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#71 |
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![]() पहला प्रयोगः केले की जड़ के 20 से 50 मि.ली. रस को 50 से 100 मि.ली. गोमूत्र के साथ मिलकर सेवन करने से तथा जड़ पीसकर उसका पेडू पर लेप करने से पेशाब खुलकर आता है। दूसरा प्रयोगः आधा से 2 ग्राम शुद्ध शिलाजीत, कपूर और 1 से 5 ग्राम मिश्री मिलाकर लेने से अथवा पाव तोला (3 ग्राम) कलमी शोरा उतनी ही मिश्री के साथ लेने से लाभ होता है। तीसरा प्रयोगः एक भाग चावल को चौदह भाग पानी में पकाकर उन चावलों का मांड पीने से मूत्ररोग में लाभ होता है। कमर तक गर्म पानी में बैठने से भी मूत्र की रूकावट दूर होती है। चौथा प्रयोगः उबाले हुए दूध में मिश्री तथा थोड़ा घी डालकर पीने से जलन के साथ आती पेशाब की रूकावट दूर होती है। यह प्रयोग बुखार में न करें। पाँचवाँ प्रयोगः 50-60 ग्राम करेले के पत्तों के रस चुटकी भर हींग मिलाकर देने से पेशाब बहुतायत से होता है और पेशाब की रूकावट की तकलीफ दूर होती है अथवा 100 ग्राम बकरी का कच्चा दूध 1 लीटर पानी और शक्कर मिलाकर पियें। छठा प्रयोगः मूत्ररोग सम्बन्धी रोगों में शहद व त्रिफला लेने से अत्यंत लाभ होता है। यह प्रयोग बुखार में न करें। |
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#72 |
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पेशाब में मवाद बहने पर
पहला प्रयोगः आधा या 1 ग्राम इलायची, 2 से 5 ग्राम मिश्री तथा 1 से 2 ग्राम शंखावली का चूर्ण देने से पेशाब में मवाद बहने की शिकायत में लाभ होता है। दूसरा प्रयोगः आँवले के रस में या काढ़े में शहद व हल्दी डालकर पीने से पेशाब मार्ग से जाता मवाद बंद हो जाता है। |
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#73 |
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पेशाब में रक्त आना
पहला प्रयोगः सात बूँद बड़ का दूध शक्कर के साथ देने से पेशाब तथा गुदा द्वारा होने वाले रक्तस्राव में लाभ होता है। दूसरा प्रयोगः अडूसी के पत्तों का 1 तोला (लगभग 12 ग्राम) रस रोज सुबह पीने से अथवा केले के फूल का 2 से 10 मि.ली. रस 10 से 50 मि.ली. दही के साथ खाने से रक्तस्राव में लाभ होता है। किडनी का दर्दः 50 से 100 मि.ली. जौ के पानी में 2 से 5 मि.ली. नींबू का रस तथा 2 से 10 ग्राम शहद अथवा केवल शहद मिलाकर पीने से किडनी की सूजन, पस, किडनी का बराबर काम न करना आदि तकलीफों में राहत होती है। |
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#74 |
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पथरी (Stones)
पहला प्रयोगः पानफुटी के पत्तों का 20 ग्राम रस अथवा सहजने की जड़ का 20 से 50 मि.ली. काढ़ा या मुनक्के (काली द्राक्ष) के 50 मि.ली. काढ़े का सेवन पथरी में लाभदायक है। दूसरा प्रयोगः गोखरू के बीजों का पाव तोला (3 ग्राम) चूर्ण भेड़ के दूध के साथ सात दिन पीने से लाभ होता है। तीसरा प्रयोगः आश्रम में उपलब्ध कालीबूटी भोजन से आधा घण्टा पूर्व और बाद में एक ग्राम मात्रा में पानी के साथ लेने से व कटिपिंडमर्दनासन करने से पथरी टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है। चौथा प्रयोगः नींबू के रस में सेंधा नमक मिलाकर कुछ दिन तक नियमितरूप से पीने से पथरी पिघल जाती है। |
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#75 |
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प्रमेह (पेशाब का रंग बदलना व बहुमूत्रता) (Polyurea)
पहला प्रयोगः 200 मि.ली. दूध के साथ बबूल के पत्तों का 10 मि.ली. रस 15 दिन पीने से अथवा अनार के 20 से 50 मि.ली. रस में 2 से 5 ग्राम मिश्री डालकर पीने से प्रमेह में लाभ होता है। दूसरा प्रयोगः रोज सुबह कच्ची हल्दी का रस एवं शुद्ध शहद 1-1 तोला मिलाकर खायें एवं रात्रि को सोते समय 3 ग्राम सूखी हल्दी का चूर्ण तथा 6 ग्राम शहद उबालकर ठण्डे किये हुए एक पाव बकरी के दूध के साथ लें। चालीस दिन ऐसा करने से पुराना प्रमेह, धातुजनित दोष, पतलापन, कमर-दर्द, बेचैनी एवं मंदाग्नि में लाभ होता है। तीसरा प्रयोगः त्रिफला चूर्ण एवं मिश्री 3-3 भाग तथा हल्दी चूर्ण एक भाग मिलाकर 6 ग्राम चूर्ण दिन में दो बार शहद के साथ चाटने से प्रमेह मिटता है। प्रमेह की तीव्र पीड़ा शान्त हो जाने के बाद कम-से-कम एक महीने तक सेवन चालू रखें। |
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#76 |
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मधुप्रमेह (डायबिटीज)
पहला प्रयोगः गूलर अथवा मूली के पत्तों का 30 ग्राम रस पीने से अथवा बेल के दस पत्तों के रस में 2 से 10 पिसी काली मिर्च मिलाकर सुबह पीने से मधुप्रमेह में लाभ होता है। दूसरा प्रयोगः 20 से 50 मि.ली. बड़ की छाल का काढ़ा पीने से अथवा बड़ के 2 से 10 फल खाने से डायबिटीज में राहत होती है। तीसरा प्रयोगः दो तोला (24 ग्राम) जामुन की छाल खाने से अथवा पके जामुन की गुठली का 2 से 5 ग्राम चूर्ण खाने से मधुप्रमेह में लाभ होता है। चौथा प्रयोगः प्रतिदिन सुबह करेले का रस लेने से मधुमेह के रोगी को विशेष लाभ होता है। रस के अभाव में करेलों के टुकड़े करके छाया में सुखाकर बारीक पीसकर 10-10 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम तीन-चार महीने तक सेवन करने से मधु्प्रमेह अवश्य मिटता है। पाँचवाँ प्रयोगः 8-9 बिल्वपत्र, 2-3 काली मिर्च पीसकर एक गिलास पानी डालकर सुबह पीने से मधुप्रमेह मिटता है एवं मूत्र संबंधी अन्य रोग भी दूर होते हैं। सप्ताह में दो दिन यह प्रयोग न करें। |
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#77 |
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हृदय-रोग
हृदयकीकमजोरी पहला प्रयोगः तुलसी के बीज का आधा या 1 ग्राम चूर्ण उतनी ही मिश्री के साथ लेने से अथवा मेथी के 20 से 50 मि.ली. काढ़े (2 से 10 ग्राम मेथी को 100 से 300 ग्राम पानी में उबालें) में शहद डालकर पीने से हृदय-रोग में लाभ होता है। दूसरा प्रयोगः अर्जुन वृक्ष की छाल का एक चम्मच चूर्ण एक गिलास पानी मिश्रित दूध में उबालकर पीने से खूब लाभ होता है। इसके अलावा लहसुन, आँवला, शहद, अदरक, किसमिस, अंगूर, अजवायन, अनार आदि चीजें हृदय के लिए लाभदायी हैं। तीसरा प्रयोगः नींबू के सवा तोला (करीब 15 ग्राम) रस में आवश्यकतानुसार मिश्री मिलाकर पीने से हृदय की धड़कनें सामान्य होती हैं तथा स्त्रियों की हिस्टीरिया के कारण बढ़ी हुई धड़कनें भी दो-तीन नींबू के रस को पानी में मिलाकर पीने से शांत होती हैं। चौथा प्रयोगः गुडुच (गिलोय) का चूर्ण शहद के साथ इस्तेमाल करने से अथवा अदरक का रस व पानी समभाग मिलाकर पीने से हृदयरोग में लाभ होता है। पाँचवाँ प्रयोगः उगते हुए सूर्य की सिंदूरी किरणों में लगभग 10 मिनट तक हृदयरोग से दूर करने की अपरिमेय शक्ति होती हैं। अतः रोगी प्रातः काल सूर्योदय का इंतजार करे और यह प्रयत्न करे कि सूर्य की सर्वप्रथम किरण उस पर पड़े। छठा प्रयोगः मोटी गाँठवाली हल्दी कूटने के बाद कपड़छान करके 8 मासा रख लें। फिर प्रतिदिन लाल गाय के दूध में 1 चम्मच चूर्ण घोलकर पियें। हल्दी में यह खास गुण है कि यह रक्तवाहिनी नसों में जमे हुए रक्त के थक्कों को पिघला देती है और नसों को साफ कर देती है। जब रक्तवाहिनी नलिकाएँ साफ हो जाएँगी तब वह कचरा यानी विजातीय द्रव्य पेट में जमा हो जाएगा और बाद में मल के द्वारा बाहर निकल जाएगा। सातवाँ प्रयोगः रोहिणी नामक हरड़ कूट-कपड़छान करके रख लें। अगर रोहिणी हरड़ नहीं मिले तो कोई भी हरड़ जो बहेड़े के आकार की होती है वह लें। इस हरड़ का लगभग एक चम्मच चूर्ण रात को सोते समय लाल गाय के दूध में लें। लाल गाय अगर देशी नहीं मिले तो जरसी लाल गाय के दूध के साथ मिलाकर लें। यह विजातीय द्रव्य को शरीर से मल, पेशाब और पसीने इत्यादि के रूप में बाहर निकाल देती है। |
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#78 |
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वीर्यवृद्धि
वीर्यवृद्धि हेतुः पहला प्रयोगः सफेद प्याज का 10 से 20 मि.ली. रस 5 से 10 मि.ली. शहद, अदरक का 5 से 10 मि.ली. रस और 1 से 2 ग्राम घी मिलाकर प्रातःकाल 21 दिन सेवन करके वीर्यवृद्धि होती है। दूसरा प्रयोगः अश्वगंधा के 2 ग्राम चूर्ण को घी-मिश्री के साथ खाने से तथा ऊपर से दूध पीने से अथवा कौंचबीज एवं खसखस का समान मात्रा में चूर्ण मिलाकर, उसमें से आधा तोला (6 ग्राम) चूर्ण रोज दूध के साथ सुबह-शाम लेने से कभी-भी धातु क्षीण नहीं होती एवं वीर्यविकार मिटते हैं। तीसरा प्रयोगः प्रतिदिन 1 हरड़ का सेवन करने से या एक पके केले में 6 ग्राम घी डालकर रोज सुबह-शाम खाने से धातुक्षीणता एवं प्रदर रोग में लाभ होता है। चौथा प्रयोगः सुखाये हुए सिंघाड़े एवं मखाने को समान मात्रा में लेकर उसका चूर्ण बना कर रखें। उसमें से 1 तोला (करीब 12 ग्राम) चूर्ण मिश्री के साथ खाकर ऊपर से ताजा दूध पीने से अथवा 2 से 5 ग्राम गुड़ के साथ श्याम तुलसी के आधा से 1 ग्राम बीज खाने से यौवनसुरक्षा होती है। |
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#79 |
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धातुस्राव होने पर
पहला प्रयोगः गुडुच (गिलोय), गोखरु एवं आँवले का आधा से 1 ग्राम चूर्ण अथवा 1 से 2 ग्राम त्रिफला चूर्ण पानी के साथ रोज दो बार लेने से वीर्यस्राव में लाभ होता है। दूसरा प्रयोगः 1 से 2 ग्राम तुलसी के बीज रात्रि को पानी में भीगोकर सुबह लेने से अथवा बड़ के पत्ते के दूध की कुछ बूँदें बताशे में डालकर रोज सुबह एक बताशे में डालकर रोज सुबह खाकर ऊपर से दूध पीने से 15-20 दिन में धातुस्राव बंद होकर वीर्य गाढ़ा होता है। |
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#80 |
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स्वप्नदोष
पहला प्रयोगः बेल के पत्तों का 10 से 50 मि.ली. रस 2 से 10 ग्राम शहद डालकर पीने से अथवा 1 से 2 ग्राम हरड़ को उतनी ही मिश्री के साथ खाने से स्वप्नदोष में लाभ होता है। दूसरा प्रयोगः ठीक से पके हुए दो केलों को छीलकर मसल डालें। उसमें हरे आँवलों का रस एवं शुद्ध शहद एक-एक तोला मिलाकर प्रातः-सायं सेवन करने से स्वप्नदोष में लाभ होता है। यह प्रयोग थोड़े दिन करें। तीसरा प्रयोगः 4-5 ग्राम जामुन की गुठली का चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ लेने से स्वप्नदोष ठीक होता है। चौथा प्रयोगः स्वप्नदोष, वीर्यविकार या प्रदररोग में आँवले का चूर्ण एवं समान मात्रा में मिश्री का चूर्ण मिलाकर रात को भोजन के पश्चात् पानी के साथ लेने से लाभ होता है। |
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