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Old 19-04-2016, 01:58 PM   #351
soni pushpa
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[QUOTE=rajnish manga;557729]हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?

एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा; बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?

शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : हमअपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।

संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं? कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया।

वह बोले : जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं।
जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं।

जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।

शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।
[size=3]

bahut sahi bat kahi sant ji ne sachh koi zor se chillaye to aaspas ke logo ko bhi achchha nahi lagta .. par krodh or duri ki vajah se ye bat insaan bhul jaten hai jhagadte samy .. nice post thanks bhai ..
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rajnish manga (19-04-2016)
Old 20-04-2016, 01:42 AM   #352
Rajat Vynar
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Talking Re: इधर-उधर से

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Originally Posted by rajnish manga View Post
हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?

एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा; बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?

शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : हमअपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।

संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं? कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया।

वह बोले : जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं।
जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं।

जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।

शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।


Ham toh gusse men sirf muskurate hain aur dhire-dhire thandi-thandi baten karte hain fir bhi na jane kyon samne wala aur bhadakkar aur tezi se chillane lagta hai?
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rajnish manga (20-04-2016)
Old 07-07-2016, 02:10 PM   #353
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जामुन का फल / JAMUN or JAWA PLUM

आजकल बाजार में आमों के साथ साथ जामुन भी खूब आ रहे हैं. काले या जामुनी रंग के दो ही फल मुझे याद आते हैं- एक तो फ़ालसे और दूसरा जामुन. दोनों का स्वाद अन्य फलों के मुकाबले बिलकुल अलग होता है और इन्हें काटे या छीले बिना ही खाया जाता है.. बचपन में हम सड़कों के किनारे लगे पेड़ों से जामुन तोड़ कर खाया करते थे. उम दिनों जामुन के पेड़ बागों में कम ही लगाए जाते थे.


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Old 07-07-2016, 02:13 PM   #354
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अच्छे, पके और स्वादिष्ट होने के साथ साथ अपेक्षाकृत रूप से कुछ सस्ते होने के कारण हम इस फल का सेवन करते हैं. शुरू शुरू में यह दो सौ से तीन सौ रुपये किलो के भाव से मिलते हैं जो इन दिनों 80 से सौ रुपये किलो हो गए हैं और मीठे भी हैं. कहते हैं कि जामुन खाने से शुगर के मरीजों को बहुत लाभ मिलता है.

आज घर में जामुन की चर्चा के दौरान मुझे याद आया कि जब हम छोटे थे तो गली-मौहल्ले में जामुन बेचने वाले सिर पर छाबड़ी या टोकरी में जामुन रख कर लाते थे (कभी कभी रेहड़ी पर भी लाते थे) और बड़ी मधुर आवाज में ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करते थे. मुझे याद आया कि वो पंजाबी लहजे में ऐसे आवाज लगाते थे-

जामुन काले काले रा
जामुन बड़े रसीले रा

तभी हमारी श्रीमती जी ने भी कुछ याद करते हुये एक लाइन जोड़ दी:

जामुन ठंड देणगे पा
(अर्थात जामुन शरीर को ठंडक देंगे)

इसके अलावा भी जो जो विक्रेता चीजें बेचने आते थे या सेवाओं के निमित्त आते थे, वे सब अलग अलग लय में गाते हुये अपनी चीजों तथा सेवाओं के बारे में लोगो को अवगत कराया करते थे. उनकी खूबियों के बारे में फिर कभी.
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Old 03-08-2016, 12:02 PM   #357
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पेपीनो (PEPINO)

यह लगभग 45 वर्ष पहले की बात है. उन दिनों मैं गोल्ड स्पॉट (ऑरेंज फ़्लेवर) कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली कंपनी में काम करता था. इस कंपनी के और भी कुछ प्रोडक्ट थे जो मार्किट में अच्छे चलते थे. उनमे से लिम्का तो आजतक अपना लेमन ड्रिंक्स में अपना अग्रणी स्थान बनाए हुये है. इसके अलावा रिमझिम (मसालेदार फ़्लेवर) और किस्मत (पाइनएप्पल फ़्लेवर) भी इनके लोकप्रिय ब्रैंड थे. उन्हीं दिनों इस कंपनी ने एक नया कोला ड्रिंक निकाला था जिसका नाम रखा गया पेपीनोयह ड्रिंक प्रतिद्वंद्वी कंपनी के लोकप्रिय कोला ड्रिंक कोकाकोला की टक्कर में बाजार में उतारा गया था. पेपीनो ड्रिंक की खूब publicity की गई और पूरी दिल्ली में फ्री सैंपल भी जनता में वितरित किये गए. साउथ दिल्ली में घर घर टीमों को इसके बारे में बताने के लिये भेजा गया. लेकिन इस सारी कवायद के बावजूद पेपीनोलोगों के दिल और दिमाग़ में अपनी जगह बनाने में कामयाब नहीं हुआ. बाद में इस कंपनी ने नया कोला फ़्लेवर थम्स अप नाम से लॉन्च किया और ज़बरदस्त पब्लिसिटी के सहारे इसे काफी हद तक आम जनता में सफलता मिली और खासकर युवाओं में यह ख़ासा मकबूल हुआ.

चलते चलते हम आपको यह बता दें कि बाद में उपरोक्त कोल्ड ड्रिंक प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी को (और उसके प्रोडक्टों को) कालांतर में कोका कोला कंपनी ने अपने स्वामित्व में ले लिया था.
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Old 30-08-2016, 11:43 PM   #358
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क्षमायाचना का पर्व क्षमावाणी

सन 1974 से 1980 के बीच मैं राजस्थान के चूरू (churu) नगर में रहा करता था. अपने 6 वर्ष के प्रवास के दौरान मैं चार मकानों में बतौर किरायेदार रहा. इत्तफ़ाक ऐसा रहा कि ये सारे के सारे मकान मालिक जैन परिवार थे. इनमे से दो परिवार मूलतः चूरू के थे लेकिन काफी समय पूर्व व्यापार के सिलसिले में कलकत्ता चले गए थे और वहीँ रहते थे. वहाँ से केवल विशेष मौकों पर ही चूरू आया करते थे. हाँ उनकी चिट्ठियाँ बराबर आती रहती थीं, मैं भी उन्हें लिखता रहता था. उन दिनों टेलीफोन का प्रयोग सामान्य रूप से नहीं होता था.

ये दोनों महानुभाव मुझसे बहुत प्यार रखते थे. निरंतर पत्राचार के बीच साल में एक बार पर्युषण पर्व के दौरान क्षमा पर्व पर उनका पत्र (आम तौर पर पोस्टकार्ड) अवश्य आता था. इस पत्र में वे लिखते थे कि यदि उनसे जाने या अनजाने मेरे प्रति कोई गलती हो गई हो तो मैं उन्हें क्षमा कर दूँ. तो यह था उन बुज़ुर्ग लोगों का प्यार तथा अपने अहंकार को हटाने का एक तरीका. यह उन लोगों का बहुत बड़प्पन था. मैं तो उनसे बहुत छोटा था उमर में भी और अनुभव में भी. मुझे आज भी उनकी बहुत याद आती है.
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पर्युषण पर्व के अंतर्गत ही क्षमावाणी पर्व के महत्व के बारे में आदरणीय मुनि विद्यासागर जी इस प्रकार हमें बताते हैं:

दस दिनों तक चलने वाला यह पर्युषण पर्व जैन समुदायी बहुत ह*ी सद्*भाव और संयम से मनाते है। इसमें क्षमावणी पर्व का अपना एक अलग ही महत्व होता है। क्षमा पर्व हमें सहनशीलता से रहने की प्रेरणा देता है।

क्रोध को पैदा न होने देना और अगर हो भी जाए तो अपने विवेक से, नम्रता से उसे विफल कर देना। अपने भीतर आने वाले क्रोध के कारण को ढूँढकर, क्रोध से होने वाले अनर्थों के बारे में सोचना और अपने क्रोध को क्षमारूपी अमृत पिलाकर अपने आपको और दूसरों को भी क्षमा की नजरों से देखना।
अपने से जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए खुद को क्षमा करना और दूसरे के प्रति भी इसी भाव को रखना इस पर्व का महत्व है। अपने अंदर क्षमा के गुणों का निरंतर चिंतन करते रहना।

क्षमा पर्व मनाते समय अपने मन में छोटे-बड़े का भेदभाव न रखते हुए सभी से क्षमा माँगना इस पर्व का उद्देश्य है। हम सब यह क्यों भूल जाते हैं कि हम इंसान हैं और इंसानों से गलतियाँ हो जाना स्वाभाविक है।

ये गलतियाँ या तो हमसे हमारी परिस्थितियाँ करवाती हैं या अज्ञानतावश हो जाती हैं। तो ऐसी गलतियों पर न हमें दूसरों को सजा देने का हक है, न स्वयं को। यदि आपको संतुष्टि के लिए कुछ देना है तो दीजिए क्षमा।

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Default Re: इधर-उधर से

हमारे समाचार चैनेल कितने ज़िम्मेदार हैं?

हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और खास तौर पर हिंदी समाचार चैनेल कितने संवेदनशील व ज़िम्मेदार है, यह मैंने उस समय महसूस किया जब आई बी एन 7 चैनेल पर उरी (जे एंड के) में सेना मुख्यालय पर हुये आतंकी हमले के विषय में एक Debate चल रही थी और सम्मानित आमंत्रित अतिथियों द्वारा गंभीर विचार विनिमय हो रहा था.


लगभग 12.40 बजे दोपहर का समय था और एक विशेषज्ञ समस्या से निबटने के लिये अपनी राय और सुझाव रख रहे थे कि इतने में ही महिला एंकर ने उन्हें बीच में रोक दिया और घोषणा करने लगी कि 'अभी अभी एक बड़ी खबर आ रही है. इस वक़्त की बड़ी खबर यह है कि दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के ऊपर स्याही फेंकी गई....

इसके बाद (विज्ञापनों के समय को जोड़ कर) अगले 40 मिनट तक इस चैनेल पर सिसोदिया का स्याही काण्ड चलता रहा यानी 1.40 बजे तक. भारत की सुरक्षा से जुड़ी उस गंभीर बहस का अब कोई नामो निशान तक नहीं था. दरअस्ल, उस डिबेट को बीच में ही अधूरा खत्म कर दिया गया और कोई सूचना तक नहीं दी गई या माफ़ी तक नहीं मांगी गई. क्या हमारा मीडिया इतना विवेकहीन हो गया है कि उसे किसी बात की प्राथमिकता का भी ध्यान नहीं रहता? यह बहुत दुखद है.
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