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![]() भारत के गणतंत्र बनने के साक्षी थे इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो देश के पहले गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन गवर्नमेंट हाउस (वर्तमान राष्ट्रपति भवन) जगमग रोशनी से गुलजार था, जहां भारत के गणतंत्र के रूप में दुनिया के पटल पर उभरने के साक्षी रहे लोगों में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो शामिल थे। ‘रेमिनिसेंस आॅफ फर्स्ट रिपब्लिक डे’ के अनुसार, 26 जनवरी 1950 को देश के पहले गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन गवर्नमेंट हाउस में कई देशों के राजनयिकों और सुकर्णो सहित 500 से अधिक अतिथि थे। इन सब अतिथियों के बीच भारत के गणतंत्र बनने की घोषणा देश के अंतिम गर्वनर जनरल सी राज गोपालाचारी ने करते हुए कहा कि इंडिया जो भारत है, वह सम्प्रभुता सम्पन्न लोकतांत्रिक गणतंत्र होगा। देश के इतिहास के उस अभूतपूर्व क्षण में स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलायी गई । भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति हीरालाल कानिया ने हिन्दी में शपथ दिलाई। इस मौके पर राजेन्द्र प्रसाद काली अचकन, उजला चूड़ीदार पाजामा और सफेद गांधी टोपी पहने हुए थे। 20वीं शताब्दी के उस ऐतिहासिक क्षण के गवाहों में निवर्तमान गर्वनर जलरल सी राजगोपालाचारी, प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, उपप्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल, कैबिनेट मंत्री, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, भारत के आॅडिटर जनरल आदि मौजूद थे। उस अवसर पर पंडित नेहरू और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों को पद एवं गोपनीयता की शपथ भी दिलाई गई। लोकसभा के पहले अध्यक्ष जी वी मावलंकर भव्य दरबार हाल में पहली पंक्ति में बैठे हुए थे। दरबार हाल में हर्ष और उल्लास के अविस्मरणीय दृश्य था। देश के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आए लोग राष्ट्रपति भवन परिसर के आसपास एकत्र थे। बाद में हजारों की संख्या में लोगों ने महात्मा गांधी की समाधि ‘राजघाट’ जाकर अपने प्यारे बापू को श्रद्धांजलि आर्पित की। दरबार हाल में पहली बार राष्ट्रीय प्रतीक (चार शेर मुख वाले अशोक स्तम्भ) को उस स्थान पर रखा गया जहां ब्रिटिश वायसराय बैठा करते थे। पहली बार ही वहां सिंहासन के पीछे मुस्कुराते बुद्ध की मूर्ति भी रखी गई थी। प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने सभी उपस्थित लोगों का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और हिन्दी एवं अंग्रेजी में संक्षिप्त भाषण दिया। दिल्ली समेत देश के अनेक स्थानों पर देश के प्रथम गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रभात फेरी भी निकाली गई और यह परंपरा आज भी जारी है।
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दूसरों से ऐसा व्यवहार कतई मत करो, जैसा तुम स्वयं से किया जाना पसंद नहीं करोगे ! - प्रभु यीशु |
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विगत की कथा
अहिंसा के पुजारी बापू के मुरीद थे एल्बर्ट आइंस्टीन दुनिया को परमाणु क्षमता से रूबरू कराने के बाद इन बमों की विध्वंसक शक्ति का दुरुपयोग होने की आशंका से परेशान एल्बर्ट आइंस्टीन की अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी से मिलने की बहुत तमन्ना थी जो पूरी नहीं हो सकी। अल्बानो मुलर के संकलन के अनुसार, 1931 में बापू को लिखे पत्र में आइंस्टीन ने उनसे मिलने की इच्छा जताई थी। आइंस्टीन ने पत्र में लिखा था कि मैं आपके एक मित्र के मेरे घर में उपस्थित होने का सदुपयोग करते हुए आपको ये पंक्तियां भेज रहा हूं । आपने अपने काम से यह साबित कर दिया है कि ऐसे लोगों के साथ भी अहिंसा के जरिए जीत हासिल की जा सकती है जो हिंसा के मार्ग को खारिज नहीं करते। मैं उम्मीद करता हूं कि आपका उदाहरण देश की सीमाओं में बंधा नहीं रहेगा बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होगा। उन्होंने लिखा कि मैं उम्मीद करता हूं कि एक दिन मैं आपसे मुलाकात कर पाउंगा, ‘कलेक्टेड वर्क्स आॅफ महात्मा गांधी वाल्यूम 54’ के अनुसार महात्मा गांधी ने आइंस्टीन के पत्र का जवाब 18 अक्टूबर 1831 को दिया। उन्होंने लिखा कि सुंदरम के माध्यम से मुझे आपका सुंदर पत्र मिला । मुझे इस बात की संतुष्टि मिली कि जो काम मैं कर रहा हूं वह आपकी दृष्टि में सही है। मैं उम्मीद करता हूं कि भारत में मेरे आश्रम में आपसे मेरी आमने सामने मुलाकात होगी। हालांकि महात्मा गांधी और आइंस्टीन आमने-सामने नहीं मिल सके। आइंस्टीन ने बापू के बारे में लिखा है कि महात्मा गांधी की उपलब्धियां राजनीतिक इतिहास में अद्भुत हैं। उन्होंने देश को दासता से मुक्त कराने के लिए संघर्ष का ऐसा नया मार्ग चुना जो मानवीय और अनोखा है। यह एक ऐसा मार्ग है जो पूरी दुनिया के सभ्य समाज को मानवता के बारे में सोचने को मजबूर करता है। उन्होंने लिखा कि हमें इस बात पर प्रसन्न होना चाहिए कि तकदीर ने हमें अपने समय में एक ऐसा व्यक्ति तोहफे में दिया जो आने वाली पीढ़ियों के लिए पथ प्रदर्शक बनेगा। अपने जीवनकाल में महात्मा गांधी ने करीब 35 हजार पत्र लिखे। इन पत्रों में बापू अपने सहयोगियों, शिष्यों, मित्रों, सम्बंधियों आदि को छद्म नाम से संबोधित करते थे। मसलन, सरोजनी नायडू को बापू ‘माई डियर पीसमेकर, सिंगर एंड गार्डियन आॅफ माई सॉल’, माई डियर फ्लाई आदि से संबोधित करते थे जबकि राजकुमारी अमृत कौर को माई डियर रेबल कहते थे। लियो टॉल्सटाय को बापू ‘सर’ और एडाल्फ हिटलर तथा एलबर्ट आइंस्टीन को ‘माई डियर फ्रेंड’ कहते थे। मोहम्मद अली जिन्ना को ‘डियर कायदे आजम’ और विंस्टन चर्चिल को ‘डियर प्राइम मिनिस्टर’ कहा करते थे।
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ब्रेल साक्षरता जागरुकता माह पर विशेष
बिंदुओं ने फैलाया अंधेरी दुनिया में उजाला पढने के लिए आंखों की जरूरत होती है लेकिन ब्रेल वह लिपि है जो नेत्रहीनों के जीवन में ज्ञान का उजियारा भर सकती है। ब्रेल लिपि में लिखे अक्षर वास्तव में बिंदुओं से बनते हैं और नेत्रहीन व्यक्ति हाथों के स्पर्श से ब्रेल लिपि में लिखे अक्षरों को पहचान कर बिना किसी की मदद के इन्हें पढ सकते हैं। ब्रेल का आविष्कार 1824 में लुइस ब्रेल ने किया था। उसके पहले नेत्रहीन लोगों को अपनी परेशानियों का हल अपने ही तरीकों से निकालना होता था, लेकिन बिंदुओं के उपयोग से बने इस तंत्र के आविष्कार ने उन लोगों की दुनिया में क्रांति ला दी जो लोग आंखों में रोशनी न होने की वजह से देख ही नहीं पाते। नेत्रहीनों और दृष्टिबाधित लोगों के लिए काम करने वाली संस्था ‘दृष्टि’ की संयोजक अनु शर्मा ने बताया ‘नेत्रहीनों के लिए सरकार की ओर से बहुत से दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। इन्हीं में से एक दिशानिर्देश सभी सरकारी और निजी कार्यालयों में ब्रेल में काम करने की सुविधा देने का है, लेकिन अब भी बहुत से कार्यालय नेत्रहीनों के लिए पारिवारिक माहौल नहीं देते।’ नेत्रहीनों को ब्रेल की शिक्षा देने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता और ब्रेल प्रशिक्षक आनंद अग्निहोत्री ने कहा, ‘जरूरी नहीं है कि आप नेत्रहीनों की मदद उन्हें ब्रेल का प्रशिक्षण देकर ही करें। इस बात को समझना जरूरी है कि आम जनजीवन में छोटे-छोटे काम करके भी आप उनकी मदद कर सकते हैं। लेकिन अगर ब्रेल की सुविधा में विस्तार हो जाए तो क्या कहने।’ आनंद ने अपने रोजमर्रा के अनुभवों के आधार पर कहा, ‘आम तौर पर नेत्रहीन किसी से मदद लेना पसंद नहीं करते और इतने प्रशिक्षित हो जाते हैं कि अपने दैनिक कार्य खुद कर सकें, लेकिन आप मेट्रो में, बसों में और सड़कों पर उनकी मदद कर सकते हैं। जो देख नहीं सकते, वे भी हमारी तरह ही इंसान हैं और उनके साथ ‘असामान्य’ लोगों की तरह व्यवहार उन्हें तकलीफ देता है।’ उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि गरीब परिवारों में पैदा होने वाले नेत्रहीन बच्चों को शिक्षा-दीक्षा देने के लिए सरकारी स्तर पर और मदद की जरूरत है। साथ ही उन्होंने कहा ‘हमारे देश की साहित्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। अगर अधिक से अधिक संख्या में किताबें ब्रेल लिपि में उपलब्ध हों तो ज्ञान का उजियारा अंधकार भरे जीवन को रौशन कर देगा।’ अनु के मुताबिक, ‘देखने में आता है कि कार्यालयों में न तो नेत्रहीनों को उचित सुविधाएं मिलती हैं और न ही कोई उनकी मदद के लिए आगे आता है। स्वाभिमान से जीने के इच्छुक नेत्रहीनों को कार्यालयों के चक्कर लगवाना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। ऐसे में समाज में जागरुकता लाकर ही परिवर्तन लाया जा सकता है।’ ब्रेल का आविष्कार करने वाले लुइस ब्रेल का जन्म जनवरी में हुआ था, इसके चलते जनवरी को ‘ब्रेल साक्षरता जागरुकता माह’ के रूप में मनाया जाता है।
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एक फरवरी को जन्मदिन पर
फिल्मों में काम नहीं करना चाहते थे हंगल लगभग 200 फिल्मों में पिता, चाचा, दादा, नाना, प्रताड़ित बुजुर्ग या नौकर की भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार ए के हंगल फिल्मों में काम करने के इच्छुक नहीं थे और रंगमंच उनका शौक था। लेकिन ऐसे हालात बने कि उन्होंने फिल्मों में काम शुरू कर दिया। फिल्म समीक्षक चैताली नोन्हारे ने बताया ‘हालांकि हंगल किसी भी फिल्म में मुख्य भूमिका में नहीं रहे लेकिन चरित्र अभिनेता के तौर पर उन्होंने सशक्त उपस्थिति दशाई। हर तरह की भूमिकाओं में अपनी छाप छोड़ने वाले हंगल फिल्म ‘शोले’ के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। इसमें नेत्रहीन रहीम चाचा बने हंगल की कांपती आवाज में बोले गए शब्द ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई’ आज भी लोगों को याद हैं।’ फिल्म समीक्षक आर सी ग्वालानी ने बताया ‘हंगल को फिल्म का पहला प्रस्ताव जब मिला तब वह 40 बरस के हो चुके थे। निर्देशक बासु भट्टाचार्य ने 1966 में राज कपूर की ‘तीसरी कसम’ के लिए हंगल को प्रस्ताव भेजा। आर्थिक समस्या से जूझ रहे हंगल ने हां कर दी। लेकिन जब फिल्म बनी तो उनके ही दृश्य पर कैंची चल चुकी थी।’ अपनी आत्मकथा ‘द लाइफ एंड टाइम आॅफ ए के हंगल’ में हंगल ने लिखा है ‘फिल्मों में करियर को लेकर मैं कभी महत्वाकांक्षी नहीं था। मैं तो रंगमंच में ही खुश था। हालात मुझे फिल्मों में ले गए। पर मैं इससे नाखुश भी नहीं रहा। शो बिजनेस में मुझे अलग माहौल मिला, मैं सबसे घुलमिल गया लेकिन दिल के किसी कोने में बाहरी होने का अहसास बना रहा।’ एक फरवरी 1917 को पेशावर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे अवतार किशन हंगल शुरू में दर्जी का काम करते थे। उन दिनों वह कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे और यूनियन की गतिविधियों में भाग लेने के कारण गिरफ्तार भी किए गए थे। पेशावर की जेल में दो साल बिता चुके हंगल देश विभाजन के बाद 1949 में बंबई आ गए। तब उम्र थी 21 बरस और जेब में थे 20 रूपये। वह ‘इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन’ से जुड़ गए और बलराज साहनी तथा कैफी आजमी जैसे कलाकारों के साथ नाटकों में काम करने लगे। लगभग 200 फिल्मों में काम कर चुके हंगल ने ज्यादातर भूमिकाएं पिता, चाचा, दादा, नाना, प्रताड़ित बुजुर्ग या नौकर की निभाई। इस छवि से उन्हें कभी छुटकारा नहीं मिल सका लेकिन वह इस छवि को साफसुथरी बनाए रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहे। शोले, शौकीन, नमक हराम, आइना, अवतार, अर्जुन, आंधी, कोरा कागज, बावर्ची, चितचोर, गुड्डी, अभिमान, अनामिका, परिचय, आपकी कसम, अमरदीप, नौकरी, थोड़ी सी बेवफाई, फिर वही रात, तेरे मेरे सपने, लगान जैसी फिल्मों को अपने अभिनय से सजाने वाले हंगल की आखिरी फिल्म शाहरूख खान अभिनीत पहेली थी जो 2005 में बनी थी। हिन्दी सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2006 में हंगल को भारत सरकार ने पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया। जीवन के आखिरी दिनों में गंभीर रूप से बीमार पड़े हंगल को घोर आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ा। उनके इलाज के लिए उनके बेटे को लोगों से मदद की अपील करनी पड़ी। हंगल ने 26 अगस्त 2012 को आखिरी सांस ली।
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जन्मदिन पर विशेष
'कथक' के ‘महाराज’ (एक ऐतिहासिक चित्र : डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से पुरस्कार ग्रहण करते बिरजू महाराज।) ताल की थापों और घुंघुरूओं की रूंझन को महारास के माधुर्य में तब्दील करने की बात हो तो बिरजू महाराज के अतिरिक्त और कोई नाम ध्यान में नहीं आता। वह भारतीय नृत्य की ‘कथक’ शैली के आचार्य और लखनऊ के ‘कालका-बिंदादीन’ घराने के मुख्य प्रतिनिधि हैं। उनका सारा जीवन ही इस कला को क्लासिक की ऊंचाइयों तक ले जाने में ही व्यतीत हुआ है। उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ (1986) और ‘कालीदास सम्मान’ समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 को लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के ‘कालका बिन्दादीन घराने’ में हुआ था। पहले उनका नाम ‘दुखहरण’ रखा गया था जो बाद में बदल कर ‘बृजमोहन नाथ मिश्रा’ हुआ। उनके पिता जगन्नाथ महाराज ‘लखनऊ घराने’ से थे और अच्छन महाराज के नाम से जाने जाते थे। महज तीन साल की उम्र में उनकी प्रतिभा को देखते हुए पिता ने बचपन से ही यशस्वी पुत्र बिरजू महाराज को कला दीक्षा देनी शुरू कर दी। किंतु नौ साल में सिर से पिता का साया उठ जाने के बाद उनके चाचाओं, सुप्रसिद्ध आचार्यों शंभू और लच्छू महाराज ने उन्हें प्रशिक्षित किया। विरासत : भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा कथक नृत्य बिरजू महाराज को विरासत में मिला। उनके पूर्वज ईश्वरी प्रसाद मिश्र इलाहाबाद के हंडिया तहसील के रहने वाले थे और उन्हें कथक के पहले ज्ञात शिक्षक के रूप में जाना जाता है। इसी खानदान के ठाकुर प्रसाद नवाब वाजिद अलीशाह के कत्थक गुरू थे। कथक नृत्य के मामले में आज के समय में बिरजू महाराज का कोई सानी नहीं है। पिता अच्छन महाराज के साथ महज सात साल की उम्र में ही वह देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर अपनी प्रस्तुति देने लगे थे, लेकिन उनकी पहली एकल प्रस्तुति रही बंगाल में आयोजित ‘मन्मथनाथ गुप्त समारोह’ में जहां उन्होंने ‘शास्त्रीय नृत्य’ के दिग्गजों के समक्ष अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन किया था। तभी उनकी प्रतिभा की झलक लोगों को मिल गई थी और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हिंदी फिल्मों से नाता : उनका बालीवुड से भी गहरा नाता रहा है। उन्होंने कई हिन्दी फिल्मों के नृत्य निर्देशन किया। इनमें प्रख्यात फिल्मकार सत्यजीत राय की शास्त्रीय कृति ‘शतरंज के खिलाड़ी’ भी शामिल है। इस फिल्म में उन्होंने दो शास्त्रीय नृत्य उद्देश्यों के लिए संगीत रचा और गायन भी किया। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा की ‘दिल तो पागल है’, ‘गदर एक प्रेम कथा’ तथा संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘देवदास’ का नाम भी इनमें प्रमुखता से लिया जा सकता है। शास्त्रीय गायक व वादक : केवल नृत्य के क्षेत्र में ही बिरजू महाराज सिद्धहस्त नहीं हैं, बल्कि ‘भारतीय शास्त्रीय संगीत’ पर भी उनकी गहरी पकड़ है। ठुमरी, दादरा, भजन और गजल गायकी में उनका कोई जवाब नहीं है। वह कई वाद्य यंत्र भी बखूबी बजाते हैं। तबले पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ है। इसके अतिरिक्त वह सितार, सरोद और सारंगी भी अच्छी प्रकार से बजा सकते हैं। खास बात यह है कि उन्होंने इन वाद्य यंत्रों को बजाने की विधिवत शिक्षा नहीं ली है। एक संवेदनशील कवि और चित्रकार के रूप में भी उन्हें जाना जाता है।
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पंडित मोतीलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर
प्रतिबद्धता और आदर्श की प्रतिमूर्ति भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के पिता और देश के एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी पंडित मोतीलाल नेहरू को उनकी सादगी और समय के साथ चलने की प्रवृत्ति के लिए याद किया जाता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में मोतीलाल नेहरू एक ऐसे व्यक्तिथे जिन्होंने न केवल अपनी जिंदगी के सभी सुखों को देश के लिए भुला दिया बल्कि अपने परिवार को भी देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। पश्चिमी सभ्यता और रहन-सहन से प्रभावित मोतीलाल नेहरू ने अपने जीवन में सादगी को ही अधिक प्राथमिकता दी। महात्मा गांधी के सम्पर्क में आने के बाद मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के साथ काम करना शुरू किया और धीरे-धीरे देश की माटी के रंग मे रंगते चले गए। मोतीलाल नेहरू के जीवन में महात्मा गांधी ने बहुत असर छोड़ा था। यहां तक कि वह देश के बड़े वकील होने के बाद भी वह गरीबों की मदद के लिए कभी पीछे नहीं रहते थे। दिल्ली में कश्मीरी ब्राह्मण के घर 6 मई, 1861 को जन्मे मोतीलाल नेहरू का बचपन ठिकाना खेतड़ी एस्टेट में बीता, जहां उनके बड़े भाई नंदलाल दीवान रहा करते थे। बाद में उनका परिवार आगरा तथा फिर इलाहाबाद आ गया। कानपुर से मैट्रिकुलेशन करने के बाद मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद के मुईर सेंट्रल कॉलेज में पढ़ाई की। बाद में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय से ‘बार एट लॉ’ किया। अप्रेल, 1887 में भाई नंदलाल के निधन के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ गई। वह वकालत में आगे बढ़ते गए। वर्ष 1900 में वह पूरे परिवार को इलाहाबाद की सिविल लाइंस में ले आए और आनंद भवन में रहने लगे। वर्ष 1909 तक वे वकालत में खुद को साबित कर चुके थे। यहां तक कि इसी साल उन्हें प्रिव्ही काउंसिल आॅफ ग्रेट ब्रिटेन में पेश होने के लिए बुलाया गया था। मोतीलाल नेहरू की शादी स्वरूप रानी से हुई थी। देश की आजादी में विशेष सहयोग देने वाले मोतीलाल नेहरू का निधन 6 फरवरी,1931 को लखनऊ में हुआ था। मोतीलाल नेहरू पश्चिमी सभ्यता से बहुत प्रभावित थे। जिस समय सिर्फ कोलकाता और दिल्ली जैसे महानगरों के लोगों ने पश्चिमी फैशन को नया-नया पसंद किया था उस समय मोतीलाल नेहरू ने कानपुर जैसे छोटे शहर में नए फैशन को अपनाकर एक तरह की क्रांति पैदा कर दी थी। अपने कालेज जीवन में ही मोतीलाल नेहरू पश्चिमी सभ्यता से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपने आपको पूरी तरह उसी ढ़ांचे में ढाल लिया था। उस जमाने में कलकत्ता और बम्बई जैसे बड़े-बड़े नगरों मे ही लोगों ने पाश्चात्य वेश-भूषा, रहन-सहन और सभ्यता को अपनाया था, लेकिन मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद जैसे छोटे-से शहर में पाश्चात्य वेश-भूषा और सभ्यता को अपनाकर एक नई क्रान्ति को जन्म दिया। इसके अलावा भारत में जब पहली बाइसिकल आई तो मोतीलाल नेहरू ही इलाहाबाद के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बाइसिकल खरीदी थी। मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद में बनवाए गए आनंद भवन में हर सुबह मरीजों का इलाज करते थे। उनके मरीजों की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि उनको एक युवा होम्योपैथ को इस काम पर लगाना पड़ा। हालांकि जटिल मरीजों को वे खुद ही देखते थे और मरीज यदि ठीक नहीं हो रहा होता तो रात में बैठकर पुस्तकों से उसके बारे में अध्ययन करते थे। मोतीलाल 1910 में संयुक्त प्रांत वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। अमृतसर में वर्ष 1919 के जलियांवाला बाग गोलीकांड के बाद उन्होंने महात्मा गांधी के आग्रह पर वकालत छोड़ दी और वह वर्ष 1919 -1920 में दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ मिलकर वर्ष 1923 में ‘स्वराज पार्टी ’ का गठन किया। इस पार्टी के जरिए वह सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली पहुंचे और बाद में वह विपक्ष के नेता बने। असेम्बली में मोतीलाल ने अपने कानूनी ज्ञान के कारण सरकार के कई कानूनों की जमकर आलोचना की। मोतीलाल नेहरू ने आजादी के आंदोलन में भारतीय लोगों के पक्ष को सामने रखने के लिए ‘इंडिपेंडेट अखबार’ भी चलाया। अपने बच्चों और देश के विकास के लिए मोतीलाल नेहरू ने हमेशा से शिक्षा पर जोर दिया। अपने बच्चों को किसी तरह की कमी ना हो इस बात का उन्होंने पूरा ख्याल रखा। उनके ही अच्छे संस्कारों का नतीजा था जो उनके बड़े बेटे पंडित जवाहरलाल नेहरू आगे चलकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने। भारतीय राजनीति में राजनीतिक विरासत पुत्र या परिवार को सौंपने की पहली नजीर भी मोतीलाल के समय सामने आई, जब उन्होंने वर्ष 1930 के दशक में कांग्रेस की अध्यक्षता पुत्र जवाहर को सौंपी। मोतीलाल नेहरू की अंत्येष्टि क्रिया पर महात्मा गांधी ने उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि मोतीलाल नेहरू एक महान राष्ट्र सेनानी थे। उन्होंने देश के लिए तो अनेक लड़ाईयां लड़ी थीं। साथ ही उन्होंने यमराज के साथ भी कड़ा संघर्ष किया। कल ही मैंने मोतीलाल से कहा था कि जैसे ही आप स्वस्थ हो जाएंगे, मैं आपको स्वराज दिला दूंगा। जलियावाला बाग हत्याकांड के बाद सुबूत की तलाश में मोती लाल नेहरू अमृतसर आए और पीड़ितों से मिले। मगर सुबूत जुटाने के काम में ब्रिटिश सरकार ने कई रोड़े अटकाए, जिसके बाद उन्होंने अपनी आंखों पर चढ़ा अंग्रेजी न्याय का चश्मा उतार फेंका। इस दौरे में उन्होंने पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता भी दी। केस के लिए वह एक साल तक पंजाब आते रहे और इस दौर ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। रोलेट एक्ट और मार्शल लॉ की ज्यादतियों के बाद बनी लॉर्ड हंटर कमेटी की मई 1920 में रिपोर्ट आई, जिसने नेहरू का अंग्रेजों पर विश्वास पूरी तरह तोड़ दिया।
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संत रविदास जयंती
समाज को समर्पित रहे संत ‘रविदास’ भारत संतों की भूमि है। यहां समय-समय पर संतों और ज्ञानियों ने अपने ज्ञान से समाज में विकास की रफ्तार को मजबूत किया और एकता का प्रचार किया है। लेकिन संत बनना भी कोई आसान काम नहीं। इच्छाओं का अंत हो जाने पर ही मनुष्य संत की श्रेणी में आ सकता है। मीरा हों या कबीर सभी ने अपनी इच्छाओं को दरकिनार कर प्रभु भक्ति और समाज सेवा की वजह से ही इतनी अधिक प्रसिद्धी पाई। संत समाज के इसी भाव और भक्ति को और ऊंचे स्तर तक ले जाने का काम किया संत रविदास ने। संत रविदास ने साबित किया है कि भगवान की भक्ति के लिए आपको किसी ऊंची जाति या पंडित होने की जरूरत नहीं। भक्ति किसी जाति और नस्ल को नहीं देखती। जीवन परिचय : भारत की मध्ययुगीन संत परंपरा में रविदास या कहें रैदास जी का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। उनका जन्म वाराणसी के पास एक गांव में सन 1398 में माघ पूणिर्मा के दिन हुआ था रविवार के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम रविदास रखा गया था। इनके पिता का नाम ‘रग्घु’ और माता का नाम ‘घुरविनिया’ बताया जाता है। चर्मकार का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया। अपने कार्य को वह बहुत लगन और मेहनत से किया करते थे उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण लोग इनसे बहुत प्रसन्न रहते थे। यद्यपि संत रविदास का जन्म तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के हिसाब से निम्न वर्ग में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपनी प्रज्ञा से समाज में आदरणीय स्थान प्राप्त किया था। बचपन से साधु प्रवृति : बचपन से ही रविदास साधु प्रकृति के थे और यह संतों की बड़ी सेवा करते थे। इस कारण इनके पिता रघु इन पर अक्सर नाराज हो जाते थे। इनकी संत-सेवा में सब कुछ अर्पित कर देने की प्रवृत्ति से क्रुद्ध होकर इनके पिता ने इन्हें घर से बाहर कर दिया और खर्च के लिए एक पैसा भी नहीं दिया। फिर भी रविदास साधुसेवी बने रहे। यह बड़े अलमस्त-फक्कड़ थे और संसार के विषयों के प्रति इनमें जरा भी आसक्तिनहीं थी। यह अपनी गृहस्थी जूता-चप्पल बनाकर अत्यंत परिश्रम के साथ चलाते थे और उनकी पत्नी भी सती-साध्वी थी। भक्त, साधक व कवि : रविदास भक्त,साधक और कवि थे उनके पदों में प्रभु भक्ति भावना, ध्यान साधना तथा आत्म निवेदन की भावना प्रमुख रूप में देखी जा सकती थ्ी। वह प्रकृति के होने के अलावा समाज के लिए भी बेहद सतर्क रहते थे उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्हें भक्ति के मार्ग को अपनाया और सत्संग द्वारा अपने विचारों को जनता के मध्य पहुंचाया तथा अपने ज्ञान तथा उच्च विचारों से समाज को लाभान्वित किया करते थे। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भूत प्रयोग था, जिसका मानव धर्म और समाज पर अमिट प्रभाव पड़ता है। संत रविदास की भक्ति से प्रभावित भक्तों की एक लम्बी श्रृंखला है। उनके आदर्शों और उपदेशों को मानने वाले ‘रैदास पंथी’ कहलाते हैं कि मन चंगा तो कठौती में गंगा यह उनकी पंक्तियां मनुष्य को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्रदान करती है। ‘रविदास के पद’, ‘नारद भक्ति सूत्र’ और ‘रविदास की बानी’ उनके प्रमुख संग्रह हैं।
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जन्मतिथि पर विशेष
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते... गजलों की दुनिया के बादशाह और अपनी मखमली आवाज से लाखों-करोड़ों सुनने वालों के दिलों पर राज करने वाले जगजीत सिंह प्रसिद्ध गजल गायक थे। जिसकी आवाज ने गजलों को नजाकत बख्शी, जिसने आत्मा के सोए तारों में रागिनियां थिरका दीं। हिंदी, उर्दू, पंजाबी, भोजपुरी सहित कई जुबानों में गाने वाले जगजीत सिंह को साल 2003 में पद्मभूषण से नवाजा गया था। जगजीत जी का जन्म 8 फरवरी, 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। उनके पिता संगीतकार बनने में असफल रहे, अत: अपने पुत्र के माध्यम से अपने सपने को साकार करना चाहते थे। लिहाजा वह जगजीत को संगीत गुरुओं के पास ले गए और सेन बंधुओं की शिक्षा उन्हें लम्बे समय तक मिली। जालंधर के कॉलेज में पढ़ते हुए उनके गायन के कई लोग कायल हुए और वह मुम्बई आए। जीवन में संघर्ष : जगजीत सिंह मुंबई में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोजी का जुगाड़ करते रहे। यही से उनके संघर्ष का दौर शुरू हुआ। इसके बाद फिल्मों में कुछ हिट संगीत दिए तो कुछ प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे। 1981 में रमन कुमार निर्देशित ‘प्रेमगीत’ और 1982 में महेश भट्ट निर्देशित ‘अर्थ’ को भला कौन भूल सकता है। ‘अर्थ’ में जगजीत ने ही संगीत दिया था। फिल्म का हर गाना लोगों की जुबान पर चढ़ गया था। कुछ साल पहले डिंपल कापड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फिल्म ‘लीला’ का संगीत औसत दर्जे का रहा। इसके बाद फिल्मों में हिट संगीत देने के सारे प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे। 1994 में खुदाई, 1989 में बिल्लू बादशाह, 1989 में क ानून की आवाज, 1987 में राही, 1986 में ज्वाला, 1986 में लौंग दा लश्कारा, 1984 में रावण और 1982 में सितम के न गीत चले और न ही फिल्में। ये सारी फिल्में उन दिनों औसत से कम दर्जे की फिल्में मानी गई। हालांकि उन्होंने बतौर कम्पोजर बहुत पापड़ बेले लेकिन वह अच्छे फिल्मी गाने रचने में असफल ही रहे। इसके उलट पाश्वर्गायक जगजीत अपने सुनने वालों को सदा जमते रहे हैं। उनकी मखमली आवाज दिल की गहराइयों में ऐसे उतरती रही मानो गाने और सुनने वाले दोनों के दिल एक हो गए हों। कुछ हिट फिल्मी गीत ये रहे : ‘प्रेमगीत’ का ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो’ ‘खलनायक’ का ‘ओ मां तुझे सलाम’ ‘दुश्मन’ का ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’ ‘जॉगर्स पार्क’ का ‘बड़ी नाजुक है ये मंजिल’ ‘साथ-साथ’ का ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ और ‘प्यार मुझसे जो किया तुमने’ ‘सरफ रोश’ का ‘होशवालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है’ ‘ट्रैफिक सिगनल’ का ‘हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते’ (फिल्मी वर्जन) ‘तुम बिन’ का ‘कोई फ रयाद तेरे दिल में दबी हो जैसे’ ‘वीर जारा’ का ‘तुम पास आ रहे हो’ (लता के साथ) ‘तरक ीब’ का ‘मेरी आंखों ने चुना है तुझको दुनिया देखकर’ (अलका याज्ञनिक के साथ)।
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जन्मतिथि पर विशेष
आशावादी व्यक्तित्व के धनी ‘हुसैन’ देश के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन एक व्यावहारिक और आशावादी व्यक्तित्व के इंसान थे। इसके अलावा शुरू से ही शिक्षा के प्रति उनका रुझान था। साधारण वेशभूषा, सरल स्वभाव एवं सात्विक आचरण के कारण वह विद्यार्थी जीवन में ‘मुर्शिद’ के नाम से विख्यात हुए। हुसैन देश की शिक्षा प्रणाली को रोजगार से जोड़ने के पैरोकार थे। डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी, 1897 को हैदराबाद के सम्पन्न पठान परिवार में हुआ था। उनके पिता वकील थे। जब जाकिर मात्र नौ वर्ष के थे, तब उनके पिता का संरक्षण उनसे सदा के लिए छिन गया। इस घटना के बाद उनका पूरा परिवार कायमगंज लौट आया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इटावा के इस्लामिया हाई स्कूल में हुई। इन्होंने अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कालेज से अर्थशास्त्र की स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में ही डाक्टरेट किया। अध्ययनकाल में उनकी गणना सदैव सुयोग्य एवं शिष्ट छात्रों में की जाती थी। अपनी साधारण वेशभूषा, सरल स्वभाव एवं सात्विक आचरण के कारण ये विद्यार्थी जीवन में ‘मुर्शिद’ के नाम से विख्यात हुए। तीन मई,1969 को हृदय की गति बंद हो जाने से इनका असामयिक निधन हो गया। वह देश के ऐसे पहले राष्ट्रपति थे जिनका कार्यालय में निधन हुआ। जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना : वर्ष1920 में जब जाकिर एम.ए.ओ. कालेज में एम.ए. के छात्र थे तभी महात्मा गांधी अली बंधुओं के साथ अलीगढ़ आए। उन्होंने कालेज के छात्रों एवं अध्यापकों के समक्ष देशभक्ति की भावनाओं से ओतप्रोत ओजस्वी भाषण किया। बापू ने अंग्रेज सरकार द्वारा संचालित अथवा नियंत्रित शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार कर राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने के लिए छात्रों एवं अध्यापकों का आहृवान किया। यहीं पर गांधी के भाषण का जाकिर पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा और उसी वक्त उन्होंने कालेज त्याग दिया। उन्होंने कतिपय छात्रों एवं अध्यापकों के सहयोग से एक राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान की स्थापना की जो बाद में ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ के नाम से विख्यात हुआ। उन्होंने इस संस्था का पोषण 40 वर्षों तक किया। अध्यापन : हुसैन उच्च अध्ययन हेतु बर्लिन चले गए। वहां पर उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएचडी. की उपाधि प्राप्त की करने के बाद देश की सेवा करने के लिए अपने देश लौट आए। वे जामिया मिलिया के वाइस चांसलर बनाए गए। 29 वर्ष की अल्पायु में इतने गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित होना इनके व्यक्तित्व की अहमीयता का द्योतक है। उस्मानिया विश्वविद्यालय के 600 रुपए मासिक के आमंत्रण को अस्वीकार कर पावन कर्तव्य की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने जामिया मिलिया में केवल 75 रुपए मासिक वेतन पर अध्यापन किया। विषम आर्थिक स्थितियों में भी वह निराश नहीं हुए एवं संस्था की अस्तित्व रक्षा के लिए सतत संघर्ष करते रहे। जामिया मिलिया उनके त्यागमय जीवन की महान पूंजी और उनकी 22 वर्षों की मौन साधना और घोर तपस्या का ज्वलंत उदाहरण है। वह देश की अनेक शिक्षण समितियों से सम्बद्ध रहे। हुसैन महात्मा गांधी द्वारा विकसित की गई बुनियादी शिक्षा अभियान के सूत्रधार थे। यहां तक कि हुसैन हिंदुस्तानी तालीमी संघ, सेवाग्राम, विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग आदि अनेक शिक्षण समितियों के सदस्य तथा सभापति भी रह चुके थे। वर्ष 1937 में जब प्रांतों को कुछ सीमा तक स्वायत्तता मिली और महात्मा गांधी ने जनप्रिय प्रांतीय सरकारों से बुनियादी शिक्षा के प्रसार पर बल देने का अनुरोध किया तब गांधी के आमंत्रण पर हुसैन ने बुनियादी शिक्षा सम्बंधी राष्ट्रीय समिति की अध्यक्षता स्वीकार की। देश के विभाजन के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के अनुरोध पर उन्होंने अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर का कार्यभार संभाला। उस समय विश्वविद्यालय पृथक्तावादी मुसलमानों के षड्यंत्र का केंद्र था। ऐसी स्थिति में उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन का गम्भीर उत्तरदायित्व ग्रहण किया और आठ वर्षों तक कुशलतापूर्वक उसका निर्वाह किया। इसके अलावा उन्होंने कई बार यूनेस्को में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। राजनैतिक सफर : डॉ. हुसैन के कार्यों को देखते हुए वर्ष 1952 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। वर्ष 1957 में वह बिहार के राज्यपाल नियुक्त होने के बाद वह वर्ष 1962 में भारत के उपराष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हुए। राज्यसभा के अध्यक्ष पद पर भी उन्होंने जिस निष्पक्षता और योग्यता का परिचय दिया वह इनके उत्तराधिकारियों के लिए अनुकरणीय थी। वर्ष1967 में डा. हुसैन भारत के तृतीय राष्ट्रपति के रूप में चुने गए। अपने कार्यकाल की अल्प अवधि में उन्होंने अपने पद की गरिमा बढ़ाई। लेखक भी रहे हुसैन : जाकिर हुसैन जितने अच्छे इंसान और नेता थे उतने ही सफल लेखक भी थे। इनकी कृतियों में एक ओर ज्ञान विज्ञान की गुरु गंभीर धारा प्रवाहित होती है वहीं दूसरी ओर ‘अबू की बकरी’ जैसी लोकप्रिय बालोपयोगी रचनाओं की प्रचुरता है। उन्होंने प्लेटो द्वारा रचित पुस्तक ‘रिपब्लिक’ का उर्दू में अनुवाद किया। शिक्षा से सम्बंधित अनेक ग्रंथों एवं कहानियों के अतिरिक्त हुसैन ने अर्थशास्त्र पर भी एक ग्रंथ की रचना की। ‘एलिमेंट्स आव एकानामिक्स’ तथा अर्थशास्त्र की अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का उर्दू में अनुवाद किया। सुंदर हस्तलिपि में अपनी प्रगाढ़ रुचि का उपयोग उन्होंने गालिब की कविताओं के अत्यंत मनोहर प्रकाशन में किया। वह उर्दू के शीर्षस्य संस्मरणलेखक भी थे। अनुशासनप्रिय व्यक्तित्त्व के धनी : डॉ. हुसैन बेहद अनुशासनप्रिय व्यक्तित्त्व के धनी थे। वह चाहते थे कि जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र अत्यंत अनुशासित रहें, जिनमें साफ-सुथरे कपडे और पॉलिश से चमकते जूते होना सर्वोपरि था। इसके लिए डॉ. हुसैन ने एक लिखित आदेश भी निकाला किंतु छात्रों ने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। छात्र अपनी मनमर्जी से ही चलते थे, जिसके कारण जामिया विश्वविद्यालय का अनुशासन बिगड़ने लगा। यह देखकर डॉ. हुसैन ने छात्रों को अलग तरीके से सुधारने पर विचार किया। एक दिन वह विश्वविद्यालय के दरवाजे पर ब्रश और पॉलिश लेकर बैठ गए और हर आने-जाने वाले छात्र के जूते ब्रश करने लगे। यह देखकर सभी छात्र बहुत लज्जित हुए। उन्होंने अपनी भूल मानते हुए डॉ. हुसैन से क्षमा मांगी और अगले दिन से सभी छात्र साफ-सुथरे कपड़ों में और जूतों पर पॉलिश करके आने लगे। इस तरह विश्वविद्यालय में पुन: अनुशासन कायम हो गया।
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दूसरों से ऐसा व्यवहार कतई मत करो, जैसा तुम स्वयं से किया जाना पसंद नहीं करोगे ! - प्रभु यीशु Last edited by Dark Saint Alaick; 08-02-2013 at 08:00 PM. |
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आज जन्मदिन पर विशेष
चित्रों की प्रेरणा भारतीय संस्कृति से लेता हूं : एसएच रजा करीब छह दशक का वक्त फ्रांस में गुजारने के बाद भी भारतीय संस्कृति को दिल में सहेज कर रखने वाले वरिष्ठ चित्रकार सैयद हैदर रजा का कहना है कि उन्हें भारतीय संस्कृति की विविधता से चित्र बनाने की प्रेरणा मिलती है। रजा ने जन्मदिन पर खास मुलाकात में कहा, ‘छह दशक का वक्त फ्रांस में गुजारने के बाद भी भारतीय नागरिक बना रहा। फ्रांस में भारतीय पासपोर्ट और वीजा के साथ समय गुजारा और अपने लोगों के बीच रहने की खुशी को बयां नहीं कर सकता।’ ज्यामिती के बिंदु और त्रिकोण के जरिए अपने भाव प्रकट करने वाले चित्रकार ने कहा, ‘विदेश में रहने के बावजूद दिल, दिमाग और आत्मा हमेशा भारतीय रही। भारतीय दर्शन के साथ हमेशा जुड़ा रहा और अपने कार्य के लिए भारतीय संस्कृति से विचार लेता हूं।’ एसएच रजा का जन्म 22 फरवरी 1922 को मध्य प्रदेश के मंडला जिले के बावरिया में हुआ था। यहां वह 12 साल की उम्र तक रहे। इसके बाद रजा ने दमोह के सरकारी विद्यालय में स्कूली शिक्षा पूरी की और जेजे स्कूल आफ आर्ट्स में अध्ययन किया। प्रगतिशील कलाकार समूह बनाने वाले कलाकार ने कहा कि शुजा और हुसैन जैसे चित्रकार अपना काम बेहद सादगी से करता थे, लेकिन कट्टरपंथियों के कारण एम. एफ. हुसैन को भारत के बाहर जाना पड़ा। कई चित्रकारों को निर्वासित जीवन बिताना पड़ा, लेकिन किसी ने कोई समझौता कभी नहीं किया। 91 वर्षीय रजा मानते हैं, ‘मेरा काम मेरे अंतर अनुभवों पर आधारित होता है और प्रकृति के रहस्यों के साथ जुड़ा होता है, जिसे रंग, रेखा, अंतरिक्ष और प्रकाश के जरिये दर्शाया जाता है।’ एक सवाल के जवाब में रजा ने कहा कि विभिन्न तरह के विवादों को सुनता हूं और देख रहा हूं कि लोग ‘न्यूड पेंटिग्स’ बना रहे हैं। यहां तक कि मेरी पेंटिग्स की कॉपी हो रही है। उन्होंने कहा कि पेंटिग्स खुद कुछ नहीं कहती, यह आर्टिस्ट का काम है कि वह अपने काम के बारे में लोगों को बताये और कई लोग ऐसा कर भी रहे है। चित्रों के बारे में उन्होंने कहा, ‘हरे, काले और लाल जैसे प्रमुख रंगों का इस्तेमाल करता हूं। ‘पुरूष और प्रकृति’ की अवधारणा स्त्री और पुरूष की शक्ति को दर्शाती है। बिंदु के विकिरण को विविध तरह से दर्शाया जा सकता है।’ उन्होंने कहा, ‘कभी भी पब्लिसिटी का सहारा नहीं लिया, जो बेहद महत्वपूर्ण है। मैं इस उम्र में भी सुबह 10 या 11 बजे काम शुरू करता हूं और दोपहर में एक से डेढ़ बजे तक काम करता हूं। शाम को 4 बजे से 6 बजे तक काम करता हूं।’ रजा के स्टूडियों में एक बड़ी पेंटिग रखी थी, जिसमें ‘संसार को प्रणति’ लिखा था। इससे उनके मित्र अशोक बाजपेयी की बात याद आई कि रजा एकमात्र हिन्दी के चित्रकार है, उनका हिन्दी के साथ प्रेम उनके चित्रों में देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि इसे कल ही पूरा किया है। इसे भी रजा ने अपने चिर परिचित अंदाज बिंदु, खड़ी रेखा और त्रिभुज के संयोजन से बनाया है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन के इस दौर में लोग सिनेमा के बारे में अधिक जानते हैं, लेकिन सेवाग्राम, महात्मा गांधी, भक्ति और टैगोर के बारे में नहीं जानते। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारतीय समकालीन कला को पूरी दुनिया में बेहद गंभीरता से लिया जाता है और इस वक्त कई आर्टिस्ट बेहतरीन काम कर रहे हैं।
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