29-12-2011, 07:01 PM | #22 |
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Re: कुंवर बेचैन की रचनाएँ
आवाज़ को / आवाज़ दे
ये मौन-व्रत /अच्छा नहीं। जलते हैं घर जलते नगर जलने लगे / चिड़यों के पर, तू ख्वाब में डूबा रहा तेरी नज़र / थी बेख़बर। आँख़ों के ख़त / पर नींद का यह दस्तख़त / अच्छा नहीं। जिस पेड़ को खाते हैं घुन उस पेड़ की / आवाज़ सुन, उसके तले बैठे हुए तू फूल की / रस्सी न बुन। जर्जर तनों / में रीढ का यह अल्पमत / अच्छा नहीं। है भाल यह ऊँचा गगन हैं स्वेदकन / नक्षत्र-गन, दीपक जला उस द्वार पर जिस द्वार पर / है तम सघन। अब स्वर्ण की / दहलीज़ पर यह शिर विनत / अच्छा नहीं
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