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Old 24-09-2014, 05:02 PM   #11
rafik
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Thumbs up Re: प्रेरणादायी जीवन

महान वैज्ञानिक डॉ होमी जहाँगीर भाभा

आज भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है। देश को इस राह पर लाने का श्रेय होमी जहाँगीर भाभा को जाता है। उनका जन्म 30 अक्टुबर 1909 को मुम्बई में हुआ था। उनके पिता जहाँगीर भाभा ने ऑक्सफोर्ड से शिक्षा पाई थी। वे जानेमाने वकील थे। पारसी कुल के जहाँगीर भाभा टाटा इंटरप्राइजेज के लिए भी काम किये थे। होमी की माता भी उच्च घराने की थीं और पितामह (दादा जी) मैसूर राज्य के उच्च शिक्षा अधिकारी थे। बालक होमी को नींद बहुत कम आती थी, डॉ. के अनुसार कम नींद आना कोई बिमारी न थी बल्की तीव्र बुद्धी के कारण विचारों के प्रवाह की वजह से कम नींद आती थी। होमी के लिए पुस्तकालय की व्यवस्था घर पर ही कर दी गई थी। जहाँ वे विज्ञान तथा अन्य विषयों से संबन्धित पुस्तकों का अध्ययन करते थे।

भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक होमी की प्रारंभिक शिक्षा कैथरैडल स्कूल में हुई और आगे की शिक्षा के लिए जॉन केनन में पढने गये। विलक्षण बुद्धी के धनी होमी जहाँगीर भाभा ने मात्र 15 वर्ष की आयु में आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धान्त पढ लिया था। भौतिक शास्त्र में उनकी अत्यधिक रुची थी। गणित भी उनका प्रिय विषय था। एलफिस्टन कॉलेज से 12वीं पास करने के बाद कैम्ब्रिज में पढने गये और 1930 में मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री हासिल किये। अध्ययन के दौरान तेज बुद्धी के कारण उन्हे लगातार छात्रवृत्ती मिलती रही। 1934 में उन्होने पीएचडी की डिग्री हासिल की, इसी दौरान होमी भाभा को आइजेक न्यूटन फेलोशिप मिली। होमी भाभा को प्रसिद्ध वैज्ञानिक रुदरफोर्ड, डेराक, तथा नील्सबेग के साथ काम करने का अवसर मिला था।

होमी भाभा ने कॉस्केटथ्योरी ऑफ इलेक्ट्रान का प्रतिपादन करने साथ ही कॉस्मिक किरणों पर भी काम किया जो पृथ्वी की ओर आते हुए वायुमंडल में प्रवेश करती है। उन्होने कॉस्मिक किरणों की जटिलता को सरल किया। दूसरे विश्वयुद्ध के प्रारंभ में होमी भारत वापस आ गये। उस समय तक होमी भाभा विश्व ख्याती प्राप्त कर चुके थे, यदि चाहते तो किसी भी देश में उच्च पद पर कार्य करके अच्छा वेतन पा सकते थे। परन्तु उन्होने मातृभूमी के लिए कार्य करने का निश्चय किया। 1940 में भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलौर में सैद्धान्तिक रीडर पद पर नियुक्त हुए। उन्होने कॉस्मिक किरणों की खोज के लिए एक अलग विभाग की स्थापना की। 1941 में मात्र 31 वर्ष की आयु में आपको रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुना गया था। नोबल पुरस्कार विजेता प्रो. सी.वी. रमन भी होमी भाभा से प्रभावित थे।

शास्त्रिय संगीत, मूर्तीकला तथा नित्य आदि क्षेत्रों के विषयों पर भी आपकी अच्छी पकङ थी। वे आधुनिक चित्रकारों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके चित्रों को खरीद कर टॉम्ब्रे स्थित संस्थान में सजाते थे। संगीत कार्यक्रमों में सदैव हिस्सा लेते थे और कला के दूसरे पक्ष पर भी पूरे अधिकार से बोलते थे, जितना कि विज्ञान पर। उनका मानना था कि सिर्फ विज्ञान ही देश को उन्नती के पथ पर ले जा सकता हैं।

होमी भाभा ने टाटा को एक संस्थान खोलने के लिए प्रेरित किया। टाटा के सहयोग से होमी भाभा का परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का सपना साकार हुआ। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने की महात्वाकांक्षा मूर्तरूप लेने लगी, जिसमें भारत सरकार तथा तत्कालीन मुम्बई सरकार का पूरा सहयोग मिला। नव गठित टाटा इन्सट्यूट ऑफ फण्डामेंटल रिसर्च के वे महानिदेशक बने। उस समय विश्व में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने वाले कम ही देश थे। जब हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा तब सारी दुनिया को परमाणु शक्ति का पता चला। होमी भाभा और जे.आर.डी. टाटा दोनो ही दूरदर्शी थे, उन्होने केन्द्र को आगे बढाया। इस केन्द्र में पाँच विभाग शुरू किया गया भौतिकी, अभियांत्रिक, धात्विक, इलेक्ट्रॉनिक और जीवविज्ञान। भाभा परमाणु शक्ति के खतरे से भी वाकिफ थे अतः उन्होने वहाँ एक चिकित्सा विभाग तथा विकिरण सुरक्षा विभाग भी खोला। प्रकृति प्रेमी होमी भाभा के प्रयासों से टाम्ब्रे संस्थान निरस वैज्ञानिक संस्थान नही था वहाँ चारो ओर हरे भरे पेङ-पौधे तथा फलदार वृक्ष संस्था को मनोरमता प्रदान करते हैं।

होमी भाभा का उद्देश्य था कि भारत को बिना बाहरी सहायता से परमाणु शक्ति संपन्न बनाना। मेहनती और सक्रिय लोगों को पसंद करने वाले होमी भाभा अंर्तराष्ट्रीय मंचो पर अणुशक्ति की शान्ती पर बल देते थे। वे मित्र बनाने में भी उदार थे। निजी प्रतिष्ठा की लालसा उनके मन में बिलकुल न थी, एक बार केन्द्रिय मंत्रीमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव मिला किन्तु उन्होने नम्रतापूर्ण प्रस्ताव को अस्विकार कर दिया। मंत्री पद के वैभव से ज्यादा प्यार उन्हे विज्ञान से था।
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Thumbs up Re: प्रेरणादायी जीवन

महान वैज्ञानिक डॉ होमी जहाँगीर भाभा

1955 में होमी भाभ जिनेवा में आयोजित एक सम्मेलन में भाग लेने गये थे, वहां कनाडा ने भारत को परमाणु रिएक्टर बनाने में सहयोग देने का प्रस्ताव दिया। जिसको उचित समझते हुए भाभा वहीं से तार भेजकर पं. जवाहर लाल से अनुमति माँगे, नेहरु जी ने समझौते की अनुमति दे दी तब कनाडा के सहयोग से सायरस परियोजना प्रारंभ हुई। इसके पहले भारत ने पहले रिएक्टर निमार्ण का कार्य शुरू कर दिया था। 6 अगस्त 1956 को इसने कार्य़ करना प्रारंभ कर दिया था जिसके लिए ईधन ब्रिटेन ने दिया था। इस रिएक्टर का उपयोग न्यूट्रॉन भौतिकी, विकिरण, प्राणीशास्त्र, रसायन शास्त्र और रेडियो आइसोटोप के निर्माण में किया जाने लगा। सायरस परियोजना 1960 में तथा जेरिलिना परियोजना 1961 में पूरी हुई। 1200 इंजिनियरों और कुशल कारीगरों ने दिन-रात इसमें काम किया। कार्य पूरा होने पर भारत का इस क्षेत्र में आत्मविश्वास बढा। रिएक्टरों के निर्माण से देश में परमाणु शक्ति से चलने वाले विद्युत संयत्रों की परियोजना का मार्ग प्रश्सत हुआ। तारापुर अणुशक्ति केन्द्र से बिजली का उत्पादन होने लगा बाद में दो अन्य केन्द्र राजस्थान में राणाप्रताप सागर तथा तमिलनाडु में कल्पकम में स्थापित किये गये। ये सभी डॉ. भाभा के प्रयासों का ही परिणाम था। भाभा विदेशी यूरेनियम पर निर्भर नही रहना चाहते थे। वे स्वदेशी थोरियम, स्वदेशी प्लेटोरेनियम आदि का उपयोग बनाना चाहते थे। विश्व में थोरियम का सबसे बङा भंडार भारत में है। केरल के तट पर स्थित मोनेजाइट बालू को संसोधित करके थोरियम और फॉस्फेट को अलग-अलग करना प्रारंभ कर दिया गया। थाम्ब्रे में अपरिष्कृत थोरियम को हाइड्रोआक्साइड तथा यूरेनियम के संसाधन के लिए संयत्र लगाया गया।

डॉ. होमी जहाँगीर भाभा के प्रयासों का ही परिणाम है कि कृषि उद्योग और औषधी उद्योग तथा प्राणीशास्त्र के लिए आवश्यक लगभग 205 रेडियो आइसोटोप आज देश में उपलब्ध हैं। भाभा ने जल्दी नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थों जैसे- मछली, फल, वनस्पति आदि को जीवाणुओं से बचाने के लिए विकिरण के प्रभाव को इस्तेमाल करने की उच्च प्राथमिकता दी और इस दिशा में शोध किया। बीजों के शुद्धीकरण पर भी जोर दिये ताकि अधिक से अधिक उच्च कोटी का अन्न उत्पादन किया जा सके। भूगर्भीय विस्फोटों तथा भूकंपो के प्रभावों का अध्यनन करने के लिए एक केन्द्र बंगलौर से 80 किलोमिटर दूर खोला गया। विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने के लिए उन्होने भारतीय वैज्ञानिकों को भारत वापस आने का आह्वान किया। उनके बुलाने पर कई वैज्ञानिक भारत आए। डॉ.भाभा को वैज्ञानिकों की परख थी, उन्होने चुन-चुन कर कुशल वैज्ञानिकों को टॉम्ब्रे तथा अन्य संस्थानो में योगयता अनुसार पद तथा अनेक सुविधाएं दिलवाई। उन्होने योग्य और कुशल वैज्ञानिकों का एक संगठन बना लिया था। लालफिताशाही से उन्हे सख्त चिढ थी तथा किसी की मृत्यु पर काम बन्द करने के वे सख्त खिलाफ थे। उनके अनुसार कङी मेहनत ही सच्ची श्रद्धांजलि है।

जिनेवा में शान्ति के लिए अणु गोष्ठी में डॉ. होमी भाभा को सभापति बनाया गया। वहाँ पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक इस बात का प्रचार कर रहे थे कि अल्पविकसित राष्ट्रों को पहले औद्योगिक विकास करना चाहिए तब परमाणु शक्ति के पीछे भागना चाहिये । भाभा ने इसका जोरदार खण्डन किया। और कहा कि अल्प विकसित राष्ट्र इसका प्रयोग शान्ति पूर्वक तथा औद्योगिक विकास के लिए कर सकते हैं।

सृजनता को जीवन साथी मानने वाले भाभा आजीवन अविवाहित रहे। उन्होने नाभकीय भौतिकी में महत्वपूर्ण काम किये तथा मेहसाण नामक प्राथमिक तत्व की खोज करने वाले डॉ. भाभा संयुक्त राष्ट्रसंघ और अंर्तराष्ट्रिय अणु शक्ति के कई वैज्ञानिक सलाहाकर मंडलों के सदस्य भी थे। देशभक्त होमी भाभा केवल अपने केन्द्र तक ही सीमित न थे, उन्होने अन्य विज्ञान संस्थानो की भी हर तरह से सहायता की।

अपनी प्रतिभा और विज्ञान की नई उपलब्धियों से उन्हे अनेक सम्मान से सम्मानित किया गया था। 1941 में उन्हे रॉयल सोसाइटी ने फैलो निर्वाचित किया। उस समय उनकी आयु मात्र 31 वर्ष की थी। 1943 में एडम्स पुरस्कार, 1948 में हॉपकिन्स पुरस्कार से सम्मानित होमी भाभा को अनेक विश्व विद्यालयों ने डॉ. ऑफ सांइस जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया। 1959 में ये उपाधी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने भी प्रदान की। 1954 में भारत के राष्ट्रपति ने डॉ. भाभा को पद्मभूषण से अलंकृत किया। होमी भाभा की तीन पुस्तकें क्वांम्टम थ्योरी, एलिमेंट्री फिजीकल पार्टिकल्स एवं कॉस्मिक रेडियेशन बहुत चर्चित पुस्तके हैं।

24 जनवरी 1966 को जब वे अर्तंराष्ट्रीय परिषद में शान्ति मिशन के लिए भाग लेने जा रहे थे तो उन्हे ले जाने वाला बोइंग विमान 707 कंचन जंघा बर्फीले तुफान में उलझकर गिर गया। जिससे भारत माता का स्वप्नद्रष्टा महान पुत्र आकस्मिक इह लोक छोङकर परलोक सिधार गया। उनके सिद्धान्तो को अपनाते हुए टॉम्ब्रे के वैज्ञानिकों ने इस असहनीय दुःख को सहते हुए पूरे दिन परिश्रम पूर्ण कार्य करके उन्हे सच्ची श्रधांजली दी। भारत सरकार ने 12 जनवरी 1967 को टॉम्ब्रे संस्थान का नामकरण उनके नाम पर यानि की भाभा अनुसंधान केन्द्र कर दिया। डॉ. होमी भाभा असमय चले गये किन्तु उनका सपना साकार हो गया, 1974 में भारत पूर्ण परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बन गया।

असाधारण प्रतिभा के धनि होमी भाभा सिर्फ सपने देखने में ही विश्वास नही करते थे, बल्की उन्हे पूरा करने में जुट जाते थे। उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत परमाणु सम्पन्न राष्ट्र की श्रेणी में गिना जाता है। डॉ. भाभा उदार विचार धारा के थे, उनके व्यवहार में मानवियता की झलक सदैव दृष्टीगोचर होती थी। मित्र बनाने में अग्रणी होमी भाभा लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं को भी हल करने में सहयोग देते थे। डॉ. भाभा का प्रयास न सिर्फ भारत के लिए बल्की सभी विकासशील देशों के लिए मूल्यवान है। भारत उनके योगदान का सदैव ऋणी रहेगा। भारत देश को सर्वश्रेष्ठ बनाने की उनकी सोच सदा वंदनीय है। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा की सृजनता तथा मृदुल व्यवहार को शत्-शत् नमन करते हैं।
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Arvind Shah (24-06-2016)
Old 25-09-2014, 06:03 PM   #13
rajnish manga
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Default Re: प्रेरणादायी जीवन

महान वैज्ञानिक डॉ होमी जहाँगीर भाभा

परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को विकसित देशों के समकक्ष ले जाने के लिए डॉ भाभा की सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता. उनके जीवन और कृतित्व पर प्रकाश डालने के लिए आपका धन्यवाद, रफीक जी.
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Arvind Shah (24-06-2016), rafik (29-09-2014)
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soni pushpa
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Default Re: प्रेरणादायी जीवन

awww... बहुत अच्छी जानकारी ..... थैंक्स भाई
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rafik (29-09-2014)
Old 29-09-2014, 01:39 PM   #15
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Thumbs up Re: प्रेरणादायी जीवन

विज्ञान की अमर विभूति सर जगदीश चंद्र बसु



पेङ पौधौं से संबन्धित सवालों की जिज्ञासा बचपन से लिए, धार्मिक वातावरण में पले, जिज्ञासु जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवंबर, 1858 को बिक्रमपुर हुआ था, जो अब ढाका , बांग्लादेश का हिस्सा है । आपके पिता श्री भगवान सिंह बसु डिप्टी कलेक्टर थे। उस दौर में अफसर लोग अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में ही पढाकर अफसर बनाना चाहते थे। परन्तु पिता श्री भगवान सिंह बसु अपने बेटे को अफसर नही बल्की सच्चा देश सेवक बनाना चाहते थे। इसलिए जगदीशचंद्र बसु को पास के स्कूल में दाखिला दिला दिया गया, वहाँ अधिकतर किसानों और मछुवारों के बच्चे पढते थे। वे पढाई भी करते थे, साथ-साथ खेती और दूसरे कामों में अपने घर वालों का हाँथ भी बँटाते थे। उन बच्चों के साथ रहकर बसु ने जीवन की वास्तविक शिक्षा को अपनाया। वहीं उन्हे शारीरिक श्रम करने की प्रेरणा मिली। सबको समान समझने की भावना पैदा हुई, मातृभाषा से प्रेम भी हो गया।
पेङ-पौधों के बारे में जब उनके सवालों का उत्तर बचपन में स्पष्ट नही मिला तो वे बङे होने पर उनकी खोज में लग गये। बचपन के प्रश्न जैसेः- माँ पेङ के पत्ते तोङने से क्यों रोकती थी? रात को उनके नीचे जाने से क्यों रोकती थी? अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण आगे चलकर उन्होंने अपनी खोजों से पूरे संसार को चकित कर दिया।
लंदन से रसायन शास्त्र और वनस्पति शास्त्र में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात भारत वापस आ गये। कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी विज्ञान के अध्यापक बने। कॉलेज में उस समय अधिकतर अंग्रेज शिक्षक ही थे। प्रिंसीपल भी अंग्रेज थे। वहाँ भारतियों के साथ भेदभाव बरता जाता था। समान कार्य हेतु अंग्रेजों के मुकाबले भारतीयों को कम वेतन दिया जाता था। बचपन से ही उन्होने अपने देश और जाति के स्वाभिमान को समझा था अतः उन्होने इस अन्याय का डटकर सामना किया। भारतियों को कम वेतन देने का कारण ये भी था कि उन्हे विज्ञान की पढाई के योग्य नही समझा जाता था।
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Thumbs up Re: प्रेरणादायी जीवन

विज्ञान की अमर विभूति सर जगदीश चंद्र बसु

जगदीश चंद्र बसु के विरोध जताने पर वहाँ के प्रिंसिपल ने उनका वेतन और कम कर दिया, जिसे बसु ने लेने से इंकार कर दिया। बगैर वेतन के वे अपना काम करते रहे। आर्थिक तंगी के कारण उन्हे अनेक परेशानियों का सामना करना पङा किन्तु वे धैर्य के साथ अपनी बात पर अङे रहे। परिणाम स्वरूप उन्हे उनके स्वाभीमान का उचित फल मिला। उनकी ढृणता के आगे कॉलेज वालों को झुकना पङा। वे अन्य भारतियों को भी पूरा वेतन देने को तैयार हो गये। जगदीशचंद्र बसु की नौकरी भी पक्की कर दी गई तथा उनका बकाया वेतन भी उन्हे मिल गया।
बसु पढाने के बाद अपना शेष समय वैज्ञानिक प्रयोग में लगाते थे। उन्होने ऐसे यंत्रो का आविष्कार किया जिससे बिना तार के संदेश भेजा जा सकता था। उनके इसी प्रयोग के आधार पर आज के रेडियो काम करते हैं। जगदीशचंद्र बसु ही बेतार के तार के वास्तविक आविष्कारक हैं परंतु परिस्थिति वश इसका श्रेय उन्हे नही मिल सका।
बसु हार मानने वाले इंसान नही थे, उन्होने पेङ-पौधों पर अध्यन करना शुरु किया वैसे भी इसमें तो उनकी बचपन से जिज्ञासा थी। पेङ-पौधों पर की गई खोज उनके लिए वरदान सिद्ध हुई। उनकी खोज ने ये सिद्ध कर दिया कि पौधे भी सजीवों के समान सांस लेते हैं, सोते जागते हैं और उन पर भी सुख-दुख का असर होता है। उन्होने ऐसा यंत्र बनाया, जिससे पेङ-पौधों की गति अपने आप लिखी जाती थी।इस यंत्र को क्रेस्कोग्राफ (crescograph) कहा जाता है । लंदन स्थित रॉयल सोसाइटी ने उनके आविष्कार को एक अद्भुत खोज कहा और उन्हे रॉयल सोसाइटी का सदस्य भी मनोनित कर लिया।
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विज्ञान की अमर विभूति सर जगदीश चंद्र बसु

इसी खोज को प्रदर्शित करते समय उनके साथ बहुत ही मजेदार घटना घटी। पेरिस में उन्हे पौधों पर तरह-तरह के जहरों का असर दिखाना था। उन्होने एक पौधे पर पोटेशीयम साइनाइड का प्रयोग किया किन्तु पौधा मुरझाने की बजाय और अधिक खिल उठा। पोटेशिय साइनाइड बहुत तेज किस्म का जहर होता है। उसका पौधे पर उलटा असर देख कर उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होने उसे चखा तो वो चीनी थी। वहीं वो कैमिस्ट भी था जिससे पोटेशियम साइनाइड उन्होने मँगाया था। कैमिस्ट ने कहा कि “कल मेरे पास एक नौकर पोटेशियम साइनाइड लेने आया था, मैने सोचा कहीं ये आत्महत्या न कर ले अतः मैने इसे चीनी का पाउडर दे दिया था।“
जगदीशचंद्र बसु निरंतर नई खोज करते रहे, 1915 में उन्होने कॉलेज से अवकाश लेकर लगभग दो साल बाद “बोस इन्स्ट्यूट” की स्थापना की। जो ‘बोस विज्ञान मंदिर’ के नाम से प्रख्यात है। 1917 में सरकार ने उन्हे सर की उपाधी से सम्मानित किया।
सर जगदीश चंद्र बसु केवल महान वैज्ञानिक ही नही थे, वे बंगला भाषा के अच्छे लेखक और कुशल वक्ता भी थे। विज्ञान तो उनके सांसो में बसता था। 23 नवंबर, 1937 को विज्ञान की ये विभूति इह लोक छोङ कर परलोक सीधार गई। आज भी वैज्ञानिक जगत में भारत का गौरव बढाने वाले सर जगदीसचन्द्र बसु का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है। ऐसी विभूतियाँ सदैव अमर रहती हैं।
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Thumbs up Re: प्रेरणादायी जीवन

“मौत का सौदागर"

1888 की बात है, एक व्यक्ति सुबह-सुबह उठ कर अखबार पढ़ रहा था , तभी अचानक उसकी नज़र एक “शोक – सन्देश ” पर पड़ी। वह उसे देख दंग रह गया , क्योंकि वहां मरने वाले की जगह उसी का नाम लिखा हुआ था। खुद का नाम पढ़कर वह आश्चर्यचकित तथा भयभीत हो गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अखबार ने उसके भाई लुडविग की मरने की खबर देने की जगह खुस उसके मरने की खबर प्रकाशित कर दी थी। खैर , उसने किसी तरह खुद को समभाला, और सोचा , चलो देखते हैं की लोगों ने उसकी मौत पर क्या प्रतिक्रियाएं दी हैं।
उसने पढ़ना शुरू किया, वहां फ्रेंच में लिखा था , “”Le marchand de la mort est mort”
यानि , “मौत का सौदागर” मर चुका है”

यह उसके लिए और बड़ा आघात था , उसने मन ही मन सोचा , ” क्या उसके मरने के बाद लोग उसे इसी तरह याद करेंगे ?”
यह दिन उसकी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट बन गया, और उसी दिन से डायनामाइट का यह अविष्कारक विश्व शांति और समाज कल्याण के लिए काम करने लगा। और मरने से पहले उसने अपनी अकूत संपत्ति उन लोगों को पुरस्कार देने के लिए दान दे दी जो विज्ञान और समाज कलायन के क्षत्र में उत्कृष्ट काम करते हैं।
मित्रों , उस महान व्यक्ति का नाम था , ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल , और आज उन्ही के नाम पर हर वर्ष “नोबेल प्राइज ” दिए जाते हैं। आज कोई उन्हें “मौत के सौदागर के रूप” में नहीं याद करता बल्कि हम उन्हें एक महान वैज्ञानिक और समाज सेवी के रूप में याद किया जाता है।
जीवन एक क्षण भी हमारे मूल्यों और जीवन की दिशा को बदल सकता है , ये हमें सोचना है की हम यहाँ क्या करना चाहते हैं ? हम किस तरह याद किये जाना चाहते हैं ? और हम आज क्या करते हैं यही निश्चित करेगा की कल हमें लोग कैसे याद करेंगे ! इसलिए , हम जो भी करें सोच-समझ कर करें , कहीं अनजाने में हम “मौत के सौदागर” जैसी यादें ना छोड़ जाएं !!!
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Arvind Shah (24-06-2016), Dr.Shree Vijay (15-10-2014)
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प्रिय रफीक जी,
एक से बढकर एक प्रेरणादायक कथानक प्रस्तुत करने के लिये आपका हार्दिक आभार.........


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Dr.Shree Vijay
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स्वयं का सही मूल्यांकन :

एक बार स्वामी विवेकानन्द रेल में यात्रा कर रहे थे. एक भिखारी ने अपनी गरीबी का हवाला देते हुए उनसे भीख मांगी. पहले स्वामीजी ने कुछ जबाब नहीं दिया , फिर दूसरी बार भिखारी ने कहा, ‘‘श्रीमान्, मैं बहुत गरीब हूं, मेरे पास कुछ भी नहीं है, मुझ पर दया करो.’’

उसके दुबारा भीख मांगने पर स्वामी जी के आंखों से आंसू टपकने लगे. तपाक से सहयात्री ने पूछा, ‘‘श्रीमान्, क्या बात है ?’’

विवकेकानन्द ने कहा, ‘‘इस अमीर आदमी द्वारा दयनीय जीवन जीने एवं भीख मांगने के कारण मुझे कष्ट हुआ.’’

इस पर सहयात्री ने कहा, ‘‘अरे, यह तो भिखमंगा है. आप इसे अमीर कैसे कह रहे हैं ?’’


तब स्वामीजी ने भिखारी से पूछा, ‘‘क्या आप मुझे अपना बांया हाथ एक लाख रुपयों में बेचोगे ? मैं खरीदना चाहता हूं, रुपये अभी दूंगा.’’ भिखारी ने मना कर दिया.
‘‘क्या दांया हाथ एक लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं!’’‘‘क्या बांया पांव एक लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं!’’‘‘दूसरा पांव दो लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं, यह बेचने के लिये नहीं है.’’
‘‘क्या एक आंख दो लाख में दोगे ?’’ यहां पर भी उत्तर नकारात्मक ही था.‘‘दूसरी आंख के पांच लाख दूंगा’’
‘‘नहीं, मैं इन्हें कैसे बेच सकता हूं?’’

इस पर स्वामीजी बोले, ‘‘बेच तो नहीं सकते, लेकिन इनका उपयोग भीख मांगने के लिये करते हो. इतना सब कुछ होते हुए भी क्या तुम अब भी गरीब हो ? क्या तुम्हारे पास कुछ नहीं है ?

जिसके पास इतना कीमती मानव शरीर है उसे आप क्या कहेंगे ? भिखारी लज्जित होकर चला गया:.........

" हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे पास बहुत कुछ है, पर हम हमेशा जो नहीं है उसी की चिन्ता में दुखी रहते हैं.जीवन में बाधाएं तो अक्सर आती हैं. परन्तु विजेता वही बनता है जो स्वयं का सही मूल्यांकन कर सकता हो !"


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