सुधारने पर विचार किया। एक दिन वह विश्वविद्यालय के दरवाजे पर ब्रश और पॉलिश लेकर बैठ गए और हर आने-जाने वाले छात्र के जूते ब्रश करने लगे। यह देखकर सभी छात्र बहुत लज्जित हुए। उन्होंने अपनी भूल मानते हुए डॉ. हुसैन से क्षमा मांगी और अगले दिन से सभी छात्र साफ-सुथरे कपड़ों में और जूतों पर पॉलिश करके आने लगे। इस तरह विश्वविद्यालय में पुन: अनुशासन कायम हो गया।