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Old 01-07-2016, 04:35 PM   #1
soni pushpa
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दो संन्यासी युवक यात्रा करते-करते किसी गाँव में पहुँचे।
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लोगों से पूछा हमें एक रात्रि यहाँ रहना है किसी पवित्र परिवार का घर दिखाओ
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लोगों ने बताया कि वहा एक चाचा का घर है। साधु-महात्माओं का आदर सत्कार करते हैं।
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अखिल ब्रह्माण्डमां एक तुं श्रीहरि' का पाठ उनका पक्का हो गया है। वहाँ आपको ठीक रहेगा।
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उन्होंने उन सज्जन चाचा का पता बताया। दोनों संन्यासी वहाँ गये।
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चाचा ने प्रेम से सत्कार किया, भोजन कराया और रात्रि-विश्राम के लिए बिछौना दिया।
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रात्रि को कथा-वार्ता के दौरान एक संन्यासी ने प्रश्न कियाः की आपने कितने तीर्थों में स्नान किया है ?
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कितनी तीर्थयात्राएँ की हैं। ?
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हमने तो चारों धाम की तीन-तीन बार यात्रा की है।
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चाचा ने कहा.. मैंने एक भी तीर्थ का दर्शन या स्नान नहीं किया है।
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यहीं रहकर भगवान का भजन करता हूँ और आप जैसे भगवत्स्वरूप अतिथि पधारते हैं तो सेवा करने का मौका पा लेता हूँ।
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अभी तक कहीं भी नहीं गया हूँ।
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दोनों संन्यासी आपस में विचार करने लगेः ऐसे व्यक्ति का अन्न खाया !
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अब यहाँ से चले जायें तो रात्रि कहाँ बितायेंगे ? यकायक चले जायें तो उसको दुःख भी होगा। चलो, कैसे भी करके इस विचित्र वृद्ध के यहाँ रात्रि बिता दें।
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जिसने एक भी तीर्थ नहीं किया उसका अन्न खा लिया, हाय ! आदि-आदि।
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इस प्रकार विचारते हुए वे सोने लगे लेकिन नींद कैसे आवे !
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करवटें बदलते-बदलते मध्यरात्रि हुई।
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इतने में द्वार से बाहर देखा तो गौ के गोबर से लीपे हुए बरामदे में एक काली गाय आयी.... फिर दूसरी आयी.... तीसरी, चौथी.... पाँचवीं... ऐसा करते-करते कई गायें आयीं।
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हरेक गाय वहाँ आती, बरामदे में लोटपोट होती और सफेद हो जाती तब अदृश्य हो जाती।
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ऐसी कितनी ही काली गायें आयीं और सफेद होकर विदा हो गयीं।
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दोनों संन्यासी फटी आँखों से देखते ही रह गये। वे दंग रह गये कि यह क्या कौतुक हो रहा है !
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आखिरी गाय जाने की तैयारी में थी तो उन्होंने उसे प्रणाम करके पूछाः
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हे गौ माता ! आप कौन हो और यहाँ कैसे आना हुआ ?
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यहाँ आकर आप श्वेतवर्ण हो जाती हो इसमें क्या रहस्य है ? कृपा करके आपका परिचय दें।
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गाय बोलने लगीः हम गायों के रूप में सब तीर्थ हैं। लोग हममें गंगे हर... यमुने हर.... नर्मदे हर... आदि बोलकर गोता लगाते हैं।
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हममें अपने पाप धोकर पुण्यात्मा होकर जाते हैं और हम उनके पापों की कालिमा मिटाने के लिए द्वन्द्व-मोह से विनिर्मुक्त आत्मज्ञानी, आत्मा-परमात्मा में विश्रान्ति पाये हुए सत्पुरूषों के आँगन में आकर पवित्र हो जाते हैं।
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हमारा काला बदन पुनः श्वेत हो जाता है।
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तुम लोग जिनको अशिक्षित, गँवार, बूढ़ा समझते हो वे बुजुर्ग के जहाँ से तमाम विद्याएँ निकलती हैं.... उस आत्मदेव में विश्रान्ति पाये हुए आत्मवेत्ता संत हैं।
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तीर्थी कुर्वन्ति जगतीं....
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ऐसे आत्मारामी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष जगत को तीर्थरूप बना देते हैं।
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अपनी दृष्टि से, संकल्प से, संग से जन-साधारण को उन्नत कर देते हैं।
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ऐसे पुरुष जहाँ ठहरते हैं, उस जगह को भी तीर्थ बना देते हैं।


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rajnish manga (02-07-2016)
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तुम लोग जिनको अशिक्षित, गँवार, बूढ़ा समझते हो वे बुजुर्ग के जहाँ से तमाम विद्याएँ निकलती हैं.... उस आत्मदेव में विश्रान्ति पाये हुए आत्मवेत्ता संत हैं।
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तीर्थी कुर्वन्ति जगतीं....
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ऐसे आत्मारामी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष जगत को तीर्थरूप बना देते हैं।
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अपनी दृष्टि से, संकल्प से, संग से जन-साधारण को उन्नत कर देते हैं।
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ऐसे पुरुष जहाँ ठहरते हैं, उस जगह को भी तीर्थ बना देते हैं।
बहुत रोचक, ज्ञानवर्धक व प्रेरणा देने वाला प्रसंग. शेयर करने के लिये आपका धन्यवाद, बहन पुष्पा जी.

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आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वतः (ऋग्वेद)
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soni pushpa (04-07-2016)
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soni pushpa
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बहुत बहुत धन्यवाद भाई उत्साह वर्धक टिपण्णी के लिए .
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