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अगर आप हिंदी क्राइम फिक्शन (Crime Fiction) के शौकीन हैं, तो 'सुरेंद्र मोहन पाठक' का नाम आपके लिए नया नहीं होगा। उन्हें हिंदी पल्प फिक्शन का 'बेताज बादशाह' कहा जाता है।
आज हम उनकी एक ऐसी ही चर्चित किताब 'काला कारनामा' (Kala Karnama) का रिव्यु करने जा रहे हैं। यह किताब सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री या थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज और सिस्टम के उस अंधेरे सच को उजागर करती है, जिसे हम अक्सर देखकर भी अनदेखा कर देते हैं।
आइये जानते हैं कि आखिर इस उपन्यास में ऐसा क्या है जो इसे एक 'मस्ट-रीड' (Must-Read) बनाता है।
कहानी: लालच और गुनाह का दलदल (The Plot)
'काला कारनामा' की कहानी महज चोर-पुलिस की भागदौड़ नहीं है। यह कहानी उन हालातों (situations) का ताना-बाना है जहाँ सत्ता का नशा (Power), अंधा लालच (Greed) और निजी स्वार्थ (Self-interest) एक आम इंसान को भी गुनाह के रास्ते पर धकेल देता है।लेखक ने बहुत ही बारीकी से दिखाया है कि कोई भी इंसान रातों-रात अपराधी नहीं बनता। शुरुआत छोटे-छोटे समझौतों (Compromises) से होती है, जो आगे चलकर एक बड़े "काला कारनामा" या जघन्य अपराध का रूप ले लेते हैं। जैसे-जैसे आप पन्ने पलटते हैं, सस्पेंस और गहरा होता जाता है। पाठक के तौर पर आप अंत तक यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि आगे क्या होगा।
अतिरिक्त जानकारी: सुरेंद्र मोहन पाठक अपने उपन्यासों में जिस 'विमल' (सरदार सुरेंद्र सिंह सोहल) चरित्र के लिए मशहूर हैं, उनकी कहानियों में अक्सर सिस्टम से सताया हुआ एक बागी (Anti-hero) देखने को मिलता है। 'काला कारनामा' में भी आपको वही क्लासिक 'पाठक स्टाइल' देखने को मिलेगा जहाँ नैतिकता और अपराध के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।
लेखन शैली: आँखों के सामने तैरते दृश्य (Writing Style)
सुरेंद्र मोहन पाठक की सबसे बड़ी ताकत उनकी सरल और सीधी भाषा है। 'काला कारनामा' में भी उन्होंने क्लिष्ट हिंदी के बजाय उस भाषा का इस्तेमाल किया है जो आम पाठक के दिल में उतर जाए।- संवाद (Dialogues): किताब के डायलॉग्स बेहद दमदार हैं। वे फिल्मी नहीं लगते, बल्कि हकीकत के करीब लगते हैं।
- चित्रण (Description): सीन्स का विवरण इतना सजीव (Vivid) है कि पढ़ते वक्त ऐसा लगता है मानो आपके सामने कोई फिल्म चल रही हो। लेखक की यह खूबी कहानी के इमोशन और नैरेशन को और भी गहराई देती है।
किरदार और उनका संघर्ष (Characterization)
इस उपन्यास के किरदार हवाई नहीं हैं; वे हमारे और आपके बीच के लोग लगते हैं। उनकी अपनी कमजोरियां हैं, उनके अंदर एक द्वंद्व (Inner conflict) चल रहा है। यही वो चीज़ है जो कहानी को विश्वसनीय (Realistic) बनाती है।कहानी का नायक (Protagonist) और खलनायक (Antagonist) जब आमने-सामने होते हैं, तो वह सिर्फ दो लोगों की लड़ाई नहीं होती, बल्कि वह 'नैतिकता बनाम लालच' (Morality vs Greed) का संघर्ष होता है। लेखक ने यह बखूबी दिखाया है कि कैसे इंसान अपने फैसलों से ही हीरो या विलेन बनता है।
किताब का सन्देश: क्या हम भी जिम्मेदार हैं?
'काला कारनामा' मनोरंजन से बढ़कर भी कुछ है। इसका मुख्य सन्देश (Core Message) यह है कि समाज में हो रहे काले कारनामे किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का नतीजा होते हैं।यह किताब आपको आत्म-चिंतन (Self-introspection) करने पर मजबूर करती है। पढ़ते वक्त आप खुद से सवाल करेंगे—क्या हम अपने छोटे-छोटे गलत चुनावों (Choices) से समाज को उस दिशा में नहीं ले जा रहे, जहाँ अपराध पनपता है?
हमारा फैसला (Final Verdict)
अगर आप सिर्फ़ टाइम पास के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसी कहानी पढ़ने के लिए किताब ढूंढ रहे हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर दे, तो 'काला कारनामा' आपके लिए है।यह उपन्यास सामाजिक वास्तविकता (Social Reality), नैतिक दुविधाओं (Moral Dilemmas) और थ्रिलर का एक बेहतरीन मिश्रण है। सुरेंद्र मोहन पाठक के पुराने पाठकों के लिए यह एक तोहफा है, और नए पाठकों के लिए हिंदी क्राइम लिटरेचर में कदम रखने की एक शानदार शुरुआत।