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DevRaj80
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अल्फ्रेड नोबल को मौत का सौदागर भी कहा गया





नई दिल्ली। विस्फोटक डायनमाइट के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबल के नाम से आज भले ही शांति तथा अन्य क्षेत्रों में पुरस्कार दिए जाते हैं लेकिन 1888 में एक फ्रांसीसी अखबार ने उन्हें मौत का सौदागर बताया था। यह बात और है कि इस अखबार ने भूलवश अल्फ्रेड के बडे भाई की मौत के बाद जो जीवनी छापी दरअसल वह अल्फ्रेड के लिए लिखी गई थी और उसमें उन्हें मौत का सौदागर बताया था।

विस्फोटकों के आविष्कार में वर्षो जुटे रहे अल्फ्रेड ने नाइट्रोग्लिीसिरीन के साथ प्रयोग करना शुरू किया। उन्हें उम्मीद थी कि यह सुरक्षित विस्फोटक होगा लेकिन 1964 में स्टाकहोम के निकट उसकी फैक्ट्री में धमाका हो गया जिसमे उसके छोटे भाई एमिल और चार लोगों की जान चली गई थी।

नोबल पुरस्कार की स्थापना 1896 में अल्फ्रेड नोबल के निधन के बाद उनकी वसीयत के मुताबिक हुई थी लेकिन पांच साल तक वसीयत को लेकर चले विवाद के बाद 10 दिसंबर 1901 को पहली बार पुरस्कार वितरित किया था।

नोबेल फाउंडेशन की सबसे बड़ी भूल

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को नोबल पुरस्कार से नहीं नवाजे जाने को नोबेल फाउंडेशन की सबसे बड़ी भूल माना जाता है। पांच बार महात्मा गांधी का नाम भेजा गया लेकिन दुनिया में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाने वाले इस महात्मा को इससे सम्मानित नहीं किया गया। आखिरी बार 1948 में गांधीजी का नाम उनके निधन से कुछ पहले भेजा गया था तब शांति पुरस्कार समिति ने यह कहते हुए उस साल पुरस्कार नहीं दिया कि इसके लिए कोई उपयुक्त जीवित व्यक्ति नहीं है।
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