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Old 02-10-2017, 01:01 AM   #191
rajnish manga
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मुहावरों वाली कथा (5)

हमने सोचा कि अपनी यह जो हिंदी भाषा है न
,पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने की क्षमता रखती है, यह स्वामी दयानन्द सरस्वती का कथन है. इसकी उन्नति से किसी भी भाषा का नुक्सान नहीं है. यह तो क्षेत्रीय भाषाओँ के बीच एक पुल का काम कर सकती है. क्यों न हम एक ऐसी रचना लिखें, जिस मे बहुत से मुहावरों और कहावतों का प्रयोग हो. जिसे लोग चटखारे ले ले कर पढ़ें. सो हमने आव देखा न ताव, झट से सारी दुनिया में ढिंढोरा पीट आये कि हम यह करने वाले हैं. इस तरह हमने अपने पैर पर कुल्हाड़ी दे मारी, आ बैल मुझे मार. इस तरह हमने मुसीबतों का पहाड़ हमेशा की तरह अपने उपर गिरा लिया. असल में बात यह है कि हमें पढना लिखना बिल्कुल बिल्कुल नहीं आता. हम पूरे अंगूठा टेक हैं, पढना लिखना हमारे लिए टेढ़ी खीर है. काला अक्षर भैस बराबर है. यह तो आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा काम है, उलटी गंगा पहाड़ चढाने जैसा है. यह तो हमारे बल बूते के बाहर की बात है.पर जहाँ चाह वहां राह. हमने लोगों से पूछा कि कैसे लिखा जाता है. कोई हमसे सीधे मुंह बात ही न करे. लोग हमसे किनारा करने लगे. हमसे नजरें चुराने लगे. सामने पड़ जाते तो मुंह फेर लेते. पर कहा गया है न कि हारिये न हिम्मत,बिसारिये ना राम. हमने नदी,पेड़,पहाड़,पशु,पक्षी,सबसे पूछ डाला. पर नतीजा वही ढाक के तीन पात. ठन ठन गोपाल.


(क्रमशः)
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आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वतः (ऋग्वेद)
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Old 02-10-2017, 01:15 AM   #192
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मुहावरों वाली कथा (6)

अंत में हमने सोचा कि घर का जोगी जोगना,गाँव का जोगी सिद्ध. घर की मुर्गी दाल बराबर. घर में पढ़ी लिखी पत्नी के रहते हुए,हम क्यों दर दर की ठोकरें खाएं. हम किसी को भाव क्यों दें. हमने पत्नी के पास जा कर कहा

सुनो बात तुम मेरी जरा सी

हे मेरे सुख दुःख की साथी
जरा दया हम पर भी करना
अपनी कृपा बनाये रखना

भूत के मूंह में राम राम. आज सूरज पश्चिम से कैसे निकला. मेरी इतनी लल्लो चप्पो क्यों कर रहे हो?

मैंने कहा---एक कलम तोड़ लेख लिख कर पाठकों को मुहावरे सिखाना चाहता हूँ. पर मुझे पता नहीं है कि कैसे लिखा जाता है. तुम इस काम में मेरी मदद करो.


(क्रमशः)
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Old 02-10-2017, 01:23 AM   #193
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मुहावरों वाली कथा (7)

पत्नी बोली: जब नहीं आता तो न लिखो. उतने ही पैर पसरो,जितनी लम्बी चादर हो. लिखते समय पैन पर इतना जोर न लगाओ कि वह टूट ही जाए. पर तुमने तो मेरी कोई भी बात न मानने की कसम चबा कर खाई हुई है. कान में हमेशा तेल डाले रहते हो. तुम्हारे कान पर तो जूं तक नहीं रेंगती. मेरी बात अगर मानी होती तो आज बड़े सुखी होते. खुद को कुछ पता नहीं है, बेचारे पाठकों को क्या समझाओगे. बसी नहीं ससुराल नसीहत दे सखियन को. घर में नहीं हैं दाने अम्मा चली भुनाने. आजकल जिसकी भलाई करो वही काटने को दौड़ता है हम तुम्हारी सेवा में आकाश=पाताल एक किये देते हैं,पर एक तुम हो,जो हमें ऑंखें दिखाते रहते हो. भले आदमी, एक मैं ही हूँ ,जो तुम्हारे साथ काटती हूँ. कोई दूसरी होती तो कब की भाग खड़ी होती.

बात तो सच ही है.हम तो बगलें झाँकने और हाथ मलने लगे.हाथ कंगन को आरसी क्या.हम तो यह सुन कर चारों खाने चित्त हो गये.सिट्टी पिट्टी गम हो गयी.काटो इओ खून नहीं.पर हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम.

(क्रमशः)
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Old 02-10-2017, 01:34 AM   #194
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मुहावरों वाली कथा (8)

हमने कहा: भले काम के लिए तो तुम्हारी मदद मांग रहा हूँ.
राजभाषा का विकास है बड़ा जरूरी
जन जन की आशा हो पूरी
पत्नी- कहीं कटे न नाक तुम्हारी
कहीं लुटे ना लाज
जब इज्जत का प्रश्न बना है
रचनाओं का स्तर सुधारों महाराज


पत्नी जी की बात सुन कर हम तो जल भुन गये. आग बबूला हो गये. बहुत लाल पीले हुए. यह तो सिर मुंडाते ही ओले पड़े. यह तो ठीकरा हमारे सिर पर ही फूट गया. हमने सोचा कि इससे पहले पानी सिर के ऊपर से गुजर जाए,क्यों ना नहले पर दहला मारते हुए,ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाए. सारा दोष इन्हीं के माथे मढ़ा जाये. क्यों न समस्या से दो चार हुआ जाए.


(क्रमशः)
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Old 02-10-2017, 01:39 AM   #195
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मुहावरों वाली कथा (9)

हमने कहा- भागवान, यही कारण है कि राजभाषा का विकास नहीं होता. तुम्हारा तो वही हाल है कि बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद. थोथा चना बजे घना. अधजल गगरी छलकत जाए.यह कह कर हमने उन्ही का तीर उन्हीं पर चला दिया और अपना उल्लू सीधा कर लिया. हम ऐसे खुश हुए जैसे हमने किला फतेह कर लिया हो,चाहे हमें उधार ले कर लड़ना पड़ा हो. हमें क्या पता था कि हमने भिड के छत्ते में हाथ डाल दिया था. हमारी पत्नी हमें खरी खरी सुनाने लगी.

वह बोली कि तुम निरे बछिया के ताऊ हो. तुम से कुछ नहीं होता. बस कोल्हू के बैल की तरह काम करना ही जानते हो. तुम मेरे काम में मीन मेख भी नहीं निकाल सकते हो. कोई गलती हो जाए तो भी कुछ नहीं कहते हो. तुम बच्चों को भी नहीं डांटते हो. उन्हे बस प्यार से समझा देते हो कि मेरी बात ध्यान से सुनें. वह भी तुम्हारी बात बिना ना नुकुर किये ही मान जाते हैं. हम चाहे दिन भर चिल्लाते रहें
,इन पर कोई असर नहीं होता. हमारा तो इस घर में कोई वजूद ही नहीं है.

हुंह
,यह भी कोई बात हुई. तुम अपनी पत्नी पर जरा भी तरस नहीं खाते कि बच्चों को कभी डांट ही दो ताकि वोह तुमसे इसी बहाने कभी लड़ ही ले. हमारी तलवारों में तो जंग ही लग गया है. बड़े बड़े सपने देखे थे तुम से लडने के,सब चूर चूर हो गये, सब पर पानी फिर गया. सब कुछ खाक में मिल गया. सब धरा का धरा ही रह गया. सब गुड गोबर हो गया. तुमने ही बच्चों को सर पर चढ़ाया हुआ है. जब भुगतना पड़ेगा तब तुम्हें आटे दाल का भाव पता चलेगा बच्चे पढने लिखने में ध्यान नहीं देते.बस इधर की उधर लगाते फिरते हैं. ये पढ़ लिख कर कुछ बन जाएँ, तो मैं तो बस गंगा नहा लूं. वैसे तुम मेरे बच्चों को कुछ नहीं कह सकते. मैं चाहे जो मर्जी कहूं.
(क्रमशः)
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Old 02-10-2017, 01:44 AM   #196
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मुहावरों वाली कथा (10)

फिर हमारा उतरा हुआ चेहरा देख कर पत्नी ने कहा- मेरी किसी बात का बुरा मत मानना. हमारा धर्म ही तुम्हारी हर बात को काटना है
, चाहे वह कितनी भी सही क्यों न हो. जो पत्नी अपने पति को जितनी ज्यादा खरी खरी सुनाती है,वह अपने पति से उतनी ही ज्यादा खुश और संतुष्ट होती है. पति का चरित्र उतना ही उज्ज्वल माना जाता है. जिस घर में पत्नी अपने पति से संतुष्ट और खुश होती है,वहाँ यो देवताओं का वास होता है.

तभी हमारे बच्चे भी हंसते हुए यानी खीसें निपोरते हुए वहां पहुंच गये. बोले माँ का जब भी मन भारी होता है तब वह पिताजी से लोहा ले कर तरोताजा हो जाती है. वैसे आपका यश आप के पीठ फिराते ही डंके की चोट पर गाती है.


(क्रमशः)
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Old 02-10-2017, 01:49 AM   #197
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मुहावरों वाली कथा (11)

हमने भी मोके का फायदा उठाते हुए बहती गंगा में हाथ धोते हुए पत्नी के सिर चढ़ कर बच्चों को बनावटी क्रोध से डाँटना शुरू किया. तुम पढने लिखने में ध्यान दिया करो. ज्यादा तीन पांच नकरो. वरना वह हाल करूंगा कि छठी का दूध याद आ जायेगा. हमने सोचा कि बच्चे वहां से नौ दो ग्यारह हो जायेंगे. रफूचक्कर हो जायेंगे. हवा हो जायेंगे. छू मंतर हो जायेंगे. पढने बैठ जायेंगे. पर बच्चे तो हमसे बुरी आदत की तरह प्यार से हमसे चिपट गये.

हमारी तो बांछें ही खिल गईं. हमने खुश हो कर कहा कि हमें गागर में सागर भरना तो आता नहीं. निबंध लेखन में हमारे नम्बर जरा कम ही आते थे. इसलिए हमारी रचनाएँ जरा लम्बी होती हैं. पर एकता में बड़ा ही बल है. मेरे प्यारे बच्चो,
तुम सब भाई बहन मिल कर मेरी रचनाओं का एक भाग पढ़ डालो और एक दूसरे को सुना दो. इससे किसी एक के दिमाग पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा.

(क्रमशः)
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Old 02-10-2017, 01:54 AM   #198
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मुहावरों वाली कथा (12)

इसके बाद पता नहींक्या हुआ कि बच्चे वहाँ से सिर पर पैर रख कर भागे. वे जोर जोर से चीखें मार रहे थे और नहीं-नहीं कह रहे थे. दुम दबा कर और जान ले कर भागे. ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग.

ऐसा दुर्लभ, विरल ज्ञान और सम्मान पा कर हम ख़ुशी से फूले नहीं समाये. हमारा दिल बाग़ बाग़ हो गया. हम फूल कर कुप्पा हो गये. हम ख़ुशी ख़ुशी टीवी पर राक्षसी सासों और चुड़ैल बहुओं वाले सीरीयल देखने लगे.


(इति)
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Old 10-10-2017, 12:16 PM   #199
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मुहावरों वाली कहानी
सांच को आंच
(इन्टरनेट से साभार)

किसी नगर में दो मित्र थे। एक का नाम रामथा और दूसरे का श्याम। बचपन में दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। मगरदोनों की आर्थिक स्थिति में जमीन-आसमान का फर्क था। राम के पिता एक बड़े व्यापारी थे और उनकी बदौलत राम बिना कुछ किए ही मालामाल हो गया।

कहावत है कि पैसा ही पैसे को खींचता है। राम ने भी जब पिता का व्यवसाय सँभाला तोउसकी संपत्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी। वहीं दूसरी ओरश्याम केपिता अत्यंत गरीब थे। स्कूल से मिले वजीफे के सहारे श्याम ने जैसे-तैसे स्कूल की पढ़ाई पूरी की। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के लिए श्याम को आकाश-पाताल एक करना पड़ा। मदद माँगने पर सभी रिश्ते नातेदारों ने उसेअँगूठा दिखा दिया।

अंतमें उसने ट्यूशन तथा अखबार बेचने जैसा पार्ट टाइम काम किया एवं इस तरह लोहे के चने चबाते हुए कॉलेज की फीस की व्यवस्था की एवं पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी धाक जमा दी।


(क्रमशः)
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Default Re: मुहावरों की कहानी

राम भी पास होकर स्नातक हो गया और उसके घर में घी के दिये जलाए गए। मगर श्याम के घर ऊँट के मुँह में जीरे के बराबर तेल भी नहीं था। अत: उसने तेते पाँव पसारिये, जेती लांबी सौर वाली लोकोक्ति पर अमल करते हुए फिल्मी गीत पर डांस ही कर लिया। स्नातक होने के बाद श्याम ने नौकरी पाने के लिए दस जगह की खाक छानी। मगर कहीं भी उसकी दाल नहीं गली। अंतत: उसने बैंक से लोन लेकर एक पावरलूम मशीन डाल ली।

शुरू में इतनी कठिनाइयाँ आई मानो सिर मुँडाते ही ओले पड़ गए हों। मगर धीरे-धीरे उसका काम चल निकला। जिन लोगों के कारण उसकी नाक में दम रहता था और जीना मुहाल हो गया था, जो उसे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे, उन्होंने भी उसकी काबिलियत का लोहा मान लिया।

रामका एक बेटा अमित था जो उसकी आँखों का तारा था। श्याम का भी एक बेटा सुमित था जो कि उसके कलेजे का टुकड़ा था। संयोग से दोनों मित्रों के ये पुत्र एक ही स्कूल में पढ़ते थे। उनकी मित्रता देखकर लोग दंग रह जाते थे कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। मगर मित्रता अमीरी-गरीबी नहीं देखती।

(क्रमशः)
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