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Old 11-09-2011, 08:46 PM   #8
bhavna singh
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Default Re: मेरी फ़ितरत ....

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Originally Posted by dr. Rakesh srivastava View Post
तुम्हारे हिस्से की सब धूप सहन कर लेता ;
मै पेड़ बन के तुझे उम्र भर साया देता .
हमारे हमसफ़र बन साथ चले चलते अगर ;
पलक पर रखता या फूलों का गलीचा देता .
तेरा यकीन जो मुझ पर ठहर गया होता ;
तेरी ताबीज़ बन ताउम्र हिफाज़त देता .
मै अगर जानता , तलवार तू भी रखती है ;
तो ख़ुद को म्यान से बाहर नहीं आने देता .
बिन तेरे जी नहीं पाऊंगा , पता होता अगर ;
बहस न करके , हाथ गूंगे - सा उठा देता .
वजूद खुद का तेरे प्यार में भुलाकर मै ;
मेरी ख़ुदी को तेरी ख़ुदी का रंग दे देता
चाँद , तू बादलों के पार छुपा बैठा है ;
चकोर किस तरह हालात का पता देता .
मेरी फ़ितरत तेरी फ़ितरत के करीब होती अगर ;
तू भी भूले न मुझे , बस ये श्राप दे देता
.
डॉक्टर साहब आपकी कविता सीधे दिल को छू गई /
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आजकल लोग रिश्तों को भूलते जा रहे हैं....!
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